04/04/2017

भाग -17-
ध्यान से देखिये l
यह पूर्व मुख्यमंत्री माननीय अखिलेश यादव की पाँच साल की महान 'आरक्षण विरोधी' उपलब्धियां हैं l

भाग-18-
'आरक्षण' और 'सामाजिक न्याय' विरोधी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 2013 से 2017 तक आरक्षण समर्थकों पर लाठियाँ बरसाया l उसका एक क्रूरतम और हिंसक दृश्य देखिये l किस तरह अखिलेश सरकार ने त्रिस्तरीय आरक्षण समर्थकों को इलाहाबाद से लखनऊ तक लगातार 3 साल लाठी चार्ज करके पिटवाया l जो पिछड़े,दलित और मुसलमान अखिलेश की लाठियाँ खाये, उनकी पीड़ा आप एक बार जरूर सुनिये l

https://www.youtube.com/watch?v=pi4bNTNnc4U

भाग -19-
माननीय अखिलेश यादव ने 'यश भारती पुरस्कारों' (2012 से 2016 तक) के वितरण में भयानक 'सामाजिक अन्याय' किया l ..... आईये देखिये ....
नेता जी ने कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों, खेल, सिनेमा, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग आदि के लिए 'यश भारती' पुरस्कार 1994 में शुरू किया था l इस पुरस्कार प्राप्तकर्ता को सम्मानित होते समय 11 लाख रुपये दिए जाते हैं l उसके बाद आजीवन 50,000 रुपए पेंसन के रूप में मिलता है l 2012 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही एक तरफ से सवर्णों को पुरस्कार बांटना शुरू हुआ l l 2012 से लेकर 2016 तक इन्होंने जो यश भारती पुरस्कार बाँटे हैं l उसका आधार इन्होंने बनाया 60 से 65% तक ब्राह्मणों, 20 से 25% क्षत्रियों, भूमिहारों, कायस्तों और अन्य सवर्ण जातियों को दिया जाय l इसके बाद यदि कुछ पुरस्कार बँचता है तो OBC के लोगों को दिया जाय l अर्थात् 10% पुरस्कार में 60% OBC जनसंख्या को सिमटा दिया जाय l और बची हुयी 25% SC, ST को एक भी पुरकार न दिया जाय l इन्होंने ऐसा ही किया l आपने पांच साल के कार्यकाल में एक भी SC, ST को 'यश भारती' नहीं दिया l अखिलेश यादव जैसा सामजिक अन्याय तो कोई सवर्ण मुख्यमंत्री भी नहीं करेगा जितने खतरनाख तरीके इन्होंने से ऐसा कार्य किया l 2016 की यश भारती पुरस्कार प्राप्त कर्ताओं की लिस्ट निचे अटैच है l देखिये l 2016 में अखिलेश यादव ने 41 ब्राह्मणों को यश भरती पुरस्कार दिए l और कुछ पुरस्कार अन्य सवर्णों को l बाकि रत्ति भर पुरस्कार OBC को दिए जाय l SC,ST को एक भी पुरस्कार नहीं दिया गया l यह अखिलेश यादव का सवर्णपरस्त मन है l आप सोचिये कि मूल चेतना 85% प्रतिभावान मनुष्यों में से एक भी इन्हें प्रतिभावान व्यक्ति नहीं मिला l निम्नलिखित लोगों को भी अखिलेश यादव पुरस्कार दे सकते थे -- 
1 - फूलन देवी (अति सम्मान में मरणोंपरान्त )
2 - प्रोफेसर लाल रत्नाकर 
3 - डॉ. ओम शंकर 
4 - सबाना आज़मी 
5 - वीरेंद्र यादव
6 - प्रोफेसर दिनेश कुशवाह 
7 - प्रोफेसर सुभाष कुशवाह 
8 - प्रोफेसर चौथीराम यादव 
9 - उर्मिलेश उर्मिल 
10 - आलम बादी
11 - असि. प्रोफेसर अजय गोंड़
12 - फ्रैंक हुज़ूर
13 - ओमप्रकाश वाल्मीकि 
14 - माखान सिंह 
15 - जय प्रकाश कर्दम
16 - तुलसी राम 
17 - प्रोफेसर उमाकांत यादव 
18 - श्यौराज सिंह बेचैन 
19 - शांति यादव 
10 - डॉ अजय प्रजापति 
21 - डॉ सुरेश सिंह
22 - राम शंकर यादव विद्रोही 
23 - संतोष वाल्मीकि
24 - सोबरन कबीर 
25 - शयीदुर्र रहमान
26 - अकील अहमद 
27 - कृष्ण मोहन 
28 - नरसिंह यादव 
28 - प्यारे लाल यादव
30 - एच. एल. दूशाद 
31 - खेशारी लाल यादव 
32 - शमीम अंसदि 
33 - डॉ. जगदीश यादव 
34 - चंद्रभूषण सिंह यादव
35 - प्रोफेसर कालीचरण स्नेह 
36 - कँवल भारती 
37 - डॉ. विवेक कुमार 
38 - चंद्रभान प्रसाद 
39 - उमेश यादव 
40 - कुलदीप यादव 
आदि l आप सब और नाम जोड़ सकते हैं l
फोटो-- Fark India patrika se sabhar
भाग -20-
अखिलेश यादव के पांच सालों के सामाजिक अन्याय की दास्तान......

अखिलेश जी कहते हैं कि 'मेरे काम को याद किया जाएगा...'
मैं भी कहता हूं ...जी हां अखिलेश जी आपके काम को जरूर याद किया जाएगा...लेकिन कैसे ......?

ये जरूर याद किया जाएगा कि आपने अपने कार्यकाल में चार वाइस चांसलर बनाए ..जिसमें से दो ब्राह्मण, एक ठाकुर औऱ एक ओबीसी बनाया.... एक भी पद SC, ST को नहीं दिया L
ये जरूर याद किया जाएगा कि आपने दलितों, पिछड़ों का हिस्सा काटकर सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी मेे 84 में से 83 ब्राह्मणों को नियुक्ति दी...SC,ST को एक भी पद नहीं दिया |
ये भी याद किया जाएगा कि आपने ही ...ब्राह्मणों को खुश करने के लिए पिछड़ों - दलितों को मिलने वाले त्रिस्तरीय आरक्षण को खत्म करके एक तरह से इन समुदायों का संहार कर दिया
ये भी याद किया जाएगा कि आपने गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी में 95 फीसदी ब्राह्मणों को नियुक्ति दी..
ये भी याद किया जाएगा कि आपने ही सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में 53 में से 49 पद सवर्णों के लिए निकाले...
ये भी याद किया जाएगा कि आपने 74 यश भारती पुरस्कार बांटे . जिसमें से 45 यश भारती पुरस्कार ब्राह्णणों को बांट दिए. बचा खुचा गैर ब्राह्णण सवर्णों को दे दिया...औऱ रत्ती भर पुरस्कार ओबीसी को दिए..और एक भी पुरस्कार किसी SC, ST को नहीं दिया .
ये भी याद किया जाएगा कि आपने लखनऊ में पत्रकारों को 80 आवास बांटे जिनमें से 58 आवास ब्राह्मण जाति के पत्रकारों को बांट दिए और आलोक रंजन की कृपा के चलते 9 आवास लालाओं को बांट दिए और 8 आवास अपनी ससुराल पक्ष की जात वालों को बांट दिए. वाकी 2 आवास यादव जात को, 3 आवास मुसलमानों को दिए..
ये भी याद किया जाएगा कि आपने वोट तो यादव समेत पिछड़ो , दलितों औऱ मुसलमानों से लिए पर पार्क जनेश्वर मिश्रा के नाम पर बनाया...
ये भी याद किया जाएगा कि आपने ही यूपी के 30 जिलों में लेखपाल की परीक्षा में पिछड़ी जीति को रिजर्वेशन तक नही दिया..
ये भी याद रखा जाएगा कि आपने ही मुसलमानों को धोखा दिया और उनको रिजर्वैशन नही दिया...
ये भी याद किया जाएगा कि आपकी पार्टी ने ही दलितों को मिलने वाले प्रमोशन में आरक्षण का विल संसद में फड़वा दिया
ये भी याद रखा जाएगा कि आपकी पार्टी ने ही यूपी में 75 जिलों में से तकरीवन 60 जिलों में सवर्ण डीएम और एसपी को रखा ...जिन्होने दलितों पिछड़ो पर जमकर अत्याचार किए...
ये भी याद रखा जाएगा कि आपने अपनी छवि चमकाने के लिए सिर्फ यादव औऱ मुसलमानों का ही उपयोग किया...आपने अपने ही विधायक रामपाल यादव को पिटवाया, आपने ही रामवृक्ष यादव मथुरा की पुलिस से हत्या करवा दी. इसके बाद आपने ब्राह्णणों को खुश करने के लिए अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी आदि मुस्लिम नेताओं को बदनाम करके सपा से दूर कर दिया....
अखिलेश जी आपकी ब्राह्णण परस्त नीतियों को यूपी की दलित , पिछड़ी और मुसलमान जनता 2019 और 2022 में भी याद रखेगी .....
मुझे पूरी उम्मीद है कि यूपी की जनता आपको 2022 में 22 सीटों तक ही सिमटा देगी ..तभी आपकी समाजिक अन्याय की अकल ठिकाने आएगी...

