16-03-2012

मार्क टुल्ली का आलेख 
(अमर उजाला से साभार)

उत्तर प्रदेश में अखिलेश

Story Update : Saturday, March 10, 2012    11:20 PM
राहुल गांधी का कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी की विफलता से उन्हें सबक मिला है, और इस बारे में वह व्यापक चिंतन करेंगे।

उत्तर प्रदेश के नतीजे पर व्यापक चिंतन की जरूरत ही नहीं है। ये सारे तथ्य तो पहले से ही स्पष्ट थे। ये ऐसे सबक हैं, जिन्हें सीखने की गांधी परिवार को कीमत चुकानी पड़ सकती है, जबकि लगता नहीं कि यह परिवार कीमत चुकाने के लिए तैयार है। इसके लिए 10, जनपथ से बाहर निकलना होगा। दरअसल राजनीति में महल जान-बूझकर साधारण लोगों से दूर कर दिए जाते हैं। जबकि राजनेताओं को आम लोगों के साथ खड़े दिखना चाहिए।

चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने पूरे राज्य का दौरा करते हुए लोगों की समस्याओं को दूर करने का इस तरह वायदा किया, मानो वह दूसरे राजनेताओं से अलग हैं, मानो केवल उन्हीं के पास लोगों की तकलीफें दूर करने की शक्ति है। वायदे करते राहुल में मुझे उनके पिता की छवि नजर आई, जो इसी तरह लोगों को आश्वस्त करते थे, जैसे कि राज्य सरकारों की तुलना में केंद्र सरकार ज्यादा कार्यकुशल और योग्य है।

दुर्भाग्य से राजीव गांधी ने यह पाया कि भारत में अधिकार इतने विकेंद्रित हैं कि प्रधानमंत्री तक अपने वायदे पूरे करने की गारंटी नहीं दे सकते। उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने जान लिया था कि राहुल गांधी के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है। वे महसूस कर चुके थे कि गांधी परिवार से होने के बावजूद राहुल के पास राजशाही वाले असीमित अधिकार नहीं हैं।

दूसरे राजकुमारों की तरह राहुल गांधी ने भी खुद को दरबारियों से घेरे रखा। फिर साधारण राजनेता न होने के कारण उन्होंने अपने सलाहकारों के तौर पर अनुभवी राजनेताओं को चुनने के बजाय अपने आसपास उभरती युवा शख्सियतों को रखा, जिनके पास एमबीए से लेकर दूसरी अकादमिक योग्यताएं थीं, जिनका भारतीय राजनीति में कोई महत्व नहीं है।

उन्होंने दिग्विजय सिंह को उत्तर प्रदेश में अपने पास रखा, लेकिन इस पूर्व मुख्यमंत्री ने पुराने और अप्रासंगिक मुद्दे उठाकर खुद ही अपना कद छोटा कर लिया। 'सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई' जैसे जुमले उछालने के अतिरिक्त मतगणना से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर चाटुकारिता का ही परिचय दिया कि अगर चुनावी नतीजे अच्छे होते हैं, तो इसका श्रेय राहुल गांधी को जाएगा, लेकिन अगर परिणाम आशानुरूप नहीं आता, तो इसकी जिम्मेदारी मेरी होगी। राहुल गांधी को अपने सलाहकारों से अच्छी सलाह नहीं मिली, बल्कि वे समझ बैठे थे कि युवराज इस तरह की चाटुकारिता से ही खुश हो जाएंगे।

लगातार यात्रा और एक के बाद एक बैठकें करके राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश की थी। चुनाव से पहले ही दलितों के घर भोजन करके और रात गुजारकर वह अपने बहुप्रचारित अभियान की झलक दे चुके थे। इसके बावजूद उनका उन अखिलेश यादव से कोई मुकाबला नहीं था, जो युवाओं के आइकॉन बनकर उभर चुके थे। अखिलेश एक ऐसे परिवार से आते हैं, जो हमेशा अपनी सादगी पर गर्व करता आया है। मुझे मुलायम सिंह के शुरुआती भाषण का एक अंश आज भी याद है, जो वह बार-बार दोहराते हैं, 'मैंने पूरे उत्तर प्रदेश की धूल फांकी है।' अखिलेश राज्य का मुख्यमंत्री बनने के साथ अब अपने वायदों पर अमल करने की हरसंभव कोशिश करेंगे।जबकि राहुल जनपथ के अपने एकांत महल में वापस लौट जाएंगे।

राहुल ने उत्तर प्रदेश से लौटते हुए यह तक बताने की जहमत नहीं की कि वायदों की पूर्ति के लिए वह राज्य में किसे छोड़ जा रहे हैं। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया था। यह आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि कांग्रेस में निष्ठा के आगे दूसरी कोई चीज मायने नहीं रखती। यही कारण है कि असम के अपवाद को छोड़कर देश के किसी राज्य में कांग्रेस का कोई स्थापित और निर्विवाद नेता नहीं है। इसके बावजूद दिशाहीन कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय पार्टियों के दो कद्दावर नेताओं से टकराने की गलती की।

कांग्रेसी निष्ठा आम आदमी पर हमेशा भारी पड़ती है। गांधी परिवार ने रहस्य के एक ऐसे आवरण से खुद को घेर रखा है, मानो उसके पास वोट पाने की जादुई क्षमता है। इस पार्टी को, जो इस बार उत्तर प्रदेश में इसी जादू के सहारे जीतने की उम्मीद लगाए बैठी थी, जान लेना चाहिए कि 1984 में राजीव गांधी की भारी जीत के बाद से यह जादू काम नहीं करता। राजीव गांधी को भी उतने वोट दरअसल इंदिरा गांधी की हत्या से उत्पन्न सहानुभूति के कारण मिले थे।

पिछले लोकसभा चुनाव में यूपीए की जीत को उत्साही टेलीविजन एंकरों ने कांग्रेस की लहर मानते हुए इसका श्रेय सोनिया के करिश्मे को दिया था। लेकिन वह कांग्रेस के पक्ष में लहर नहीं थी। इस चुनाव में एक और मिथक को चुनौती मिली-वह यह कि राहुल की तरह प्रियंका के करिश्मे पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। अमेठी के नतीजे बताते हैं कि प्रियंका कांग्रेस को जीत नहीं दिला पाई।
मतगणना के एक दिन बाद सोनिया को दूसरे राजनेताओं की तरह पत्रकारों के बीच देखा गया। उन्होंने भी कहा कि मुझे उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों के नतीजे से सबक मिला है।

उन्होंने यह कहा कि ज्यादा नेताओं के कारण भी कांग्रेस की यह दुर्गति हुई हो, तो आश्चर्य नहीं। मेरे हिसाब से उन्होंने बिलकुल उलटी बात कही है-मुलायम और मायावती जैसे कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं के सामने खड़े होने वाले कांग्रेसी नेता बहुत थोड़े थे। गांधियों को सबसे पहले सत्ता साझा करने का सबक सीखना चाहिए। कांग्रेस को समझना होगा कि उसे न तो गांधी परिवार पर इतना निर्भर होना चाहिए और न ही चाटुकारिता का प्रदर्शन करना चाहिए।

राहुल गांधी के लिए बेहतर यही होगा कि दोबारा अपनी छवि दांव पर लगाने से पहले वह राज्य की धूल फांकें। इसी तरह 10, जनपथ को महल के बजाय एक ऐसा निवास होना चाहिए, जहां सभी राजनेताओं की आसान पहुंच संभव हो।
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14-03-2012

