9 अप्रैल 2019

क्यों नहीं करना चाहिये भाजपा को वोट ।

डा.लाल रत्नाकर

भारतीय संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की गरिमा ही हमारे देश का ताज है और संयोग से इस समय उस ताज को ऐसे व्यक्ति ने गुमराह करके धारण कर लिया है जिसको न तो संविधान का ज्ञान है और न ही भारत की आत्मा का ।

यही वक़्त है जब हम ऐसे व्यक्ति के हाथ से उस ताज को छीन सकते हैं । यह हमारा लोकतंत्र का चुनाव जो विभिन्न तिथियों में देश के अनेक हिस्सों में होने जा रहा है मेरा और मेरे हज़ारों साथियों का ऐसा मानना है कि यह ताज यदि इस व्यक्ति के हाथ में रहा गया तो वह बंदरों की तरह जैसे तोड़ मरोड़ रहा है वैसे ही आगे भी करता रहेगा ? क्योंकि न तो वह इसका अर्थ समझेगा और न ही गरिमा जिसका परिणाम यह होगा कि जिस तरह से इसने संविधान बे असर कर डाला है वैसे ही आगे भी करता रहेगा ख़तरा तो यहाँ तक है कि आगे से संविधान की कोई महत्ता ही नहीं होगी। होगा यह कि इसकी एक एक गतिविधियां निरंकुशता और आपातकाल से भी बदतर होगी।

इसके भक्तगणों की बातों पर मत जाइए उन्होने सदियों से बहुजन अवाम को अपना ग़ुलाम बनाकर के रखना सीखा है ना तो उनके अंदर मानवता है ना ही वो मानवीय मूल्यों को समझते हैं । क्योंकि बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान में जो अधिकार हमारी अवाम को दिए हैं उस अधिकार को रोकने और समाप्त करने का काम इस झूठी निक्कमी और पाखंडी नकलची बंदर नुमा सरकार ने किया है ! जिसके मन में संविधान के प्रति कोई आस्था नहीं है यही कारण है की यह निरंतर संविधान को कमजोर कर रहे हैं। 

संविधान और देश बचना है तो हमें अब यही वक़्त है जब आप इस सब मिलकर उस सरकार को अपने मताधिकार से बाहर कर सकते हैं और लोकतंत्र और संविधान के साथ साथ देश की भी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं ।

"चुनाव अभियान में आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा बन गया है। वर्धा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अवांछित तरीके से इस मुद्दे को छेड़ दिया। अपने भाषण में वह समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामले में आए विशेष जज के फैसले का हवाला देकर अपने पक्ष में हवा बनाने की कोशिश कर रहे थे। इस मामले को समझने के लिए अतीत के कुछ पन्ने पलटने होंगे। समझौता एक्सप्रेस पर फरवरी 2007 में आतंकी हमला हुआ। दिल्ली से लाहौर के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में यह आतंकी हमला दिल्ली से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर पानीपत में हुआ था। इस हमले में लगभग 80 मुसाफिर मारे गए थे जिनमें से अधिकांश पाकिस्तानी नागरिक थे। उस समय इस साजिश की सुई पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा और 2006 में पुणो में बने एक हिंदूू अतिवादी संगठन अभिनव भारत की ओर उठी। समझौता एक्सप्रेस आतंकी हमला कई पहलुओं की वजह से बहुत पेचीदा बन गया था। इसमें एक सेवारत भारतीय सैन्य अधिकारी की संलिप्तता के आरोप सामने आ रहे थे। ऐसे में भारतीय जांच एजेंसियों ने पूरी एहतियात के साथ तफ्तीश का काम आगे बढ़ाया। वहीं अमेरिका इस नतीजे पर पहुंच गया कि हमले के संदिग्धों में से एक पाकिस्तान नागरिक और लश्कर से जुड़ा था और उसे आतंकी घोषित कराने के लिए वह संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी चला गया। जांच में स्वामी असीमानंद का नाम प्रमुख अभियुक्त के रूप में सामने आया जिसके तार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। इस तरह यह मामला बहुत जटिल राजनीतिक समीकरणों में उलझ गया।

उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार सत्ता में थी और अभिनव भारत के हंिदूू जुड़ाव की वजह से ‘हंिदूू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे जुमले इस्तेमाल होने लगे। इसे जिहादी आतंकवाद की तरह श्रेणीबद्ध किए जाने का भाजपा ने खुला विरोध किया जो उस समय विपक्ष में थी। इस मामले की जटिलता और इसके धार्मिक पहलू को देखते हुए इसकी जांच का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआइए को सौंप दिया गया जिसने जून 2011 में आरोप पत्र दाखिल किया। जैसा अनुमान लगाया जा रहा था कि न्यायिक पेचीदगियों के चलते मामले की जांच सुस्त पड़ती गई और आठ वर्ष बाद इस साल 20 मार्च को एनआइए की विशेष अदालत ने स्वामी असीमानंद सहित सभी चारों आरोपियों को बरी कर दिया। मामले पर टिप्पणी करते हुए विशेष अदालत के न्यायाधीश ने ‘गहरे दुख और भारी वेदना’ के साथ कहा कि ‘भरोसेमंद और स्वीकार्य साक्ष्यों के अभाव में ¨हसा के ऐसे वीभत्स मामले में सजा नहीं दी जा सकी।’ अपराधियों को सजा दिलाने के लिए साक्ष्य जुटाने में एनआइए के अपर्याप्त प्रयासों से जुड़ी टिप्पणी में उन्होंने कहा कि ‘अहम साक्ष्यों की गुत्थी अभी भी सुलझना बाकी है।’ इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी ने समझौता ब्लास्ट मामले में आए फैसले को अपनी सुविधा के अनुसार भुनाने का प्रयास किया।

