13 जून 2026

इंसाफ के लिए डर को गले लगा लें।

आईए अब मिलकर
नाकामियों को गले लगा लें।
अपने उन्हीं साथियों से आंखें चुरा लें।
लड़ने की हिम्मत नहीं है।
इंसाफ के लिए।
डर को गले लगा लें।
शोहरत अपनी बढ़ा लें।
नफरत को भी छुपा लें।
हिंदू मुसलमान के बीच।
कल तक यही थे ?
मेरे इतने अपने और अजीज।
आज उनसे इतनी दूरी
क्यों बढ़ा लें।
ऐसा क्यों कर रहे हो।
दूरी क्यों बढ़ा रहे हो।
यह मुल्क सब ने बनाया है।
यह क्यों भूल रहे हो।
मनुष्यता का दुश्मन ।
वो सदियों से रहा है।
सब में फूट डालकर जो लूट रहा है।
लोकतंत्र के लिए !
संविधान ने सब कुछ समझाया है।
यह मंत्र बताया है।
इसीलिए संविधान ही धर्म हमारा है।
यह तय करना होगा।
हिंदू मुस्लिम सभी बचेंगे।
जब यह नारा होगा।
और बहुजन की आवाज उठेगी।
भागेगा दुश्मन।
यह बिल्कुल माकूल दवा है।
हमें यही आवाज उठाना है।
यदि मुल्क बचाना है।
सबको यही समझाना है।

-डा.लाल रत्नाकर

भारत में जिस तरह का राजनितिक परिवर्तन हो रहा है वह कहाँ ले जा रहा है :
भारत में हो रहा राजनीतिक परिवर्तन मुख्य रूप से 2014 से शुरू हुए ‘मोदी युग’ की निरंतरता और कुछ नई वास्तविकताओं की ओर इशारा कर रहा है। यह एक स्पष्ट दिशा की तरफ ले जा रहा है: सांस्कृतिक-राष्ट्रीयवादी (हिंदुत्व-केंद्रित) शासन, मजबूत केंद्र सरकार, आर्थिक सुधारों और विकसित भारत (Viksit Bharat 2047) के लक्ष्य के साथ, लेकिन गठबंधन की मजबूरियों और विपक्षी पुनरुत्थान के साथ।
मुख्य परिवर्तन और उनकी दिशा:
1 BJP की प्रभुत्व वाली लेकिन पूर्ण बहुमत-रहित राजनीति:
2024 लोकसभा चुनाव में BJP को 240 सीटें मिलीं (2019 में 303), NDA को 293। मोदी तीसरी बार PM बने, लेकिन अब गठबंधन सहयोगियों (TDP, JD(U) आदि) पर निर्भरता बढ़ गई है। यह 1989 के बाद वाले गठबंधन युग की ओर वापसी जैसा है, लेकिन BJP अब भी सबसे मजबूत पार्टी बनी हुई है।3
परिणाम: सुधारों (जैसे One Nation One Election, CAA-NRC संबंधित कदम) में गति धीमी पड़ सकती है, लेकिन हिंदुत्व एजेंडा (सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, संस्थागत बदलाव) जारी है। 2025-26 में राज्य चुनावों (बिहार आदि) और 2029 के आम चुनावों में यह टेस्ट होगा।
2 संस्थागत और लोकतांत्रिक बदलाव:
कुछ रिपोर्ट्स (जैसे BTI 2026) में democratic backsliding (लोकतंत्र में गिरावट) का जिक्र है — मीडिया, संस्थाओं, ध्रुवीकरण और मुस्लिम समुदाय पर असर वाले कदमों के जरिए। लेकिन उच्च मतदान दर और चुनावी प्रक्रिया की मजबूती भी दिखती है।23
दिशा: अधिक मेजॉरिटेरियन (बहुसंख्यकवादी) राज्य की ओर, जहां विकास (labharthi vikas) और राष्ट्रवाद को जोड़ा जा रहा है। विपक्ष (कांग्रेस 99 सीटें 2024 में) मजबूत हुआ है, लेकिन अभी केंद्र में चुनौतीपूर्ण नहीं।
3 आर्थिक और विकासात्मक दिशा:
फोकस Viksit Bharat 2047 पर: इंफ्रास्ट्रक्चर, टैक्स सुधार (नया इनकम टैक्स लॉ 2026), GST 2.0, MSME, AI, न्यूक्लियर एनर्जी, urban development। GDP ग्रोथ 6.5-7.5% के आसपास रहने का अनुमान, घरेलू मांग और सुधारों से।25
यह परिवर्तन समावेशी विकास + राष्ट्रवादी गौरव की तरफ ले जा रहा है — डिजिटल गवर्नेंस, आत्मनिर्भर भारत, और वैश्विक सप्लाई चेन में भूमिका बढ़ाना।
4 विदेश नीति और वैश्विक भूमिका:
निरंतरता: US (ट्रंप 2.0 के साथ भी), QUAD, EU ट्रेड डील्स, चीन काउंटर। आर्थिक सुरक्षा (critical minerals, AI) पर जोर।29
भारत मध्य शक्ति से उभरते वैश्विक खिलाड़ी की ओर जा रहा है, जहां घरेलू राजनीति और विदेश नीति ज्यादा जुड़ रही है।
संभावित परिणाम (कहाँ ले जा रहा है?):
सकारात्मक: स्थिरता, तेज विकास, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, और वैश्विक महत्व बढ़ना। अगर सुधार सफल रहे तो 2047 तक उच्च-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था संभव।
चुनौतियां: ध्रुवीकरण बढ़ना, गठबंधन की अस्थिरता, संस्थागत स्वायत्तता का सवाल, और क्षेत्रीय असमानताएं (दक्षिण vs उत्तर)। 2026-29 में राज्य चुनाव और नेतृत्व परिवर्तन (मोदी के बाद) बड़े टर्निंग पॉइंट होंगे।28
कुल मिलाकर, यह ‘नई भारत’ की ओर ले जा रहा है — कम सेकुलर (जैसा पहले था), ज्यादा राष्ट्रवादी और केंद्र-केंद्रित, लेकिन लोकतांत्रिक चुनावी प्रतिस्पर्धा बरकरार।
यह दिशा जनता की पसंद पर निर्भर करती है। 2024 का चुनाव दिखाता है कि पूर्ण बहुमत हमेशा नहीं मिलता, और विकास + रोजगार जैसे मुद्दे निर्णायक रहते हैं। भविष्य अनिश्चित है, लेकिन वर्तमान ट्रेंड मजबूत BJP-led शासन + आर्थिक महत्वाकांक्षा की तरफ है।