चुनौतियों भरा होगा कार्यकाल 
डॉ.लाल रत्नाकर 
इस खिचडीनुमा मंत्री मंडल के स्वरुप से युवा मुख्यमंत्री को घेरने की पूरी साजिश की गयी है.यदि इस पर प्रकाश डाला जाय तो  यह साफ हो गया है कि 'अखिलेश जी' की पहली तस्वीर उतनी साफ़ नहीं है, जीतनी का अंदाजा लगाया जा रहा था .
यदि अच्छे लोगों के नाम पर जिन माननीयों को लिया गया उनमें कईयों को लाने कि मजबूरी तो समझ में आती है पर कुछ नाम ऐसे हैं जिनसे प्रदेश ही नहीं प्रदेश कि अवाम भी त्राहिमाम कर चुकी है, जिसके चलते पिछली सरकार  भी जा चुकी है, हारे हुए अच्छे लोगों को मंत्रीमंडल में शामिल किया जाना तो समझ में आता है, इसमे जहाँ एक तरफ काबिल लोगों को लाया गया है वहीँ इतने दागदार चहरे हैं जिनसे 'युवा' मुख्यमंत्री की चुनौतिया बढेंगी, यह निश्चित है की स्वामिभक्ति का मंत्र अहम है पर अंतिम और सत्य नहीं, आशा है भरती और छंटनी की संभावनाएं बरक़रार रहेंगी. जिससे उन तथाकथित विधायकों कि महत्वाकांक्षा भी पूरी हो जायेगी और प्रदेश कि सरकार कि गरिमा भी बचेगी.
अखिलेश यादव का मन्त्रीमंडल -
15 मार्च 2012
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अखिलेश यादव : मुख्यमंत्री
कैबिनेट मंत्री
1- मोहम्मद आजम खां
2- शिवपाल सिंह यादव
3- अहमद हसन
4- डा. वकार अहमद शाह
5- राजा महेंद्र अरिदमन सिंह
6- आनन्द सिंह
7- अम्बिका चौधरी
8- रघुराज प्रताप सिंह
9- बलराम यादव
10- अवधेश प्रसाद
11- ओम प्रकाश सिंह
12- पारसनाथ यादव
13- राम गोविंद चौधरी
14- दुर्गा प्रसाद यादव
15- ब्रहमाशंकर त्रिपाठी
16- कामेश्वर उपाध्याय
17- राजाराम पांडे
18- राज किशोर सिंह
19- शिवकुमार बेरिया
राज्य मंत्री
1- इकबाल महमूद
2- महबूब अली
3- शाहिद मंजूर
4- रियाज अहमद
5- फरीद महफूज किदवई
6- वसीम अहमद
7- नरेंद्र सिंह यादव
8- शिवप्रताप यादव
9- राजेंद्र सिंह राणा
10- मूलचंद्र चौहान
11- अरविंद सिंह गोप
12- राजीव कुमार सिंह
13- अभिषेक मिश्र
14- विनोद कुमार सिंह
15- भगवत शरण गंगवार
16- नरेंद्र वर्मा
17- राम मूर्ति वर्मा
18- सुरेंद्र सिंह पटेल
19- चितरंजन स्वरूप
20- मानपाल सिंह वर्मा
21- कमाल अख्तर
22- शंखलाल मांझी
23- कैलाश चौरसिया
24- रामपाल राजवंसी
25- मनोज पारस
26- राम करन आर्य
27- अरुणा कोरी
28- जगदीश सोनकर

13-03-2012

देखो भैया ये डोरे डाल रहा है ; जरा बची के रहिओ !
धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का 
(अमर उजाला से साभार khabar के आधार पर)
डॉ.लाल रत्नाकर

अमर के दिल की कसक मानों चोट में बदलने लगी

नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो।
Story Update : Tuesday, March 13, 2012    1:19 AM
amar singh injury to the heart was aching values
सपा के पूर्व महासचिव अमर सिंह यह मान चुके हैं कि सपा में उनकी वापसी का रास्ता बंद हो गया है। उत्तर प्रदेश चुनाव में परचम लहराने के बाद सोमवार को संसद पहुंचे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को कैमरों के चमचमाते फ्लैश के सामने देखते-देखते अमर सिंह के दिल की कसक मानों चोट में बदलने लगी जिसे आखिर उन्होंने बयां कर ही दिया।

गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा
बजट सत्र के पहले दिन भीतर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का अभिभाषण चल रहा था और बाहर अकेले घूम रहे अमर सिंह मीडिया से कहते फिर रहे थे कि ... गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा, हाफिज खुदा तुम्हारा ....। अमर सिंह ने कहा कि उन्होंने ही कभी सपा सुप्रीमो नेता जी से कहा था कि अखिलेश का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर आगे बढ़ाना चाहिए और युवाओं को पार्टी
में जगह देनी चाहिए।

जनता ने परिवारवाद पर मुहर लगा दी
अमर सिंह के मुताबिक उस वक्त मुलायम का कहना था कि इससे परिवारवाद को बढ़ावा मिलेगा। अब उत्तर प्रदेश की जनता ने इस परिवारवाद पर मुहर लगा दिया है। नेता जी से मनमुटाव पर कहा कि उन्होंने सपा के लिए खून और गुर्दा कुर्बान किया है। नेता जी के साथ उनका रिश्ता दिल का है राजनीति का नहीं। सपा में वापसी की गुंजाइश के सवाल पर कहा कि वह राजनीति में पैसा कमाने नहीं आए थे। राजनीति उनका शौक है और वह किसी भी हालत में राजनीति नहीं छोड़ेंगे।

सपा से निकाले जाने के बाद कांग्रेस के मंच पर लगातार अपनी जगह तलाश रहे अमर सिंह राहुल गांधी की मेहनत की तारीफ करना नहीं भूले। कहा, राहुल ने कोशिश की लेकिन परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आए। राजनीति में ऐसा होता रहता है।
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यह उदारवादी रवैया अपना कर चारों तरफ नेता जी के गुणगान करेगा, नेताजी इसके इन्ही नौटंकियों पर रीझ जायेगे और यह अपनी 'दुकान' इधर लगा लेगा , फिर तो दूकान चलने में तो कोई अड़चन ही नहीं इसके पुराने ग्राहक तो हैं ही , नए 'मुख्यमंत्री' को यह भी देखना है. की ऐसी दुकानें न लगाने पायें.

