28 सित॰ 2026

"जो समाज के लिए श्रम करता है, उसे सम्मान, सुरक्षा और प्रगति का उचित अवसर मिलना चाहिए।"


 “मैं नास्तिक क्यों हूँ” भगत सिंह का एक प्रसिद्ध वैचारिक निबंध है, जिसे उन्होंने 1930 में जेल में रहते हुए लिखा था। यह निबंध केवल धर्म या ईश्वर पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि उनके बौद्धिक विकास, तर्कवादी दृष्टिकोण और क्रांतिकारी चिंतन को समझने का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ माना जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • 1929 में भगत सिंह और उनके साथियों को केंद्रीय विधानसभा बम प्रकरण तथा बाद में लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार किया गया।
  • जेल के दौरान उन्हें पढ़ने, चिंतन करने और अपने विचारों को व्यवस्थित रूप से लिखने का अवसर मिला।
  • उस समय कुछ लोगों का मत था कि भगत सिंह की नास्तिकता अहंकार या प्रसिद्धि का परिणाम है। इस आलोचना के उत्तर में उन्होंने यह निबंध लिखा।
  • निबंध में उन्होंने बताया कि उनका नास्तिक होना किसी भावनात्मक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं था, बल्कि अध्ययन, तर्क और आत्मचिंतन की प्रक्रिया से विकसित हुआ विचार था।

उस समय का राजनीतिक संदर्भ

  • भारत स्वतंत्रता आंदोलन के उग्र चरण से गुजर रहा था।
  • क्रांतिकारी संगठनों के बीच समाजवाद, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक परिवर्तन के विचार तेजी से फैल रहे थे।
  • भगत सिंह यूरोपीय क्रांतिकारियों, समाजवादी लेखकों और तर्कवादी विचारकों के साहित्य का अध्ययन कर रहे थे।
  • उनके विचार धार्मिक आस्था से अधिक सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानव प्रयास पर केंद्रित होते गए।

निबंध का महत्व

  • यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी के बौद्धिक पक्ष को उजागर करता है।
  • निबंध में तर्क, स्वतंत्र चिंतन और प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति पर जोर दिया गया है।
  • इतिहासकार इसे भगत सिंह के राजनीतिक और दार्शनिक विकास को समझने के प्रमुख स्रोतों में से एक मानते हैं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस निबंध का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं था, बल्कि अपने व्यक्तिगत विचारों और तर्कों की व्याख्या करना था। इसलिए इसे स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक इतिहास के संदर्भ में पढ़ा जाता है।

भगत सिंह के समाजवादी विचार केवल ब्रिटिश शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थे। उनका मानना था कि यदि स्वतंत्रता के बाद भी गरीबी, शोषण और असमानता बनी रहे, तो ऐसी आजादी अधूरी होगी।

1. राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता

भगत सिंह का विचार था कि केवल अंग्रेजों को हटाना पर्याप्त नहीं है। वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें किसानों, मजदूरों और आम लोगों का शोषण न हो। उनके अनुसार, सत्ता का हस्तांतरण केवल शासकों के रंग बदलने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

2. पूंजीवादी शोषण का विरोध

वे मानते थे कि शोषण चाहे विदेशी पूंजीपति करें या भारतीय, दोनों ही अन्यायपूर्ण हैं। इसलिए उन्होंने आर्थिक व्यवस्था में समानता और न्याय की आवश्यकता पर जोर दिया।

3. किसान और मजदूर केंद्र में

उनके समाजवाद का केंद्र श्रमिक और किसान वर्ग था। उनका विश्वास था कि समाज की वास्तविक शक्ति वही लोग हैं जो उत्पादन करते हैं, इसलिए उन्हें सम्मान, अधिकार और बेहतर जीवन मिलना चाहिए।

4. वैज्ञानिक दृष्टिकोण

भगत सिंह अंधविश्वास, रूढ़ियों और बिना तर्क के किसी बात को स्वीकार करने के विरोधी थे। वे शिक्षा, विज्ञान और आलोचनात्मक सोच को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण साधन मानते थे।

5. क्रांति का अर्थ

उनके लिए "क्रांति" केवल हथियार उठाना नहीं था। क्रांति का अर्थ था समाज की अन्यायपूर्ण संरचनाओं में मूलभूत परिवर्तन लाना। उनका प्रसिद्ध नारा "इंकलाब जिंदाबाद" इसी व्यापक सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक था।

6. अंतरराष्ट्रीय प्रभाव

भगत सिंह ने Karl Marx, Vladimir Lenin और अन्य समाजवादी विचारकों का अध्ययन किया था। हालांकि उन्होंने भारतीय परिस्थितियों के अनुसार समाजवाद की कल्पना की और इसे राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष से जोड़ा।

संक्षेप में

भगत सिंह ऐसे भारत की कल्पना करते थे जो:

  • राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो,
  • आर्थिक रूप से न्यायपूर्ण हो,
  • वर्गीय शोषण से मुक्त हो,
  • वैज्ञानिक सोच को अपनाए,
  • और सबके लिए समान अवसर सुनिश्चित करे।

इसी कारण इतिहासकार उन्हें केवल एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण समाजवादी चिंतक भी मानते हैं।

भगत सिंह के समाजवादी विचारों में किसान और मजदूर केवल सहानुभूति के पात्र नहीं थे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की मुख्य शक्ति थे।

किसान की भूमिका

  • भगत सिंह मानते थे कि भारत की अधिकांश आबादी किसान थी और सबसे अधिक आर्थिक शोषण भी उसी का होता था।
  • उनकी दृष्टि में स्वतंत्र भारत का निर्माण तभी संभव था जब किसानों को भूमि, उचित आय और शोषण से मुक्ति मिले।
  • वे चाहते थे कि किसान केवल करदाता या उत्पादनकर्ता न रहें, बल्कि राजनीतिक रूप से जागरूक नागरिक बनें।

मजदूर की भूमिका

  • औद्योगिक मजदूरों को वे आधुनिक समाज की उत्पादन शक्ति मानते थे।
  • उनका मानना था कि जो लोग कारखानों, रेलों, खानों और उद्योगों को चलाते हैं, उन्हें अपने श्रम का न्यायपूर्ण प्रतिफल मिलना चाहिए।
  • मजदूर संगठनों और श्रमिक अधिकारों के प्रति उनका दृष्टिकोण सकारात्मक था।