 

16 मई 2026

अर्जक पद्धति (जौनपुर ( मई 10 एवम 12, 2026 अलग दो शादियां )

जौनपुर (मई10 एवम 12, 2026  अलग दो शादियां अर्जक पद्धति से डॉ लाल रत्नाकर द्वारा संपन्न करायी गयी हैं जिनके विवरण निम्नवत है-

दिनांक 10 मई 2026 को अर्जक पद्धति द्वारा श्री नीरज कुमार और सुश्री सुमन यादव के गांव मछलीगांव बदलापुर जौनपुर में शादी का कार्यक्रम संपन्न कराया जो अपने आप में प्रशंसनीय और बहुत ही पवित्र ढंग से संपन्न हुआ जिसमें किसी भी प्रकार का पाखंड अंधविश्वास और चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं था यह पेरियार ज्योतिबा फुले रामस्वरूप वर्मा ललई सिंह और डॉ मनराज शास्त्री के साथ साथ श्री राम आश्चर्य यादव जी के सतत प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप समाज में इसे स्वीकार किया गया है और कुछ ऐसे लोग जो परंपरा को बिना समझे हुए ढो़ रहे हैं यद्यपि वह हर जगह मिल जाते हैं। 

अर्जक पद्धति के विवाह को बहुत ही साधारण तरीके से कोई भी संपन्न कर/करा सकता है इसमें किसी भी प्रकार का दिखावा नहीं होता दोनों वर वधू प्रतिज्ञापन करते हैं।

साक्ष्य के लिए दो वर की तरफ से दो वधू की तरफ से हस्ताक्षर करते हैं और यह सब कार्य पूर्ण होने पर विवाह करने वाले के यहाँ पर मैं स्वयं हस्ताक्षर करके उन्हें प्रमाण पत्र सौंप दिया हूं।

इसके उपरांत तमाम संबंधी और सगा जन फोटो इत्यादि कार्यक्रम करते हैं बाकि लोग रात्रि भोज का लुफ्त ले रहे होते हैं।


नीरज कुमार एवं सुमन यादव 

मई  10, 2026 

नव दंपति को हार्दिक शुभकामनाएं। 






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ललित कुमार एवं नीतू 
मई  12 , 2026 