11-03-2012


अगली पहल; युवा मुख्यमंत्री की 
डा.लाल रत्नाकर


जो करना है मुख्यमंत्री के रूप में सबसे युवा मुख्यमंत्री को प्रदेश की नयी पीढ़ी के लिए यही नयी पीढ़ी जिसने किसी को नहीं सुना, भले ही अपनी लालच में इन्हें चुना है, केवल और केवल लैपटाप के लिए ही नहीं और न ही बेरोजगारी भत्ते के लिए बल्कि उसने देखा कि उसकी चिन्ता किसको है जहां उसकी चिन्ता थी उसे उसने जम के चुना कैण्डिडेट को नहीं देखा, देखा तो केवल और केवल उसको जो उसकी चिन्ता कर रहा है, यही कारण था कि नेता जी ने इस सच को समझा और उन्होने उस युवा को मौका दिया है, उन युवाओं की इच्छा को पूरा करने के लिए प्रदेश को युवा मुख्यमंत्री मिला है।
घोषणा-पत्र की प्राथमिकताएं तो अपनी जगह है उन्हें करने में ज्यादा वक्त नहीं लगने जा रहा है यदि भ्रष्ट तंत्र पर नियंत्रण हो जाय। क्योंकि प्रदेश को अब और इन्तजार नहीं करना है नाकाबिल और अकर्मण्य मंत्रियों को, अफसरों को और दलालों को यह वक्त है उन्हें बदलने का कर्मठ होने का। इसी कर्मठता से प्रदेश आगे बढ़ेगा। सामाजिक समरसता से छेड़छाड़ करनी होगी सारी हाय तौबा मिडिया का सामाजिक बदलाव की आहट से ही तो है।
लूट की महारानी के दौर में सारा मिडिया मौन था क्यों ? आज सत्ता का हस्तातंरण भी नहीं हुआ पूरे जोर सोर से ‘गुण्डा राज’ की वापसी का कलरव शुरू कराने वाले कौन है इनक पीछे किनको खड़ा कर दिया मिडिया ने। इनसे पूछो किसका दायित्व बनता है ला एण्ड आर्डर का ‘कार्यवाहक मुख्यमंत्री’ का क्या कोई बयान आया उनका, उनकी सत्ता का नियन्त्रण कहां गया, क्या यह न माना जाय कि उनके इशारे पर उन अधिकारियों ने ऐसा उपद्रव कराया हो जिन्हे पता है आने वाली सरकार को ‘बदनाम’ करने के लिए। यह तथ्य तार्किक भी लगते हैं।
फिर भी नेता जी का संरक्षकत्व और उनके भाईयों कि कृपादृष्टि इस युवा मुख्यमंत्री को निश्चित तौर पर अनुभव के अनेक आयाम देंगें। पर डर जिससे लगता है वह है उनके उन कामों से जहां वह नुकसान कर बैठते हैं। जिनमें क्षेत्रियता की बू आती रही है यथा सब कुछ इटावा या सैफई ही है से।
अब नए युवा मुख्यमंत्री को यहां समता का ध्यान देना होगा पूरे प्रदेश का समान विकास कराना होगा वह चाहे पूर्वी उत्तर प्रदेश हो या बुन्देलखण्ड हो। सबको विकास से जोड़ना होगा, नहीं तो प्रदेश की उत्तरोत्तर दुर्दशा होगी और किसी तरह इनके भी 5 वर्ष कट जाएंगे पर कोई नाम लेने वाला नहीं होगा। आजादी के बाद से उपेक्षित ए क्षेत्र अन्ततः किसी न किसी दलाल की बात मानने को तैयार हो जाएंगे और प्रदेश के बटवारे के लिए आन्दोलन कर सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करेंगे। अतः इनपर गौर ही नहीं अमल करना होगा-
1. किसानों की समस्याओं को देखना होगा जिसमें उनके कर्ज तथा अनेक समस्याओं से निजात दिलाने का प्रयास कराना होगा।
2. मजदूरों की समस्याओं को देखना होगा को देखना होगा एवं निजात दिलाने का प्रयास कराना होगा। 
3. कारखानों और उद्यमियों की समस्याओं को देखना होगा एवं निजात दिलाने का प्रयास कराना होगा। 
4. स्वास्थ्य और शिक्षा पर नजर रखना होगा।
5. आवास पीने का पानी तथा बिजली मुहैया करानी होगी।
6. निरंकुश ठेकेदारों की फौज रातोंरात सेठ,राजनेता,सामंत बनने को तैयार बैठे हैं यह सब नेता जी के शरण में आने को आतुर हैं उन्हे रोकना होगा। 
7. राहुल गांधी को काबिल कहने वाले सारे द्विज नेता जी को पीछे गालियां बकने वाले कोई न कोई सम्बन्ध निकाल ही लेंगे अपना हित साधने के लिए।
8. सारे भ्रष्ट अधिकारी शिष्ट होकर शरण में आ जाएंगे और उनके राजकाज इस राज के समापन तक आराम से यहां भी अपनी चाल चल रहे होंगे।
परन्तु इन सबसे दूर खड़ा होगा इनका मतदाता लाईन में भी नहीं और आगे आ रहा होगा घूसखोर। इनसे पार्टी को निजात दिलाने का प्रयास कराना होगा युवा मुख्यमंत्री को। 

10-03-2012

समाजवादी पार्टी की जीत 
संपादक
जनता जनार्दन की जय हो. जिसने समाजवादी पार्टी पर भरोसा कर "लूट की छूट" और आतंक के छुपे अजेंडे के 'राक्षस' राज से मुक्ति पाने की अपनी कसक को निकल लिया है, निश्चित रूप से समाजवादी पार्टी को लोगों ने इसीलिए चुना है की यह इनसे तो निजात दिलाने में कामयाब होंगे यह आम अवाम ने कर दिया गया है.
मैं आजतक के चैनल पर श्री नीरज शेखर (सिंह) को सुन रहा था, उनको पता भी नहीं है की मुलायम सिंह हैं क्या ? बड़े बाप के बेटे हैं नीरज शेखर उनको तो यह भी पता नहीं होगा की मुलायम ने उनके बाप स्वर्गीय चंद्र शेखर जी का साथ देकर उस पूरी कौम का कितना नुकसान किये उसका यह मतलब नहीं है नीरज शेखर के मन में जो आये वह कह दें, साझदार व्यक्ति जो भी इनको सुन रहा होगा वह इनकी मानसिक विकृति को देख पा रहा होगा, जिस बयान को दुहराना भी किसी सभ्य व्यक्ति को शोभा नहीं देता .
नीरज शेखर की बातें सामंती सोच से भरी हुयी थी जिससे पूरा मिडिया का 'मन' की ये 'गुंडे' हैं का बयान पर सफाई न देकर स्वीकार रहे थे.
यहीं पर यह साफ़ कर दूँ की इन बातों को जानबूझकर कहा जाता है क्योंकि ये यही मानते हैं की ये किसी जाती विशेष का होने के नाते समझदार हैं, अगर यही मुलायम सिंह चंद्रशेखर (स्वर्गीय) के पुत्र की मदद न करते तो ये साफ हो चुके थे. अमर सिंह की सारी हैसियत ही मुलायम सिंह थे, इसका भी एहसास अब अमर को हो गया होगा ! यदि नहीं तो आने वाले दिनों में हो जाएगा.
इसी तरह की तुलना आद. दिग्विजय सिंह जी एन डी टी वी पर अखिलेश यादव और राहुल गांधी में अंतर बताते  हुए जिस तरह कर रहे थे की राहुल को पूरा देश जानता है पर  अखिलेश यादव को देश के बाहर कौन जानता है. तरस आता है आ.दिग्गी नरेश अभी भी 'सामंती' सोच के साथ विश्लेषण करते हैं यदि उनसे कोई पूछे की आप तो उप्र के बाहर के होते हुए जानते हो तो क्या समझा जाय.
इसीलिए नेताजी कईबार इस तरह के लोगों से धोखा खा जाते रहे हैं. वह अमर सिंह द्वारा हो, मोहनसिंह द्वारा हो, या पुराने लोग जानते हैं की नेता जी को चन्द्र शेखर जी के साथ जाने पर जनता ने वी.पी. सिंह जी को अपना नेता माना था जिसकी वजह से नेताजी को सत्ता से बाहर रहने का जोखिम उठाया .
जातीय विद्वेष की विचारधारा ने इन सामंतों और द्विजों की वजह से समाज जिस कदर विभाजित किया है वह  आज हर जगह दिखाई दे रहा है. अतः यह कह सकते हैं की हमारा समाज इस तरह की बातों से ही दूसरों के व्यक्तित्व को कम कर रहा है .
नहीं तो यादवों का गौरवशाली इतिहास इन भूखों,नंगों,लूटेरों और भ्रष्टों को कैसे मोहताज़ हो जाता. लेकिन इन्ही सामाजिक कुरित्यों के चलते सारा देश इस तरह के प्रपंचों में फस रह जाएगा .
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वैसे तो आज की जीत का सारा श्रेय मुलायम सिंह की बजाय अखिलेश यादव  को जाता है, और उनकी नितिगत रणनीति काम ही नहीं आयी है बल्कि जनता ने विश्वास किया और पूर्ण बहुमत दिया है. निश्चित रूप से अखिलेश यादव ने अपने प्रथम पार्टी की अध्यक्षता की परीक्षा में टॉप कर गए हैं, और यह हक़ बनता है की अपनी टीम के नेत्रित्व का दायित्व संभालें.
यह अलग बात है की अखिलेश जी यह कह रहे हैं की मुख्यमंत्री नेता जी ही बनेंगे, यह उनका संस्कार है पर अब नेता जी को भीष्मपिता के रूप में रखना चाहिए, आराम के साथ एक गुरु की जगह भी होनी चाहिए पिता के दायित्व के साथ जिस दायित्व के निर्वहन हेतु नेता जी ने अखिलेश को चुना है उसका पूर्णत्व प्रदेश का मुखिया बनाने तक का होता है और यही सही वक़्त भी है यह जिम्मेदारी सौपने की.
पहुचता है     
वैसे तो जीत हो गयी समाजवादी पार्टी और पार्टी के हरे रंग में रंगेगी इस बार की होली. समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश में हुई ऐतिहासिक जीत ने उन सभी लोगों के मुंह पर तमाचा मारा है, जो इसे गुंडों की पार्टी कहते थे. हवा-हवाई फाइव स्टार युवराज राहुल गाँधी पर धरती-पुत्र का युवराज अखिलेश यादव भारी पड़ा. इतिहास की इबारत को समझने और पढने की जरुरत है. मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव सहित सभी समाजवादियों को इस जीत पर हार्दिक बधाई. इस बार की होली हरे रंग के नाम, जो की किसानों की जिजीविषा और समृधि का प्रतीक है !
अखिलेश यादव के नेत्रित्व में प्रदेश का विकास एक नया मॉडल बन सकता है यदि टैलेंटेड लोगों को लेकर सरकार चलाते हैं तो. परन्तु ऐसा तभी सम्भव होगा जब वह विकास की जरूरतों को समझेंगे. सैफई प्रदेश नहीं है उसे उसी तरह विकसित करना होगा प्रदेश की तरह नहीं . 