प्रधानमंत्री ने वर्धा रैली में बहुसंख्यक हिन्दुओं को लामबंद करने के लिए हिन्दू आतंकवाद जैसा जुमला पेश करने वाली कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। उनकी यह कोशिश अवसरवादी ही कही जा सकती है।हिन्दू आतंकवाद जैसा शब्द गढ़ने के लिए कांग्रेस पर हमलावर होते हुए उन्होंने कहा, ‘दुनिया के सामने हंिदूुओं को अपमानित करने वाली कांग्रेस को भला कैसे माफ किया जा सकता है? क्या हंिदूू आतंकवाद जैसा शब्द सुनकर आप आहत नहीं हुए? आखिर शांति, भाईचारे और सद्भाव का पर्याय माने जाने वाले समुदाय को आतंकवाद से कैसे जोड़ा जा सकता है? हजारों वर्षो के इतिहास में आपको हंिदूू आतंकवाद का एक भी मामला देखने को नहीं मिला होगा।’

प्रधानमंत्री का चुनावी लक्ष्य एकदम स्पष्ट था कि वह भाजपा को हिन्दू हितों, गौरव और एकता की संरक्षक के रूप में पेश करें और कांग्रेस को मुस्लिम हितैषी बताकर उस पर राष्ट्रविरोधी होने का मुलम्मा चढ़ाएं। उनका यह दावा न केवल तथ्यों के आधार पर कहीं नहीं टिकता, बल्कि भारत जैसे विविधता से भरे देश के सामाजिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने के लिहाज से भी खतरनाक है। कुछ तथ्यों पर गौर करना होगा। बीते सात दशकों में एशिया में तमाम किस्म के आतंक का बोलबाला रहा है। इस दौरान हंिदूू, मुस्लिम, सिख और बौद्ध जैसे धर्मो से कहीं न कहीं आतंक की कुछ जड़ें जुड़ी रही हैं। अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद वैश्विक स्तर पर जिहादी आतंक पर ध्यान केंद्रित होने के बावजूद आतंक को किसी एक धर्म के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। इसमें किसी एक का ही एकाधिकार नहीं है। श्रीलंका में एलटीटीई के रूप में जिस किस्म का आतंक हावी रहा या फिर एक हंिदूू चरमपंथी द्वारा महात्मा गांधी की हत्या- ये सभी मामले आतंक की श्रेणी में ही आते हैं, फिर भी मोदी कहते हैं कि हंिदूू समुदाय को आतंक के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। उनका यह दावा सही नहीं। भारत में हालिया घटनाक्रम से इसकी और परतें खुलती हैं। वर्ष 2017 में जब मोदी ही प्रधानमंत्री थे तब एनआइए ने सुनिश्चित किया कि अजमेर ब्लास्ट मामले में आरएसएस से जुड़े एक व्यक्ति पर आरोप सिद्ध हो जाएं। इसके अलावा बीते साल दिसंबर में महाराष्ट्र एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड ने मुंबई के नजदीक 12 लोगों को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत गिरफ्तार किया। उस समय ऐसी खबरें आईं कि सनातन नाम की संस्था 'हिन्दू राष्ट्र’ बनाने के लिए आतंकी हमले करने की साजिश कर रही थी। यहां यह दोहराना आवश्यक होगा कि आतंकवाद आतंकवाद ही होता है, भले ही उसे कोई अंजाम दे। इसमें धार्मिक जुड़ाव दूसरे पायदान पर आता है। भारत जैसे देश में जहां तमाम किस्म के आतंकी हमले होते हैं वहां यही अपेक्षा की जाती है कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया को ही सबसे ज्यादा वरीयता दी जाए और प्रधानमंत्री चुनावी फायदे के लिए उसे न भुनाएं।

भारत पाकिस्तान से कहता रहा है कि वह मुंबई आतंकी हमले और हाल में पुलवामा हमले के दोषियों पर कानूनी शिकंजा कसे। ऐसे में समझौता ब्लास्ट मामले में अभियोजन को इस प्रकार आगे बढ़ाना ताकि पीड़ितों को इंसाफ मिल सके, विधिसम्मत शासन के प्रति भारतीय प्रतिबद्धता का प्रमाण होगा। पाकिस्तान से इसी मानदंड का पालन करने की अपेक्षा की जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी ने वर्धा में आतंकवाद की चुनौती को जिस तरह पेश किया उसमें उन्हें सुधार करना चाहिए। मिथ्या बातों के सहारे हंिदूू-मुस्लिम के बीच विभाजन की खाई बनाना सही नहीं होगा। हंिदूू और मुसलमान दोनों ही भारतीय नागरिक हैं जिन्हें यह हक हमारा संविधान देता है।