नव दंपति को हार्दिक शुभकामनाएं। 








जाति और धर्म के नाम पर होने वाले शोषण का अंत।
समानता और भाईचारे पर आधारित समाज।
विवाह और सामाजिक रीति-रिवाजों में सरलता और तर्कवाद।
प्रभाव: इस संगठन ने गैर-ब्राह्मण आंदोलन को संगठित किया और सामाजिक सुधार की दिशा दी।
4. स्त्री अधिकार
बाल विवाह और सती प्रथा का विरोध किया। विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। स्त्रियों को शिक्षा और स्वतंत्रता दिलाने पर जोर दिया।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अपने समाज को जागरूक करना मेरा उद्देश्य है और यह उद्देश्य जुड़ा हुआ है मेरे पूर्वजों के सांस्कृतिक जागरण के उद्देश्यों से :
आज दिनांक 12 मई 2026 को ललित कुमार एवं नीतू की शादी अर्जक पद्धति से संपन्न हुई ।
इस पद्धति के माध्यम से पिछजले दिनों एक शादी मछली गांव में संपन्न हुई थी आज शाहपुर सिंटी में यह आयोजन हुआ जिसकी प्रशंसा तमाम लोगों ने अलग-अलग तरीके से व्यक्त की। 
परंपरावादियों की एक बड़ी जमात अज्ञानता की शिकार है जो अखंड पाखंड और अंधविश्वास में आस्था रखती है। 
इस पूरे प्रकरण में ललित कुमार यादव उर्फ टोनी के दृढ़निश्चय के कारण यह आयोजन सम्पन्न हो पाया। 
इस आयोजन में जनपद के तमाम बुद्धिजीवियों ने इस पद्धति की सराहना की और कई लोगों ने भविष्य में अपने बच्चों की शादी इसी रीति से सम्पन्न कराने के लिए वचनबद्धता जाहिर की। और यह कहा की इस विवाह पद्धति का पुरजोर स्वागत होना चाहिए और समाज में व्याप्त पाखंड अंधविश्वास और चमत्कार से बहुजन समाज में व्याप्त इस परंपरा को व्यापार से बचाना चाहिए जिससे बहुजन समाज के लोगों को जिस तरह से सदियों से लूटा जा रहा है उस पर नियंत्रण लगाया जा सके। 
सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव के वगैर राजनैतिक शैक्षिक आर्थिक वैज्ञानिक समझ को पैदा करना दुरूह ही नहीं जटिल होता जा रहा है। इसी के खिलाफ हमारे समाज सुधारक महापुरुषों यथा - भगवान गौतम बुद्ध जी ने कितना बड़ा आंदोलन खड़ा किया मगर कालान्तर में उसे भी पाखण्ड,अन्धविश्वास और चमत्कार ने निगल लिया।  उनके इस उपदेश की कितनी अनदेखी हुयी है आज हमें पुरे समाज में दिखती है अंधे बहरे लंगड़े अज्ञानी उसी पाखण्ड के लिए पागलों की तरह अपना समान्न  उसके जाल में फ़साने में करते हैं। 
समाज को जागृत करने में ई वी रामासामी पेरियार ने कितना संघर्ष किया यथा - पेरियार (ई.वी. रामासामी) ने दक्षिण भारत में जातिवाद, ब्राह्मणवादी प्रभुत्व और धार्मिक आडंबरों के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक आंदोलन चलाया। उनका आत्मसम्मान आंदोलन और वैकोम सत्याग्रह जैसे संघर्ष अस्पृश्यता, स्त्री अधिकारों और सामाजिक न्याय की दिशा में निर्णायक साबित हुए।
पेरियार का सामाजिक आंदोलन
1. आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) स्थापना: 1925 में पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया।
उद्देश्य: जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध। स्त्रियों को समान अधिकार दिलाना। तर्कवाद और नास्तिकता को बढ़ावा देना।
प्रभाव: इस आंदोलन ने तमिलनाडु में सामाजिक न्याय की राजनीति की नींव रखी और बाद में द्रविड़ पार्टियों की विचारधारा का आधार बना।
2. वैकोम सत्याग्रह (1924–25)
पृष्ठभूमि: त्रावणकोर राज्य के वैकोम क्षेत्र में दलितों को मंदिर की ओर जाने वाली सड़कों पर चलने की अनुमति नहीं थी।
पेरियार की भूमिका: 
उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया और दलितों को समान अधिकार दिलाने के लिए अहिंसक सत्याग्रह में भाग लिया।
महात्मा गांधी ने भी आंदोलन का समर्थन किया।
परिणाम: सरकार ने अंततः दलितों को मंदिर तक जाने वाली सार्वजनिक सड़कों का उपयोग करने की अनुमति दी। यह अस्पृश्यता के खिलाफ पहली बड़ी जीत थी।
3. जस्टिस पार्टी और सामाजिक न्याय
जस्टिस पार्टी (1920 के दशक): पेरियार इससे जुड़े और गैर-ब्राह्मणों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की शुरुआत की गई।
मंदिर प्रशासन में सुधार किए गए। महत्व: इसने तमिलनाडु में आरक्षण और सामाजिक न्याय की राजनीति की नींव रखी।
4. महिलाओं के अधिकार
पेरियार ने: बाल विवाह, देवदासी प्रथा और स्त्रियों के शोषण का विरोध किया। विधवा पुनर्विवाह और स्त्रियों की शिक्षा का समर्थन किया।
प्रभाव: महिलाओं को सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में अधिक अधिकार मिले।
मुख्य उपलब्धियाँ : जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के खिलाफ निर्णायक संघर्ष। आत्मसम्मान आंदोलन से सामाजिक न्याय की राजनीति का आधार।
महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा को बढ़ावा। तर्कवाद और नास्तिकता के जरिए धार्मिक आडंबरों का विरोध। 
ज्योतिराव फुले (ज्योति बा फुले) ने 19वीं सदी में भारतीय समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक क्रांतिकारी आंदोलन चलाया। उनका संघर्ष जातिवाद, स्त्री-शिक्षा और शोषण के खिलाफ था।
ज्योतिराव फुले (ज्योति बा फुले) ने 19वीं सदी में भारतीय समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक क्रांतिकारी आंदोलन चलाया। उनका संघर्ष जातिवाद, स्त्री-शिक्षा और शोषण के खिलाफ था।
ज्योति बा फुले फुले का सामाजिक आंदोलन
1. शिक्षा का प्रसार
1848 में पुणे में पहला लड़कियों का स्कूल खोला।
पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षिका बनाया।
दलितों और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए स्कूल खोले।
शिक्षा को सामाजिक समानता का सबसे बड़ा हथियार माना।
2. जातिवाद और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध
जाति व्यवस्था को अन्यायपूर्ण बताया।
शूद्रों और अति-शूद्रों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक शोषण और आडंबरों का विरोध किया।
3. सत्यशोधक समाज (1873)
स्थापना: 1873 में "सत्यशोधक समाज" की स्थापना की।
उद्देश्य:
जाति और धर्म के नाम पर होने वाले शोषण का अंत।
समानता और भाईचारे पर आधारित समाज।
विवाह और सामाजिक रीति-रिवाजों में सरलता और तर्कवाद।
प्रभाव: इस संगठन ने गैर-ब्राह्मण आंदोलन को संगठित किया और सामाजिक सुधार की दिशा दी।
4. स्त्री अधिकार
बाल विवाह और सती प्रथा का विरोध किया।विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। स्त्रियों को शिक्षा और स्वतंत्रता दिलाने पर जोर दिया।
5. किसान और श्रमिक हित
किसानों की बदहाली और साहूकारों के शोषण पर आवाज उठाई।
"किसान का असली मित्र" कहे गए। उन्होंने किसानों को संगठित होकर अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी।
मुख्य उपलब्धियाँ
भारत में स्त्री शिक्षा की नींव रखी। जातिवाद और धार्मिक शोषण के खिलाफ निर्णायक संघर्ष। सत्यशोधक समाज के जरिए सामाजिक न्याय की राजनीति का आधार। किसानों और श्रमिकों के अधिकारों की आवाज बुलंद की।
संक्षेप में, ज्योति बा फुले का आंदोलन भारतीय समाज में समानता, शिक्षा और न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक क्रांति था।
क्या आप चाहेंगे कि मैं फुले और पेरियार के आंदोलनों की तुलना करके बताऊँ कि दोनों ने किस तरह सामाजिक न्याय की राजनीति को आकार दिया? 
फुले का सामाजिक आंदोलन


6 मई 2026

जो हमें करना था यह उन्होंने कर दिखाया !