12/03/2017

2017 के चुनाव परिणामों के मायने ?

2017 के चुनाव परिणामों के मायने ?
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सपा बसपा के उत्तर प्रदेश की राजनीती में बने रहने के पुराने ख़यालात को तोड़ने का श्रेय और गैर राजनितिक कार्य करने का दायित्व सपा और बसपा के नेताओं को देना वाजिब होगा। 
यहीं पर यह उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण होगा की केंद्र में आयी सरकार की नियति और नीति साफ़ तौर पर संविधान प्रदत्त दलितों और पिछड़ों के हकों को समाप्त कर मध्यकालीन व्यवस्था को लागू करने की है जिसके लिए वह  अपनी तैयारी में लगा हुआ है जिसका राजनितिक विरोध न कर पाना ही मूलतः इन वर्गों की कमजोरी है। 
राष्ट्रीय जनगणना 2011 के लिए किये गए जातिवार जनगणना की रिपोर्ट न प्रकाशित करना और मंडल कमीशन के प्रावधानों को लागू करने के बजाय उन्हें तोड़-मरोड़कर समाप्त कर देना जिसका सारा दायित्व जनता पर नहीं उस वर्ग की राजनीती कर रहे नेताओं की है।  
जारी-----------


चुनाव परिणाम के पूर्व भोर में लिखा गया मेरा आलेख !
मित्रों आज का चुनाव परिणाम क्या आएगा ? 
इस पर ना जाते हुए हम आपका ध्यान कुछ ऐसे लोगों की तरफ ले जा रहे हैं जो आपके मध्य रह कर आपका अहित करते रहते हैं ! आप उन्हें पहचानने की कोशिश नहीं करते हैं और यदि आपको वह दिखाई भी दे जाते हैं तो आप के नेताओं की उन पर नजर ही नहीं जाती ? वे उन्हें नजर क्यों नहीं आते ?
मेरा आलेख ऐसे अवसर पर उन्ही को समर्पित है।
- डॉ.लाल रत्नाकर