अगली पहल
जो करना है मुख्यमंत्री के रूप में सबसे युवा मुख्यमंत्री को प्रदेश की नयी पीढ़ी के लिए यही नयी पीढ़ी जिसने किसी को नहीं सुना, भले ही अपनी लालच में इन्हें चुना है, केवल और केवल लैपटाप के लिए ही नहीं और न ही बेरोजगारी भत्ते के लिए बल्कि उसने देखा कि उसकी चिन्ता किसको है जहां उसकी चिन्ता थी उसे उसने जम के चुना कैण्डिडेट को नहीं देखा, देखा तो केवल और केवल उसको जो उसकी चिन्ता कर रहा है, यही कारण था कि नेता जी ने इस सच को समझा और उन्होने उस युवा को मौका दिया है, उन युवाओं की इच्छा को पूरा करने के लिए प्रदेश को युवा मुख्यमंत्री मिला है।
घोषणा-पत्र की प्राथमिकताएं तो अपनी जगह है उन्हें करने में ज्यादा वक्त नहीं लगने जा रहा है यदि भ्रष्ट तंत्र पर नियंत्रण हो जाय। क्योंकि प्रदेश को अब और इन्तजार नहीं करना है नाकाबिल और अकर्मण्य मंत्रियों को, अफसरों को और दलालों को यह वक्त है उन्हें बदलने का कर्मठ होने का। इसी कर्मठता से प्रदेश आगे बढ़ेगा। सामाजिक समरसता से छेड़छाड़ करनी होगी सारी हाय तौबा मिडिया का सामाजिक बदलाव की आहट से ही तो है।
लूट की महारानी के दौर में सारा मिडिया मौन था क्यों ? आज सत्ता का हस्तातंरण भी नहीं हुआ पूरे जोर सोर से ‘गुण्डा राज’ की वापसी का कलरव शुरू कराने वाले कौन है इनक पीछे किनको खड़ा कर दिया मिडिया ने। इनसे पूछो किसका दायित्व बनता है ला एण्ड आर्डर का ‘कार्यवाहक मुख्यमंत्री’ का क्या कोई बयान आया उनका, उनकी सत्ता का नियन्त्रण कहां गया, क्या यह न माना जाय कि उनके इशारे पर उन अधिकारियों ने ऐसा उपद्रव कराया हो जिन्हे पता है आने वाली सरकार को ‘बदनाम’ करने के लिए। यह तथ्य तार्किक भी लगते हैं।
फिर भी नेता जी का संरक्षकत्व और उनके भाईयों कि कृपादृष्टि इस युवा मुख्यमंत्री को निश्चित तौर पर अनुभव के अनेक आयाम देंगें। पर डर जिससे लगता है वह है उनके उन कामों से जहां वह नुकसान कर बैठते हैं। जिनमें क्षेत्रियता की बू आती रही है यथा सब कुछ इटावा या सैफई ही है से।
अब नए युवा मुख्यमंत्री को यहां समता का ध्यान देना होगा पूरे प्रदेश का समान विकास कराना होगा वह चाहे पूर्वी उत्तर प्रदेश हो या बुन्देलखण्ड हो। सबको विकास से जोड़ना होगा, नहीं तो प्रदेश की उत्तरोत्तर दुर्दशा होगी और किसी तरह इनके भी 5 वर्ष कट जाएंगे पर कोई नाम लेने वाला नहीं होगा। आजादी के बाद से उपेक्षित ए क्षेत्र अन्ततः किसी न किसी दलाल की बात मानने को तैयार हो जाएंगे और प्रदेश के बटवारे के लिए आन्दोलन कर सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करेंगे। अतः इनपर गौर ही नहीं अमल करना होगा-
1. किसानों की समस्याओं को देखना होगा जिसमें उनके कर्ज तथा अनेक समस्याओं से निजात का प्रयास।
2. मजदूरों की समस्याओं को देखना होगा को देखना होगा।
3. कारखानों और उद्यमियों की समस्याओं को देखना होगा।
4. स्वास्थ्य और शिक्षा पर नजर रखना होगा।
5. आवास पीने का पानी तथा बिजली मुहैया करानी होगी।
6. निरंकुश ठेकेदारों की फौज रातोंरात सेठ,राजनेता,सामंत बनने को तैयार बैठे हैं यह सब नेता जी के शरण में आने को आतुर हैं। 
7. राहुल गांधी को काबिल कहने वाले सारे द्विज नेता जी को पीछे गालियां बकने वाले कोई न कोई सम्बन्ध निकाल ही लेंगे।
8. सारे भ्रष्ट अधिकारी शिष्ट होकर शरण में आ जाएंगे और उनके राजकाज इस राज के समापन तक आराम से चल रहे होंगे।
परन्तु इन सबसे दूर खड़ा होगा इनका मतदाता लाईन में भी नहीं और आगे आ रहा होगा घूसखोर। 






05-03-2012

भाई शिवपाल के बयान कहीं खेल बिगाड़ न दें !


