6 मई 2026

जो हमें करना था यह उन्होंने कर दिखाया !





जो हमें करना था यह उन्होंने कर दिखाया !
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समाजवादी पार्टी का विभाजन तो उसी दिन हो गया था जिस दिन अखिलेश यादव ने नेताजी से सब कुछ ले लिया था और नेताजी ने उस दिन समाजवादी पार्टी को समाप्त कर दिया था जिस दिन उन्होंने अपने पुत्र को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था !
यद्यपि मैं भी इस बात का पक्षधर था कि अब अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री का पद दे देना चाहिए और जब यह हुआ हमें भी इस बात की प्रसन्नता हुई कि मेरी भी बात मानी गई है। तब तक मैं अखिलेश यादव के बारे में उतना नहीं जानता था जितना कि उनसे अपेक्षा करता था, समय-समय पर जो बातें आती रहीं उनसे लगता था कि युवा हैं सीख रहे हैं और नेता जी का संरक्षण है बहुत कुछ सीख जाएंगे।
लेकिन जब यह लगने लगा की यह सीख नहीं रहे हैं और लोग इनका दुरुपयोग कर रहे हैं, इसलिए कि या तो यह कुछ जानते नहीं या यह बहुत कुछ जानबूझकर करने दे रहे हैं अक्सर आता था कि वह अकेले मुख्यमंत्री नहीं हैं बल्कि प्रदेश में साढे़ तीन मुख्यमंत्री हैं। आधा मुख्यमंत्री कौन है इस बारे में जो जानकारी हुई उसमें ही इन्हें रखा जाता था।
ख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते य
अब सवाल यह है कि सैफई परिवार का युवराज अपने घर से ही मात खाना शुरु कर दिया है उसके सबसे शक्तिशाली चाचा ने अपनी एक पार्टी बना ली है और ऐसा कहा जा रहा है कि माननीय नेता जी उसी की तरफ हैं, सैफई घर संभालेगा या प्रदेश देश की तो छोड़िए उसके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया। आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व
मुह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था। इनके​आचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठा
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि
क्याकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला । प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं। राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परा
स्तसाथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल हैके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया।
आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व मुख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते यह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि क्या विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था।


इनके​आचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठाकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला ।
प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है

12 अप्रैल 2025

बिहार उत्तर प्रदेश पर असली नज़र है

बिहार उत्तर प्रदेश पर असली नज़र है  

बिहार और उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी ज्यादा है !
भारतीय राजनीति में जिन लोगों का पदार्पण हो गया है वह कौन है यह बताने की जरूरत नहीं है उनकी मानसिकता क्या है यह भी बताने की जरूरत नहीं है जो सबसे ज्यादा जरूरी है वह यह है कि जनता की अभी सच में विरोध कायम है कल कहीं इसको एकदम से ना दबा दिया जाए जबकि पूरी कोशिश की गई है कि जनता किस तरह से भयभीत रहे लेकिन अभी भी संभावना है बिहार और उत्तर प्रदेश में कि वहां की जनता खड़ी हो सकती है। 
पिछले दिनों हमने देखा मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ हरियाणा महाराष्ट्र और अभी हाल में दिल्ली किस तरह से भाजपा ने अपने कब्जे में कर लिया है। 
यह किसी को भरोसा नहीं था कि इन राज्यों में ऐसा होने जा रहा है लेकिन ऐसा हुआ मीडिया ने बहस करके यह समझा दिया कि जनता भाजपा के पक्ष में थी। 
उत्तर प्रदेश में भी यही हुआ था जो आम आदमी को भी इस बात की खबर और विश्वास था कि भाजपा नहीं आ रही है लेकिन भाजपा आई। 
अब सवाल यह है कि आने वाले दिनों में बिहार में चुनाव होने वाले हैं बिहार भाजपा के लिए उतना मुफीद राज्य नहीं है, लेकिन अभी जिस तरह की भाजपा की योजनाएं हैं और देश की लोकतंत्र की रक्षा की संस्थाएं हैं वह किस तरह से घाल मेल कर रही हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। 
पिछले दिनों राष्ट्रीय अधिवेशन में बिहार के प्रमुख विपक्षी दल के नेता श्री तेजस्वी यादव ने यह स्वीकार किया था कि अभी तो बिहार में बहुत तरह की ऐसी नीतियां लागू की जाएगी जिससे उनको हराया जा सके। 
हमें गंभीरता से विचार करना होगा की आने वाले चुनाव में बिहार के बाद अन्य प्रदेशों को किस तरह से भाजपा प्रदेश बनाने की योजना जारी रहेगी। 
उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में यह पता चल गया कि भाजपा के खिलाफ इस तरह का माहौल है लेकिन उपचुनाव में गणित कुछ और था और वहां के मुख्य विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इस बात को चिल्ला चिल्ला के कहते हैं कि ईवीएम किसी तरह भी विश्वसनीय नहीं है।
समय रहते उत्तर प्रदेश और बिहार को विशेष रूप से पूरे देश के लोगों को विश्वास में लेकर एक आंदोलन खड़ा करना चाहिए जिसमें जनता सड़क पर आए और ईवीएम की बचाए बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए और तब तक यह आंदोलन जारी रहे जब तक इस मांग को मान ना लिया जाए।
यह भी विचारणीय है कि कांग्रेस क्या चाहती है पिछले दिनों ऐसा देखने में आया है कि कांग्रेस कई प्रदेशों में अपनी गलत रणनीति की वजह से चुनाव हार चुकी है उसके पीछे कांग्रेस में बैठे संघ के विचारधारा के लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं। 
राहुल गांधी को इन लोगों से भिन्न माना जा सकता है और उनके साथ इंडिया गठबंधन की अवधारणा के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है और उनको यह समझने की जरूरत है कि यह समय बिहार और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बढ़ाने का नहीं है यह समय उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा को ना आने देने की है। 
जयराम रमेश कन्हैया कुमार और बहुत सारे ऐसे नाम हैं जो कांग्रेस में बैठकर के संघ की मानसिकता को ज्यादा बल देते हैं।
जब आज नेताजी नहीं है माननीय शरद यादव जी नहीं है आदरणीय लालू प्रसाद यादव जी अस्वस्थ हैं ऐसे में बहुत जरूरी है कि नई पीढ़ी को अपने इर्द-गिर्द ऐसे लोगों को रखने की जो हमारे वरिष्ठ नेताओं के विचारधारा को सहयोग कर सके और वर्तमान नेतृत्व को संघर्षील बनाए रखने में सहयोग करें। 
जबकि यहां भी अक्सर यह दिखाई देता है कि ऐसे तत्व समय-समय पर इस विचारधारा को नुकसान पहुंचाते रहते हैं उनका जिक्र करना जरूरी नहीं है। 
लेकिन जरूरत पड़ने पर उनके बारे में बताया जा सकता है।