मित्रों अमर सिंह आजकल किस दल में हैं यह बहुत सारे लोग जानते हैं ? लेकिन जिन लोगों को अमर सिंह का चरित्र केवल एक दलाल का ही पता था अब वे जान गये होंगे कि वह कितने बड़े जातिवादी हैं और सामाजिक न्याय के घोर विरोधी ? क्या उन्हें यह पता है कि उन के कल के बेवजह के बयान को भी जानना चाहिए कि समाजवादी पार्टी में इतनी गालियां खा कर के इतना अपमान सह करके वह आदमी क्यों बना हुआ है।
और समाजवादी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा क्यों दी है इन सबका उत्तर में आपको आगे दे रहा हूं।
मूलत: अमर सिंह जिस तरह का चरित्र लगता है और वह कितना बहुरूपिया है उस का सबसे बड़ा प्रमाण कल उसके बयान से निकल कर के आया कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी नदी के दो किनारे हैं और वह आपस में कभी मिल नहीं सकते।
इसकी व्याख्या कर उसने केवल अपने जातिवादी सोच का घटियापन उजागर कर रहा है उसे यह नहीं पता कि प्रकृति के बहुत सारे आयाम मानव को जीने की कला सिखाते हैं और उन्हीं का अनुकरण कर मनुष्य जीवन जीता है माननीय अमर सिंह मान न मान मैं तेरा मेहमान की अवस्था में हर जगह अपना उपदेश करने लगता है जबकि नदी का निर्माण बिना दो पाटों के हो ही नहीं सकता?
इसलिए वह दोनों पाट या उसके किनारे एक तरह से आपस में मिले हुए होते हैं और साथ साथ चलते हैं और उन्हीं के मध्य नदियां कल कल कल करके बहती हैं वे बहती रहे इसलिए दोनों किनारों का होना बहुत जरूरी होता है जिस दिन वह किनारे कमजोर पडते हैं उस दिन नदी का तांडव पूरी कायनात को अपने आगोश में लेकर उस परिवेश को जल में समाहित कर लेता है । इसलिए अमर सिंह को यह पता है कि जिस दिन यह किनारे अपनी जगह छोड़कर एक साथ आ जाएंगे उस दिन अमर सिंह जैसे लोग जल मग्न हो जायेंगे ।
कौन कहे अमर सिंह की अमर सिंह जी अब तो जाने दीजिए क्योंकि जाति का स्वभाव इस देश में बना ही रहता है बहुत कम ऐसे लोग हुए हैं जो अपने जातिय स्वभाव से मुक्त हो पाए हैं ।
कम से कम यह आवाज जिस रूप में भी अखिलेश यादव की ओर से निकल कर आई है वह यह संदेश तो देती है कि अगर उनकी रक्षा और आप जैसे जातीवादियों से सुरक्षा नहीं हो सकती है तो वह बसपाइयों के साथ ही संभव है और मैंने बहुत पहले यह बात लिखी है कि तब तक सामाजिक बदलाव नहीं होगा जब तक सामाजिक रुप से दबे कुचले लोग और सदियों से अन्याय सहते आए हुए लोग एकजुट नहीं होंगे।
मुझे लगता है कि अखिलेश यादव को यह भान तो हो गया है लेकिन बहन जी को भी इस पर विचार करना होगा और बहुत ही खुले मन से उनके साथ खड़ा होना होगा और यदि ऐसा नहीं होता तो आने वाली सदियां इन दोनों लोगों को सामाजिक न्याय के असली दुश्मन के रूप में पहचानेंगी ।
यही कारण है कि अमर सिंह जैसे लोग समाजवादी पार्टी में और सतीश मिश्रा जैसे लोग बहुजन समाज पार्टी में अपनी जगह पक्की रखना चाहते हैं । क्योंकि वह यह जानते हैं कि जिस दिन इनका नियंत्रण इन दलों से हट जाएगा उस दिन यह लड़ते भिडते कहीं एक हो गए तो फिर उनका क्या हस्र होगा ?
हमें अखिलेश जी के इस बयान पर बौद्धिक स्तर पर सोचने की जरूरत है और देश के तमाम बुद्धिजीवियों से मेरा आग्रह है कि इस देश को बचाना है तो इन दोनों को एक साथ लाने के लिए और समता और समानता की राह पर चलने के लिए आंदोलन करना चाहिए और जन जन में इस भाव को बढ़ाना चाहिए कि बगैर इन दोनों की वैचारिकी के एक साथ आए ? किसी भी तरह से सामाजिक सरोकारों का सही-सही क्रियान्वन नहीं हो सकता ?
क्योंकि बाबा साहब अंबेडकर के बनाए हुए तमाम संवैधानिक अधिकारों को आज तक इन समाजों के लिए सही ढंग से उपयोग ही नहीं किया जा सका है, जिस के बहुत बड़े कारण वही लोग हैं जो आज तक सत्ता में विराजमान है।
बहुत सारी योजनाएं हैं जिनपर हमारे बुद्धिजीवी आपस में बहस तो करते रहते हैं और उनके अच्छे हल भी उनके पास हैं । लेकिन यह हमारे कूढमगज कथित राजनेता ब्राह्मणों और दूसरी दोगली और बेईमान कौमों से नियंत्रित होते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि समय आने पर वह उन्हें धोखा देता है और यह धोखा खाकर के आहत होते हैं लेकिन सुधरते नहीं हैं ।
अरे भाई जिन लोगों ने तुम्हें इस लायक बनाया है कि तुम उनका नेतृत्व करो तो कम से कम उनके बुद्धिजीवियों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, कलाकारों, साहित्यकारों,संगीतकारों, समाजसेवियों को तलाश करो, तैयार करो यही दायित्व दिया है समाज ने तुम्हें ।
उनकी व्याख्या पर मत जाओ वह तो तुम्हें गर्त में ले जाएंगे, अगर तुम्हारे लोग आगे आएंगे तो उनकी मदद के लिए उन लोगों को भी उनके साथ आना पड़ेगा जो आज तक उनका विरोध करते आए हैं उनकी प्रतिभा का, उनके हुनर का, उनकी मेहनत का, ऐसा नहीं है कि पिछड़ों दलितों में काबिल नहीं है, बुद्धिजीवी नहीं हैं, इनको रोका गया है उन्ही लोगों द्वारा जो तुम्हारे इर्द-गिर्द दिखते हैं, तुम्हारी दलाली करते हैं, गुमराह करते हैं और यह कोई आज की नहीं सदियों की सच्चाई है ।
जब जब किसी भी महापुरुष ने इस बात को समझा कि वह कौन लोग हैं जो समाज को ऐसी हालत में करने के लिए जिम्मेदार हैं उन्होंने उनका बहिष्कार ही नहीं किया बल्कि चिन्हित करके समाज को उनके खिलाफ खड़ा होने का आवाहन किया ।
कहते हैं कि अंग्रेजों ने भी इस बात को पहचाना था की इन ब्राह्मणों को किसी भी तरह की न्याय व्यवस्था से दूर रखो क्योंकि उनका चरित्र न्यायप्रिय नहीं होता ? वह हमेशा अपने प्रति बेईमान होते हैं अपने और अपनों के लिए बेईमानी करते हैं? अन्यथा इस विविध जातियों के देश में सदियों से मुट्ठी भर लोग 80,90 प्रसिद्ध जगहों पर कैसे काबिज हो जाते हैं क्या केवल उनके यहां बुद्धिमान ही पैदा होते हैं नहीं उनकी बुद्धिमानी यही होती है कि उनके लोग बेईमान होते हैं और दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं होते, अपने कमजोर से कमजोर आदमी को देश की अच्छी से अच्छी जगह पर बैठा देते हैं ।
और आज सोने की चिड़िया कहा जाने वाला देश उन्हीं चन्द लोगों के हाथ में गिरवी पड़ा हुआ है। जिन्होंने इसे सदियों से लूटा है बेचा है और अपने लिए इस्तेमाल किया है। यहां के असंख्य लोगों को सत्ता और व्यवस्था से सदा दूर रखा है बाबा साहब के दिए गए अधिकारों को उन तक पहुंचने ही नहीं दिया है।
मैं हमेशा इस बात को कहता रहा हूं कि जब तक सामाजिक रुप से कमजोर लोग एक साथ खड़े नहीं होंगे तब तक हम लड़ाई जीत ही नहीं सकते और रोज हारते रहेंगे जीत कर भी।
मेरे साथियों समझो उनकी साजिश को समझो और आगे आओ खड़े हो जाओ यह मत देखो कि वह क्या कह रहे हैं । उनकी मत सुनो वह तो भेदभाव कर तुम्हें तोड़ रहे हैं कमजोर कर रहे हैं और तो और तुम्हारे बीच आपस में दूरियां पैदा कर रहे हैं इन्होंने सदियों से ही किया है।
यदि तुम्हें यह लगता है कि यह आवाज तुम्हें कौन दे रहा है तो तुम इस तरह से समझो कि-
मैं बुद्ध हूं 
मैं बाबा साहब अंबेडकर हूं 
मैं माननीय कांसी राम हूं 
मैं महात्मा फुले हूं 
मैं पेरियार हूं 
मैं ललई सिंह हूं 
मैं रामस्वरूप वर्मा हूं 
मैं मैं हूं 
जागो उठो खड़े हो जाओ 
मैं पिछड़ा हूं 
मैं दलित हूं 
और मैं मुसलमान भी हूं 
मैं अफसर हूं 
मैं शासक हूं 
मैं मुख्यमंत्री हूं 
मैं प्रधानमंत्री हूं 
मैं संविधान हूं
मैं दाता हूं 
मैं वकील हूं 
मैं डॉक्टर हूं 
मैं ज्योतिषी हूं 
मैं बुद्धिजीवी हूं 
मैं वैज्ञानिक हूं 
मैं इंजीनियर हूं 
मैं कवि हूं 
मैं कथाकार हूं 
मैं कहानीकार हूं 
मैं संगीतकार हूं 
मैं मजदूर हूं 
मैं कलाकार हूं 
मैं किसान हूं 
मैं स्वाभिमान हूं 
मैं सम्मान हूं 
तुम्हारे अपमान के खिलाफ हूं

मैं तुंहें पहचानता हूं और उन्हें भी पहचानता हूं जो तुम्हे धोखा दे रहे हैं जो तुम्हारे खिलाफ हैं ज़ो तुम्हारे साथ होने का नाटक कर रहे हैं और तुम्हें लूट रहे हैं उठो जागो एक साथ खड़े हो जाओ तुम्हारे अंदर बहुत क्षमता है तुम देश संभालो नहीं तो यह देश फिर से गुलाम हो जाएगा और इस को गुलाम बनाने वाला राहुल सांकृत्यायन द्वारा बताया गया वही बेईमान आदमी होगा जो तुम्हारा दुश्मन है।

05/03/2017

गांधी और बाबा साहब के सपनों का भारत

देश के प्रधानमंत्री का बनारस में रोड शो ? 
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ऐसा क्यों कर रहे हैं प्रधानमंत्री जी क्या अब उनके "मन की बात" का असर ख़त्म हो गया है, देश का प्रधानमंत्री बनारस जैसे शहर में रोड शो कर रहा हो तो उससे यही लगता है कि प्रधानमंत्री जी को अपने पर भरोसा नहीं रहा, अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं रहा, मुझे याद है कि प्रदेशों के चुनाव में प्रधानमंत्री आते भी नहीं थे और बहुत आए तो उस राजधानी में आकर के कोई सभा कर दी और वह मैसेज प्रदेश के कोने-कोने में पहुंच गया ।