जो हमें करना था यह उन्होंने कर दिखाया !
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समाजवादी पार्टी का विभाजन तो उसी दिन हो गया था जिस दिन अखिलेश यादव ने नेताजी से सब कुछ ले लिया था और नेताजी ने उस दिन समाजवादी पार्टी को समाप्त कर दिया था जिस दिन उन्होंने अपने पुत्र को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था !
यद्यपि मैं भी इस बात का पक्षधर था कि अब अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री का पद दे देना चाहिए और जब यह हुआ हमें भी इस बात की प्रसन्नता हुई कि मेरी भी बात मानी गई है। तब तक मैं अखिलेश यादव के बारे में उतना नहीं जानता था जितना कि उनसे अपेक्षा करता था, समय-समय पर जो बातें आती रहीं उनसे लगता था कि युवा हैं सीख रहे हैं और नेता जी का संरक्षण है बहुत कुछ सीख जाएंगे।
लेकिन जब यह लगने लगा की यह सीख नहीं रहे हैं और लोग इनका दुरुपयोग कर रहे हैं, इसलिए कि या तो यह कुछ जानते नहीं या यह बहुत कुछ जानबूझकर करने दे रहे हैं अक्सर आता था कि वह अकेले मुख्यमंत्री नहीं हैं बल्कि प्रदेश में साढे़ तीन मुख्यमंत्री हैं। आधा मुख्यमंत्री कौन है इस बारे में जो जानकारी हुई उसमें ही इन्हें रखा जाता था।
ख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते य
अब सवाल यह है कि सैफई परिवार का युवराज अपने घर से ही मात खाना शुरु कर दिया है उसके सबसे शक्तिशाली चाचा ने अपनी एक पार्टी बना ली है और ऐसा कहा जा रहा है कि माननीय नेता जी उसी की तरफ हैं, सैफई घर संभालेगा या प्रदेश देश की तो छोड़िए उसके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया। आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व
मुह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था। इनके​आचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठा
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि
क्याकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला । प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं। राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परा
स्तसाथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल हैके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया।
आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व मुख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते यह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि क्या विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था।


इनके​आचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठाकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला ।
प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है

12 अप्रैल 2025

बिहार उत्तर प्रदेश पर असली नज़र है

बिहार उत्तर प्रदेश पर असली नज़र है  

बिहार और उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी ज्यादा है !
भारतीय राजनीति में जिन लोगों का पदार्पण हो गया है वह कौन है यह बताने की जरूरत नहीं है उनकी मानसिकता क्या है यह भी बताने की जरूरत नहीं है जो सबसे ज्यादा जरूरी है वह यह है कि जनता की अभी सच में विरोध कायम है कल कहीं इसको एकदम से ना दबा दिया जाए जबकि पूरी कोशिश की गई है कि जनता किस तरह से भयभीत रहे लेकिन अभी भी संभावना है बिहार और उत्तर प्रदेश में कि वहां की जनता खड़ी हो सकती है। 
पिछले दिनों हमने देखा मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ हरियाणा महाराष्ट्र और अभी हाल में दिल्ली किस तरह से भाजपा ने अपने कब्जे में कर लिया है। 
यह किसी को भरोसा नहीं था कि इन राज्यों में ऐसा होने जा रहा है लेकिन ऐसा हुआ मीडिया ने बहस करके यह समझा दिया कि जनता भाजपा के पक्ष में थी। 
उत्तर प्रदेश में भी यही हुआ था जो आम आदमी को भी इस बात की खबर और विश्वास था कि भाजपा नहीं आ रही है लेकिन भाजपा आई। 
अब सवाल यह है कि आने वाले दिनों में बिहार में चुनाव होने वाले हैं बिहार भाजपा के लिए उतना मुफीद राज्य नहीं है, लेकिन अभी जिस तरह की भाजपा की योजनाएं हैं और देश की लोकतंत्र की रक्षा की संस्थाएं हैं वह किस तरह से घाल मेल कर रही हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। 
पिछले दिनों राष्ट्रीय अधिवेशन में बिहार के प्रमुख विपक्षी दल के नेता श्री तेजस्वी यादव ने यह स्वीकार किया था कि अभी तो बिहार में बहुत तरह की ऐसी नीतियां लागू की जाएगी जिससे उनको हराया जा सके। 
हमें गंभीरता से विचार करना होगा की आने वाले चुनाव में बिहार के बाद अन्य प्रदेशों को किस तरह से भाजपा प्रदेश बनाने की योजना जारी रहेगी। 
उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में यह पता चल गया कि भाजपा के खिलाफ इस तरह का माहौल है लेकिन उपचुनाव में गणित कुछ और था और वहां के मुख्य विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इस बात को चिल्ला चिल्ला के कहते हैं कि ईवीएम किसी तरह भी विश्वसनीय नहीं है।
समय रहते उत्तर प्रदेश और बिहार को विशेष रूप से पूरे देश के लोगों को विश्वास में लेकर एक आंदोलन खड़ा करना चाहिए जिसमें जनता सड़क पर आए और ईवीएम की बचाए बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए और तब तक यह आंदोलन जारी रहे जब तक इस मांग को मान ना लिया जाए।
यह भी विचारणीय है कि कांग्रेस क्या चाहती है पिछले दिनों ऐसा देखने में आया है कि कांग्रेस कई प्रदेशों में अपनी गलत रणनीति की वजह से चुनाव हार चुकी है उसके पीछे कांग्रेस में बैठे संघ के विचारधारा के लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं। 
राहुल गांधी को इन लोगों से भिन्न माना जा सकता है और उनके साथ इंडिया गठबंधन की अवधारणा के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है और उनको यह समझने की जरूरत है कि यह समय बिहार और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बढ़ाने का नहीं है यह समय उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा को ना आने देने की है। 
जयराम रमेश कन्हैया कुमार और बहुत सारे ऐसे नाम हैं जो कांग्रेस में बैठकर के संघ की मानसिकता को ज्यादा बल देते हैं।
जब आज नेताजी नहीं है माननीय शरद यादव जी नहीं है आदरणीय लालू प्रसाद यादव जी अस्वस्थ हैं ऐसे में बहुत जरूरी है कि नई पीढ़ी को अपने इर्द-गिर्द ऐसे लोगों को रखने की जो हमारे वरिष्ठ नेताओं के विचारधारा को सहयोग कर सके और वर्तमान नेतृत्व को संघर्षील बनाए रखने में सहयोग करें। 
जबकि यहां भी अक्सर यह दिखाई देता है कि ऐसे तत्व समय-समय पर इस विचारधारा को नुकसान पहुंचाते रहते हैं उनका जिक्र करना जरूरी नहीं है। 
लेकिन जरूरत पड़ने पर उनके बारे में बताया जा सकता है।

21 अग॰ 2024

सवाल नेतृत्व का है बौद्धिक पलायन और अयोग्य प्रतिनिधित्व का।

 सवाल नेतृत्व का है बौद्धिक पलायन और अयोग्य प्रतिनिधित्व का।

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-डॉ लाल रत्नाकर 

वैसे देखा जाए तो पूर्वांचल की उपस्थिति संसद में यादवों के हिसाब से 'ना' के बराबर है, यह अलग बात है कि श्री धर्मेंद्र यादव जी आजमगढ़ से सांसद है, वैसे तो आजमगढ़ से और भी यादव सांसद हुए हैं (उनके चित्र कि यहां जरूरत नहीं समझा) जौनपुर से कई यादव सांसद हुए हैं बनारस से भी चंदौली से भी बगल के अन्य जिलों से भी बहुत सारे ऐसे नाम है। 

लेकिन जो सबसे आश्चर्यजनक खबर है वह यह है जिसको नीचे संलग्न खबर में अखबार नवीश ने उठाया है जिसपर पहले भी सवाल खड़े हुए हैं ?