21 अग॰ 2024

सवाल नेतृत्व का है बौद्धिक पलायन और अयोग्य प्रतिनिधित्व का।

 सवाल नेतृत्व का है बौद्धिक पलायन और अयोग्य प्रतिनिधित्व का।

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-डॉ लाल रत्नाकर 

वैसे देखा जाए तो पूर्वांचल की उपस्थिति संसद में यादवों के हिसाब से 'ना' के बराबर है, यह अलग बात है कि श्री धर्मेंद्र यादव जी आजमगढ़ से सांसद है, वैसे तो आजमगढ़ से और भी यादव सांसद हुए हैं (उनके चित्र कि यहां जरूरत नहीं समझा) जौनपुर से कई यादव सांसद हुए हैं बनारस से भी चंदौली से भी बगल के अन्य जिलों से भी बहुत सारे ऐसे नाम है। 

लेकिन जो सबसे आश्चर्यजनक खबर है वह यह है जिसको नीचे संलग्न खबर में अखबार नवीश ने उठाया है जिसपर पहले भी सवाल खड़े हुए हैं ?

जहां तक किसी क्षेत्र से वहां के प्रतिनिधियों के त्याग का सवाल है, यह पुरानी कहावत है वह पड़ोसी के घर से ही होना चाहिए चाहे वह नेता या वह व्यक्ति जो ऐसा कहता है करता है वह स्वंय ऐसा क्यों नहीं कर सकता। 

समय का चक्र है की पूर्वांचल देश की संसद में अपने प्रतिनिधि के रूप में उधार के प्रतिनिधियों से प्रतिनिधित्व पा रहा है, जिन लोगों के चित्र यहाँ लगाए गए हैं वह पूर्वांचल की प्रतिभाशाली रहे हैं उनमें से अधिकांश लोग कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टी के जनप्रतिनिधि रहे हैं. जिसमें वह लोग भी हैं जो बहुजन समाज के अनेकों ऐसे और लोग हुए हैं जिन्होंने पहले भी भारत की संसद के लिए प्रतिनिधित्व का नेतृत्व किया है।

आज सवाल यह नहीं है कि श्री अखिलेश यादव जी ने पीडीए के माध्यम से जो सफलता हासिल की है उसकी मैं किसी रूप में बुराई कर रहा हूं। लेकिन मेरा ख्याल है कि इसको और बेहतर तरीके से किया जा सकता था जिसमें प्रदेश के यादवों का और नेतृत्व कराया जा सकता था। जो इस समीकरण को कहीं से भी कमजोर नहीं करता, प्रतिनिधित्व के सवाल पर फेर बदल हो सकता था और लोगों को भी शामिल कर पीडीए को विस्तृत और विस्तारित किया जा सकता था।

नाम लेकर बताना शायद उन लोगों को अच्छा न लगे जो उससे लाभान्वित हुए हैं लेकिन आम आदमी के मुंह से यही चर्चा आती है कि पिता, पुत्र, पुत्री जैसे विवाद से भी बचा जा सकता था।

आज उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपने कुकर्मों की वजह से जिस हालत में पहुंच गई है उसी का लाभ उठाकर बीजेपी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सीना तानने की शक्ति के रूप में दिखाई देती है जिसका इस चुनाव में कुछ मानमर्दन हुआ है। इस मानमर्दन के पीछे जनता के उत्साह का बहुत बड़ा हाथ है, जिसे यदि किसी राजनेता को यह लगता हो कि उसने कोई जादू कर दिया है तो यह आम आदमी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ भी इसी बात को महत्व देते हैं। 

जिन लोगों से इस चुनाव में लड़ना था उनसे लड़ता हुआ विपक्ष नजर नहीं आ रहा था लेकिन जनता के उत्साह ने उन्हें कमजोर किया और विपक्ष को ताकत दिया। 

इसके उलट बिहार में जो हुआ वहां से भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। 

यदि समय रहते व्यापक रूप से इस पर विचार नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ऐसा नहीं है कि जिनको आज हम कमजोर मान रहे हैं, जो हर तरह से सत्ता के लिए देश को तहस-नहस कर रहे हैं, उनके खिलाफ जनता कहीं यह महसूस न करने लगे कि यह तो और खराब लोग हैं। यह सवाल उनको बहुत ताकत देगा जो इनमें फुट डालने की टाक में रहते हैं। 