लेकिन मा. मोदी जी क्या सन्देश पहुंचाना चाहते हैं यह तो उनके मन की बात से भी साफ नहीं होता और न ही उनकी जनसभाओं से ही। पर जिस तरह के तंज वह प्रदेशवासियों पर कस रहे हैं, चाहे उनका हमला प्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश के आम व्यक्तियों पर हो या उनके प्रचारकीय कसीदे जिसे वे समय समय पर कस रहे हैं यह प्रधानमंत्री का धर्म नहीं है। क्योंकि देश का प्रधानमंत्री मात्र किसी दल विशेष का प्रधानमंत्री नहीं है ? उसकी जिस दल से जीत हुई है वह काम प्रधानमंत्री बनते ही खत्म हो गया है और प्रधानमंत्री जी देश के सभी नागरिकों के प्रधानमंत्री हो गए हैं, लेकिन उन्हें लगता है केवल वह कुछ लोगों के प्रधानमंत्री हैं ? जिसमें खास करके उनके मतदाता वर्ग हैं । 

आजकल प्रधानमंत्री जी जिस तरह से एक खास जाति विशेष की तरफ इशारा करते हैं और माननीय प्रधानमंत्री जी का इशारा उस जाति विशेष की इज्जत के लिए प्रश्न चिन्ह बन जाता है ? क्या उस जाति का यह हक बनता है कि वह इन्हें प्रधानमंत्री ना माने ? जब प्रधानमंत्री जी भेदभावपूर्ण नजरिया किसी जाति विशेष के प्रति या धर्म विशेष के प्रति या वर्ग विशेष के प्रति रखकर के काम करते हैं और अपने भाषणों में उसका उल्लेख करते हुए कोई मौन सन्देश देते हैं तो ऐसे प्रधानमंत्री जी हिन्दू धर्म के मंदिरों में किस बात की प्रार्थना कर रहे हैं इस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है ? यह बनारस का सांस्कृतिक माहौल दूषित तो नहीं करना चाहते हैं ?

प्रधानमंत्री जी बनारस का सांस्कृतिक दर्शन कर देश की अवाम को सुख चैन की याचना कर रहे हैं या उन मंदिरों से अपनी और अपनी पार्टी की इज्जत के लिए भीख मांग रहे हैं ? क्योंकि यह वक़्त तो जनता से याचना करने का है क्योंकि इस समय उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव का समय है ? शायद चुनाव आयोग के नियमों की भी अनदेखी प्रधानमंत्री जी द्वारा की जा रही है क्योंकि चुनाव आयोग के स्पष्ट आदेश हैं की राजनैतिक कार्यक्रमों में किसी खास धर्म , जाती और धार्मिक दिखावा आचार संहिता का उल्लंघन मना जाएगा ? उनका यह स्वरूप किसी धार्मिक नेता का चरित्र उजागर करता है ? इनकी देखादेखी उ. प्र. के मुख्यमंत्री जी भी बनारस में जाकर के जिस तरह से मंदिरों में माथा टेक रहे हैं उससे उनकी भी नियति का पता चलता है ? 

यहां पर यह कहना महत्वपूर्ण है कि मायावती ने ऐसा नहीं किया है क्योंकि उन्हें आचार संहिता का शायद ध्यान है और उन्हें यह भी पता है की मंदिरों में उनके जाने से कोई नया वितंडा भी खड़ा किया जा सकता है (यथा मंदिरों की पवित्रता आदि) जो अपने आप में गैर धार्मिक हो जाना नहीं होता । चुनाव के समय राजनेता का मुख्य धर्म होता है कि वह अपने कैंडिडेट के लिए जनता के दरबार में माथा टेके और जनसभाएं करके उसका प्रचार करें और जब उसे धर्म और दर्शन हेतु बनारस आना हो तो मंदिरों में जाकर माथा टेके लेकिन मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को क्या हो गया है ? इससे जनता को तो वह कोई संदेश दे नहीं रहे हैं ? क्या अपने अपने कैंडिडेट की जीत के लिए जनता के विश्वास की वजाय मंदिरों में माथा टेक रहे हैं ? 

इससे किस भारत का निर्माण करना चाहते हैं डिजिटल इंडिया का ? या पाखंड इंडिया का ? पाखंड से तात्पर्य है कि अवैज्ञानिक अवधारणा से सांस्कृतिक साम्राज्यवाद स्थापित करना और जब तक देश इस तरह के धर्म और पाखंड से नहीं निकलेगा तो विज्ञान है और नई टेक्नोलॉजी का क्या होगा ? मुझे लगता है कि धर्म और पाखंड विज्ञान को रोकता है, भेदभाव बढ़ाता है, जातिवाद बढ़ाता है, धर्मांधता बढ़ाता है और विज्ञान व्यक्ति को विकास की ओर ले जाता है।

मैं बनारस में अपनी पढ़ाई के समय इस बात को शिद्दत से महसूस किया हूं कि जिस तरह का हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस में माननीय महामना ने बनाया था उसका असर चौगुना होता यदि वह इस कथित आध्यात्मिक पाखंडी महानगर के धार्मिक और पाखंडी वातावरण की नगरी में ना होता। मैंने उस समय यह महशुस किया और देखा था कि ज्ञान के साथ-साथ जिस तरह का धर्म का मुलम्मा बनारस के मंदिरों से व्यक्ति को बांध देता है, उससे वह जीवन भर निकल नहीं पाता ! कोल्हू के बैल की तरह वहीँ इर्द गिर्द घूमता रहता है ?

दर्शन,साहित्य, संगीत, विज्ञान, समाजशास्त्रीय विद्याओं, तकनिकी, औषधीय  एवं ललित कलाओं का केंद्र कहा जाने वाला विश्वविद्यालय जहां दुनिया भर में अपने यहां से पढ़े लिखे लोगों को प्रसारित किया है या फैलाया हुआ है वही पर वह घोर जातिवाद संकट से निकल नहीं पाया है। जिसकी स्टाफ में देश की अन्य तमाम जातियों का धर्मों का और वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया है और इसका मुख्य कारण है बनारस का पाखंडी और विश्वविद्यालय में जातिवादियों का काबिज होना । कहते हैं यह आस्था और आध्यात्म की नगरी है और आस्था और आध्यात्म मानव के विकास के लिए है पर पाखंड का स्वरूप क्या है ? जो सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने के लिए ही तो है। 

जब पूरी दुनिया घूम घूम कर के देश के प्रधानमंत्री बनारस आये हुए है तो बनारस को दुनिया के मुकाबले कहां खड़ा देख पा रहे हैं, यह तो वह खुद जाने लेकिन जो हम देख पा रहे हैं कि माननीय प्रधानमंत्री जी जिस तरह का पाखंड बनारस पहुंच करके कर रहे हैं वह किसी देश के प्रधानमंत्री के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। जितना समय उन्होंने मंदिरों को दिया है उतना समय देश की किसी समस्या के लिए लोकतंत्र के मंदिर जिसे भारत की संसद कहा जाता है  को शायद ही दिया हो?