सी. उदयभास्कर 
(लेखक सोसायटी फॉर पॉलिसीज स्टडीज के निदेशक हैं)

6 अप्रैल 2019

समाजवादी पार्टी का सामाजिक न्याय -डॉ लाल रत्नाकर


समाजवादी पार्टी का सामाजिक न्याय 
-डॉ लाल रत्नाकर 
चलिए माना की अखिलेश जी को भाजपा ने बता दिया की वह भी पिछड़े हैं ? और उन्हें याद आया पिछड़ों के लिए सामाजिक न्याय शब्द ! देर आये दुरुस्त आये ? लेकिन यह विश्लेषण करने का मुद्दा है की उनको समाजवाद की समझ भी है क्या क्योंकि बहुतेरे वरिष्ठ समाजवादियों को उन्होंने किस तरह से समाजवादी पार्टी से बहार जाने को बाध्य ही नहीं किया अपमानित भी किया ? यह सब उन्होंने भाजपा समर्थकों की फौज के देख रेख में किया इसका खामियाज़ा तो वह भुगत चुके हैं 2017 में ही अब सवाल यह है की बहुजन समाज का सर्वजन अभियान और इनका सवर्ण मोह किस तरह के समाजवाद का ढकोसला कर रहा है।
"सामाजिक न्याय से महापरिवर्तन : एक नयी दिशा, एक नयी उमीद !
ग़रीबी के ख़िलालाफ़ लड़ाई एक धोखा है जब तक जाति और लिंग केआधार पर भेदभाव के खिलाफ़ लड़ाई ना हो — डॉ राममनोहर लोहिया"

अखिलेश जी सामाजिक न्याय की समझ और आपके विजन डाक्यूमेंट 2019 को पढ़ते हुए एक बहुत बड़ा धोखा दिखाई दिया ? क्या वास्तव में आपका ह्रदय परिवर्तन हो गया है और यदि ऐसा है तो यह सब परिवर्तन "निरहुआ" के चलते तो नहीं हुआ। क्योंकि इस बीच न जाने क्यों हमने निरहुआ की बहुतेरी फ़िल्में देखीं जब तक वह भाजपा में नहीं गया था।
जैसे ही उसके भाजपा में जाने की खबर आयी आश्चर्य हुआ की वह आपको पसंद नहीं किया उसे भाजपा क्यों पसंद आयी ? उसकी फिल्मों में भी एक सामाजिक सरोकार है और जिसमें वह हमेशा जितता है सामाजिक अन्यायियों से ?
सामाजिक न्याय और पिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी : का सवाल आपके शासनकाल में बहुत गहरे से उभर कर आया था जब आपने शिक्षा के क्षेत्र में सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी सिद्धार्थ नगर ( बस्ती के विश्वविद्यालय जिसमें सतप्रतिशत ब्राह्मणों की ही नियुक्ति की गयी थी) को छोड़कर एक भी नियुक्ति नहीं करा पाए थे। उच्च शिक्षा सेवा आयोग आपके पांच वर्ष के शासन के समय में एक भी नियुक्ति नहीं कर पाया।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ठप्प पड़ा रहा केवल इस अफवाह के की शतप्रतिशत यादवों का चयन किया गया है आप सच्चाई का एक भी विज्ञापन नहीं दे पाए। जो लोग सामाजिक न्याय की आपसे बात करते थे उनको सवर्ण नाराज हो जाएगा का डर दिखाकर आपने अनसुना कर दिया।
यश भारती में "सामाजिक न्याय की याद आपको क्यों नहीं आयी क्या वास्तव में आपको ज्ञान भी है की पिछड़ों में आपके दिए गए यशभारती धारकों से कई गुना काबिल लोग हैं जिनको आप पसंद भी नहीं करते" पत्रकार, चित्रकार, समाज सेवक आदि आदि।
आपने अपने पूरे कार्यकाल में सामाजिक न्याय वाली जातियों के अफसरों की कितनी उपेक्षा की है क्या इसका संज्ञान है आपको।
चलिए सामाजिक न्याय की जातियों की राजनैतिक हैसियत में गायत्री प्रसाद प्रजापति को छोड़ दिया जाय तो आपने उन्हें कितना अपमानित किया है ज़रा गौर से सोचियेगा ?