आईए सांस्कृतिक विचार के लोगों को इकट्ठा करके ऐसे कार्यक्रम प्रस्तुत कर उन बिंदुओं को चिन्हित करें, जिनसे आपको सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाया जाता है और उसी की परम्परा में अखंड-पाखण्ड, अंधविश्वास और चमत्कार की राजनीति की जाती है।

जिस दिन आम आदमी इन सारे प्रतीकों के बारे में जान जाएगा उस दिन असली राजनीति शुरू होगी। यही असली राजनीती होगी जिससे संविधान की रक्षा होगी। 

तब फिर से राजनीति समझने वाले लोगों का राजनीती में आगमन होगा और गुमराह करने की राजनेताओं की नीति का सही मूल्यांकन और सही प्रतिनिधित्व पर जोर देगी। ऐसा करने के लिए जनता को बहुत सजग होना पड़ेगा पुनः उसके लिए आंदोलन शुरू करने होंगे।


(नोट : इस आलेख में पूर्वांचल के तत्कालीन नेताओं को लिया गया है जबकि उत्तर प्रदेश में ऐसे अनेक नेता जिन्होंने सामाजिक क्रांति को बहुत ही महत्व दिया है और बहुजन समाज के लोगों को एकजुट रखा है हमारे इतिहास में मौजूद हैं वर्तमान समय में जिस तरह की राजनीति की जा रही है उसे राजनीति के और बहुत सारे विकल्प हैं जिनका प्रयोग किया जाना चाहिए लेकिन संभवत हुआ है उनकी समझ में नहीं आ रहा है जिनको इस तरह के फैसले लेने की जरूरत है)

10 फ़र॰ 2024

संसद राम मंदिर पर चर्चा के लिए तैयार है, विपक्ष कैसे प्रतिक्रिया देगा?

 राजनीति में आज: संसद राम मंदिर पर चर्चा के लिए तैयार है, विपक्ष कैसे प्रतिक्रिया देगा?

साथ ही, अमित शाह ऐसे समय में कर्नाटक में होंगे जब भाजपा-जद(एस) की बातचीत अंतिम चरण में है, और बिहार भाजपा महत्वपूर्ण विश्वास मत से पहले अपने विधायकों के लिए एक कार्यशाला आयोजित करेगी।

संसद का बजट सत्र शनिवार को समाप्त हो गया, जिसमें दोनों सदनों ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की देखरेख के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया, जिसका उद्घाटन 22 जनवरी को हुआ था। भाजपा का एक दीर्घकालिक वैचारिक लक्ष्य, उम्मीद है कि आगामी लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी के संदेश में मंदिर एक प्रमुख भूमिका निभाएगा।

यह भी पढ़ें | संसद बजट सत्र 2024 लाइव अपडेट: 'हमने सभी कुशासन को ठीक किया, सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया': विपक्ष के हंगामे के बीच एफएम सीतारमण 'श्वेत पत्र' पर बोलती हैं

भाजपा सांसद सत्यपाल सिंह और शिवसेना सांसद श्रीकांत एकनाथ शिंदे मंदिर पर चर्चा शुरू करने के लिए तैयार हैं, यह देखना होगा कि विपक्षी दल इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं, क्योंकि कांग्रेस सहित भारत के अधिकांश शीर्ष नेता या तो दूर रहे। घटना से या मुद्दे पर चुप थे।

यह भी पढ़ें | राम मंदिर, पीएम की भूमिका पर बीजेपी की चर्चा के साथ 17वीं लोकसभा आज खत्म हो गई

संकल्प के अलावा, राज्यसभा शनिवार को भाजपा के सत्ता में आने से पहले और बाद में भारतीय अर्थव्यवस्था पर श्वेत पत्र पर भी चर्चा करेगी, जैसा कि लिज़ मैथ्यू ने बताया है। यह पेपर भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव का मुद्दा बन गया है, सत्तारूढ़ दल गुरुवार को संसद में पेश किए गए 59 पन्नों के दस्तावेज़ के इर्द-गिर्द चुनावों के लिए एक कहानी तैयार करने के लिए तैयार है।

राज्यों में बीजेपी की चुनावी तैयारी

शनिवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अन्य कार्यक्रमों के अलावा पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में भाग लेने के लिए कर्नाटक पहुंचने की उम्मीद है। शाह की यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भाजपा और जद (एस) लोकसभा चुनावों के लिए सीट-बंटवारे की बातचीत के अंतिम चरण में हैं, जैसा कि अकरम एम ने बताया है। जद (एस) के सदस्यों को कौन सी सीटें मिलेंगी, इस पर कुछ सवाल बने हुए हैं। पहला परिवार चुनाव लड़ेगा.