देश का प्रधानमंत्री जितना धन, जितना समय अपने खुद के प्रचार प्रसार के लिए व्यय कर रहा है, इतना तो कारपोरेट कंपनियां नहीं करती और शायद यही कारण है कि देश के बहुत सारे विभाग अपने जरूरी काम भी नहीं कर पा रहे हैं, सातवें वेतन आयोग में जिस तरह से वर्तमान सरकार ने कटौती कर के देशवासियों को चुप करा दिया है और नोट बंदी कर के बहुत सारे अनिवार्य कार्य भी रोक दिए हैं, देश के विभिन्न कार्यक्रमों जनोपयोगी योजनाओं को बंद कर दिया गया है, जिससे देश का आर्थिक और सांस्कृतिक विकास होता था । 

आज बहुत सारे संस्थानों को ऐसे कार्यकर्ताओं से सुशोभित कर दिया गया है जिनका उद्देश्य मात्र धर्म प्रचार और पाखंड के सिवाय अवैज्ञानिक ही है चाहे वह विश्वविद्यालय के कुलपतियों का मामला हो या शिक्षा में भगवाकरण का सवाल हो देश के सारे विश्वविद्यालय इसी तरह के भगवाकरण के कारण पठन पाठन की बजाए पाखंड की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसमें पाखंडी बाल-बच्चे अवैज्ञानिक करतूतों से देश को शर्मसार कर रहे हैं । देश संविधान से चलता है और संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले लोग देश चलाने का दंभ भर रहे हैं यही कारण है कि अब वक्त आ गया है कि जनता उठे और इन दंभियों को सबक सिखाएं।

जिसके लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा क्योंकि बिहार के चुनाव में वहां की अवाम ने प्रधानमंत्री को यह बता दिया था कि गपबाजी से प्रदेश नहीं चला करता और नहीं पाखंड से किसी जाति का विनाश हो सकता है।  हां किसी खास जाति विशेष के लिए भारत में पाखंड अनिवार्य हिस्सा है। क्योंकि उसने इस पाखंड से इस देश को अपने कब्जे में कर रखा है, और आज भाजपा उसी वर्ग विशेष को पाखंड करके जिंदा रखना चाहती है। कमोबेश अन्य पार्टियां भी उनके चंगुल से मुक्त नहीं हो पा रही हैं लेकिन जहां संभावनाएं दिखती हो वहां वोट करके जनता को पाखंड पुरोहितों को सबक सिखाना चाहिए ? 

अब सवाल यह है कि उस सत्ता का नेतृत्व किसके हाथ में जा रहा है उसी से यह तय होगा कि गांधी और बाबा साहब  के सपनों का भारत बन रहा है कि नहीं।

डॉ.लाल रत्नाकर 

10/02/2017

अंबिका चौधरी जी के बहाने: बसपा में जाने के मायने ?

फर्क इंडिया 'फरवरी 2017'
मासिक पत्रिका लखनऊ 


31/01/2017

कुछ तो कहना पड़ेगा ?

कुछ तो कहना पड़ेगा ?
और हमें खड़ा होना पडेगा ?

डा.लाल रत्नाकर
हर बात के कहने का अपना अर्थ होता है और जो मैं कहने जा रहा हूं वह आपको शायद उतना उपयुक्त ना लगे जितना की उसकी प्रासांगिकता और वास्तविकता है।  उत्तर प्रदेश में चुनाव आसन्न हैं उसी के मध्य यह प्रदेश अपने नए शासक की राह देख रहा है ? जनता के मन में क्या है वह उनके नेताओं को नज़र नहीं आ रहा है इसलिए कि आजकल वह देखना इतना आसान नहीं है क्योंकि इन राजनेताओं के चमचे और उनके चापलूस सलाहकार अपने को जनता की उस इक्षा के मध्य अभेद्य दिवार की तरह खड़े हैं ? उनके खरीदे हुए इन्तजामकार बेहद वाहियात किस्म के लोग है जो कई तरह से बिकते हैं उनकी कीमत देकर उन्हें आज की राजनीति में केवल और केवल सत्ता की वापसी चाहिए होती है ।

जिस तरह से भाजपा, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों का आम आदमी के सुकून की बात करते-करते सत्ता में विराजमान हो गयी और कोई सत्ता से हजारों कोस दूर हो गया लेकिन जिन दलित और पिछड़े विचारों की उनकी पार्टियों को अपनी पहचान और अपनी आइडियोलॉजी ले करके बड़ा होना था वह आज उन्हीं दगे हुए कारतूसों के इशारे पर और उनके घटिया समीकरण पर विश्वास करके जिस राजनीतिक विरासत को हासिल करना चाहते हैं । मुझको लगता है कि वह बेमानी है उसका बहुजन राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, कोई सरोकार नहीं है। क्योंकि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सारे सामाजिक न्याय के संदर्भों को बहुत ही दूसरे तरीके से देख रही है यही कारण है कि राजनीतिक लोगों की जगह पारिवारिक होनहार या निकम्मे पुत्र पुत्रियां जैसे सामंती व्यवस्था में अपने राजपाठ को हासिल करते थे वैसे ही लोकतंत्र के इस दौर में अपनी जगह बनाए रखना चाहते हैं उनके सलाहकार उनके खरीदे हुए इंतजाम कार और लंपट कार्यकर्ता पूरे नेतृत्व को ही भोथरा करके रख दिए हैं । ऐसे समय में हमारी राजनीति का जो पहलू हमारे सम्मुख आता है उसकी अपनी अलग कहानी है । जो निहायत अदूरदर्शी भी है। 

अब राजनितिक पार्टियों में दो नंबर का कोई नेता नहीं होता जिसकी वजह से सब अपनी-अपनी लूट जारी रखते हैं और कोई चारित्रिक राजनैतिक उत्थान कि वहां जगह नहीं है इसलिए वह चारों तरफ भागते रहते हैं शाम तक जो संघी था सुबह समाजवादी हो गया, जो समाजवादी था वह संघी हो गया है।
अब यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई पार्टी की नीतियों के प्रति ईमानदार, वफादार और सैद्धांतिक रूप से जुड़ाव रखता है की नहीं ? बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि नेता के प्रति वह वफादार हो न हो दौलतमंद और धोखेबाज जरूर हो ? कौन है यह कैसी राजनीति है जिसमें एक को धोखा दिया दूसरे को प्रिय हो गया ? उसको धोखा दिया तीसरे को प्रिय हो गया ?  क्या राजनीति का यही चरित्र है और अगर यही चरित्र है तो फिर राजनीति में रहना, राजनीति सोचना, राजनीति करना अधर्म है और ऐसा अधर्म जो धर्म के नाम पर लोगों का शोषण करता हो अपना भरण पोषण करता हो, उससे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं ?
आइए हम ऐसी राजनीति की बात करें जिसमें यह सब ना हो और लोकतंत्र की महत्ता हो विचारधारा हो नैतिकता हो चरित्र हो और जनता की सेवा करने की भावना हो जनता खुशहाल होगी तो हम खुशहाल होंगे । आज भी देश बहुत ही समृद्ध है संसाधन युक्त है, केवल और केवल कमी है नैतिकता और चरित्र की ?
(अखिलेश और राहुल का प्लान सपा और कांग्रेस के गठबंधन के खिलाफ मा.मुलायम सिंह यादव )
आखिर यह कैसी राजनीति है जिस वंशवाद के खिलाफ जनता ने उन्हें नेता बनाया उन्होंने अपना वंश आगे बढ़ाया और उसी जनता से उम्मीद करते हैं कि उनके इन कारनामों को भूल जाए ? इतिहास दोहराया जा रहा है क्योंकि जिस बाप ने बेटे को सल्तनत दी जिसने बेटे को सिंहासन दिया और बेटे ने उसे बनवासी बना दिया ? जिस कांग्रेस को हटाने के लिए दलितों ने उसका हाथ काट कर उसको पकड़ा दिया था, पिछड़ों ने देश और प्रदेश की सत्ता की ओर कूच ही किया था कि उसी वंशवाद ने वंशवादी व्यवस्था का दामन थाम लिया लोगों को लगता है कि इनके साथ होने से जनता इन्हें सत्ता सौंप देगी ? मुसलमान इन के कुकर्मों को भूल जाएगा, दलित और पिछड़े इनको सर पर बैठा लेंगे ? और भागड़ा करेंगे ? क्या सचमुच इस तरह का भूलभुलैया का खेल होने जा रहा है, एक तरफ दो मुही सत्ता सदियों के आंदोलन से निकले हुए संविधान सम्मत सुविधाओं को अवसरों को बंद करने पर आमादा है और दूसरी तरफ दलितों और पिछड़ों का नेतृत्व उन्हीं लोगों के कंधे पर सवार होकर किस ओर इसे ले जा रहा है । इन्होंने उस जनता को जिसने मुट्ठीभर लोगों को समसान की ओर धकेल दिया था उन्हें ये वापस सत्ता में लाने पर आमादा है ।