सामाजिक न्याय की जातियों के पत्रकारों की एक सूचि निकलवा लीजियेगा कितने उन जातियों के पत्रकारों को अपने शासनकाल में आपने अवसर दिया है ज़रा गौर करियेगा ।
"यादव रेजिमेंट के बारे में आपने घोषणा की है बधाई आपको ।”
पर गुजरात की भी याद आपको है यथा "हम राजनितिक फायदे के लिए सेना और सैनिकों के इस्तेमाल को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करेंगे।साथ ही उन सभी राज्यों में रेजिमेंट की स्थापना करेंगे जहाँ वर्तमान में रेजिमेंट नहीं है। हम अहीर बख्तरबंद रेजिमेंट और गुजरात इन्फेंट्री रेजिमेंट की स्थापना करेंगे।”
अंत में यही कहना चाहूंगा की यह समय आपको उत्तर प्रदेश से भाजपा को साफ़ करने के लिए जनता ने अवसर दिया है। आपने बसपा को साथ लेकर भी अच्छा सन्देश दिया है। अनेक राजनितिक मज़बूरिया हो सकती है पर आपने अपने घोषणा पत्र में जितना स्थान "भाजपा" को दिया है उतना न तो बसपा या अपने किसी भी सहयोगी और उसकी नीतिओं को ही।
इसे पढ़कर तो यही लगता है कि किसी भाजपाई टीम ने ही इसे तैयार किया है।
चलिए अब यह देखना है कि आपका नया सामाजिक न्याय कैसा होगा ?

सामाजिक न्याय पर कभी संगोष्ठी जरूर कराईये बहुतेरे बहुजन इसपर बोलना जानते हैं जिन्हे आप यशभारती के लायक भी नहीं समझे हैं ?

5 नव॰ 2018

मेरे भोले भाले भाइयों एवं बहनों !

मैं जानता हूँ मेरे विचार मेरे ही लोगों को रास नहीं आयेंगे ! लेकिन मेरा विश्वास है कि यदि एकबार हम भावनाओं और समाज की रूढ़ियों से किनारा कर ले तो हम समाज को बदल सकते हैं ! कईबार हमारा समाज रूढ़ियों को अन्यमनस्क भाव से इसलिये ढो रहा होता है क्योंकि उसके पास अपना कहने को कुछ भी नहीं बचा है जिसके कारण अपने खिलाफ बनाये गए उसके त्योहारों और परम्पराओं को वह उस समाज से बढ़ चढ़ कर अपने को  विकसित दिखाने के चक्कर में उनकी परम्पराओं का शिकार हो रहा है जिन्होंने उससे ठगी करने के लिये सदियों से यह परम्परायें गढ़ी है । और यही कारण है की वह हर लड़ाई उससे हार जाता है। 

( चित्र ; डॉ.लाल रत्नाकर )


परम्परा कैसी कैसी ?
दशहरा,दिवाली,होली,छठ !
जन्माष्टमी जैसे त्योहार की परम्परा !
कब से चली चली आ रही है ?
और कब तक चलती रहेगी ?
इसी तरह ?

क्या कभी आपने सोचा ?
शायद नहीं, और न ही सोचने की
ज़रूरत ही समझा/समझी आपने !
किसी त्योहार के दिन को क्या ?
आपने उसे नकारा या नकारी ?
ज़रा विचार करिये ?
क्या खोया क्या पाया आपने ?

मिठाईयॉ ड्राई फ़्रूट नये परिधान !
या और कुछ !
पर आपने खोया अपना विश्वास !
वशीभूत कर लिया आपको उसने
अगले साल के इस उत्सव के लिये !
यह कौन है जो आपको डरा रहा है ?
कभी सोचा आपने !

उसका व्यापार और
उसका पाखण्ड मिलकर !
रोज़ रोज़ नये नये परिवर्तन कर रहा है ।
मगर आपको समझ में ही नहीं आ रहा है !
उसका षड्यन्त्र !
यही तो है जिसके बल पर
आप उसके गुलाम हो सदियों से !

आज भी समय है विचार करने का !
क्या कभी आपने इसपर सोचा ?
सही सही आकलन करिये अपने मन और
मन में पैठे परम्परा के नाम पर विराजमान !
अपने अंदर के शत्रु को !


डा.लाल रत्नाकर

28 मई 2018

EVM बनाने वाली कंपनी ने ‘चुनाव आयोग’ के अलावा किसी और को भी बेंची लाखों मशीनें

BOLTA UP बोलता स्पेशल
RTI से खुलासा : EVM बनाने वाली कंपनी ने ‘चुनाव आयोग’ के अलावा किसी और को भी बेंची लाखों मशीनें !
 (BOLTA UP (2 months ago))

ईवीएम को लेकर अब एक नया खुलासा हुआ है। अभी तक ईवीएम के हैक होने को लेकर विवाद हो रहा था लेकिन अब पता चला है कि जितनी ईवीएम मशीनें बन रही हैं उतनी चुनाव आयोग को नहीं मिल रही हैं। कंपनी ने मशीनें कम बनाई हैं लेकिन आयोग के पास ज़्यादा मशीनें हैं। तो सवाल है कि बाकी की मशीने कहाँ से आ रही हैं? क्या ईवीएम बनाने वाली कम्पनियाँ ही किसी और को मशीनें बेंच रही हैं और वहां से ये चुनाव आयोग के पास पहुँच रही हैं?

मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन एस रॉय ने चुनाव आयोग और ईवीएम बनाने वाली कंपनियों से आरटीआई के ज़रिए ये पूछा कि अबतक कितनी ईवीएम बनी हैं और कितनी चुनाव आयोग को मिली हैं। ईवीएम चुनाव आयोग के द्वारा कोई और तो प्रयोग नहीं करता है तो जितनी मशीने बनी थी उतनी ही चुनाव आयोग को मिलनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।

बता दें, कि ईवीएम को दो सरकारी कम्पनियाँ बनाती हैं। इलेक्ट्रोनिक कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल)। ईवीएम मशीन तीन भागों में होती है। बेलेटिंग यूनिट (बीयू) कंट्रोल यूनिट (सीयू) और हाल ही में आए वोटर वेरीफेबल पेपर ऑडिट ट्रायल (विविपीऐटी)।

चुनाव आयोग ने बताया कि उसने 1989 से 15 मई 2017 तक बीईएल से 1,005,662 (दस लाख पांच हज़ार 662) बीयू और 928,049 (नौ लाख 28 हज़ार 49) सीयू प्राप्त किये। ईसीआईएल से चुनाव आयोग को 1,014,644 बीयू और 934,031 सीयू प्राप्त हुए।

वहीं ईवीएम बनाने वाली कंपनियों की बात करे तो बीईएल 9 जून 2017 को बताया कि उसने 2010 से 2017 तक चुनाव आयोग को 190,000 बीयू और 125,000 सीयू की आपूर्ति की। दूसरी कंपनी ईसीआईएल ने बताया कि उसने इसी दौरान चुनाव आयोग को 222,925 बियू और 211,875 सीयू की आपूर्ति की। इसके अलावा 497,348 बियू और 307,030 सीयू इसी दौरान अलग से चुनाव आयोग को दिये गए।

मतलब चुनाव आयोग ने 2,020,326 (20 लाख 20 हज़ार 326) बीयू और 1,862,080 (18 लाख 62 हज़ार 80)  सीयू प्राप्त किये। वहीं ईवीएम बनाने वाली कंपनियों बीईएल, ईसीआईएल ने 910,273 ( नौ लाख 10 हज़ार 273) बीयू और  643,905 (छह लाख 43 हज़ार 908) सीयू की आपूर्ती की।

चुनाव आयोग और कंपनियों के आंकड़ों के बीच में लाखों ईवीएम मशीनों का अंतर आ रहा है। सवाल है ये मशीने कहा है?

साथ ही ईवीएम मशीनों के भुगतान में भी गड़बड़ी है। 2006-07 से 2016-17 तक चुनाव आयोग ने ईवीएम खरीदने के लिए Rs 5,360,175,485 (536 करोड़ 1 लाख 75 हज़ार 485 रुपये) खर्च किये। वहीं ईवीएम बनाने वाली कंपनी बीईएल ने 6,525,644,000 (652 करोड़ 56 लाख 44000 रुपये) की ईवीएम मशीनें बेंची। अब सवाल ये है कि 116 करोड़ रुपये ज़्यादा ईवीएम कंपनी ने किस्से लिए?

क्या ईवीएम कम्पनियाँ किसी और को भी ईवीएम बेंच रही हैं? साथ ही क्या चुनाव आयोग कही और से भी मशीनें खरीद रहा है? क्या ये खरीदार राजनीतिक पार्टियाँ तो नहीं हैं? अगर ऐसा है तो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बहुत बड़े खतरे में है।

आरटीआई कार्यकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट में ईवीएम को लेकर पुनर्विचार याचिका दायर की है। याचिका में मांग की गई है कि राजनीतिक पार्टियों से इस मामले में जवाब तलब किया जाए और जब तक जांच के परिणाम नहीं आते वोटिंग के लिए ईवीएम का प्रयोग न किया जाए।।

1 मार्च 2018

क्या वास्तव में स्त्रियों के सम्मान के विपरीत यह उत्सव इशारा नहीं करता।

-डॉ.लाल रत्नाकर 
एक तरफ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा चल रहा है, जिस पर सरकार रात दिन विज्ञापनों पर करोड़ों करोड़ रुपए खर्च कर रही है लेकिन वही सरकार जो भावनात्मक रूप से वायुयान को पुष्पक विमान से जोड़ कर के देखती है और गणेश जी को उस जमाने की प्लास्टिक सर्जरी बताती है तो क्या इस समय भी स्त्रियों को असत्य को ढकने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है क्या वास्तव में होलिका का जला दिया जाना तर्कसंगत रहा होगा या यह कितना सच है यह सब सवाल विचारणीय नहीं हैं ? और एक तरह का पाखंड और अपना आधिपत्य बनाए रखने का सरोकार ही प्रतीत होता है।