उत्तर प्रदेश में, जाट नेता जयंत चौधरी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) ने पश्चिमी यूपी में भाजपा के साथ समझौते का संकेत दिया है, जिनके दादा और पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह को शुक्रवार को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

जयंत कहते हैं, दिल जीत लिया, पश्चिमी यूपी में बीजेपी के साथ समझौते के संकेत

इस बीच, भाजपा का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ शनिवार को पश्चिम यूपी के 23 लोकसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंचने के लिए "कौमी चौपाल" अभियान शुरू करेगा। चूंकि भाजपा आरएलडी के साथ हाथ मिलाकर अपने जाट वोटों को मजबूत करने का प्रयास कर रही है, इसलिए उसे उम्मीद होगी कि उसकी अतिरिक्त मुस्लिम पहुंच समाजवादी पार्टी (एसपी) की संभावनाओं को कम कर सकती है जो यादवों और मुसलमानों के वोटों पर निर्भर है।

इस बीच, भाजपा के बिहार विधायक बोधगया में शनिवार से शुरू होने वाली दो दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने के लिए तैयार हैं, ताकि पार्टी सोमवार को विधानसभा विश्वास मत से पहले अपने विधायकों को जानकारी दे सके। राजद और भाजपा दोनों ने विधायकों की खरीद-फरोख्त के प्रयासों का संकेत दिया है और माइंड गेम खेल रहे हैं। जैसे-जैसे निर्णायक मतदान नजदीक आएगा जुबानी जंग और तेज होने की संभावना है।

जारांगे-पाटिल का अल्टीमेटम

महाराष्ट्र में, मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जारांगे-पाटिल ने धमकी दी है कि अगर सरकार उन लोगों के रक्त संबंधियों को कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने के अपने वादे को लागू नहीं करती है, जिन्होंने पहले से ही खुद को समुदाय से संबंधित के रूप में स्थापित किया है, तो वे शनिवार से एक और भूख हड़ताल शुरू करेंगे। यह निर्णय राज्य मंत्री और ओबीसी नेता छगन भुजबल के विरोध के बीच आया है, जो दावा करते हैं कि मराठों को ओबीसी कोटा में "पिछले दरवाजे से प्रवेश" दिया जाएगा।

इस बीच, नागपुर में, आदिवासी गोवारी गोंड समुदाय शनिवार को एक बैठक आयोजित करने और सरकार द्वारा जाति प्रमाण पत्र की उनकी मांगों को पूरा नहीं करने पर "आंदोलन तेज" करने के लिए तैयार है।

मनोज जारांगे पाटिल: जब तक सभी मराठों को आरक्षण नहीं मिल जाता तब तक आंदोलन जारी रहेगा

राजनीतिक मोर्चे पर, कांग्रेस की मुंबई इकाई में राज्य के पूर्व मंत्री और तीन बार के विधायक बाबा सिद्दीकी के शनिवार को अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल होने को लेकर मंथन चल रहा है।

सिद्दीकी का बाहर निकलना पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा के हाई-प्रोफाइल इस्तीफे के बाद हुआ है, जो सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होने के लिए चले गए थे। पार्टी में एक प्रमुख मुस्लिम चेहरा, सिद्दीकी के बाहर निकलने से लोकसभा चुनाव के लिए महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सहयोगियों के साथ महत्वपूर्ण सीट-बंटवारे की बातचीत से पहले शहर की कांग्रेस इकाई की ताकत और कम हो जाएगी।

-पीटीआई इनपुट के साथ

Indian Express

28 जन॰ 2024

भारत में अब एक नया संविधान है जिसमें हर लक्ष्मण रेखा बहुसंख्यक समुदाय खींचता है और जिसे सरकार का कोई भी अंग पार नहीं कर सकता है. योगेंद्र यादव

 गणतंत्र मर चुका है और BJP-RSS को जिम्मेदार ठहराने का मतलब नहीं, हमें नई राजनीतिक भाषा की जरूरत है

भारत में अब एक नया संविधान है जिसमें हर लक्ष्मण रेखा बहुसंख्यक समुदाय खींचता है और जिसे सरकार का कोई भी अंग पार नहीं कर सकता है.

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अंग्रेजी की कहावत है: किंग इज डेड, लॉन्ग लिव द किंग” (`राजन नहीं रहे, राजन जिन्दाबाद`). इसी तर्ज पर 26 जनवरी को हमारा राष्ट्रीय उद्घोष होना चाहिए: गणतंत्र न रहा आबाद , गणतंत्र जिन्दाबाद!भारत नामक जो गणराज्य 26 जनवरी 1950 को बना था वह बीते 22 जनवरी 2024 को ध्वस्त हो गया. यह प्रक्रिया लंबे समय से जारी थी. मैं कुछ सालों से ‘गणतंत्र के अंत’ की बात कहता आ रहा था. लेकिन अब हम गणतंत्र के खात्मे की एक निश्चित तारीख भी बता सकते हैं. अब हम एक नई राजनीतिक व्यवस्था में जी रहे हैं. जो लोग इस नई व्यवस्था में अवसर ढूंढ़ रहे हैं उन्होंने नये खेल के नियमों को अगर अब तक न अपनाया होगा तो आगे के दिनों में तेजी से अपना लेंगे. हम जैसे लोगों के पास जो अपने पहले गणतंत्र पर दावा जताने को प्रतिबद्ध हैं सिवाय इसके कोई और विकल्प नहीं कि हम अपनी राजनीति पर मूलगामी अर्थों में पुनर्विचार करें. हमारी जरूरत सियासत की एक नई भाषा गढ़ने की है—एक ऐसी भाषा जिसके सहारे हम अपने गणतांत्रिक मूल्यों की ज्यादा मजबूती और धारदार तरीके से हिफाजत और हिमायत कर सकें. हमें अपनी राजनीतिक रणनीति को हर हाल में बदलना और अपने सियासी रिश्तों की चिनाई-बिनाई पर नये सिरे से काम करना होगा— पुराने तर्ज के संसदीय विरोध की जगह सड़क के प्रतिरोध की राजनीति की राह अपनानी होगी.