क्रांति का आधार

उनके अनुसार वास्तविक क्रांति केवल कुछ साहसी व्यक्तियों द्वारा नहीं लाई जा सकती। इसके लिए किसान और मजदूर वर्ग की व्यापक भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि क्रांतिकारी आंदोलन को जनता, विशेषकर किसानों और मजदूरों, से जोड़ना होगा।

"इंकलाब" का अर्थ

भगत सिंह के लिए "इंकलाब जिंदाबाद" केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का नारा नहीं था। इसका अर्थ था:

  • आर्थिक शोषण का अंत,
  • वर्गीय असमानता में कमी,
  • श्रम का सम्मान,
  • और एक अधिक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना।

आज के संदर्भ में

यदि भगत सिंह के विचारों को संक्षेप में देखें, तो वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ किसान अन्नदाता होने के बावजूद गरीब न रहे और मजदूर उत्पादन करने के बावजूद वंचित न रहे। उनके समाजवाद का केंद्र मानव गरिमा, आर्थिक न्याय और जनता की भागीदारी था।

यही कारण है कि उन्हें केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि किसान-मजदूर आधारित सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण चिंतक के रूप में भी याद किया जाता है।

भगत सिंह के आर्थिक न्याय के विचार उनके समाजवादी दृष्टिकोण का मूल हिस्सा थे। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब उसके साथ आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय भी हो।

1. शोषण-मुक्त समाज

उनके अनुसार सबसे बड़ी समस्या केवल विदेशी शासन नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण था। वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें कोई वर्ग दूसरे वर्ग का आर्थिक शोषण न कर सके।

2. श्रम का सम्मान

भगत सिंह मानते थे कि समाज की वास्तविक संपत्ति किसानों, मजदूरों और श्रमिकों के परिश्रम से बनती है। इसलिए उत्पादन करने वालों को उसके लाभ का उचित हिस्सा मिलना चाहिए।

3. धन और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण

वे अत्यधिक आर्थिक असमानता के विरोधी थे। उनका विचार था कि कुछ लोगों के हाथों में अत्यधिक संपत्ति का केंद्रीकरण सामाजिक अन्याय को जन्म देता है। इसलिए संसाधनों का वितरण अधिक न्यायपूर्ण होना चाहिए।

4. किसान और मजदूर केंद्र में

उनकी दृष्टि में आर्थिक व्यवस्था का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे सबसे गरीब और श्रमिक वर्ग का जीवन कितना बेहतर होता है। यदि किसान कर्ज़ में डूबा रहे और मजदूर गरीबी में जीवन बिताए, तो व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं मानी जा सकती।

5. समाजवादी गणराज्य की अवधारणा

उनके संगठन "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" के नाम में ही "सोशलिस्ट" शब्द था। इससे स्पष्ट होता है कि वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ आर्थिक नीतियाँ जनता के कल्याण और समान अवसर पर आधारित हों।

6. शिक्षा और अवसर की समानता

आर्थिक न्याय केवल आय का प्रश्न नहीं था। वे चाहते थे कि सभी लोगों को शिक्षा, विकास और सम्मानजनक जीवन के समान अवसर मिलें, चाहे उनका जन्म किसी भी वर्ग में हुआ हो।

संक्षेप में

भगत सिंह के लिए आर्थिक न्याय का अर्थ था:

  • शोषण का अंत,
  • श्रम का सम्मान,
  • किसानों और मजदूरों के अधिकार,
  • अत्यधिक आर्थिक असमानता में कमी,
  • और ऐसी व्यवस्था जिसमें देश की संपत्ति का लाभ व्यापक जनता तक पहुँचे।

इसीलिए उनका प्रसिद्ध नारा "इंकलाब जिंदाबाद" केवल राजनीतिक क्रांति का नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक न्याय पर आधारित परिवर्तन का भी प्रतीक माना जाता है।

यदि भगत सिंह के आर्थिक न्याय के विचारों को आज के भारत से जोड़कर देखें, तो उनका मूल प्रश्न आज भी प्रासंगिक है: क्या आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँच रहा है?

1. आर्थिक विकास और असमानता

आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन आय और संपत्ति की असमानता पर लगातार बहस होती रहती है। भगत सिंह संभवतः यह प्रश्न पूछते कि आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ गरीब, किसान, मजदूर और निम्न आय वर्ग के जीवन में कितना वास्तविक सुधार हुआ है।

2. किसान की स्थिति

कृषि आज भी करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। किसान आय, लागत, ऋण और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दों पर चर्चा जारी रहती है। भगत Singh के दृष्टिकोण से नीतियों का मूल्यांकन इस आधार पर किया जा सकता है कि वे किसानों की आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन को कितना बढ़ाती हैं।

3. श्रमिक और असंगठित क्षेत्र

भारत के बड़े हिस्से के श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। रोजगार की स्थिरता, मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और कार्य परिस्थितियां महत्वपूर्ण विषय हैं। भगत सिंह श्रमिकों के अधिकारों और श्रम के सम्मान को आर्थिक न्याय का प्रमुख आधार मानते थे।

4. शिक्षा और अवसर

आज उच्च शिक्षा, डिजिटल तकनीक और कौशल विकास के नए अवसर उपलब्ध हैं, लेकिन अवसरों की समान पहुंच अभी भी एक चुनौती मानी जाती है। भगत सिंह के अनुसार आर्थिक न्याय केवल आय नहीं, बल्कि शिक्षा और उन्नति के समान अवसर भी है।

5. वैज्ञानिक सोच

वे तर्क, विज्ञान और आलोचनात्मक चिंतन के समर्थक थे। आज के भारत में नवाचार, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी विकास और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार उनके "वैज्ञानिक दृष्टिकोण" के आदर्श से जुड़ा हुआ देखा जा सकता है।

6. उनकी विचारधारा का आज का अर्थ

आज भगत सिंह के आर्थिक न्याय के विचारों को किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि कुछ मूल प्रश्नों के रूप में समझा जा सकता है:

  • क्या विकास समावेशी है?
  • क्या श्रम का उचित सम्मान और प्रतिफल मिल रहा है?
  • क्या किसानों और कमजोर वर्गों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है?
  • क्या सभी नागरिकों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिल रहे हैं?