कौन नहीं जानता उनका इतिहास क्या है मुट्ठी भर लोग करोड़ों लोगों की किस्मत लिख रहे हैं और करोड़ों लोग अपने नेताओं के दोमुंहेपन पर नजर नहीं डाल पा रहे हैं । जिस वक्त उन्होंने अपने पुत्र को अनेकों राजनीतिज्ञों को जो इनके वारिस हो सकते थे जिन्हें उन्होंने तिरस्कृत कर वंशवाद के चलते उत्तर प्रदेश की राज्य सत्ता उन्हें दी उस समय ही समाजवाद का लोप हो चुका था और साम्राज्यवाद का आरंभ अब कौन सी ऐसी घड़ी है जिसमें पुनः समाजवाद जन्म लेगा और जनता की उम्मीदें पूरी होगी । आज का विचारणीय मामला है ?

यह कैसा दौर है जब दुश्मनों से हाथ मिला रहे हैं और उनके पिताजी चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं यह अविश्वसनीय हैं पर उनकी सुनने को ही उनका पुत्र भी और कोई तैयार नहीं है ? क्या सचमुच नेताजी इस गठबंधन के खिलाफ मैदान में आएंगे और आते हैं तो उन्हें हराने के साथ किसी को जिताने की बात करनी चाहिए और वह कौन दल हो सकता है ?

जिसमें समाजवादी मानसिकता और बहुजन की हिफाजत की ताकत हो नेताजी अगर ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास में वह सबसे महान पुरुष और राजनीतिज्ञ माने जाएंगे कि वक्त आने पर उन्होंने अपने पुत्र की तानाशाही के खिलाफ उस ताकत को मजबूत किया है जिसे उन्होंने संघर्ष करके आगे लाने की कोशिश की थी और निश्चित तौर पर यह संगठन जिसने आरक्षण को एक नया आयाम दिया था उस दल का नाम है बहुजन समाज पार्टी 1993 में नेताजी ने अपने समाजवादी दाल के साथ बहुत सारी ऐसी स्कीमें लागू की थी जिनकी वजह से आज उन दोनों की उस एकता की आग उन लोगों को आज भी उस एकता के ताप का एहसास है जो उन्हें इनके प्रति क्रूर रहने की सीख देती रहती है पर इन्हें क्यों समझ नहीं आता ?

जिसके चलते कांग्रेसियों की ऐसी की तैसी हो गई और इनकी लापरवाही ने भाजपा जैसे अविश्वसनीय दल को सत्ता में आने को निमंत्रित किया मैंने पहले भी कहा है नेताजी की कुछ नीतियां जिन्हें वे लागू करना चाहते हैं उनके आस पास खड़े उनके अदृश्य दुश्मन उसे लागू नहीं होने देते यही कारण है कि उनके मूर्ख अनुयायियों ने मायावती के साथ गेस्ट हाउस कांड में जो कुछ किया वह दलितों और पिछड़ों की एकता में बहुत बड़ा रोड़ा बन गया आज मौका है नेताजी को उस भूल को सुधारने का जिसको मायावती ने गांठ की तरह बांध रखा है, उसे खोलने का ?

उस गांठ को खोलिये नेता जी देश संकट में है इसलिए खोलने का प्रयास करिये क्योंकि बदतमीजी आपकी तरफ से हुयी थी ? आप यह कर सकते हैं जो आपका बड्डपन्न होगा ! अगर देश सुरक्षित रहेगा लोकतंत्र बचा रहेगा तो हम आपस में फिर लड़ लेंगे अभी तो हमें चाहिए कि हम इन दोनों से गुजारिश करें कि वे एक साथ आकर इस समय नजाकत को समझें ?

उधर कांग्रेस को इधर भाजपा को हराने की गुहार करनी चाहिए और मेरा विश्वास है कि ऐसा होने पर बहुजन समाजवादी पार्टी निश्चित रुप से देश में बहुजन की बात करेगी और आरक्षण के साथ इमानदारी से खड़ी रहेगी । जिसके लिए नेताजी की कई भूलों पर दलित आँखमूंद लेगा और एक साथ खड़ा होगा।  यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह सारा दोष आप पर जाएगा क्योंकि कांग्रेस और भाजपा दो नहीं एक ही है नेता जी ?

जिसके लिए नेता जी का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण होगा और मायावती अगर इस बात को नहीं मानेगी तो आने वाला युग उनको माफ नहीं करेगा और उनकी दलितों के प्रति ठेकेदारी केवल यह साबित करेगी की वह दौलत की भूखी है और भूखी जनता से उनका कोई लेना देना नहीं है।

02/01/2017

उत्तराधिकार की जंग



ताकि सनद रहे।
(समाजवादी पार्टी की अहमियत का सवाल है)
डा.लाल रत्नाकर
स.अजय यादव जी
आपकी भावनाएं शुभकामनाएं प्रभावी हों नये वर्ष में मेरी यह कामना है । लेकिन जिस तरह का द्वंद जारी है उसमें नए युग की शुरुआत की बजाए ऐसा लगता है जैसे एक युग का अंत होने जा रहा है।

पारिवारिक कलह जब राजनीतिक कलह बन गई है जिसका परिणाम भविष्य के गर्त में है । इस तरह के परिवारिक झगडों के उदाहरण दक्षिण भारत के कुछ प्रांतों में और परिवारों में हुए हैं, जिनका परिणाम हम सबको मालूम है ।

नेताजी ने जिस समय राजनीतिक हैसियत हासिल की थी उसके पीछे उनके परिवार का कोई योगदान नहीं था लेकिन अखिलेश यादव के पीछे नेता जी को और उनके परिवार का बड़ा योगदान है इससे मुकरा नहीं जा सकता नकारा नहीं जा सकता यह देख ले की अखिलेश जी ने उस परिवार को संभालने में जरा सी भी रुचि नहीं लीे अन्यथा शिवपाल जी इतने घातक नहीं बनते ?