जहां तक किसी क्षेत्र से वहां के प्रतिनिधियों के त्याग का सवाल है, यह पुरानी कहावत है वह पड़ोसी के घर से ही होना चाहिए चाहे वह नेता या वह व्यक्ति जो ऐसा कहता है करता है वह स्वंय ऐसा क्यों नहीं कर सकता। 

समय का चक्र है की पूर्वांचल देश की संसद में अपने प्रतिनिधि के रूप में उधार के प्रतिनिधियों से प्रतिनिधित्व पा रहा है, जिन लोगों के चित्र यहाँ लगाए गए हैं वह पूर्वांचल की प्रतिभाशाली रहे हैं उनमें से अधिकांश लोग कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टी के जनप्रतिनिधि रहे हैं. जिसमें वह लोग भी हैं जो बहुजन समाज के अनेकों ऐसे और लोग हुए हैं जिन्होंने पहले भी भारत की संसद के लिए प्रतिनिधित्व का नेतृत्व किया है।

आज सवाल यह नहीं है कि श्री अखिलेश यादव जी ने पीडीए के माध्यम से जो सफलता हासिल की है उसकी मैं किसी रूप में बुराई कर रहा हूं। लेकिन मेरा ख्याल है कि इसको और बेहतर तरीके से किया जा सकता था जिसमें प्रदेश के यादवों का और नेतृत्व कराया जा सकता था। जो इस समीकरण को कहीं से भी कमजोर नहीं करता, प्रतिनिधित्व के सवाल पर फेर बदल हो सकता था और लोगों को भी शामिल कर पीडीए को विस्तृत और विस्तारित किया जा सकता था।

नाम लेकर बताना शायद उन लोगों को अच्छा न लगे जो उससे लाभान्वित हुए हैं लेकिन आम आदमी के मुंह से यही चर्चा आती है कि पिता, पुत्र, पुत्री जैसे विवाद से भी बचा जा सकता था।

आज उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपने कुकर्मों की वजह से जिस हालत में पहुंच गई है उसी का लाभ उठाकर बीजेपी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सीना तानने की शक्ति के रूप में दिखाई देती है जिसका इस चुनाव में कुछ मानमर्दन हुआ है। इस मानमर्दन के पीछे जनता के उत्साह का बहुत बड़ा हाथ है, जिसे यदि किसी राजनेता को यह लगता हो कि उसने कोई जादू कर दिया है तो यह आम आदमी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ भी इसी बात को महत्व देते हैं। 

जिन लोगों से इस चुनाव में लड़ना था उनसे लड़ता हुआ विपक्ष नजर नहीं आ रहा था लेकिन जनता के उत्साह ने उन्हें कमजोर किया और विपक्ष को ताकत दिया। 

इसके उलट बिहार में जो हुआ वहां से भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। 

यदि समय रहते व्यापक रूप से इस पर विचार नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ऐसा नहीं है कि जिनको आज हम कमजोर मान रहे हैं, जो हर तरह से सत्ता के लिए देश को तहस-नहस कर रहे हैं, उनके खिलाफ जनता कहीं यह महसूस न करने लगे कि यह तो और खराब लोग हैं। यह सवाल उनको बहुत ताकत देगा जो इनमें फुट डालने की टाक में रहते हैं। 

आईए सांस्कृतिक विचार के लोगों को इकट्ठा करके ऐसे कार्यक्रम प्रस्तुत कर उन बिंदुओं को चिन्हित करें, जिनसे आपको सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाया जाता है और उसी की परम्परा में अखंड-पाखण्ड, अंधविश्वास और चमत्कार की राजनीति की जाती है।

जिस दिन आम आदमी इन सारे प्रतीकों के बारे में जान जाएगा उस दिन असली राजनीति शुरू होगी। यही असली राजनीती होगी जिससे संविधान की रक्षा होगी। 

तब फिर से राजनीति समझने वाले लोगों का राजनीती में आगमन होगा और गुमराह करने की राजनेताओं की नीति का सही मूल्यांकन और सही प्रतिनिधित्व पर जोर देगी। ऐसा करने के लिए जनता को बहुत सजग होना पड़ेगा पुनः उसके लिए आंदोलन शुरू करने होंगे।


(नोट : इस आलेख में पूर्वांचल के तत्कालीन नेताओं को लिया गया है जबकि उत्तर प्रदेश में ऐसे अनेक नेता जिन्होंने सामाजिक क्रांति को बहुत ही महत्व दिया है और बहुजन समाज के लोगों को एकजुट रखा है हमारे इतिहास में मौजूद हैं वर्तमान समय में जिस तरह की राजनीति की जा रही है उसे राजनीति के और बहुत सारे विकल्प हैं जिनका प्रयोग किया जाना चाहिए लेकिन संभवत हुआ है उनकी समझ में नहीं आ रहा है जिनको इस तरह के फैसले लेने की जरूरत है)

10 फ़र॰ 2024

संसद राम मंदिर पर चर्चा के लिए तैयार है, विपक्ष कैसे प्रतिक्रिया देगा?

 राजनीति में आज: संसद राम मंदिर पर चर्चा के लिए तैयार है, विपक्ष कैसे प्रतिक्रिया देगा?