                      नेता जी से निवेदन है की वह शिवपाल भाई से निवेदन करें की वह जनता की आशाओं का मजाक न बनाएं और प्रदेश का गरिमामयी वजूद गढ़ें । जैसा की सर्वविदित भी है कि सपा की दुश्मनी लगभग सबसे है और सबसे ज्यादा तो मिडिया में बैठे सपा विरोधियों से है, वैसे यह अपना मोर्चा तो संभाल चुके हैं, पर सावधान रहना है समाजवादी पार्टी के प्रवक्ताओं को. यद्यपि जिस तरह के नपे तुले बयान ने अखिलेश यादव की छवि एक समझदार नवयुवक नेता के रूप में निखर कर आयी है, उनको यह छवि बनाये रखना चाहिए और भाई शिवपाल से आग्रह करना चाहिए की वह मौन कायम रखें. और अपने दुश्मनों से बचे रहें. साथ ही सरकार गठन से भाई शिवपाल को दूर रखें . हो सकता है की यह बात उनको अच्छा न लगे पर मेरे मौन रहने से यह बात कोई कहने वाला भी नहीं है.
                          मुझे याद है नेता जी का जब अमर सिंह ने राजनैतिक 'अपहरण' कर लिया था तो किसी ने भी यह हिम्मत ही नहीं की थी तब 'आवाज' के माध्यम से लगातार मैं यह कह रहा था यह 'दलाल' बड़ा धोखा देने जा रहा है जो आगे जा के साबित भी हुआ है.
                         मुझे लगता है की नेता जी की देखरेख में यदि अखिलेश को प्रदेश को आगे ले जाने का मौका दिया जाता है तो प्रदेश में ही नहीं अखिलेश की राजनैतिक सौम्यता  देश को नेत्रित्व के लिए उपयोगी होगी . क्योंकि अब तो विरासत का दौर आमंत्रित कर रहा है, क्योंकि वहां भी मा.नेता जी की अभी भी राजनैतिक हैसियत है जिससे देश में वह नयी लहर पैदा कर सकते हैं.
                         बहुत कम लोग जानते हैं की देवीलाल के जन्मदिन का ७५वा  जन्मदिन मनाया जा रहा था उसका संयोजकत्व मा. नेता जी के पास था. आज़  तक उस तरह का आयोजन तो देखा नहीं, फिर सारे बदलाव कई सरकारें उनका मंत्रित्वकाल केन्द्रीय सरकार का. पर उसको जितना प्रचारित किया जाना था उसकी बजाय उसे दबाया ही गया है. जो दुखद है.
                           नेता जी की कुछ सीमाएं हैं जहां कई लोग उन्हें खंडित करते हैं जिनमें उनके करीबी लोग ज्यादा हो जाते हैं, नेता जी ने  कई बार स्वीकार किया है की बाहर का विरोधी कुछ नहीं कर सकता, जितना नुकसान भीतर बैठा आदमी करता है, यह बात आगरा अधिवेशन  में कोर ग्रुप की बैठक में कपिलदेव सिंह और के.सी.त्यागी के लिए उन्होंने कहा था, यदि उस दिन बीच में जनेश्वर मिश्र न आते तो उसी दिन उन दोनों पर जीतनी 'गाज़' गिरती या गिर चुकी थी, यहाँ तक की नेताजी ने उनको पार्टी छोड़कर चले जाने को भी कहे थे. और वो जिस तरह झुके अपनी कुटिलताओं को समेटे चिपके रहे थे उन्हें रुके रहने का पूरा प्रयास जनेश्वर जी ने किया था . आज भी नेता जी के पास जो राजनैतिक खज़ाना है उसको देश के लिए इस्तेमाल के लिए 'सुयोग्य' प्रतिनिधि की आवश्यकता है. उस प्रतिनिधित्व में यदि भाई शिवपाल अपने को शरीक करते हैं, तो घर का भविष्य को भी अन्धकार में ले जाना शुरू हो जायेगा, जैसा की पीछे हो भी गया था . इसीलिए उनको घर पर ही छोड़ देना चाहिए की गाँव के लोगों की राजनीती कर सकते हों तो करें.
                                अब नेता जी के पास सुयोग्य प्रतिनिधि के रूप में अखिलेश यादव हैं जो उनकी परंपरा के कुशल संवाहक साबित हो रहे हैं. अतः उनको ही यह दायित्व देना चाहिए. यहाँ यह उल्लेखनीय है की जहाँ 'राहुल' जैसे अपढ़ आदमी को देश के 'प्रधानमंत्री के रूप में परोसा जा रहा हो पूरी कांग्रेस मौन हो वहीँ 'भाई शिवपाल की नियति' अखिलेश को राजनीती में आगे लाकर नेता जी के यश को फैलाने में 'बाधक या रोड़ा नहीं बनने देना चाहिए .
                               एक आग्रह माननीय आज़म साहब से किये जाने हेतु 'आज़म साहब आप तेज़ तर्रार और अनुभवी नेता हैं पर दुखद है की भारतीय राजनीति में परिवारवाद पनप चुका है अतः लोकतान्त्रिक चयन का चलन नेत्रित्व के लिए का लगभग अंत हो चला है, यह जानते हुए यह तो स्वीकारना ही पडेगा की भाई शिवपाल से युवा अखिलेश यादव आपके संरक्षत्व में आपके लिए भी और समाजवादी पार्टी के लिए उपयुक्त रहेंगे यदि समाजवादी पार्टी को सत्ता में बनाए रखना है.' और देश तक ले जाना है. अतः आपका इस चुनाव में अहम् रोल होते हुए भी वह यश जनता में नहीं ले जाया जा पा रहा है.
                               फिर भी यह पार्टी आपकी है आप इसमें आगे रहें या पीछे जो भी नेत्रित्व करेगा उसे आपको निहारना तो पडेगा ही. फिर नेता जी का बेटा हो तो और भी अच्छा है .

  
(जागरण से साभार खबर के आधार पर)
व्यंग;
दे ही दो युवराज को ताज!


अगल-बगल बैठे बगलें झांक रहे सारे चचा, ताउओं को बाअदब सलाम ठोकते हुए विदूषक ने जनता बनकर

सीधे नेताजी से अर्ज किया, हुजूर! यह बेटा अब हमें दे ही दो। जैसे राजा दशरथ ने ऋषियों की रक्षा के लिए 

अपने बेटे दे दिए थे। गुरु ज्ञान और धर्म पालन, दोनों साथ-साथ हो जाएगा। इन खटारा सड़कों और कीचड़ 

सनी पगडंडियों में साइकिल चलाने का हुनर इसी में है। इतने बड़े सूबे के लोगों ने यह बात बटन दबाकर 

कही है। अब धमाके से युवराज का राज्याभिषेक कर दिया जाए। 



दरबार में सन्नाटा है। विदूषक फिर शुरू हुआ, हुजूर! अमर चचा की वक्री वाणी पर न जाइए, उन्हें भला


भतीजे पर कैसे लाड़ आएगा! सम्मोहनी इत्र बांटकर मित्र बनाने वालों के नुसखों पर अमल कर अच्छा


तजुर्बा हो चुका है। दिल पर हाथ रखकर कहिए, वे पहलवानी के दिन, वे साइकिल यात्राएं, बड़े नेताओं की वे


तिरछी मुसकानें... संघर्ष के वे कई वर्ष, वे तजुर्बे...। बेटे ने सारा इतिहास सामने रख दिया कि नहीं! एक


झटके में सारी खोई पूंजी सूद समेत कदमों में रख दी। जो आज्ञा पिताश्री का यह रामायणकालीन


शिष्टाचार...। बताइए, आज के राजघरानों में ऐसे संस्कार बचे ही कहां हैं? 