अखिलेश जी ने भी वही किया जो शिवपाल कर रहे थे यह पढ़े लिखे हैं और जिस तरह से प्रदेश के मुखिया के नाते सामाजिक न्याय की अवधारणा को उन्होंने बिगाड़ा ही है न कि बनाया जो समाज हित में बिल्कुल ही नहीं है, अब देखना है कि आने वाले दिनों में यह राजनीति करते हैं तो इन्हें कौन स्वीकार करता है कि इनकी विचार धारा क्या है ।

अभी जो भीड़ दिख रही है वह भी उन्ही लोगों की है जो इनकी राजनीतिक सोच (यद्यपि है नहीं) को बड़ा नहीं करने वाले हैं । इनकी सत्ता के लोभ में जो नाच कर रहे है हमें विश्वास नहीं हो रहा है कि वास्तव में प्रदेश का मतदाता उनसे इतना खुश है कि वह दोबारा ऐसे लोगों को सत्ता देने के पक्ष में हैं । जबकि लंबे समय से कांग्रेस और भाजपा प्रदेश की राजनीति से सपा/बसपा यानि माननीय नेता जी और मायावती जी के कारण दूर रही है । जिसे अब किसी न किसी तरह इनके पारिवारिक कलह से मिलती (सत्ता) दिखाई दे रही है।

उनके विरोधी यह जानते हैं कि उनका मतदाता बिल्कुल तैयार बैठा है इस तरह की सत्ताओं को बेदखल करने के लिए लेकिन इन्हे नहीं लग रहा है, मेरा यह भी मानना है कि बिहार की राजनीति और उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत मूलभूत अंतर है बिहार में तो दोनों दिग्गज नेता भाजपा को आने से रोकने में कामयाब हो गए लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसी स्थिति नहीं है । जबकि यहां बहुजन समाजवादी पार्टी अपनी योजना में है और भाजपा अपनी योजना में है कांग्रेस अपनी योजना में है।

यद्यपि इसी क्रम में यह आलेख भी प्रासंगिक है :

'मुसलिम वायस आफ़ इँडिया' के संस्थापक अजमल रहमान साहब के विचार उल्लेखनीय है जिसको मैं यहां लगा रहा हूं; 

मुलायम सिँह जी का हम एक बज़ुर्ग और तजुरबाकार नेता के रुप में हमेशा सममान करते रहे हैं लेकिन हर नेता का एक युग होता है,उमर पटटा, कोइ लिखवा कर नही लाया,जिस राजनेता ने,दीवार पर लिखे से आँख चुराइ और ""जनरेशन टराँसफोरमेंशन"" के सच से मुँह मोडा उसने भुगता,वह चाहे सिनडीकेट काँग्रेस के नेता रहे हों?या पँ.कमला पति त्रिपाठी,अर्जुन सिँह या जार्ज फ़रनानडीज़ रहे हों अथवा अडवाणी जी या फ़िर ???

मुलायम सिँह जी के बारे में,लोग जानते हैं,वह मानसिक रुप(याद दाशत के रुप मे)से गमभीर रुप से बीमार है,उनहें 10 मिँट पहले किस ने कया कहा था ?उनहें याद नही रहता।

मुलायम सिँह जी,की कमज़ोरी का फ़ायदा ,शिवपाल-अमर-साधना गुप्ता ""कौकस"" बख़ूबी उठाते और बाप -बेटे के बीच दूरी बढाने में करते रहे हैं।

यह गुट न तो आज की राजनीती की सचचाइ को मान एवँ समझ पा रहा है और लालच में, उ.प्र.जनता और सपा कार्यकर्ता की "सामुहिक इचछा" को दरग़ुज़र कर गलती कर रहा है।यह ज़बरदसती,यह मैसिज दे रहा है,मुसलमान अतीक़ और मुख़तार व ब्रहमण अमरमणि त्रिपाठी को नायक मानता है यह गुट 2016 में 1990 की राजनीती थोप रहा है।

आज का युवा उ.प्र. विकास और समाजिक नयाय/हिससेदारी का मुहावरा और भाषा की तरफ़ बढता नज़र आ रहा है।

काश के यह लोग इस सच्चाई को समझे और माने,वरना समय ख़ुद ज़लील भी करेगा और सज़ा भी देगा।

(मुसलिम वायस आफ़ इँडिया )


बी बी सी क्या कहता है (साभार ) ?

मेरे विचार से इसमें से एक भी आदमी ऐसा नहीं है जिसका अपना कोई वजूद हो इसलिए इन्हें उनके सबसे करीबियों में रखने की जो भी कसौटी हो उन्हें छत्रप नहीं बना सकती ? मेरा मानना है ये जितने भी नाम गिनाये गए हैं सब परिजीवी हैं और अखिलेश को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिए हैं, उस पिता से अलग जिसने तमाम झंझावातों के मध्य "अखिलेश" को ताज दिया ?

राजनीती में बहुतों को चढ़ते उतरते देखा है पर ऐसे नहीं ?

"अखिलेश के ये सात भरोसेमंद सिपाही !
समीरात्मज मिश्र
(लखनऊ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति पर अमरीकी रणनीतिकार और हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में पब्लिक पॉलिसी के प्रोफ़ेसर स्टीव जार्डिंग काम कर रहे हैं.
इसके अलावा अखिलेश तमाम अधिकारियों और सलाहकारों से मशविरा करते रहते हैं लेकिन समाजवादी पार्टी में उनके कुछ ख़ास ऐसे क़रीबी लोग हैं जिन पर वो बहुत भरोसा करते हैं.
इनमें से ज़्यादातर 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान निकली उनकी रथयात्रा में भी साथ थे और अखिलेश के क़रीबी होने की वजह से ये कई बार उनके चाचा शिवपाल यादव के ग़ुस्से का शिकार भी बन चुके हैं. एक नज़र इन नेताओं पर
उदयवीर सिंह ; उत्तर प्रदेश के टूंडला के रहने वाले उदयवीर सिंह धौलपुर के उसी मिलिट्री स्कूल से पढ़े हैं जहां से अखिलेश ने पढ़ाई की है. अखिलेश यादव, उदयवीर से दो साल सीनियर थे.
उदयवीर ने आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमए और एमफ़िल की डिग्री ली.
अखिलेश यादव के बेहद क़रीब होने के बावजूद उदयवीर कभी चर्चा में नहीं आए लेकिन दो महीने पहले जब पार्टी और परिवार में छिड़ी जंग सामने आई तो उदयवीर ने अखिलेश के समर्थन में चिट्ठी लिखी जिसके बाद वो सुर्ख़ियों में आ गए.
तब उन्हें इस 'अपराध' के लिए पार्टी से निकाल दिया गया था, लेकिन अब 'उन्हें निकालने वाले' ही पार्टी से बाहर कर दिए गए हैं.
सुनील यादव 'साजन' ; उन्नाव ज़िले के एक गांव से आने वाले सुनील यादव ने लखनऊ में केकेसी डिग्री कॉलेज के छात्र संघ से राजनीति की शुरुआत की.
यूं तो वो अखिलेश यादव के संपर्क में क़रीब एक दशक से हैं लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले जब तत्कालीन मायावती सरकार के ख़िलाफ़ अखिलेश संघर्ष कर रहे थे, उस दौरान वो उनके क़रीब आए.
तब राज्य सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के दौरान सपा के कई नेताओं को पुलिस के डंडे भी खाने पड़े.
सुनील यादव भी 2012 की रथ यात्रा में अखिलेश के साथी थे. समाजवादी छात्र सभा का प्रदेश अध्यक्ष होने के अलावा अखिलेश यादव ने सरकार बनने के बाद पहले उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दिलाया और बाद में एमएलसी बनवाया.
सुनील, अखिलेश यादव की युवा ब्रिगेड की कोर टीम के सदस्य हैं.
आनंद भदौरिया ; लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र संघ से राजनीति की शुरुआत करने वाले आनंद भदौरिया छात्र संघ चुनाव में तो जीत हासिल नहीं कर सके लेकिन इस समय वो टीम अखिलेश के अहम सदस्य हैं.
आनंद भदौरिया उस वक़्त चर्चा में आए जब बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की सरकार के दौरान एक पुलिस अधिकारी के पैरों से रौंदी जा रही उनकी तस्वीर अख़बारों में छपी थी.
बाद में भदौरिया समाजवादी पार्टी के फ्रंटल संगठन लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिए गए. उसके बाद अखिलेश ने उन्हें विधान परिषद भी भेजा.
संजय लाठर ; संजय लाठर यूं तो हरियाणा के रहने वाले हैं लेकिन अखिलेश यादव से क़रीबी की वजह से वो पार्टी में अहम स्थान हासिल कर चुके हैं.
वो अखिलेश के पुराने साथी हैं. इस क़रीबी की बदौलत वो पार्टी की युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए.
क़ानून में मास्टर्स और पत्रकारिता में पीएचडी प्राप्त संजय समाजवादी पार्टी से विधान सभा चुनाव भी लड़ चुके हैं. हालांकि वो चुनाव हार गए थे लेकिन बाद में उन्हें भी विधान परिषद की सदस्यता पुरस्कार के रूप में मिली.
एसआरएस यादव ; समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और सलाहकारों में से एक एसआरएस यादव पहले कोऑपरेटिव बैंक में नौकरी करते थे.
उसी दौरान वो मुलायम सिंह यादव के संपर्क में आए. मुलायम सिंह यादव 1989 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने एसआरएस को अपना विशेष कार्याधिकारी यानी ओएसडी बनाया.
जानकार बताते हैं कि बतौर ओएसडी वो इतने ताक़तवर थे कि प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी तक उनसे उलझने की हिम्मत नहीं करते थे.
रिटायर होने के बाद वो सपा में कार्यालय प्रभारी हो गए और फ़िलहाल एमएलसी हैं.
मुलायम और अखिलेश के बीच तनाव के बावजूद, एसआरएस यादव दोनों के ही काफ़ी क़रीबी हैं.
अभिषेक मिश्र ; विदेश में पढ़े होने के नाते अभिषेक मिश्र की एक अलग पहचान है. उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नौकरशाह के बेटे अभिषेक को 2012 में अखिलेश यादव ने ही लखनऊ उत्तर सीट से चुनाव लड़ाया और वो पहली बार में ही विधायक बने. अखिलेश यादव ने उन्हें अपनी मंत्रिपरिषद में भी जगह दी.
विधायक बनने से पहले अभिषेक मिश्र आईआईएम अहमदाबाद में पढ़ाते थे. उनके चुनाव प्रचार में आईआईएम के छात्रों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था और इसी वजह से वो एकाएक चर्चा में आए थे.
अभिषेक मिश्र को बड़ी संख्या में निवेशकों को उत्तर प्रदेश में बुलाने और यहां निवेश के लिए तैयार करने का भी श्रेय दिया जाता है.
इसके अलावा वो अखिलेश यादव के राजनीतिक और सरकारी दोनों स्तरों पर प्रमुख रणनीतिकारों में से एक माने जाते हैं.
राजेंद्र चौधरी ; अखिलेश यादव के साथ हमेशा साये की तरह रहने वाले कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी भी उन कुछ लोगों में से एक हैं जो मुलायम सिंह की ही तरह अब अखिलेश के क़रीबी हैं.
ग़ाज़ियाबाद के रहने वाले राजेंद्र चौधरी अखिलेश के प्रमुख राजनीतिक सलाहकार भी हैं और सरकार के प्रवक्ता भी हैं.
अखिलेश के क़रीबी बताते हैं कि राजेंद्र चौधरी अखिलेश के किसी भी फ़ैसले को उनसे पलटवाने की भी क्षमता रखते हैं.
पारिवारिक सत्ता संघर्ष में राजेंद्र चौधरी भी शिवपाल खेमे के निशाने पर आए थे लेकिन जानकारों का कहना है कि शायद मुलायम सिंह यादव के हस्तक्षेप के कारण उन पर उस तरह से कार्रवाई नहीं हुई जिस तरह से अखिलेश यादव के अन्य समर्थकों पर हुई थी."