साथ ही, अमित शाह ऐसे समय में कर्नाटक में होंगे जब भाजपा-जद(एस) की बातचीत अंतिम चरण में है, और बिहार भाजपा महत्वपूर्ण विश्वास मत से पहले अपने विधायकों के लिए एक कार्यशाला आयोजित करेगी।

संसद का बजट सत्र शनिवार को समाप्त हो गया, जिसमें दोनों सदनों ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की देखरेख के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया, जिसका उद्घाटन 22 जनवरी को हुआ था। भाजपा का एक दीर्घकालिक वैचारिक लक्ष्य, उम्मीद है कि आगामी लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी के संदेश में मंदिर एक प्रमुख भूमिका निभाएगा।

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भाजपा सांसद सत्यपाल सिंह और शिवसेना सांसद श्रीकांत एकनाथ शिंदे मंदिर पर चर्चा शुरू करने के लिए तैयार हैं, यह देखना होगा कि विपक्षी दल इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं, क्योंकि कांग्रेस सहित भारत के अधिकांश शीर्ष नेता या तो दूर रहे। घटना से या मुद्दे पर चुप थे।

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संकल्प के अलावा, राज्यसभा शनिवार को भाजपा के सत्ता में आने से पहले और बाद में भारतीय अर्थव्यवस्था पर श्वेत पत्र पर भी चर्चा करेगी, जैसा कि लिज़ मैथ्यू ने बताया है। यह पेपर भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव का मुद्दा बन गया है, सत्तारूढ़ दल गुरुवार को संसद में पेश किए गए 59 पन्नों के दस्तावेज़ के इर्द-गिर्द चुनावों के लिए एक कहानी तैयार करने के लिए तैयार है।

राज्यों में बीजेपी की चुनावी तैयारी

शनिवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अन्य कार्यक्रमों के अलावा पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में भाग लेने के लिए कर्नाटक पहुंचने की उम्मीद है। शाह की यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भाजपा और जद (एस) लोकसभा चुनावों के लिए सीट-बंटवारे की बातचीत के अंतिम चरण में हैं, जैसा कि अकरम एम ने बताया है। जद (एस) के सदस्यों को कौन सी सीटें मिलेंगी, इस पर कुछ सवाल बने हुए हैं। पहला परिवार चुनाव लड़ेगा.


उत्तर प्रदेश में, जाट नेता जयंत चौधरी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) ने पश्चिमी यूपी में भाजपा के साथ समझौते का संकेत दिया है, जिनके दादा और पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह को शुक्रवार को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

जयंत कहते हैं, दिल जीत लिया, पश्चिमी यूपी में बीजेपी के साथ समझौते के संकेत

इस बीच, भाजपा का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ शनिवार को पश्चिम यूपी के 23 लोकसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंचने के लिए "कौमी चौपाल" अभियान शुरू करेगा। चूंकि भाजपा आरएलडी के साथ हाथ मिलाकर अपने जाट वोटों को मजबूत करने का प्रयास कर रही है, इसलिए उसे उम्मीद होगी कि उसकी अतिरिक्त मुस्लिम पहुंच समाजवादी पार्टी (एसपी) की संभावनाओं को कम कर सकती है जो यादवों और मुसलमानों के वोटों पर निर्भर है।

इस बीच, भाजपा के बिहार विधायक बोधगया में शनिवार से शुरू होने वाली दो दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने के लिए तैयार हैं, ताकि पार्टी सोमवार को विधानसभा विश्वास मत से पहले अपने विधायकों को जानकारी दे सके। राजद और भाजपा दोनों ने विधायकों की खरीद-फरोख्त के प्रयासों का संकेत दिया है और माइंड गेम खेल रहे हैं। जैसे-जैसे निर्णायक मतदान नजदीक आएगा जुबानी जंग और तेज होने की संभावना है।

जारांगे-पाटिल का अल्टीमेटम

महाराष्ट्र में, मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जारांगे-पाटिल ने धमकी दी है कि अगर सरकार उन लोगों के रक्त संबंधियों को कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने के अपने वादे को लागू नहीं करती है, जिन्होंने पहले से ही खुद को समुदाय से संबंधित के रूप में स्थापित किया है, तो वे शनिवार से एक और भूख हड़ताल शुरू करेंगे। यह निर्णय राज्य मंत्री और ओबीसी नेता छगन भुजबल के विरोध के बीच आया है, जो दावा करते हैं कि मराठों को ओबीसी कोटा में "पिछले दरवाजे से प्रवेश" दिया जाएगा।

इस बीच, नागपुर में, आदिवासी गोवारी गोंड समुदाय शनिवार को एक बैठक आयोजित करने और सरकार द्वारा जाति प्रमाण पत्र की उनकी मांगों को पूरा नहीं करने पर "आंदोलन तेज" करने के लिए तैयार है।

मनोज जारांगे पाटिल: जब तक सभी मराठों को आरक्षण नहीं मिल जाता तब तक आंदोलन जारी रहेगा

राजनीतिक मोर्चे पर, कांग्रेस की मुंबई इकाई में राज्य के पूर्व मंत्री और तीन बार के विधायक बाबा सिद्दीकी के शनिवार को अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल होने को लेकर मंथन चल रहा है।

सिद्दीकी का बाहर निकलना पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा के हाई-प्रोफाइल इस्तीफे के बाद हुआ है, जो सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होने के लिए चले गए थे। पार्टी में एक प्रमुख मुस्लिम चेहरा, सिद्दीकी के बाहर निकलने से लोकसभा चुनाव के लिए महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सहयोगियों के साथ महत्वपूर्ण सीट-बंटवारे की बातचीत से पहले शहर की कांग्रेस इकाई की ताकत और कम हो जाएगी।

-पीटीआई इनपुट के साथ

Indian Express

28 जन॰ 2024

भारत में अब एक नया संविधान है जिसमें हर लक्ष्मण रेखा बहुसंख्यक समुदाय खींचता है और जिसे सरकार का कोई भी अंग पार नहीं कर सकता है. योगेंद्र यादव

 गणतंत्र मर चुका है और BJP-RSS को जिम्मेदार ठहराने का मतलब नहीं, हमें नई राजनीतिक भाषा की जरूरत है

भारत में अब एक नया संविधान है जिसमें हर लक्ष्मण रेखा बहुसंख्यक समुदाय खींचता है और जिसे सरकार का कोई भी अंग पार नहीं कर सकता है.