निष्कर्ष

भगत सिंह का सपना केवल स्वतंत्र भारत नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण भारत था। आज उनके विचार हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि आर्थिक प्रगति का अंतिम उद्देश्य केवल उत्पादन और संपत्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की गरिमा, अवसर और कल्याण सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।

आर्थिक न्याय को सरल उदाहरणों से समझें। भगत सिंह के दृष्टिकोण में आर्थिक न्याय का मतलब था कि जो लोग मेहनत करते हैं, उन्हें उनके श्रम का उचित फल मिले और किसी का शोषण न हो।

1. किसान का उदाहरण

अन्याय: किसान फसल उगाता है, लेकिन लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है, जबकि बिचौलिये अधिक लाभ कमा लेते हैं।

आर्थिक न्याय: किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले, ऋण और बाजार तक बेहतर पहुंच हो, और उसकी आय सम्मानजनक जीवन के लिए पर्याप्त हो।

2. मजदूर का उदाहरण

अन्याय: एक मजदूर दिनभर काम करता है, लेकिन इतनी मजदूरी नहीं मिलती कि परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें।

आर्थिक न्याय: सुरक्षित कार्यस्थल, उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक अधिकार सुनिश्चित हों।

3. शिक्षा का उदाहरण

अन्याय: गरीब परिवार का प्रतिभाशाली बच्चा पैसे की कमी के कारण अच्छी शिक्षा न प्राप्त कर सके।

आर्थिक न्याय: हर बच्चे को गुणवत्ता वाली शिक्षा और आगे बढ़ने का समान अवसर मिले।

4. स्वास्थ्य सेवा का उदाहरण

अन्याय: गंभीर बीमारी होने पर परिवार कर्ज़ में डूब जाए।

आर्थिक न्याय: आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं सभी की पहुंच में हों, केवल आर्थिक स्थिति पर निर्भर न हों।

5. उद्योग और श्रम

अन्याय: किसी कंपनी का लाभ लगातार बढ़े, लेकिन कर्मचारियों की आय और सुविधाएं न बढ़ें।

आर्थिक न्याय: उत्पादन और प्रगति का लाभ केवल मालिकों तक सीमित न रहे, बल्कि कर्मचारियों और समाज तक भी पहुंचे।

6. ग्रामीण और शहरी विकास

अन्याय: शहरों में सभी सुविधाएं हों, जबकि गांवों में सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी हो।

आर्थिक न्याय: विकास के अवसर और सार्वजनिक सुविधाएं सभी क्षेत्रों तक पहुंचें।

भगत सिंह की दृष्टि से

वे शायद कहते कि आर्थिक न्याय का मूल सिद्धांत यह है:

"जो समाज के लिए श्रम करता है, उसे सम्मान, सुरक्षा और प्रगति का उचित अवसर मिलना चाहिए।"

इसलिए उनके लिए आर्थिक न्याय केवल धन बांटना नहीं था, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना था जिसमें मेहनत, अवसर और सम्मान का वितरण अधिक न्यायपूर्ण हो।


3 जुल॰ 2026

संविधान की उद्देशिका और वर्तमान राजनितिक परिदृश्य ?

 