चचा-ताऊ इस अवांछित के प्रवेश से खिन्न नाखून कुतर रहे हैं। विदूषक ने फिर खुद ही खामोशी तोड़ी-

मालिक! अपना यह प्रदेश थोड़ा उपचार और थोड़ी ताजा हवा मांग रहा है। साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति में

फंसी व्यवस्था थोड़ा-सा इजी होना चाहती है। बेटे ने बढ़िया गणित बनाया है। तीन-तिकड़म की भी कोई

जरूरत नहीं। हर सवाल का जवाब इनके पास है, बिना लाग लपेट, बिना अटके ...। समझ है, शालीनता है,

हौसला है। 

नेता जी थोड़ा-सा मुसकराए। विदूषक फिर बोला, आप तो अब अश्वमेध यज्ञ का सामान जुटाएं और इस सूबे

को युवराज को सौंप दे। सोनिया जी को बेटे को पीएम बनाने की जल्दी है। चचा फारूक का ही उदाहरण

लीजिए। इन्हें कृष्ण का उपदेश सुनाइए। चचा, ताऊ, भाई, भतीजे, राजा-प्रजा आदि-आदि के बारे में जो भी

कहा, बताइए और चाहे तो आप भी त्रिगुणरहित हो जाइए। विविधताओं से भरा इतना बड़ा प्रदेश बहुत कुछ

सिखाने को तैयार बैठा है। बच्चों के मन से चचाओं का डर निकालिए। 

एक दूसरे को ताक रहे चचाओं की भृकुटी तनी देख ऐलान होता है, तख्लिया! विदूषक धीरे से बाहर निकलते

हुए बड़बड़ाता है-जेहि विधि राखे राम, सियासत से हम जैसे विदूषकों का भला क्या काम!

दिनेश जुयाल

(साभार;अमर उजाला - डॉ.लाल रत्नाकर)
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शिवपाल को विश्वास, जरूरी नहीं किसी का साथ
Mar 04, 07:51 am
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश मतदान के बाद अब यूपी की सियासत धीरे-धीरे उबाल पर आ रही है। यूं भी चुनाव के ठीक बाद आए एग्जिट पोल ने समाजवादी पार्टी की बल्ले-बल्ले कर दी है और वह अब अपनी सरकार बनाने के सपने संजोने लगी है। वहीं सपा नेता को पूर्ण बहुमत की उम्मीद है।
लेकिन बहुमत न आने की सूरत में सपा के पास कांग्रेस से गठजोड़ का विकल्प ही बचता है। लेकिन हाल ही में कांग्रेस गठबंधन की सरकार में आए रालोद के अध्यक्ष अजित सिंह सपा के साथ किसी तरह के गठबंधन से इंकार कर रहे हैं। वहीं सपा नेता शिवपाल यादव अपनी पार्टी के पूर्ण बहुमत में आने का दावा भी कर रहे हैं।
सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी समाजवादी पार्टी की मुश्किलें कम नहीं होंगी। क्योंकि जहां अखिलेष यादव को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की बातें चल रही हैं वहीं अखिलेष एक बार फिर मुलायम को इस गद्दी पर काबिज होते देखना चाहते हैं। वहीं दूसरे वरिष्ठ नेता इस बारे पार्टी हाईकमान के निर्णय की बात स्वीकारने की बात कर रहे हैं।
सपा को बहुमत न मिलने की सूरत में कांग्रेस प्रदेश में सरकार बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसके अलावा एग्जिट पोल्स ने सभी पांच राज्यों में बदलाव के संकेत दिए हैं। उत्तार प्रदेश में सपा को भारी बढ़त के साथ बसपा के हाथ से सत्ता खिसकने के पूर्वानुमान लगाए गए हैं। उत्ताराखंड और पंजाब भी परिवर्तन की राह पर जाते दिख रहे हैं। हालांकि पिछले कई चुनावों में पूर्वानुमानों पर खरे नहीं उतरने वाले एक्जिट पोल को लेकर विभिन्न राजनीतिक दल मुतमईन नहीं हैं।
इस बार ये कितने खरे उतरेंगे, यह तो छह मार्च को परिणाम आने पर ही पता चलेगा, लेकिन तब तक के लिए बहस और अटकलें तो शुरू हो ही गई हैं। पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के सामने हमारे देश की चुनावी सर्वे व एक्जिट पोल करने वाली एजेंसियां ज्यादातर सटीक पूर्वानुमान लगाने में विफल रही हैं।
यही वजह है कि अब न तो राजनीतिक दल और न ही आम जनता इनके आंकड़ों पर ज्यादा भरोसा करती हैं। यह अलग बात है कि अधिकृत परिणाम आने तक यह चर्चा का विषय जरूर रहते हैं। देश में चुनाव में इस तरह के पूर्वानुमानों का दौर 1996 के आम चुनावों से शुरू हुआ था। बाद में इनका प्रचलन बढ़ा और कथित तौर पर आंकड़ों को इकट्ठा करने व आकलन के वैज्ञानिक तरीकों का दावा किया गया।
लेकिन, इसके साथ ही इनके गलत साबित होने का आंकड़ा भी बढ़ा। एक-दो बार को छोड़ दिया जाए तो अक्सर ये पूर्वानुमान मतदाताओं के असली मन को पढ़ने में नाकामयाब रहे। 2004 व 2009 के लोकसभा चुनाव हों या 2007 के उत्तार प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव, एक्जिट पोल कसौटी पर खरे नहीं उतरे।
इस बार भी कुछ समाचार चैनलों ने एक्जिट पोल किए हैं। अगर उनके आंकड़ों को माना जाए तो उत्तार प्रदेश में लगभग सभी पूर्वानुमानों में सपा को बहुमत के करीब सबसे बड़ी पार्टी बताया गया है। बसपा को दूसरे स्थान पर, लेकिन सपा से काफी पीछे रखा गया है। भाजपा पहले से बेहतर तीसरे और कांग्रेस चौथे नंबर पर है। कांग्रेस को रालोद गठबंधन का ज्यादा फायदा मिलता नहीं दिख रहा।
पंजाब में सभी पूर्वानुमानों में कड़े मुकाबले में कांग्रेस को अकाली-भाजपा गठबंधन से आगे दिखाया गया है। यही स्थिति उत्ताराखंड की है। वहां भी कांग्रेस, भाजपा पर भारी पड़ रही है। मणिपुर में भी कांग्रेस विपक्षी दलों के गठबंधन से आगे है।
उत्तार प्रदेश में अगर कोई दल पूर्ण बहुमत के पास नहीं पहुंचता है तो काग्रेस और भाजपा कहा खड़ी होंगी? 2014 के लोकसभा चुनावों की रणनीति अभी से बुन रही काग्रेस को अब समाजवादी पार्टी के साथ किसी भी तरह के समझौते में नुकसान दिख रहा है। पार्टी की सोच है कि अगर वह 80 से 100 सीटें तक लाने में कामयाब रही तो वह बसपा के साथ ही सरकार बनाने को वरीयता देगी।
वहीं, भाजपा के लिए सपा के साथ जाने का सवाल ही नहीं। साथ ही वह बसपा से भी हाथ मिलाने को तैयार नहीं है। सपा-बसपा से धोखा खाए बैठे दोनों राष्ट्रीय दलों के इस रुख से उत्तार प्रदेश में सरकार के स्वरूप या उसके भविष्य को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है।
काग्रेस की सारी योजना या सोच सीटों की संख्या पर टिकी हैं। उसकी कोशिश उत्तार प्रदेश की सत्ता में भागीदारी की तो है, लेकिन यह भी वह सीटों की संख्या के बाद ही तय कर सकेगी। कांग्रेस के रणनीतिकारों की सोच है कि वह या तो बसपा को समर्थन दे या उससे ही समर्थन लेकर सरकार बनाए।
सूत्रों का कहना है कि काग्रेस महासचिव राहुल गाधी और उनके करीबी मान रहे हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी की तरफ दोस्ती का कदम उत्तार प्रदेश में काग्रेस के दोबारा पैरों पर खड़े होने की कोशिशों में बाधक होगा। काग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि समाजवादी पार्टी के साथ सरकार बनाने का सवाल ही नहीं उठता। यदि सीटें कम आई तो काग्रेस विपक्ष में बैठेगी।
काग्रेस के मैनेजर मान रहे हैं कि मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के बीच इस चुनाव में काग्रेस ने जो पैठ बनाने की कोशिश की है, वह एक तरह से मुलायम का वोटबैंक ही छीनने के मंतव्य से थी। ऐसे में फिर उनका साथ, मतदाताओं और कार्यकर्ताओं को भ्रमित करेगा। वैसे भी 1990 में जबसे काग्रेस ने मुलायम को समर्थन दिया तबसे उसने उत्तार प्रदेश में सत्ता का मुंह नहीं देखा।
वहीं, अब बसपा के साथ जाने से उसे ऐसा सियासी नुकसान नहीं दिख रहा। बसपा के साथ जाने के इच्छुक वर्ग का मानना है कि दलित वोट पहले भी काग्रेस केसाथ था। यदि सत्ता में बसपा के साथ भागीदारी होती है तो हो सकता है कि पुराना वोट फिर उसके साथ आ सके।
दूसरे राष्ट्रीय दल भाजपा अपने पूर्व अनुभवों के मद्देनजर सरकार बनाने के लिए बसपा के साथ किसी भी तरह के समझौते के लिए अभी तक तो तैयार नहीं है। भाजपा के थिंकटैंक का मानना है कि बसपा के साथ एक बार फिर समझौते का मतलब पार्टी को पीछे धकेलने जैसा होगा। पार्टी के शीर्ष पदस्थ सूत्रों ने कहा कि यदि भाजपा के पास मुख्यमंत्री बनने लायक नंबर नहीं आते तो वह विपक्ष में बैठेगी।
सुझाव---
समाजवादी पार्टी के चिंतकों की चिंता ; यह नहीं है की ऊंट किस करवट बैठेगा, वो तो बैठेगा ही, पर बैठने के बाद उठेगा कैसे, मुझे यह कहते हुए बिलकुल हिचक नहीं है की समाजवादी पार्टी यदि सत्ता में आती है. तो उसे सत्ता प्रबंधकों की अच्छी फौज लेकर आना चाहिए, जनता ने सुशासन के लिए सपा को वोट दिया है. और जनता को मुलायम सिंह से ही आशा भी थी कि 'बहन जी के अनियंत्रित' आचारों से फैले संकट से वही उबार सकते हैं, यथा बड़ी बड़ी आशाओं के साथ मुलायम के तथाकथित स्वार्थी सपाई घात लगाए बैठे हैं. वक़्त आते ही वह अपने कुकर्मों में लग जायेंगे और पार्टी को पिछले वाले चरित्रों से जोड़ने में कामयाब हो जायेंगे.
यदि इन बातों पर ध्यान दे दिया जाय तो सरकार अपने को राष्ट्रिय स्तर पर अपनी 'इमानदार' छाप छोड़ने में कामयाब हो सकेगी क्योंकि 'बहन' जी ने जिस "लूट की छूट" को अंजाम दिया है, वही पुरे देश में चर्चा का कारण बना हुआ है. अतः कृपया -
१.पार्कों और मूर्तियों पर बिना विचारे किसी तरह का बयान न दिया जाय. 
२.प्रदेश में विद्युत् आपूर्ति के लिए तत्काल इंतजामात किये जाय .
३. प्रदेश को बिल्डरों की लूट से रोका जाय और विकास के सरकारी और किसानों के साथ निति तय की जाय (पुणे के माडल पर हो) जिससे किसान खुशहाल हो.
४. शिक्षा के निजीकरण से उपजी लूट को रोकने का प्रयास किया जाय .
५. सभी स्तर के सरकारी शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों व् स्कूलों को नियमतः आरक्षित और अनारक्षित पदों को तत्काल भरा जाय और ईमानदार और सुयोग्य शिक्षा मंत्री दिया जाय .
६.समय पर कर्मचारियों को उनके कार्यालयों में उपस्थिति और नियमितता तय की जाय.
७. भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों और अधिकारीयों को जेल भेजा जाय .
८.तबादले और भर्तियों में 'घुस' पर सख्त रोक लगाई जाए. और इसके व्यवसाय होने से रोक लगाकर  इमानदार और कर्मठ लोगों को मौका दिया जाय.
९. 'शिष्टाचार' का रूप ले चूका 'भ्रष्टाचार' समाप्त करने के लिए एक मंत्रालय बनाया जाय और लोकायुक्त को मज़बूत बनाया जाये.
१०. मंत्रिमंडल में साफ छवि और प्रबुद्ध लोगों को रखा जाए.
यदि इन पर ध्यान नहीं दिया जाता तो सरकार भले ही बन जाय पर जनता का विश्वास नहीं बनेगा  और 'समता  और समाजवादी अवधारणा तार तार हो जायेगी' लोग लोहिया को भूल जायेंगे.
अतः आपकी कोशिस होनी चाहिए की लोहिया के इस सिद्धांत का कडाई से पालन हो आय में १;१० का ही अनुपात हो. एक बात और की 'गुंडा राज' से बचने के बयान मात्र से ही काम नहीं चलेगा उस पर अमल भी आवश्यक होगा.  
(समय समय पर हम एसे सुझाव देते रहेंगे यदि आपके पास भ अच्छे सुझाव हैं तो क्रिपय लिखते रहें.)
(संपादक)