इसे लेकर कोई गफलत में रहने की जरूरत नहीं. प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का रिश्ता किसी मूर्ति, भगवान राम या फिर राम मंदिर से कत्तई नहीं था. उस समारोह का रिश्ता किसी मर्यादा, आस्था या धर्म से भी नहीं था. वह समारोह दरअसल कई सांवैधानिक, राजनीतिक और धार्मिक मर्यादाओं के उल्लंघन का समारोह था. इस प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के साथ जुड़ी करोड़ों लोगों की आस्था के अपहरण का आयोजन था. धर्म और राजसत्ता के रिश्ते की धुरी पलटने का अवसर था, चूंकि इस समारोह ने हिन्दू धर्म को राजनीति का खिलौना बना दिया. अपनी पृष्ठभूमि, अपनी बनावट, लामबंदी के अपने मिज़ाज और असर के एतबार से 22 जनवरी का समारोह एक सियासी समारोह था जिसका मकसद राजनीतिक जीत के मंसूबे बांधना, उसके लिए हड़बोंग मचाना और सियासी जीत की राह साफ करना था. दरअसल यह उस`हिन्दू राष्ट्र` की प्राण-प्रतिष्ठा का समारोह था जहां न परंपरा-सम्मत हिन्दू धर्म ही मौजूद है और न ही वह ‘राष्ट्र’ जो भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक चौहद्दी में परिभाषित होता है.

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एक नई राज-व्यवस्था

हमारे पास अब एक नया संविधान है— एक नये दस्तावेज की शक्ल में नहीं बल्कि राजनीतिक सत्ता के एक नये व्याकरण के रूप में जिसमें बीते एक दशक के दौरान हुए बदलावों को सूत्रबद्ध कर दिया गया है. मूल संविधान में तो अल्पसंख्यकों के अधिकार को एक सीमा-रेखा के रूप में स्वीकार किया गया है जो यह तय करती है कि लोकतांत्रिक रीति से चुनी गई कोई सरकार क्या नहीं कर सकती. लेकिन नये संविधान में बहुसंख्यक समुदाय की मर्जी वह लक्ष्मण-रेखा है जिसका उल्लंघन राज्य की कोई भी संस्था नहीं कर सकती, चाहे मूल संविधान में कुछ भी लिखा हो. अब हमारे देश में दु-छत्ती नागरिकता की व्यवस्था होगी जिसमें हिन्दू और हिन्दुओं के सहवर्ती मकान मालिक हैं जबकि मुसलमान और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक किरायेदार की तरह. देश के असली संविधान में भारत को ‘राज्यों का संघ’ बताया गया है लेकिन इसकी जगह अब एकल सरकार स्थापित हो गई है जो अब प्रांतों को कुछ छोटे मोटे शासकीय काम सौंपा करेगी. कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच ताकत के बंटवारे की जगह शासन की बागडोर कार्यपालिका को थमा दी गई है. यही अधिशासी अब विधायिका के कर्मकांड तय करते हैं और वह चौहद्दी खिंचा करते हैं जिसके भीतर रहकर न्यायपालिका को निर्णय देना है. संसदीय लोकतंत्र का स्थान शासन की राष्ट्रपति-केंद्रित प्रणाली ने नहीं बल्कि एक व्यक्ति के शासन ने ले लिया है, एक ऐसा राजा जिसे जनता ने चुना है— हम एक ऐसी नई राजनीतिक व्यवस्था में रह रहे हैं जिसमें जनता अपने सर्वोच्च नेता को चुनती है और ऐसे चुनाव के बाद सबकुछ उसी नेता पर छोड़ देती है.

इस नये संविधान की अमलदारी को अभी संविधान-सभा का अनुमोदन हासिल नहीं हुआ है. कैबिनेट का प्रस्ताव भले ही इसे भारत की आत्मा की स्वाधीनता का दिवस कहे, हम अब भी 22 जनवरी 2024 को दूसरे गणतंत्र की स्थापना का दिवस नहीं कह सकते. मूल संविधान को औपचारिक रूप से निरस्त करने को रोकने की लड़ाई अभी भी बाकी है. आने वाला लोकसभा चुनाव इस लड़ाई का पहला मोर्चा होगा. लेकिन चुनाव का नतीजा चाहे जो भी निकले, हम इस नई राजनीतिक व्यवस्था की सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते. हम मूलगामी पुनर्विचार की चुनौती को अब आगे के दिनों पर और नहीं टाल सकते.

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हमें शुरूआत इस कड़वे सच को मान कर करनी होगी कि हम स्वयं भारत के प्रथम गणतंत्र की मौत के अपराधी हैं. आरएसएस और बीजेपी को उस बात के लिए दोष देना बेकार है जो उनका मूल मकसद रहता आया है. जिम्मेवारी तो उनकी है जिन्होंने भारत के प्रथम गणतंत्र के प्रति निष्ठा रखने की सौगंध उठायी थी. सेक्युलरवाद का प्रतिबद्धता की राजनीति से धीरे-धीरे ढहकर सुविधा की राजनीति में बदलते जाना हमारे प्रथम गणतंत्र को मटियामेट करने का दोषी है. सेक्युलर राजनीति का औद्धत्य, जनता-जनार्दन से इसका विलगाव, लोगों से उनकी बोली-बानी में बतियाने से उसका इनकार सेक्युलरवाद के विचार को अवैध बनाने का जिम्मेवार है. हम ये बात नहीं भूल सकते कि यह प्राणघाती अघात भरपूर चेतावनी की उस घटना के तीस साल बाद लगा है जिसे बाबरी मस्जिद का विध्वंस कहा जाता है. पूरे तीस साल तक सेक्युलर ढर्रे की राजनीति इस प्रमाद में टालमटोल करती रही कि यह रोग खुद ही गायब हो जायेगा या फिर जाति की राजनीति इसकी काट कर लेगी. यदि सेक्युलर राजनीति आज धूल चाट रही है तो इस दुरवस्था के लिए इसके अपने कर्म-अपकर्म के पाप ही जिम्मेदार हैं.