संविधान की उद्देशिका और वर्तमान राजनितिक परिदृश्य :
संविधान की उद्देशिका और वर्तमान राजनितिक परिदृश्य 
भारतीय संविधान के खिलाफ भाजपा की क्रिया प्रणाली का विस्तृत विश्लेषण (संतुलित, तथ्य-आधारित दृष्टिकोण)।
यह विषय अत्यंत संवेदनशील और राजनीतिक रूप से विभाजित है। विपक्ष (कांग्रेस, वामपंथी दल आदि), मानवाधिकार संगठन (HRW, Amnesty) और कुछ मीडिया BJP/RSS को संविधान की मूल भावना (धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के खिलाफ काम करने का आरोप लगाते हैं। वहीं BJP खुद को संविधान का सच्चा रक्षक बताती है, जो ऐतिहासिक सुधार (जैसे Article 370 हटाना) कर रही है और कांग्रेस के Emergency (1975) जैसे अतीत को याद दिलाती है। मैं तथ्यों, अदालती फैसलों और दोनों पक्षों के दावों पर आधारित विस्तार से बता रहा हूँ। कोई पक्ष पूर्ण रूप से सही या गलत नहीं है; वास्तविकता जटिल है।74
1. मुख्य आरोप और उदाहरण (विपक्ष/आलोचकों के अनुसार)
आलोचक कहते हैं कि BJP सरकार (2014 से) संस्थाओं का दुरुपयोग, कानूनों का चयनात्मक लागू करना और बहुसंख्यकवादी नीतियों से संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को कमजोर कर रही है:
• Article 370 का निरसन (2019): जम्मू-कश्मीर की विशेष स्वायत्तता खत्म कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटा गया। आलोचक इसे संघवाद का उल्लंघन और बिना राज्य विधानसभा की सहमति के कदम मानते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में इसे सर्वसम्मति से वैध ठहराया, कहा कि Article 370 अस्थायी था और जम्मू-कश्मीर में अलग आंतरिक संप्रभुता नहीं थी।75
• Citizenship Amendment Act (CAA) 2019: पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों (हिंदू, सिख आदि) को तेजी से नागरिकता। आलोचक इसे धार्मिक आधार पर भेदभाव (Article 14 समानता का उल्लंघन) कहते हैं। NRC के साथ मिलाकर मुसलमानों को लक्षित करने का डर। सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लंबित है; नियम 2024 में अधिसूचित हुए, लेकिन स्टे नहीं हुआ।62
• संस्थागत दुरुपयोग (ED, CBI, IT): विपक्षी नेताओं पर केस, फिर BJP में शामिल होने पर “धुलाई” (washing machine)। कई नेता BJP जॉइन करने के बाद राहत पाते दिखे। आलोचक इसे “selective prosecution” कहते हैं।0
• दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: UAPA, sedition-like कानूनों का इस्तेमाल, मीडिया पर नियंत्रण, NGOs पर FCRA प्रतिबंध, छात्र-विपक्षी प्रदर्शनों पर कार्रवाई। Kashmir में 2019 के बाद इंटरनेट/फोन बंदी। Cow vigilantism और minorities पर हमलों की शिकायतें।
• राज्यपालों का दुरुपयोग: विपक्षी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, पंजाब) में बिलों को रोके रखना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Governor बिल अनंतकाल तक नहीं रोक सकता।35
• 2025 के विवादास्पद बिल: Constitution (130th Amendment) Bill आदि, जो 30 दिन जेल में रहने पर CM/मंत्रियों को हटाने का प्रावधान। आलोचक इसे विपक्षी सरकारें गिराने का हथियार मानते हैं।21
• अन्य: Uniform Civil Code की कोशिशें (कुछ राज्यों में), Waqf Amendment, Electoral Bonds (SC ने असंवैधानिक ठहराया), Parliament में बहुमत का इस्तेमाल।
ये आरोप मुख्यतः opposition, international NGOs और leftist sources से आते हैं।
2. BJP का बचाव और तर्क
BJP दावा करती है कि वह संविधान को मजबूत कर रही है, कांग्रेस के दुरुपयोग को सुधार रही है:
• Article 370: एकीकरण पूरा किया, विकास लाया (टनल, इंफ्रा, चुनाव)। SC ने वैध ठहराया। BJP का पुराना वादा पूरा।8
• CAA: धार्मिक उत्पीड़न से भागे अल्पसंख्यकों (गैर-मुस्लिम) की मदद। मुसलमानों को बाहर नहीं किया; भारत में रहने वाले मुसलमानों पर कोई असर नहीं। Secularism का मतलब pseudo-secularism नहीं।
• संस्थागत सुधार: Corruption कम करने, efficiency बढ़ाने के लिए कदम। GST, Triple Talaq ban, Women Reservation Bill आदि संवैधानिक/कानूनी सुधार।
• Review Commission: पुराने manifesto में Constitution review का प्रस्ताव था, लेकिन बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं किया। Basic Structure doctrine (Kesavananda Bharati case) अभी भी लागू।
• अतीत की तुलना: Congress ने Emergency लगाई, Article 356 का दुरुपयोग किया, NJAC (judiciary control) की कोशिश की (SC ने रद्द किया)। BJP कहती है विपक्ष हार का बहाना बना रहा है।
BJP ने कई संवैधानिक संशोधन किए (जैसे women’s reservation), लेकिन Basic Structure को चुनौती नहीं दी।
3. वास्तविकता और संतुलन
• अदालती जांच: कई विवाद SC में गए। कुछ में सरकार जीती (Article 370), कुछ हारी (Electoral Bonds), कुछ लंबित (CAA)। Judiciary अभी स्वतंत्र दिखती है, हालांकि आलोचक कहते हैं executive …
[7:12 am, 3/7/2026] Dr.Lal Ratnakar: संविधान की मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) भारतीय संवैधानिक कानून का एक अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत है। यह संसद की संशोधन शक्ति को सीमित करता है ताकि संविधान की मूल भावना और ढांचे को नष्ट न किया जा सके।
उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
• केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): यह सिद्धांत 13 जजों की संवैधानिक पीठ के ऐतिहासिक फैसले में स्थापित हुआ। 7-6 के बहुमत से कोर्ट ने कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन मूल संरचना (Basic Structure) को नष्ट, क्षतिग्रस्त या बदल नहीं सकती।81
• इससे पहले गोलकनाथ मामले (1967) में कोर्ट ने मौलिक अधिकारों को अपरिवर्तनीय माना था, लेकिन केशवानंद में इसे संतुलित किया गया।
• 42वें संशोधन (1976, Emergency काल) ने कोर्ट की शक्ति को सीमित करने की कोशिश की, लेकिन मिनerva Mills मामले (1980) में कोर्ट ने इसे रद्द करते हुए सिद्धांत को मजबूत किया।
मूल संरचना के प्रमुख तत्व
सुप्रीम कोर्ट ने इसे निर्धारित (exhaustive) सूची नहीं दी, बल्कि विभिन्न मामलों में विकसित किया। मुख्य तत्व शामिल हैं:88
• संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution)
• लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic)
• संघवाद (Federalism)
• धर्मनिरपेक्षता (Secularism)
• शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
• न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Judicial Independence)
• कानून का शासन (Rule of Law)
• मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) — कुछ सीमा तक (समता, स्वतंत्रता आदि)
• स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव
• संसदीय प्रणाली
• कल्याणकारी राज्य (Welfare State)
• संप्रभुता और एकता
ये तत्व संविधान की आत्मा हैं। संसद इन्हें छू नहीं सकती।
महत्व
• संसद की असीमित शक्ति पर अंकुश: Emergency जैसे काल में संविधान को मनमाने ढंग से बदलने से बचाता है।
• मौलिक अधिकारों की रक्षा: Parliament उन्हें पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती।
• संवैधानिक नैतिकता: न्यायपालिका को संरक्षक बनाता है।
• लचीलापन बनाए रखना: संविधान को समय के साथ बदलने की गुंजाइश है, लेकिन मूल पहचान नहीं बदल सकती।
प्रभाव और आलोचना
• सकारात्मक: भारत को “संवैधानिक लोकतंत्र” बनाए रखा। कई संशोधनों को चुनौती दी गई (जैसे NJAC रद्द)।
• आलोचना: कुछ कहते हैं यह न्यायिक अतिक्रमण है, क्योंकि कोर्ट “मूल संरचना” को खुद परिभाषित करता है।
निष्कर्ष: यह सिद्धांत भारतीय संविधान को जीवंत लेकिन स्थिर रखता है। BJP या किसी भी सरकार के संशोधनों (जैसे Article 370) की वैधता इसी पर निर्भर करती है—अगर वे मूल संरचना का उल्लंघन न करें तो वैध। सुप्रीम कोर्ट अंतिम व्याख्याकार है।


13 जून 2026

अर्जक संघ बनाम संघ

 अर्जक संघ बनाम संघ
Narendra Pratap
✍️ डॉ लाल रत्नाकर



कांटे से कांटा निकालने का जुमला बहुत पुराना है चूंकि यह जुमलों का युग है इसलिए इस जुमले पर गंभीरता से विचार करिए।

आमतौर पर देखा जाता है बहुत सजग लोग बार-बार कहते हैं हमें संघ (RSS) जैसे काम करना चाहिए, मैंने कभी किसी को यह कहते नहीं सुना कि हमें अर्जक संघ जैसे काम करना चाहिए।
अब इन दोनों में फर्क क्या है चलिए इसको ठीक से समझ लेते हैं संघ आपको गुलाम बना के रखना चाहता है।