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अंग्रेजी की कहावत है: किंग इज डेड, लॉन्ग लिव द किंग” (`राजन नहीं रहे, राजन जिन्दाबाद`). इसी तर्ज पर 26 जनवरी को हमारा राष्ट्रीय उद्घोष होना चाहिए: गणतंत्र न रहा आबाद , गणतंत्र जिन्दाबाद!भारत नामक जो गणराज्य 26 जनवरी 1950 को बना था वह बीते 22 जनवरी 2024 को ध्वस्त हो गया. यह प्रक्रिया लंबे समय से जारी थी. मैं कुछ सालों से ‘गणतंत्र के अंत’ की बात कहता आ रहा था. लेकिन अब हम गणतंत्र के खात्मे की एक निश्चित तारीख भी बता सकते हैं. अब हम एक नई राजनीतिक व्यवस्था में जी रहे हैं. जो लोग इस नई व्यवस्था में अवसर ढूंढ़ रहे हैं उन्होंने नये खेल के नियमों को अगर अब तक न अपनाया होगा तो आगे के दिनों में तेजी से अपना लेंगे. हम जैसे लोगों के पास जो अपने पहले गणतंत्र पर दावा जताने को प्रतिबद्ध हैं सिवाय इसके कोई और विकल्प नहीं कि हम अपनी राजनीति पर मूलगामी अर्थों में पुनर्विचार करें. हमारी जरूरत सियासत की एक नई भाषा गढ़ने की है—एक ऐसी भाषा जिसके सहारे हम अपने गणतांत्रिक मूल्यों की ज्यादा मजबूती और धारदार तरीके से हिफाजत और हिमायत कर सकें. हमें अपनी राजनीतिक रणनीति को हर हाल में बदलना और अपने सियासी रिश्तों की चिनाई-बिनाई पर नये सिरे से काम करना होगा— पुराने तर्ज के संसदीय विरोध की जगह सड़क के प्रतिरोध की राजनीति की राह अपनानी होगी.

इसे लेकर कोई गफलत में रहने की जरूरत नहीं. प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का रिश्ता किसी मूर्ति, भगवान राम या फिर राम मंदिर से कत्तई नहीं था. उस समारोह का रिश्ता किसी मर्यादा, आस्था या धर्म से भी नहीं था. वह समारोह दरअसल कई सांवैधानिक, राजनीतिक और धार्मिक मर्यादाओं के उल्लंघन का समारोह था. इस प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के साथ जुड़ी करोड़ों लोगों की आस्था के अपहरण का आयोजन था. धर्म और राजसत्ता के रिश्ते की धुरी पलटने का अवसर था, चूंकि इस समारोह ने हिन्दू धर्म को राजनीति का खिलौना बना दिया. अपनी पृष्ठभूमि, अपनी बनावट, लामबंदी के अपने मिज़ाज और असर के एतबार से 22 जनवरी का समारोह एक सियासी समारोह था जिसका मकसद राजनीतिक जीत के मंसूबे बांधना, उसके लिए हड़बोंग मचाना और सियासी जीत की राह साफ करना था. दरअसल यह उस`हिन्दू राष्ट्र` की प्राण-प्रतिष्ठा का समारोह था जहां न परंपरा-सम्मत हिन्दू धर्म ही मौजूद है और न ही वह ‘राष्ट्र’ जो भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक चौहद्दी में परिभाषित होता है.

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एक नई राज-व्यवस्था

हमारे पास अब एक नया संविधान है— एक नये दस्तावेज की शक्ल में नहीं बल्कि राजनीतिक सत्ता के एक नये व्याकरण के रूप में जिसमें बीते एक दशक के दौरान हुए बदलावों को सूत्रबद्ध कर दिया गया है. मूल संविधान में तो अल्पसंख्यकों के अधिकार को एक सीमा-रेखा के रूप में स्वीकार किया गया है जो यह तय करती है कि लोकतांत्रिक रीति से चुनी गई कोई सरकार क्या नहीं कर सकती. लेकिन नये संविधान में बहुसंख्यक समुदाय की मर्जी वह लक्ष्मण-रेखा है जिसका उल्लंघन राज्य की कोई भी संस्था नहीं कर सकती, चाहे मूल संविधान में कुछ भी लिखा हो. अब हमारे देश में दु-छत्ती नागरिकता की व्यवस्था होगी जिसमें हिन्दू और हिन्दुओं के सहवर्ती मकान मालिक हैं जबकि मुसलमान और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक किरायेदार की तरह. देश के असली संविधान में भारत को ‘राज्यों का संघ’ बताया गया है लेकिन इसकी जगह अब एकल सरकार स्थापित हो गई है जो अब प्रांतों को कुछ छोटे मोटे शासकीय काम सौंपा करेगी. कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच ताकत के बंटवारे की जगह शासन की बागडोर कार्यपालिका को थमा दी गई है. यही अधिशासी अब विधायिका के कर्मकांड तय करते हैं और वह चौहद्दी खिंचा करते हैं जिसके भीतर रहकर न्यायपालिका को निर्णय देना है. संसदीय लोकतंत्र का स्थान शासन की राष्ट्रपति-केंद्रित प्रणाली ने नहीं बल्कि एक व्यक्ति के शासन ने ले लिया है, एक ऐसा राजा जिसे जनता ने चुना है— हम एक ऐसी नई राजनीतिक व्यवस्था में रह रहे हैं जिसमें जनता अपने सर्वोच्च नेता को चुनती है और ऐसे चुनाव के बाद सबकुछ उसी नेता पर छोड़ देती है.

इस नये संविधान की अमलदारी को अभी संविधान-सभा का अनुमोदन हासिल नहीं हुआ है. कैबिनेट का प्रस्ताव भले ही इसे भारत की आत्मा की स्वाधीनता का दिवस कहे, हम अब भी 22 जनवरी 2024 को दूसरे गणतंत्र की स्थापना का दिवस नहीं कह सकते. मूल संविधान को औपचारिक रूप से निरस्त करने को रोकने की लड़ाई अभी भी बाकी है. आने वाला लोकसभा चुनाव इस लड़ाई का पहला मोर्चा होगा. लेकिन चुनाव का नतीजा चाहे जो भी निकले, हम इस नई राजनीतिक व्यवस्था की सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते. हम मूलगामी पुनर्विचार की चुनौती को अब आगे के दिनों पर और नहीं टाल सकते.