जो चीज राजनीति के हाथों से गंवायी गई वह चीज राजनीति के हाथों से ही हासिल की जा सकती है. आज हमारे पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं. हम जो मूल संविधान के तरफदार हैं वे अब अपने ही देश में एक संकटग्रस्त विचारधाराई अल्पसंख्यक बनकर रह सकते हैं, जब-तब सांकेतिक विरोध जताकर जी बहला सकते हैं. या फिर हम एक निर्भीक और दमदार गणतांत्रिक राजनीति की प्राण प्रतिष्ठा करें.


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दोधारी राजनीति

ऐसी गणतांत्रिक राजनीति का दोधारी होना जरूरी है. एक तरफ इस राजनीति को सांस्कृतिक-वैचारिक लड़ाई का रूप लेना होगा. यह लड़ाई लंबी होगी— आगे दो-तीन दशकों तक चलने वाली. इस लड़ाई की शुरूआत भारतीय राष्ट्रवाद, अपनी सभ्यतागत विरासत, अपनी भाषाओं और हिन्दू-धर्म समेत अपनी तमाम परंपराओं पर दावेदारी जताने से होनी चाहिए. इस लड़ाई के पास भारत के लिए एक नया स्वप्न होना चाहिए, सामाजिक पिरामिड के निचले हिस्से के लोगों की आशाओं को मुखरित करती विचारधाराई धुरी होनी चाहिए. इसके लिए हमें बीसवीं सदी के वैचारिक द्वंद्व, मसलन साम्यवादी, समाजवादी और गांधीवादी के बीच का द्वंद्व, को पीछे छोड़ना होगा. हमें बीसवीं सदी के सभी उदार, समतामूलक और उपनिवेश विरोधी विचारों को जोड़कर उनसे एक स्वराज 2.0 जैसी नई विचारधारामें गूंथना होगा.

दूसरी तरफ, हमारे पास नये तर्ज की राजनीति होनी चाहिए. विरोध की राजनीति की जगह प्रतिरोध की राजनीति अपनानी होगी. सामान्य ढर्रे के चुनावी और संसदीय विपक्ष की राजनीति अब सबसे महत्वपूर्ण नहीं है. गणतांत्रिक राजनीति को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा. विभिन्न दलों को बांटने वाली पुरानी लकीर राजनीति की नई दुनिया के लिए प्रासंगिक नहीं. मौजूदा संकट के मद्देनजर सियासी जुड़ाव की जमीन में कुछ ऐसा बदलाव होना चाहिए मानो भू-चाल आया हो और सारा कुछ एक नये रूपाकार में गढ़ा जा रहा हो. जो लोग गणतंत्र की आत्मा के प्रति सच्चे हैं उन्हें आपस में घुल-मिल कर एक राजनीतिक धारा में बदलना होगा. चूंकि चुनाव अब पूर्व-निर्धारित नतीजों वाले जनमत-संग्रह में बदल गये हैं इसलिए संसद की चुनावी राजनीति की बजाय सड़क पर आंदोलन धर्मी प्रतिरोध नई स्थिति में कहीं ज्यादा कारगर है. लेकिन प्रतिरोध की ऐसी राजनीति पर भी दबाव होंगे क्योंकि लोकतांत्रिक रीति से विरोध जताने के जमीन सिकुड़ती जायेगी. प्रतिरोध की राजनीति को नई लेकिन लोकतांत्रिक और अहिंसक राह और नई तरकीब ढूंढ़नी होगी.

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक मजाक चल रहा है कि चलो, इस गणतंत्र दिवस का जश्न धूमधाम से मनायें क्योंकि कहीं ऐसा ना हो कि यह आखिरी गणतंत्र दिवस साबित हो. लेकिन विडंबना यह है कि यह चुटकुला जिस लम्हे सोशल मीडिया पर घूमना शुरू हुआ उसी लम्हे यह पुराना भी पड़ चुका था. यह छब्बीस जनवरी अब हमारे लिए एक मृत गणतंत्र की बरसी मनाने का दिन हो सकता है, या फिर देश के प्रथम गणतंत्र पर अपनी दावेदारी पुनः जताने के राष्ट्रीय संकल्प का दिन!

गणतंत्र दिवस मुबारक हो !