जबकि अर्जक संघ आपको मानववादी बनाना चाहता है दुनिया भर के पाखंडों से अंधविश्वासों से और चमत्कारों से दूर करके मनुष्यता मनुष्यता के बीच भाईचारा पैदा करना चाहता है।
अगर आपको इतनी सरल बात समझ में नहीं आती तो फिर आपको मनुष्य होने का कोई अधिकार नहीं है।
जिन लोगों ने अर्जक संघ को यदि किसी एक जाति या जमात का अभियान समझा है तो वह गलत है।
यह समग्र बहुजन समाज के उत्थान के लिए सबसे बड़ा मूल मंत्र है यदि इसका विस्तार हो जाए तो एक दिन में पाखंड अंधविश्वास और चमत्कारी बहुत दूर चले जाएंगे।

यह बात आपको गंभीरता से समझनी होगी और हर व्यक्ति को इस पर अमल करना होगा और अगर आज नहीं करिएगा तो कभी भी आपको मौका नहीं मिलेगा।

(✍️ डॉ लाल रत्नाकर विश्वप्रसिद्ध चित्रकार है जो लगातार सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान कर रहे हैं।)

इंसाफ के लिए डर को गले लगा लें।


आईए अब मिलकर
नाकामियों को गले लगा लें।
अपने उन्हीं साथियों से आंखें चुरा लें।
लड़ने की हिम्मत नहीं है।
इंसाफ के लिए।
डर को गले लगा लें।
शोहरत अपनी बढ़ा लें।
नफरत को भी छुपा लें।
हिंदू मुसलमान के बीच।
कल तक यही थे ?
मेरे इतने अपने और अजीज।
आज उनसे इतनी दूरी
क्यों बढ़ा लें।
ऐसा क्यों कर रहे हो।
दूरी क्यों बढ़ा रहे हो।
यह मुल्क सब ने बनाया है।
यह क्यों भूल रहे हो।
मनुष्यता का दुश्मन ।
वो सदियों से रहा है।
सब में फूट डालकर जो लूट रहा है।
लोकतंत्र के लिए !
संविधान ने सब कुछ समझाया है।
यह मंत्र बताया है।
इसीलिए संविधान ही धर्म हमारा है।
यह तय करना होगा।
हिंदू मुस्लिम सभी बचेंगे।
जब यह नारा होगा।
और बहुजन की आवाज उठेगी।
भागेगा दुश्मन।
यह बिल्कुल माकूल दवा है।
हमें यही आवाज उठाना है।
यदि मुल्क बचाना है।
सबको यही समझाना है।

-डा.लाल रत्नाकर

भारत में जिस तरह का राजनितिक परिवर्तन हो रहा है वह कहाँ ले जा रहा है :
भारत में हो रहा राजनीतिक परिवर्तन मुख्य रूप से 2014 से शुरू हुए ‘मोदी युग’ की निरंतरता और कुछ नई वास्तविकताओं की ओर इशारा कर रहा है। यह एक स्पष्ट दिशा की तरफ ले जा रहा है: सांस्कृतिक-राष्ट्रीयवादी (हिंदुत्व-केंद्रित) शासन, मजबूत केंद्र सरकार, आर्थिक सुधारों और विकसित भारत (Viksit Bharat 2047) के लक्ष्य के साथ, लेकिन गठबंधन की मजबूरियों और विपक्षी पुनरुत्थान के साथ।
मुख्य परिवर्तन और उनकी दिशा:
1 BJP की प्रभुत्व वाली लेकिन पूर्ण बहुमत-रहित राजनीति:
◦ 2024 लोकसभा चुनाव में BJP को 240 सीटें मिलीं (2019 में 303), NDA को 293। मोदी तीसरी बार PM बने, लेकिन अब गठबंधन सहयोगियों (TDP, JD(U) आदि) पर निर्भरता बढ़ गई है। यह 1989 के बाद वाले गठबंधन युग की ओर वापसी जैसा है, लेकिन BJP अब भी सबसे मजबूत पार्टी बनी हुई है।3
◦ परिणाम: सुधारों (जैसे One Nation One Election, CAA-NRC संबंधित कदम) में गति धीमी पड़ सकती है, लेकिन हिंदुत्व एजेंडा (सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, संस्थागत बदलाव) जारी है। 2025-26 में राज्य चुनावों (बिहार आदि) और 2029 के आम चुनावों में यह टेस्ट होगा।
2 संस्थागत और लोकतांत्रिक बदलाव:
◦ कुछ रिपोर्ट्स (जैसे BTI 2026) में democratic backsliding (लोकतंत्र में गिरावट) का जिक्र है — मीडिया, संस्थाओं, ध्रुवीकरण और मुस्लिम समुदाय पर असर वाले कदमों के जरिए। लेकिन उच्च मतदान दर और चुनावी प्रक्रिया की मजबूती भी दिखती है।23
◦ दिशा: अधिक मेजॉरिटेरियन (बहुसंख्यकवादी) राज्य की ओर, जहां विकास (labharthi vikas) और राष्ट्रवाद को जोड़ा जा रहा है। विपक्ष (कांग्रेस 99 सीटें 2024 में) मजबूत हुआ है, लेकिन अभी केंद्र में चुनौतीपूर्ण नहीं।
3 आर्थिक और विकासात्मक दिशा:
◦ फोकस Viksit Bharat 2047 पर: इंफ्रास्ट्रक्चर, टैक्स सुधार (नया इनकम टैक्स लॉ 2026), GST 2.0, MSME, AI, न्यूक्लियर एनर्जी, urban development। GDP ग्रोथ 6.5-7.5% के आसपास रहने का अनुमान, घरेलू मांग और सुधारों से।25
◦ यह परिवर्तन समावेशी विकास + राष्ट्रवादी गौरव की तरफ ले जा रहा है — डिजिटल गवर्नेंस, आत्मनिर्भर भारत, और वैश्विक सप्लाई चेन में भूमिका बढ़ाना।
4 विदेश नीति और वैश्विक भूमिका:
◦ निरंतरता: US (ट्रंप 2.0 के साथ भी), QUAD, EU ट्रेड डील्स, चीन काउंटर। आर्थिक सुरक्षा (critical minerals, AI) पर जोर।29
◦ भारत मध्य शक्ति से उभरते वैश्विक खिलाड़ी की ओर जा रहा है, जहां घरेलू राजनीति और विदेश नीति ज्यादा जुड़ रही है।
संभावित परिणाम (कहाँ ले जा रहा है?):
• सकारात्मक: स्थिरता, तेज विकास, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, और वैश्विक महत्व बढ़ना। अगर सुधार सफल रहे तो 2047 तक उच्च-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था संभव।
• चुनौतियां: ध्रुवीकरण बढ़ना, गठबंधन की अस्थिरता, संस्थागत स्वायत्तता का सवाल, और क्षेत्रीय असमानताएं (दक्षिण vs उत्तर)। 2026-29 में राज्य चुनाव और नेतृत्व परिवर्तन (मोदी के बाद) बड़े टर्निंग पॉइंट होंगे।28
• कुल मिलाकर, यह ‘नई भारत’ की ओर ले जा रहा है — कम सेकुलर (जैसा पहले था), ज्यादा राष्ट्रवादी और केंद्र-केंद्रित, लेकिन लोकतांत्रिक चुनावी प्रतिस्पर्धा बरकरार।
यह दिशा जनता की पसंद पर निर्भर करती है। 2024 का चुनाव दिखाता है कि पूर्ण बहुमत हमेशा नहीं मिलता, और विकास + रोजगार जैसे मुद्दे निर्णायक रहते हैं। भविष्य अनिश्चित है, लेकिन वर्तमान ट्रेंड मजबूत BJP-led शासन + आर्थिक महत्वाकांक्षा की तरफ है।