02-03-2012

मांगलिक प्रयोजन
(संपादक)


आज मैं एक मांगलिक समारोह में शरीक हुआ यह समारोह समाज के अमुक नवधनाढ्य के यहां था, यह एक डाक्टर लड़की और एक भारतीय प्रशासनिक सेवा मे चयनित डाक्टर वर के परिणयसंस्कार के रस्म का मांगलिक प्रयोजन का अवसर था. इस समारोह में लगभग जिले के राजनेता एवं व्यवसायी तथा तथाकथित सामाजिकजन मौजूद थे। पर आम आदमी था तो पर उसकी उपस्थिति कहीं नदारद थी ।

इनमें अधिकांश को मैं जानता था, शायद वह भी हमें जानते होंगे पर यह ठीक से नहीं पता था कि यह कौन हैं, पर उनके इर्द गिर्द जो भी होते थे यदि हमें जान रहे होते तो यह फख्र से बताते कि यह बड़े कलाकार हैं। यह सुन  बहुत ही सन्तोष मिल रहा था कि लोग भूल चुके थे कि मैं भी कभी यहां कि राजनीति में सक्रिय ही नहीं था बल्कि चुनाव भी लड़ा था।

संयोग ही था कि उन दिनों के मेरे सारे विरोधी (राजनैतिक) पर जो कभी न कभी उस क्षेत्र को प्रतिनिधित्व दे चुके थे, आज खाली ही नहीं उदास भी थे क्योंकि अब उन्हें वहां की राजनीति से अलग थलग होना पड़ा था या कर दिया गया था। जिसमें हर एक दूसरे ने एक दूसरे के साथ लगभग वही किया था जो एक राजनीतिक को करना पड़ता है। या यह भी कहें कि जनता को वह उसकी इच्छा के अनुरूप साबित कर पाने में नाकाम साबित हुआ। जबकि इनमें से लगभग हर एक ने अपने को सबल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। क्या ? यही लोकतंत्र का असली चेहरा है।