जो लोग होलिका को भारत की आधी आबादी के रूप में देखते हैं उन्हें लगता है कि यह भारतीय समाज में आधी आबादी के प्रति हिंसात्मक कुरीति है जिसे आधी आवादी के प्रति अन्याय है। एक तरफ सत्य और राष्ट्रवाद का हौवा (बोलबाला) फैलाया जा रहा है दूसरी तरफ असत्य और आधी ावादी के उत्पीड़न का उत्सव मनाया जा रहा है।
आइए हम विचार करें और ऐसे उत्सव का पुनर्मूल्यांकन कर भारतीय परंपरा और संस्कृति को साम्राज्यवाद से मुक्त कर पाखंड और पाखंडवाद के खिलाफ खड़े हों और उसका भंडाफोड़ करें।
"पर क्या आपने कभी विचार किया हमारे देश में सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का बोलबाला है ऐसे हालात में हम लोग क्या मनाते हैं और क्यों मनाते हैं इस पर कभी विचार नहीं करते ?
क्या वास्तव में स्त्रियों के सम्मान के विपरीत यह उत्सव इशारा नहीं करता।"


भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।[11] प्रतीक रूप से यह भी माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।[12]
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढीराधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है।[13] कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।[14]

परंपराएँ

होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।[15]
होलिका दहन
होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए[16] जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।[16] लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं।
सार्वजनिक होली मिलन
विदेश (जर्मनी) में होली मनाते हुए युवा
होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजीभांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्रायः सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने की वज़ह से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता।

साहित्य में होली

प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली[क] तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। भारविमाघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदासरहीमरसखानपद्माकर[ख]जायसीमीराबाईकबीर और रीतिकालीन बिहारीकेशवघनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं।[28] इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है।[29] सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाअमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं।[8] आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँतेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सवयश चोपड़ा की सिलसिलावी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं।[30]

संगीत में होली[संपादित करें]

वसंत रागिनी- कोटा शैली में रागमाला शृंखला का एक लघुचित्र
भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हालाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंतबहारहिंडोलऔर काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैतीदादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है, जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहाँ ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री।[31] इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता है। भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और 'नवरंग' के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।

आधुनिकता का रंग

होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं।[32] लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं।[33] रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं।[34] होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। बाज़ार में इसकी उपयोगिता का अंदाज़ इस साल होली के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान केन्ज़ोआमूर द्वारा जारी किए गए नए इत्र होली है से लगाया जा सकता है।
इस तरह से इस पर्व को जनमानस में इतने भीतर तक भर दिया है की वः आसानी से निकलता ही नहीं है। 

8 फ़र॰ 2018

जब किसी समुदाय के पास उपयुक्त नेतृत्व ना हो ?

डॉ.लाल रत्नाकर 
http://www.dainikdunia.com/akhilesh-yadav-fight-with-social-justice-discuss-5-brahmin-journalist-taj-vivanta/

'अखिलेश यादव लड़ेंगे सामाजिक न्याय की लड़ाई, इन 5 ब्राह्मण पत्रकारों से बंद कमरे में की मंत्रणा !'

"निश्चित तौर पर विडंबना की कोई सीमा नहीं बचती है जब किसी समुदाय के पास उपयुक्त नेतृत्व ना हो ?"
और यह हालत जब राजनैतिक दलों की हो तब ?

जहाँ तक सवाल माननीय मुलायम सिंह यादव जी का है तो यह कहना पड़ेगा कि उन्होंने संघर्ष करके अपनी राजनैतिक हैसियत बनायी थी और उन्हें भले ही राजनीति के ठगों ने समय समय पर ठगा हो लेकिन उनके संघर्षों का अपना एक इतिहास तो रहेगा ही। हालाँकि इतिहास की अपनी कुछ न कुछ मजबूरियां तो होती ही है..  जिन मजबूरियों को इतिहास जनता के सामने नहीं ला पाता लेकिन इतिहास तो मूलतः वही होता है बाकी तो व्यक्ति का विवरण होता है। उसी तरह की बहुत सारी मजबूरियां माननीय मुलायम सिंह के राजनीतिक जीवन की भी है। 

अगर हम इतिहास के आईने में झाके तो माननीय मुलायम सिंह हो या बहुजन का कोई भी नेता हो जिसके पीछे चौ.चरण सिंह जैसा संघर्षशील और आर्थिक और राजनैतिक समझ रखने की क्षमता का व्यक्ति जिसे किसान से लेकर के देश के उद्योग धंधों की पक्की समझ रही हो और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के परत दर परत की जानकारी थी या कांशी राम जैसा साहसिक व्यक्ति रहा हो उसके बाद का हस्र क्या हुआ ? चौ. चरण सिंह जी जब राष्ट्रीय राजनीति से अवसान कर गए तब उनके पीछे उनके सुयोग्य इंजीनियर पुत्र भारतीय राजनीति में एक भी क़दम अपने पिता के राजनितिक चिन्हों पर नहीं चल पाए । जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों ने चौधरी चरणसिंह की विरासत के रूप में चौधरी अजीत सिंह को अपनाया भी यही नहीं उत्तर प्रदेश के अन्य भागों में भी चौधरी अजीत सिंह चौधरी चरण सिंह की विरासत के रूप में स्वीकार तो किए गए लेकिन चौधरी अजीत सिंह की राजनैतिक सोच चौधरी चरण सिंह की सोच समझ के मुक़ाबले बिलकुल ही उपयुक्त नहीं बानी कारन जो भी हो ?