(योगेंद्र यादव जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के संस्थापकों में से एक हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैं. उनका एक्स हैंडल @_YogendraYadav है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

राम मंदिर अभिषेक के साथ, भाजपा ने कैसे नेहरू, अंबेडकर की विरासत को नष्ट कर दिया है - और संविधान को नुकसान पहुंचाया है

राम मंदिर अभिषेक के साथ, भाजपा ने कैसे नेहरू, अंबेडकर की विरासत को नष्ट कर दिया है - और संविधान को नुकसान पहुंचाया है

संविधान द्वारा गणतंत्र को स्वयं को धर्म से अलग करने का आदेश दिया गया है। भारत के प्रति प्रतिशोधपूर्ण दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए आरएसएस-भाजपा गठबंधन द्वारा लोगों की आस्था को हथियार बनाया गया है

डी. राजा 


राष्ट्रीय राजधानी में घूमते हुए, कई स्थानों पर तिरंगे के स्थान पर राम के चित्रों वाले भगवा झंडों की भरमार है - जो संघ परिवार की राजनीतिक परियोजना के एक पहलू की पूर्ति है। 

औपनिवेशिक भारत सरकार अधिनियम, 1935 के स्थान पर, भारतीय संविधान औपचारिक रूप से 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ। उस दिन दुनिया और अपने स्वयं के नागरिकों को घोषित किया गया कि भारत एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, सार्वभौमिकता का प्रतीक गणतंत्र बनना चाहता है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श। फिर भी, 2024 में, आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की उत्पत्ति का जश्न मनाने वाला गणतंत्र दिवस, अयोध्या में राम मंदिर अभिषेक कार्यक्रम के कुछ दिनों बाद आता है, जिसे सत्तारूढ़ सरकार, प्रधान मंत्री और पूरे मंत्रिमंडल का आशीर्वाद प्राप्त है।

राष्ट्रीय राजधानी में घूमते हुए, कई स्थानों पर तिरंगे के स्थान पर राम के चित्रों वाले भगवा झंडों की भरमार है - जो संघ परिवार की राजनीतिक परियोजना के एक पहलू की पूर्ति है। 2024 में भारत को देखते हुए, बी आर अंबेडकर इसके संवैधानिक दृष्टिकोण में हुई अपूरणीय क्षति पर बहुत चिंतित होंगे। सरकार के मुखिया के नेतृत्व में किया जा रहा राम मंदिर अभिषेक एक ऐसा कदम है जिसका उद्देश्य उन संवैधानिक मूल्यों की छवि से धर्मनिरपेक्षता को उजागर करना है जिन्होंने भारत को प्रगति के लोकतंत्र के रूप में बनाए रखा है। श्रेणीबद्ध असमानता के रूप में पदानुक्रम के विचार के आसपास चिह्नित और निर्मित हिंदू धर्म तेजी से हमारी प्रस्तावना के मूलभूत सिद्धांतों की जगह ले रहा है। राज्य की अपार शक्ति द्वारा "हम लोगों" को अलग और अलग करने का प्रयास किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में, बाबरी मस्जिद का विध्वंस कानून के शासन का घोर उल्लंघन करके किया गया था। उस उल्लंघन के बाद, भारत अब एक पवित्र रेखा का उल्लंघन देख रहा है। संविधान द्वारा गणतंत्र को स्वयं को धर्म से अलग करने का आदेश दिया गया है। भारत के प्रति प्रतिशोधपूर्ण दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए आरएसएस-भाजपा गठबंधन द्वारा लोगों की आस्था को हथियार बनाया गया है।

इतिहास का एक छोटा सा पाठ यहां उपयोगी है। जब सोमनाथ मंदिर का अभिषेक किया जा रहा था, तो प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू, सी राजगोपालाचारी और एस राधाकृष्णन ने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से आग्रह किया कि वे अभिषेक समारोह में शामिल न हों। नेहरू ने विशेष रूप से प्रसाद को लिखा कि अगर भारत के राष्ट्रपति किसी मंदिर में जाते हैं तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि अभिषेक समारोह जैसे विशेष कार्यक्रम में उनकी यात्रा का मतलब वास्तव में राज्य की वैधता को बढ़ावा देना और एक विशेष धर्म को सदस्यता देना होगा। , एक अनुचित और खतरनाक मिसाल कायम करना। प्रसाद ने दावा किया कि वह भारत के राष्ट्रपति के रूप में नहीं बल्कि अपनी व्यक्तिगत क्षमता से इसमें भाग लेंगे। हालाँकि, नेहरू, राजगोपालाचारी और राधाकृष्णन ने यह स्पष्ट कर दिया कि कोई भी इस कथन को स्वीकार नहीं करेगा कि विशेष धार्मिक कार्यों के संदर्भ में भारत के राष्ट्रपति के कार्यालय को उनकी व्यक्तिगत क्षमता से अलग किया जा सकता है। इस नये भारत में ये भेद कोई मायने नहीं रखता.

संविधान के प्रति इस उपेक्षा की साजिश रचते हुए, मोदी अम्बेडकर के प्रति दिखावटी बातें करना जारी रखते हैं। अंबेडकर को समानता, न्याय और मुक्ति के उनके विचारों से अलग करके उन्हें एक खोखला संकेतक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। अंबेडकर ने अपने संविधान के मसौदे में प्रावधान किया कि राज्य में कोई धर्म नहीं होगा और भारत में अल्पसंख्यकों के व्यापक बहिष्कार के किसी भी आह्वान को संज्ञेय अपराध माना जाएगा। उन्होंने मसौदे में यह भी निर्धारित किया कि भारत की भावी विधायिका को उन लोगों को कड़ी सजा देने के लिए एक कानून बनाना होगा जो सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों से अल्पसंख्यकों का बहिष्कार करने के लिए लोगों का नेतृत्व करने का अपराध करेंगे। राज्य की न्याय की भावना से इस प्रकार समझौता होते देख अम्बेडकर परेशान हो गए होंगे। क्योंकि, यह अंबेडकर ही थे जिन्होंने कहा था कि संविधान के कामकाज की सफलता के लिए नागरिकों द्वारा संवैधानिक नैतिकता का विकास अनिवार्य है। फिर भी, इस शासन के तत्वावधान में, हम एक उलटफेर देख रहे हैं।