 

16 मई 2026

अर्जक पद्धति (जौनपुर ( मई 10 एवम 12, 2026 अलग दो शादियां )

जौनपुर (मई10 एवम 12, 2026  अलग दो शादियां अर्जक पद्धति से डॉ लाल रत्नाकर द्वारा संपन्न करायी गयी हैं जिनके विवरण निम्नवत है-

दिनांक 10 मई 2026 को अर्जक पद्धति द्वारा श्री नीरज कुमार और सुश्री सुमन यादव के गांव मछलीगांव बदलापुर जौनपुर में शादी का कार्यक्रम संपन्न कराया जो अपने आप में प्रशंसनीय और बहुत ही पवित्र ढंग से संपन्न हुआ जिसमें किसी भी प्रकार का पाखंड अंधविश्वास और चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं था यह पेरियार ज्योतिबा फुले रामस्वरूप वर्मा ललई सिंह और डॉ मनराज शास्त्री के साथ साथ श्री राम आश्चर्य यादव जी के सतत प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप समाज में इसे स्वीकार किया गया है और कुछ ऐसे लोग जो परंपरा को बिना समझे हुए ढो़ रहे हैं यद्यपि वह हर जगह मिल जाते हैं। 

अर्जक पद्धति के विवाह को बहुत ही साधारण तरीके से कोई भी संपन्न कर/करा सकता है इसमें किसी भी प्रकार का दिखावा नहीं होता दोनों वर वधू प्रतिज्ञापन करते हैं।

साक्ष्य के लिए दो वर की तरफ से दो वधू की तरफ से हस्ताक्षर करते हैं और यह सब कार्य पूर्ण होने पर विवाह करने वाले के यहाँ पर मैं स्वयं हस्ताक्षर करके उन्हें प्रमाण पत्र सौंप दिया हूं।

इसके उपरांत तमाम संबंधी और सगा जन फोटो इत्यादि कार्यक्रम करते हैं बाकि लोग रात्रि भोज का लुफ्त ले रहे होते हैं।


नीरज कुमार एवं सुमन यादव 

मई  10, 2026 

नव दंपति को हार्दिक शुभकामनाएं। 






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ललित कुमार एवं नीतू 
मई  12 , 2026 