यह सब यद्यपि चौ.चरण सिंह के अवसान के उपरांत हुआ ! लोगों का तो यहाँ तक मानना है कि चौधरी चरण सिंह कभी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा उनके बाद राजनीति में आए ! चौधरी साहब किसान नेता थे और उन्होंने पूरे हिंदी बेल्ट में बहुत सारे नेताओं को निकाल करके राजनीतिक क्षितिज पर लाये जिनमें प्रमुख रूप से आगे किये जिनमें कई लोग कालांतर में भारत की राजनीति की अच्छी समझ रखने वाले माने गए जिसमें श्री शरद यादव का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है ! चौधरी साहब के अवसान के बाद उनकी विचारधारा को शरद यादव ने आगे बढ़ाया। जिसकी वजह से उत्तर प्रदेश और बिहार में दो ऐसे नेता निकले जिनकी शुरुआत अपनी तरह से अपनी राजनीति शुरू की थी लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी तब कोई पकड़ नहीं थी और न ही अब है !

भारतीय राजनीति को जो लोग जानते हैं वो लोग यह बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि उत्तर भारत के जिन प्रांतों में पिछड़ी जाति के नेता उभरे उसके पीछे जिस इंजीनियर का हाँथ था वह था राजनीतिक इंजीनियर श्री शरद यादव का उत्तर प्रदेश में जब जनता दल सत्ता में आया था तब मुख्यमंत्री के लिए अजीत सिंह और मुलायम सिंह आमने सामने थे और अजीत सिंह के पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री मा. वी पी सिंह जी का हाथ था लेकिन मा. मुलायम सिंह यादव जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे कितने लोग इस बात को जानते होंगे यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन मुलायम सिंह जी इस बात को ज़रूर जानते हैं कि वो मुख्यमंत्री न बन पाते यदि उनकी पीछे उस समय के राष्ट्रीय युवा नेता श्री शरद यादव का हाथ न होता।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करने का भी दारोमदार और योगदान श्री शरद यादव को ही जाता है क्योंकि बिहार की राजनीति के बारे में मेरा अनुभव कम है इसलिए इतना ही कह पाना उपयुक्त है जो तत्कालीन सच्चाई है आगे जो कुछ होता है और जिस तरह से नीतीश कुमार जी अलग होते हैं यहाँ तक कि नीतीश जी का पूरा राजनैतिक जीवन ही श्री शरद यादव के राजनैतिक दिशा निर्देश का परिणाम है ।

मैं यहाँ उत्तर प्रदेश की राजनीति के बारे में बात कर रहा हूँ इसलिए राष्ट्रीय राजनीति का उल्लेख दूसरे लेख में करूँगा यहाँ पर हम फिर वापस आते हैं चौधरी चरण सिंह के उपरांत माननीय अजीत सिंह जी के राजनैतिक जीवन पर अगर देखा जाए तो इसी तरह की राजनीति हमारे पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव सिंह जी के साथ हो रही है इन दोनों घटनाओं में अंतर केवल इतना है कि एक पिता के अवसान के उपरांत राजनितिक विरासत पाया दूसरा पिता के जीवन काल में ही पिता की राजनितिक विरासत के रूप में उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रायोजित किया गया। क्योंकि माननीय मुलायम सिंह यादव जी अपने जीवनकाल में राजनैतिक विरासत सौंपने की जिस मंशा से अपने पुत्र श्री अखिलेश यादव जी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश को सौंपे थे उन्होने बहुमत के पाँच सालों में पारिवारिक छबि को जिस तरह से धूल धूसरित किया उससे कोई भी अनभिज्ञ नहीं है।  

राजनीति में चापलूसों और चमचों की भरमार होती है लेकिन वो राजनीति के लिए मील के पत्थर नहीं माने जाते है।  हमेशा राजनीति को प्रभावित करने वाले लोग नेपथ्य में होते हैं लेकिन दुर्भाग्य से उत्तर प्रदेश की उस सरकार की राजनीति में सरकार को प्रभावित करने वाले लोग मुख्यमंत्री से आगे आ गये थे !