सरकार जानबूझकर उपमहाद्वीप के साम्राज्यवाद विरोधी, सामंतवाद विरोधी इतिहास को नजरअंदाज करती है और इसे मिथकों, इच्छापूर्ण दावों और अवैज्ञानिक स्वभाव से बदल देती है। यहां राष्ट्र के लोगों से हिंदू राष्ट्र की आपदा का विरोध करने और लड़ने के लिए अंबेडकर के आह्वान को याद करना उचित होगा। कुछ लोग मूर्तियों, मंदिरों, आदमकद बैनरों, गरीबों और उनके आवासों को भौतिक रूप से ढककर शहर के सौंदर्यीकरण, शहरों के नाम बदलने और छद्म विज्ञान और इतिहास को बढ़ावा देने के खाली संकेतकों में आनंद लेते हैं। दूसरी ओर वे लोग हैं जो रिकॉर्ड उच्च बेरोजगारी, शिक्षा का बाजारीकरण, महिलाओं, विशेषकर दलित और आदिवासी महिलाओं के खिलाफ बढ़ती पाशविक और साथ ही संस्थागत हिंसा, महिलाओं की कार्यबल भागीदारी में कमी, त्वरित गिग-ीकरण के संबंध में मौलिक और वस्तुनिष्ठ चिंताएं उठाते रहते हैं। रोज़गार की, और आम जनता की चोरी। समय और इतिहास हमारे देश के संवैधानिक ढांचे को बनाए रखने के लिए हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति और राजनीतिक साहस को जुटाने के लिए सभी पर दबाव डाल रहे हैं।

लेखक सीपीआई के महासचिव हैं
(इण्डियन एक्सप्रेस )
27 जनवरी 2024 

(नोट : मूल रूप से यह आर्टिकल इंडियन एक्सप्रेस में आया है गूगल ट्रांसलेट द्वारा इसका हिंदी अनुवाद किया गया है यदि कोई त्रुटि है तो वह तकनिकी हो सकती है )

27 जन॰ 2024

यदि मोहन भागवत देश के लिए अपनी मानसिकता थोपना चाहते हैं तो संविधान का क्या होगा ?

यदि मोहन भागवत देश के लिए अपनी मानसिकता थोपना चाहते हैं तो संविधान का क्या होगा ?


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने 26 जनवरी को लोगों से 'भाईचारा' (भाईचारा) के साथ रहने का आग्रह किया और कहा कि भारत में कुछ वर्षों में 'विश्व गुरु' (विश्व नेता) बनने की क्षमता है।

75वें गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में नागपुर में आयोजित एक समारोह में बोलते हुए, श्री भागवत ने कहा कि देश के लोगों ने खुद को संविधान दिया है और अब यह उनका कर्तव्य है कि वे न केवल इसका सम्मान करें बल्कि इसका पालन भी करें।

“भारत के लोगों की ताकत अनंत है। जब यह शक्ति बढ़ती है तो अनेक चमत्कार करती है। यह हममें से प्रत्येक के लिए है कि हम अपनी क्षमताओं का उपयोग सभी के लाभ के लिए करें क्योंकि हर कोई हमारा अपना है। भले ही हम अलग दिखें, लेकिन हमारे देश में विविधता को स्वीकार करने की परंपरा है। हमें भाईचारे के साथ रहना चाहिए और संविधान के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। तब देश प्रगति की ओर अग्रसर होगा, ”उन्होंने कहा।

नागरिकों की भूमिका
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हालांकि सरकार के पास संविधान को लागू करने और उसकी रक्षा करने की 'तकनीकी' जिम्मेदारी है, लेकिन नागरिकों की अपने आचरण के माध्यम से इसे लागू करने की मुख्य भूमिका है।

“हम सभी 26 जनवरी को उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। ऐसा ही उत्साह 22 जनवरी (राम मंदिर प्रतिष्ठा दिवस) पर देखने को मिला. लेकिन ऐसा उत्साह और भक्ति एक दिन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, ”उन्होंने कहा।

श्री भागवत ने कहा कि लोगों को अपना जीवन देश के लिए समर्पित करना चाहिए। उन्होंने कहा, "हम कुछ ही वर्षों में भारत को विश्व गुरु बनते हुए देख सकते हैं।"

सांप्रदायिक हिंसा
अयोध्या में मंदिर के उद्घाटन के बाद विभिन्न राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं सामने आने के कुछ दिनों बाद आरएसएस प्रमुख का भाईचारा का आह्वान आया।

22 जनवरी को गुजरात के वडोदरा में जश्न मनाने के लिए निकाली गई 'शोभा यात्रा' पर पथराव की घटना सामने आई थी। मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी।

तेलंगाना के नारायणपेट जिले में इसी तरह के जुलूस के दौरान एक मस्जिद के सामने कथित तौर पर पटाखे छोड़े गए, जिसके कारण पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी।
लखनऊ में एक पंडाल में नफरत भरे गाने बजाए जाने के वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने पंडाल के आयोजकों पर भी मामला दर्ज किया।

मध्य प्रदेश में, असामाजिक तत्वों ने कथित तौर पर एक चर्च के अभिषेक समारोह से एक दिन पहले उसके ऊपर भगवा झंडा लगा दिया।

बिहार के दरभंगा जिले में, अयोध्या में मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर निकाले गए जुलूस में भाग लेने वाले लोगों द्वारा एक मुस्लिम कब्रिस्तान के अंदर कथित तौर पर पटाखे फेंके गए।

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