नव दंपति को हार्दिक शुभकामनाएं। 








जाति और धर्म के नाम पर होने वाले शोषण का अंत।
समानता और भाईचारे पर आधारित समाज।
विवाह और सामाजिक रीति-रिवाजों में सरलता और तर्कवाद।
प्रभाव: इस संगठन ने गैर-ब्राह्मण आंदोलन को संगठित किया और सामाजिक सुधार की दिशा दी।
4. स्त्री अधिकार
बाल विवाह और सती प्रथा का विरोध किया। विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। स्त्रियों को शिक्षा और स्वतंत्रता दिलाने पर जोर दिया।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अपने समाज को जागरूक करना मेरा उद्देश्य है और यह उद्देश्य जुड़ा हुआ है मेरे पूर्वजों के सांस्कृतिक जागरण के उद्देश्यों से :
आज दिनांक 12 मई 2026 को ललित कुमार एवं नीतू की शादी अर्जक पद्धति से संपन्न हुई ।
इस पद्धति के माध्यम से पिछजले दिनों एक शादी मछली गांव में संपन्न हुई थी आज शाहपुर सिंटी में यह आयोजन हुआ जिसकी प्रशंसा तमाम लोगों ने अलग-अलग तरीके से व्यक्त की। 
परंपरावादियों की एक बड़ी जमात अज्ञानता की शिकार है जो अखंड पाखंड और अंधविश्वास में आस्था रखती है। 
इस पूरे प्रकरण में ललित कुमार यादव उर्फ टोनी के दृढ़निश्चय के कारण यह आयोजन सम्पन्न हो पाया। 
इस आयोजन में जनपद के तमाम बुद्धिजीवियों ने इस पद्धति की सराहना की और कई लोगों ने भविष्य में अपने बच्चों की शादी इसी रीति से सम्पन्न कराने के लिए वचनबद्धता जाहिर की। और यह कहा की इस विवाह पद्धति का पुरजोर स्वागत होना चाहिए और समाज में व्याप्त पाखंड अंधविश्वास और चमत्कार से बहुजन समाज में व्याप्त इस परंपरा को व्यापार से बचाना चाहिए जिससे बहुजन समाज के लोगों को जिस तरह से सदियों से लूटा जा रहा है उस पर नियंत्रण लगाया जा सके। 
सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव के वगैर राजनैतिक शैक्षिक आर्थिक वैज्ञानिक समझ को पैदा करना दुरूह ही नहीं जटिल होता जा रहा है। इसी के खिलाफ हमारे समाज सुधारक महापुरुषों यथा - भगवान गौतम बुद्ध जी ने कितना बड़ा आंदोलन खड़ा किया मगर कालान्तर में उसे भी पाखण्ड,अन्धविश्वास और चमत्कार ने निगल लिया।  उनके इस उपदेश की कितनी अनदेखी हुयी है आज हमें पुरे समाज में दिखती है अंधे बहरे लंगड़े अज्ञानी उसी पाखण्ड के लिए पागलों की तरह अपना समान्न  उसके जाल में फ़साने में करते हैं। 
समाज को जागृत करने में ई वी रामासामी पेरियार ने कितना संघर्ष किया यथा - पेरियार (ई.वी. रामासामी) ने दक्षिण भारत में जातिवाद, ब्राह्मणवादी प्रभुत्व और धार्मिक आडंबरों के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक आंदोलन चलाया। उनका आत्मसम्मान आंदोलन और वैकोम सत्याग्रह जैसे संघर्ष अस्पृश्यता, स्त्री अधिकारों और सामाजिक न्याय की दिशा में निर्णायक साबित हुए।
पेरियार का सामाजिक आंदोलन
1. आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) स्थापना: 1925 में पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया।
उद्देश्य: जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध। स्त्रियों को समान अधिकार दिलाना। तर्कवाद और नास्तिकता को बढ़ावा देना।
प्रभाव: इस आंदोलन ने तमिलनाडु में सामाजिक न्याय की राजनीति की नींव रखी और बाद में द्रविड़ पार्टियों की विचारधारा का आधार बना।
2. वैकोम सत्याग्रह (1924–25)
पृष्ठभूमि: त्रावणकोर राज्य के वैकोम क्षेत्र में दलितों को मंदिर की ओर जाने वाली सड़कों पर चलने की अनुमति नहीं थी।
पेरियार की भूमिका: 
उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया और दलितों को समान अधिकार दिलाने के लिए अहिंसक सत्याग्रह में भाग लिया।
महात्मा गांधी ने भी आंदोलन का समर्थन किया।
परिणाम: सरकार ने अंततः दलितों को मंदिर तक जाने वाली सार्वजनिक सड़कों का उपयोग करने की अनुमति दी। यह अस्पृश्यता के खिलाफ पहली बड़ी जीत थी।
3. जस्टिस पार्टी और सामाजिक न्याय
जस्टिस पार्टी (1920 के दशक): पेरियार इससे जुड़े और गैर-ब्राह्मणों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की शुरुआत की गई।
मंदिर प्रशासन में सुधार किए गए। महत्व: इसने तमिलनाडु में आरक्षण और सामाजिक न्याय की राजनीति की नींव रखी।
4. महिलाओं के अधिकार
पेरियार ने: बाल विवाह, देवदासी प्रथा और स्त्रियों के शोषण का विरोध किया। विधवा पुनर्विवाह और स्त्रियों की शिक्षा का समर्थन किया।
प्रभाव: महिलाओं को सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में अधिक अधिकार मिले।
मुख्य उपलब्धियाँ : जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के खिलाफ निर्णायक संघर्ष। आत्मसम्मान आंदोलन से सामाजिक न्याय की राजनीति का आधार।
महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा को बढ़ावा। तर्कवाद और नास्तिकता के जरिए धार्मिक आडंबरों का विरोध। 
ज्योतिराव फुले (ज्योति बा फुले) ने 19वीं सदी में भारतीय समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक क्रांतिकारी आंदोलन चलाया। उनका संघर्ष जातिवाद, स्त्री-शिक्षा और शोषण के खिलाफ था।
ज्योतिराव फुले (ज्योति बा फुले) ने 19वीं सदी में भारतीय समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक क्रांतिकारी आंदोलन चलाया। उनका संघर्ष जातिवाद, स्त्री-शिक्षा और शोषण के खिलाफ था।
ज्योति बा फुले फुले का सामाजिक आंदोलन
1. शिक्षा का प्रसार
1848 में पुणे में पहला लड़कियों का स्कूल खोला।
पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षिका बनाया।
दलितों और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए स्कूल खोले।
शिक्षा को सामाजिक समानता का सबसे बड़ा हथियार माना।
2. जातिवाद और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध
जाति व्यवस्था को अन्यायपूर्ण बताया।
शूद्रों और अति-शूद्रों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक शोषण और आडंबरों का विरोध किया।
3. सत्यशोधक समाज (1873)
स्थापना: 1873 में "सत्यशोधक समाज" की स्थापना की।
उद्देश्य:
जाति और धर्म के नाम पर होने वाले शोषण का अंत।
समानता और भाईचारे पर आधारित समाज।
विवाह और सामाजिक रीति-रिवाजों में सरलता और तर्कवाद।
प्रभाव: इस संगठन ने गैर-ब्राह्मण आंदोलन को संगठित किया और सामाजिक सुधार की दिशा दी।
4. स्त्री अधिकार
बाल विवाह और सती प्रथा का विरोध किया।विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। स्त्रियों को शिक्षा और स्वतंत्रता दिलाने पर जोर दिया।
5. किसान और श्रमिक हित
किसानों की बदहाली और साहूकारों के शोषण पर आवाज उठाई।
"किसान का असली मित्र" कहे गए। उन्होंने किसानों को संगठित होकर अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी।
मुख्य उपलब्धियाँ
भारत में स्त्री शिक्षा की नींव रखी। जातिवाद और धार्मिक शोषण के खिलाफ निर्णायक संघर्ष। सत्यशोधक समाज के जरिए सामाजिक न्याय की राजनीति का आधार। किसानों और श्रमिकों के अधिकारों की आवाज बुलंद की।
संक्षेप में, ज्योति बा फुले का आंदोलन भारतीय समाज में समानता, शिक्षा और न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक क्रांति था।
क्या आप चाहेंगे कि मैं फुले और पेरियार के आंदोलनों की तुलना करके बताऊँ कि दोनों ने किस तरह सामाजिक न्याय की राजनीति को आकार दिया? 
फुले का सामाजिक आंदोलन


6 मई 2026

जो हमें करना था यह उन्होंने कर दिखाया !