राजनीतिक समझ के लोग इस बात को बहुत ही अच्छी तरह से समझते हैं कि मौजूदा राजनीतिक दल किस तरह की राजनीति कर रहा है अगर इसका राजनीतिक मूल्यांकन किया जाए तो उस 5 साल की बहुमत वाली सरकार में राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद उसका कोई काम राष्ट्रीय राजनीती के लिए मानदंड नहीं बना। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में श्री अखिलेश यादव ने कोई राष्ट्रीय सपना नहीं देखा था हालाँकि प्रदेश के विकास के लिए उन्होंने जितनी भी योजनाएं चलाईं उसकी समाजवादी राजनिति से कोई बहुत लेना देना नहीं था। 
उनके सलाहकार मंडली में जो लोग भी थे वो राजनीतिक रूप से शत प्रतिशत ग़ैर राजनैतिक लोग थे। जिन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री के आगे पीछे इस तरह का औरा बनाया कि युवा मुख्यमंत्री सीखने की बजाए अति उत्साह में ऐसे ऐसे कार्य कर डाले जो ना तो समाजवादी राजनीती के लिए उपयुक्त थे और न ही उनकी राजनैतिक समझ  की ही बात थी। हालाँकि उनके प्रशंसकों द्वारा उनके  इन कार्यों का बहुत प्रचार प्रसार किया गया। लेकिन वह काम वोट के हिसाब से और प्रदेश के विकास के हिसाब से कारगर साबित नहीं हुआ। यही कारण था कि उस समय के चुनाव में किनारे रहने वाली भाजपा बहुत बड़े बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में विराजमान हो गई।  जो लोग माननीय नेताजी को अच्छी तरह से जानते हैं वे जानते हैं कि नेताजी भले ही बीजेपी के  आंतरिक रूप  से सम्मान देते हों लेकिन हमेशा देश में भाजपा को रोकने की वकालत करते आए हैं। अफ़सोस होता है यह कहते हुए कि उनके युवा पुत्र के इर्द गिर्द भाजपा के लोग रात - दिन घेरे रहे और अंत में भाजपा पूरी  ताक़त के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह बना ली ? 

यही कारण है कि आने वाले दिनों में जिस तरह से अजीतसिंह स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के उत्तर प्रदेश में और अब वह भाजपा पूरे अपने ताक़त के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी उपस्थिति बनाली है। जिससे यह उम्मीद नहीं दिखती की आने वाले दिनों में संघर्ष का कोई तरीका यह याद कर सकें और अपनी छवि प्रदेश की बहुजन अवाम को इनकी तरफ खींच सके जिससे  कि आने वाले दिनों में जिस तरह से अजीत सिंह स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के उत्तर प्रदेश में निरंतर अपनी पह्चान खोते गये डर है कि यही हाल कहीं उस युवा मुख्यमंत्री का भी ना हो जाय ?

1 जन॰ 2018

मुझे नववर्ष की शुभकामनाएं न दें .

मुझे नववर्ष की शुभकामनाएं न दें। यह मेरा नववर्ष नहीं है। यह अंग्रेजों का नववर्ष है।यह विदेशी नववर्ष है। यह ईसाईयों का नववर्ष है। मैं विदेशी नववर्ष को नहीं मनाता। मैं अपने नव वर्ष को मनाता हूं। केवल मेरे ही नववर्ष पर बधाइयां भेजें ।
इस नववर्ष की बधाइयां अगर आप भेजेंगे भी तो मुझे नहीं मिल पाएंगी क्योंकि मैंने सभी विदेशी विचारों, परम्पराओं,वस्तुओं,आविष्कारों का बहिष्कार कर दिया है। मैंने अपना मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया है। मैंने अपना आईपैड कूड़ेदान में डाल दिया है। मैंने अपना कंप्यूटर टुकड़े टुकड़े कर दिया है। एसी की जगह ताड़ का पंखा ले आया हूँ।
मुझे इस बात का दुख है कि मैंने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा अंग्रेजी में प्राप्त की थी क्योंकि नववर्ष की तरह अंग्रेजी भी अंग्रेजों की भाषा है,विदेशी है। पर मैं इंजीनियर बना था। नौकरी मिली थी। चीफ इंजीनियर के पद से अवकाश प्राप्त किया था। मुझे दुख होता है कि मैंने ऐसा क्यों किया। मुझे चाहिए था मैं गुरुकुल में जाकर शिक्षा प्राप्त करता। लेकिन तब मुझे नौकरी कहां मिलती? वेतन कहां से मिलता? कोठी कैसे बनाता? गाड़ी कैसे खरीदता? बच्चों को अच्छे स्कूल में कैसे पढ़ाता? 
पर कोई बात नहीं, पुरानी गलतियों पर मुझे दुख है पर आगे कभी ऐसा नहीं करुंगा। मैंने अपने घर की बिजली कटवा दी है क्योंकि बिजली भी विदेशी है।अब मैं अपने फ्लैट में असली घी के दीप जलाता हूं और पूरा वातावरण बहुत शुद्ध हो गया है। मैंने अपनी कार को बेच दिया है और एक बैलगाड़ी खरीदी है जिस पर मैं यात्रा करता हूँ।
कृपया मुझे मेरे नव वर्ष की शुभकामनाएं कागज़ पर नहीं ताड़ के पत्ते पर लिख कर किसी वाहक के हाथ भिजवाएं तभी स्वीकार की जाएंगी। कागज का आविष्कार भी हमारे देश में नहीं हुआ है। यह भी विदेशी है। इस कारण अब मैं ताड़पत्र पर ही लिखता हूं। पेन या पेंसिल का प्रयोग नहीं करता।
धन्यवाद आभार
आपका
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(यह एक मित्र का संदेश है जो उन्होंने मुझे भेजा है उनका नाम बताए बिना साझा कर रहा हूंअ.व.)
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असग़र वज़ाहत साहब की फेसबुक वाल से साभार। 
आरेखण एवं चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर  (2018 की पहली पोस्ट)


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