वहां कुछ अन्य दलों के प्रत्याशी भी थे, एवं एक सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी जिन्हें चुनाव परिणाम की सार्थक परिणाम की प्रत्यासा में विजयी होने की पूरी उम्मीद थी, वह आम लोगों के बीच अपने सारे कौशल बघारने को विवश थे, उन्ही में से मैंने जिस प्रत्याशी को पीछे खींचकर सादाब उनके हाल चाल जानना चाहा तो वह पूरे आत्मविश्वास से अपने विजय की समीक्षात्मक व तार्किक तर्को से सन्तुष्टि तक अवगत कराने का भरपूर प्रयास किये। मैं भी उनकी विजय से संतुष्ट हो तृप्ति का एहसास कराया. संयोग ही था कि उनके धनपशु प्रतिद्वन्दी जिस तरह से अपने राजनीति में आने को लेकर अपनी अनभिज्ञता एवं अन्यमनस्कता जता रहे थे उससे आश्चर्य तो नहीं हो रहा था पर इस सामाजिक परिवेश एवं राजनितिक दल में उनके घुटन का एहसास जरूर दिखाई दे रहा था।

वहां एक तपका और था जो पिछले 25 वर्षों मे या तो जवान हुआ था या धनवान हुआ था। जिसे न तो मैं पहचानता था और न ही वह मुझे वह जानता था, इसीलिए उससे बहुत रूबरू नहीं हुआ जा पा रहा था। पर जिन्हें हम ठीक से जानते थे वो अब या तो किसी सार्वजनिक समारोहों में जाना छोड़ चुके थे या इस लोक से विदा हो गए हैं।

पर एक बात से खुशी जरूर हो रही थी कि अभी एक पीढ़ी है जहां संस्कार शेष हैं। क्यांेकि अपने परिचितों या नेताओं के साथ मेरा भी अभिवादन उसी गर्म जोशी से कर रहे थे। इससे लगा कि अभी इस इलाके में सम्भावनाएं शेष हैं। इसका यह कतई मतलब नहीं कि वह मुझे महत्व दे रहा था।

दूसरी ओर एक जमात और थी जिनसे किसी न किसी प्रकार हम रिस्तों से जुड़े थे लम्बे समय बाद किसी सार्वजनिक आयोजन में मेरी भागेदारी उन्हे आश्चर्य पर सुखद लग रही थी। जिनमें उस एम.एल.सी. पर तरस आ रहा था जिसे अकारण ही दुबारा मौका नहीं दिया गया था जिसे सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दिलाकर उक्त पद पर आसीन किया गया था। उसका दुःख देखने लायक था क्योंकि आज वह मुझे घेरकर हाल चाल जानना भी चाह रहा था और बता भी रहा था। पर जब भी मैं पहले जब वे उक्त पद पर थे मिला था तो या तो वह भागने की कोशिस की या छुपने की मुझे तभी लगने लगा था कि इनकी राजनीतिक उम्र लम्बी नहीं है। और यही उनकी आज की चिन्ता भी थी।

बताते चलें कि मैं भी नीर छीर के विलगाव की प्रवृत्ति से परे आज पूरे समारोह मे पूरे मनोयोग से शरीक था जनवासे में जाकर बारातियों, वर, समधी एवं अन्य अनेकों से मिला क्योंकि इस समारोह का प्रबन्धकत्व का दायित्व जिनके जिम्मे था उन्ही कि इच्छा थी कि मैं देर तक रूकूं।

मुख्यतः इस समारोह ने समाज में एक अलग पहचान देने में कामयाब तो रहा पर गांव की जो चीजें यहां नदारद थीं उनमें ग्रामीण लोकाचार, जन सामान्य जिन्हें उन्ही के बन्धुबान्धवों ने अलग कर रखा था, जिनकी इस पूरे समारोह में दोयम दर्जे की नागरिक्ता साफ दिखाई दे रही थी, इनमें खासकर उन नवनिहालों की जिनके वस्त्र या तो मलीन थे या शक्लें उतनी आकर्षक नहीं थीं, पर मुझे उसमें नजर आ रहे थे कई विधायक, कई भारतीय प्रशासनिक सेवा को सुशोभित करने वाले सजग अन्वेषी चेहरे, पर उन्हें वहां से भगाया जा रहा था। यही जब कल इन्हें भगाने वालों को नहीं पहचानेंगे तब फिर इन्हें ऐ गालियां दे रहे होंगे।

संयोग से ये तथाकथित समाजवादी दल / जनता दल के विचारधारा के तथाकथित प्रतिनिधियों की सोच का मामला है, जिससे सामाजिक न्याय की लड़ी गयी लम्बी लड़ाई के उपरान्त प्राप्त किए जाने का सपनों में देखा गया था, सामाजिक न्याय के पुरोधाओं के साथ ही उनका भी जो कल तक इसी भीड़ के हिस्से रहे हैं।

पर मैं यहां क्यों आमन्त्रित था क्या मंै भी उनके उसी समूह का जो अनैतिक आचरणों से प्राप्त अकूत सम्पत्तियों के मालिक बन बैठे हैं, का हिस्सा होता जा रहा हूं या किन्ही कारणों से शरीक किया जा रहा हूं मुझे नहीं पता कि पिता जी की सूची में इनके कभी नाम रहे हों, क्यांेकि मेरा वह चचेरा भाई भी वहां आमन्त्रित था जिसने हाई स्कूल की परीक्षा पास न करने के बाद जीप, ट्रक के व्यवसाय में आकर कई ट्रृक चलवा रखा है।

सामाजिक बदलाव या विकास का यही असली स्वरूप है यह इसबार के जौनपुर प्रवास पर मांगलिक प्रयोजन में आमंत्रण में शरीक होकर देखा यही संस्कृति सामाजिक बदलाव की मानदण्ड बन रही है क्योंकि अब ‘दहेज’ प्रथा के खिलाफ खड़े होने के बजाय इस प्रदर्शन के विविध प्रकार के दर्शनार्थियों से इस ‘दहेज’ प्रथा के खिलाफ आन्दोलन की बजाय और सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ते देख मैं भी सहमा हुआ था क्योंकि यह भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित और ‘आयकर अधिकारी’के रूप में प्रथम नियुक्ति प्राप्त वर का परिणय संस्कार समारोह था। जिसमें ‘फारच्यूनर’ का महंगा वाला माडल दहेज की सामग्री में शरीक था इसलिए उसे मण्डप के समीप प्रदर्शनार्थ रखा गया था।

इस नवजवान के भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित और ‘आयकर अधिकारी’ के नाते सम्पत्ति लोभ का उत्साह देख मेरा सारा आदर्श भीतर से तार तार हो रहा था जिसे छुपाए मैं मुख्य जेवनहार के भोजनालय के आरम्भ होने तक किस तरह ‘भाई’ को रोके रखने में संकोच कर रहा था यह मैं ही समझ रहा हॅूं, क्योंकि वह आमजन के जेवनहारालय में उदर भरण पहले ही कर चुका था, क्योंकि जब उधर बम्बईया सेठ के साथियों ने भोजनार्थ उन्हें वहां ले जा रहे थे तो वहंा का नजारा देख मैंने ही उन्हें कहा था कि आपका इंतजाम अन्दर है, यह बात मुझे इस समारोह के मुख्य निदेशक ने इंतजामात का निरीक्षण कराते वक्त ही अवगत करा दिया था।
आशा है ऐसे प्रसाशनिक अधिकारियों से कि उनके कार्यकाल में आय से अधिक सम्पत्ति का कोई झंझट न रहे।
(आगे भी जारी)

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