जो हमें करना था यह उन्होंने कर दिखाया !
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समाजवादी पार्टी का विभाजन तो उसी दिन हो गया था जिस दिन अखिलेश यादव ने नेताजी से सब कुछ ले लिया था और नेताजी ने उस दिन समाजवादी पार्टी को समाप्त कर दिया था जिस दिन उन्होंने अपने पुत्र को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था !
यद्यपि मैं भी इस बात का पक्षधर था कि अब अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री का पद दे देना चाहिए और जब यह हुआ हमें भी इस बात की प्रसन्नता हुई कि मेरी भी बात मानी गई है। तब तक मैं अखिलेश यादव के बारे में उतना नहीं जानता था जितना कि उनसे अपेक्षा करता था, समय-समय पर जो बातें आती रहीं उनसे लगता था कि युवा हैं सीख रहे हैं और नेता जी का संरक्षण है बहुत कुछ सीख जाएंगे।
लेकिन जब यह लगने लगा की यह सीख नहीं रहे हैं और लोग इनका दुरुपयोग कर रहे हैं, इसलिए कि या तो यह कुछ जानते नहीं या यह बहुत कुछ जानबूझकर करने दे रहे हैं अक्सर आता था कि वह अकेले मुख्यमंत्री नहीं हैं बल्कि प्रदेश में साढे़ तीन मुख्यमंत्री हैं। आधा मुख्यमंत्री कौन है इस बारे में जो जानकारी हुई उसमें ही इन्हें रखा जाता था।
ख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते य
अब सवाल यह है कि सैफई परिवार का युवराज अपने घर से ही मात खाना शुरु कर दिया है उसके सबसे शक्तिशाली चाचा ने अपनी एक पार्टी बना ली है और ऐसा कहा जा रहा है कि माननीय नेता जी उसी की तरफ हैं, सैफई घर संभालेगा या प्रदेश देश की तो छोड़िए उसके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया। आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व
मुह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था। इनके​आचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठा
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि
क्याकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला । प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं। राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परा
स्तसाथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल हैके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया।
आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व मुख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते यह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि क्या विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था।


इनके​आचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठाकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला ।
प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है

12 अप्रैल 2025

बिहार उत्तर प्रदेश पर असली नज़र है

बिहार उत्तर प्रदेश पर असली नज़र है  

बिहार और उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी ज्यादा है !
भारतीय राजनीति में जिन लोगों का पदार्पण हो गया है वह कौन है यह बताने की जरूरत नहीं है उनकी मानसिकता क्या है यह भी बताने की जरूरत नहीं है जो सबसे ज्यादा जरूरी है वह यह है कि जनता की अभी सच में विरोध कायम है कल कहीं इसको एकदम से ना दबा दिया जाए जबकि पूरी कोशिश की गई है कि जनता किस तरह से भयभीत रहे लेकिन अभी भी संभावना है बिहार और उत्तर प्रदेश में कि वहां की जनता खड़ी हो सकती है। 
पिछले दिनों हमने देखा मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ हरियाणा महाराष्ट्र और अभी हाल में दिल्ली किस तरह से भाजपा ने अपने कब्जे में कर लिया है। 
यह किसी को भरोसा नहीं था कि इन राज्यों में ऐसा होने जा रहा है लेकिन ऐसा हुआ मीडिया ने बहस करके यह समझा दिया कि जनता भाजपा के पक्ष में थी। 
उत्तर प्रदेश में भी यही हुआ था जो आम आदमी को भी इस बात की खबर और विश्वास था कि भाजपा नहीं आ रही है लेकिन भाजपा आई। 
अब सवाल यह है कि आने वाले दिनों में बिहार में चुनाव होने वाले हैं बिहार भाजपा के लिए उतना मुफीद राज्य नहीं है, लेकिन अभी जिस तरह की भाजपा की योजनाएं हैं और देश की लोकतंत्र की रक्षा की संस्थाएं हैं वह किस तरह से घाल मेल कर रही हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। 
पिछले दिनों राष्ट्रीय अधिवेशन में बिहार के प्रमुख विपक्षी दल के नेता श्री तेजस्वी यादव ने यह स्वीकार किया था कि अभी तो बिहार में बहुत तरह की ऐसी नीतियां लागू की जाएगी जिससे उनको हराया जा सके। 
हमें गंभीरता से विचार करना होगा की आने वाले चुनाव में बिहार के बाद अन्य प्रदेशों को किस तरह से भाजपा प्रदेश बनाने की योजना जारी रहेगी। 
उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में यह पता चल गया कि भाजपा के खिलाफ इस तरह का माहौल है लेकिन उपचुनाव में गणित कुछ और था और वहां के मुख्य विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इस बात को चिल्ला चिल्ला के कहते हैं कि ईवीएम किसी तरह भी विश्वसनीय नहीं है।
समय रहते उत्तर प्रदेश और बिहार को विशेष रूप से पूरे देश के लोगों को विश्वास में लेकर एक आंदोलन खड़ा करना चाहिए जिसमें जनता सड़क पर आए और ईवीएम की बचाए बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए और तब तक यह आंदोलन जारी रहे जब तक इस मांग को मान ना लिया जाए।
यह भी विचारणीय है कि कांग्रेस क्या चाहती है पिछले दिनों ऐसा देखने में आया है कि कांग्रेस कई प्रदेशों में अपनी गलत रणनीति की वजह से चुनाव हार चुकी है उसके पीछे कांग्रेस में बैठे संघ के विचारधारा के लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं। 
राहुल गांधी को इन लोगों से भिन्न माना जा सकता है और उनके साथ इंडिया गठबंधन की अवधारणा के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है और उनको यह समझने की जरूरत है कि यह समय बिहार और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बढ़ाने का नहीं है यह समय उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा को ना आने देने की है। 
जयराम रमेश कन्हैया कुमार और बहुत सारे ऐसे नाम हैं जो कांग्रेस में बैठकर के संघ की मानसिकता को ज्यादा बल देते हैं।
जब आज नेताजी नहीं है माननीय शरद यादव जी नहीं है आदरणीय लालू प्रसाद यादव जी अस्वस्थ हैं ऐसे में बहुत जरूरी है कि नई पीढ़ी को अपने इर्द-गिर्द ऐसे लोगों को रखने की जो हमारे वरिष्ठ नेताओं के विचारधारा को सहयोग कर सके और वर्तमान नेतृत्व को संघर्षील बनाए रखने में सहयोग करें। 
जबकि यहां भी अक्सर यह दिखाई देता है कि ऐसे तत्व समय-समय पर इस विचारधारा को नुकसान पहुंचाते रहते हैं उनका जिक्र करना जरूरी नहीं है। 
लेकिन जरूरत पड़ने पर उनके बारे में बताया जा सकता है।

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