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हमें शुरूआत इस कड़वे सच को मान कर करनी होगी कि हम स्वयं भारत के प्रथम गणतंत्र की मौत के अपराधी हैं. आरएसएस और बीजेपी को उस बात के लिए दोष देना बेकार है जो उनका मूल मकसद रहता आया है. जिम्मेवारी तो उनकी है जिन्होंने भारत के प्रथम गणतंत्र के प्रति निष्ठा रखने की सौगंध उठायी थी. सेक्युलरवाद का प्रतिबद्धता की राजनीति से धीरे-धीरे ढहकर सुविधा की राजनीति में बदलते जाना हमारे प्रथम गणतंत्र को मटियामेट करने का दोषी है. सेक्युलर राजनीति का औद्धत्य, जनता-जनार्दन से इसका विलगाव, लोगों से उनकी बोली-बानी में बतियाने से उसका इनकार सेक्युलरवाद के विचार को अवैध बनाने का जिम्मेवार है. हम ये बात नहीं भूल सकते कि यह प्राणघाती अघात भरपूर चेतावनी की उस घटना के तीस साल बाद लगा है जिसे बाबरी मस्जिद का विध्वंस कहा जाता है. पूरे तीस साल तक सेक्युलर ढर्रे की राजनीति इस प्रमाद में टालमटोल करती रही कि यह रोग खुद ही गायब हो जायेगा या फिर जाति की राजनीति इसकी काट कर लेगी. यदि सेक्युलर राजनीति आज धूल चाट रही है तो इस दुरवस्था के लिए इसके अपने कर्म-अपकर्म के पाप ही जिम्मेदार हैं.

जो चीज राजनीति के हाथों से गंवायी गई वह चीज राजनीति के हाथों से ही हासिल की जा सकती है. आज हमारे पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं. हम जो मूल संविधान के तरफदार हैं वे अब अपने ही देश में एक संकटग्रस्त विचारधाराई अल्पसंख्यक बनकर रह सकते हैं, जब-तब सांकेतिक विरोध जताकर जी बहला सकते हैं. या फिर हम एक निर्भीक और दमदार गणतांत्रिक राजनीति की प्राण प्रतिष्ठा करें.


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दोधारी राजनीति

ऐसी गणतांत्रिक राजनीति का दोधारी होना जरूरी है. एक तरफ इस राजनीति को सांस्कृतिक-वैचारिक लड़ाई का रूप लेना होगा. यह लड़ाई लंबी होगी— आगे दो-तीन दशकों तक चलने वाली. इस लड़ाई की शुरूआत भारतीय राष्ट्रवाद, अपनी सभ्यतागत विरासत, अपनी भाषाओं और हिन्दू-धर्म समेत अपनी तमाम परंपराओं पर दावेदारी जताने से होनी चाहिए. इस लड़ाई के पास भारत के लिए एक नया स्वप्न होना चाहिए, सामाजिक पिरामिड के निचले हिस्से के लोगों की आशाओं को मुखरित करती विचारधाराई धुरी होनी चाहिए. इसके लिए हमें बीसवीं सदी के वैचारिक द्वंद्व, मसलन साम्यवादी, समाजवादी और गांधीवादी के बीच का द्वंद्व, को पीछे छोड़ना होगा. हमें बीसवीं सदी के सभी उदार, समतामूलक और उपनिवेश विरोधी विचारों को जोड़कर उनसे एक स्वराज 2.0 जैसी नई विचारधारामें गूंथना होगा.

दूसरी तरफ, हमारे पास नये तर्ज की राजनीति होनी चाहिए. विरोध की राजनीति की जगह प्रतिरोध की राजनीति अपनानी होगी. सामान्य ढर्रे के चुनावी और संसदीय विपक्ष की राजनीति अब सबसे महत्वपूर्ण नहीं है. गणतांत्रिक राजनीति को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा. विभिन्न दलों को बांटने वाली पुरानी लकीर राजनीति की नई दुनिया के लिए प्रासंगिक नहीं. मौजूदा संकट के मद्देनजर सियासी जुड़ाव की जमीन में कुछ ऐसा बदलाव होना चाहिए मानो भू-चाल आया हो और सारा कुछ एक नये रूपाकार में गढ़ा जा रहा हो. जो लोग गणतंत्र की आत्मा के प्रति सच्चे हैं उन्हें आपस में घुल-मिल कर एक राजनीतिक धारा में बदलना होगा. चूंकि चुनाव अब पूर्व-निर्धारित नतीजों वाले जनमत-संग्रह में बदल गये हैं इसलिए संसद की चुनावी राजनीति की बजाय सड़क पर आंदोलन धर्मी प्रतिरोध नई स्थिति में कहीं ज्यादा कारगर है. लेकिन प्रतिरोध की ऐसी राजनीति पर भी दबाव होंगे क्योंकि लोकतांत्रिक रीति से विरोध जताने के जमीन सिकुड़ती जायेगी. प्रतिरोध की राजनीति को नई लेकिन लोकतांत्रिक और अहिंसक राह और नई तरकीब ढूंढ़नी होगी.

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक मजाक चल रहा है कि चलो, इस गणतंत्र दिवस का जश्न धूमधाम से मनायें क्योंकि कहीं ऐसा ना हो कि यह आखिरी गणतंत्र दिवस साबित हो. लेकिन विडंबना यह है कि यह चुटकुला जिस लम्हे सोशल मीडिया पर घूमना शुरू हुआ उसी लम्हे यह पुराना भी पड़ चुका था. यह छब्बीस जनवरी अब हमारे लिए एक मृत गणतंत्र की बरसी मनाने का दिन हो सकता है, या फिर देश के प्रथम गणतंत्र पर अपनी दावेदारी पुनः जताने के राष्ट्रीय संकल्प का दिन!

गणतंत्र दिवस मुबारक हो !

(योगेंद्र यादव जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के संस्थापकों में से एक हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैं. उनका एक्स हैंडल @_YogendraYadav है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

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