क्रमश जारी :...........
(बी बी सी से साभार)
"समझ नहीं आ रहा सपा का 'असली नेता' कौन?
ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
1 जनवरी 2017

कहते हैं कि राजनीति में एक हफ्ता एक लंबा समय होता है. बीते दो दिनों में समाजवादी पार्टी का जो घटनाक्रम रहा है, उसे देखते हुए समझ नहीं आ रहा कि सपा का 'नेता' कौन है? रविवार सुबह 'समाजवादी पार्टी अधिवेशन' कर रामगोपाल ने जो ऐलान किया, उसके हिसाब से दो दिन पहले तक मुलायम सिंह यादव पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. अब उनके बेटे अखिलेश यादव को यह पद सौंपा गया है. शनिवार शाम यह नहीं समझ आ रहा था कि अखिलेश का संकट में आ चुका मुख्यमंत्री पद कैसे बचेगा. लेकिन आज वो सत्ता पर और भी मज़बूत स्थिति में नज़र आ रहे हैं. कल को यह सब भी पलट सकता है. लेकिन सियासत में कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं. मुग़लों के दौर में बाप को सत्ता से हटाने के लिए बेटे न केवल बग़ावत पर उतर आते थे, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर राजधानी पर चढ़ाई भी कर देते थे. जहांगीर ने अक़बर से बग़ावत की. जहांगीर से शाहजहां ने विद्रोह किया और शाहजहां से औरंगज़ेब ने. समय के पहियों को और पीछे ले जाएं तो रोमन साम्राज्य में भी सत्ता के लिए संघर्ष होता रहा. इन दिनों उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में जारी पारिवारिक घमासान भी मुग़लों की याद दिलाता है. पार्टी में बाप से बेटे की बग़ावत, पार्टी के अंदर साज़िश और एक दूसरे के खिलाफ़ षड्‍यंत्र से मुग़ल साम्राज्य की बू आती है. शुक्रवार को 'नेता जी' कहे जाने वाले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से बग़ावत करने के इलज़ाम में अपने बेटे अखिलेश यादव को छह सालों के लिए पार्टी से निकालने का फैसला किया, लेकिन अगले ही दिन उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया. आज यानी रविवार को उनकी जगह पर पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश बनाए गए, जिसे मुलायम सिंह ने गैरकानूनी करार दिया है. साथ ही कहा है कि इस लेकर वो 5 जनवरी को 'अपना' अधिवेशन करेंगे. हालांकि रामगोपाल यादव और अखिलेश के जिस विशेष अधिवेशन को रविवार को लखनऊ में आयोजित किया गया, उसे असंवैधानिक घोषित करते हुए मुलायम सिंह ने इस सम्मेलन में शामिल होने वाले लोगों के ख़िलाफ कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी थी. फिर भी इस सम्मेलन में करीब 5000 कार्यकर्ता शामिल हुए. इस सम्मेलन में मुलायम को पार्टी का रहनुमा बताते हुए उनके ख़ास सहयोगी शिवपाल यादव का राज्य अध्यक्ष पद छीन लिया गया और उनके दिल के करीब बताए जाने वाले अमर सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया. तो क्या ये उत्तराधिकार की लड़ाई है या फिर पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी की आपसी कशमकश, या फिर दोनों ? पार्टी पर नज़र रखने वाले कई विशेषज्ञ ये कहते हैं कि मुलायम सिंह सियासत के शिखर पर जितना ऊंचा जा सकते थे गए. अब वो और ऊपर नहीं जा सकते. दूसरी तरफ बेटे के बारे में वो कहते हैं कि अब दौर है अखिलेश यादव का, जिनके बारे में कहा जाता है कि नई पीढ़ी में उनकी लोकप्रियता काफी ज्यादा है. कुछ तो यहां तक कहने को तैयार हैं कि मुलायम सिंह भी यही चाहते हैं कि पार्टी की बागडोर अखिलेश ही संभालें. वो अपने छोटे भाई शिवपाल यादव के क़रीब ज़रूर हैं लेकिन अगर चुनाव बेटे और भाई के बीच किसी एक का करना हो, तो वो अंत में बेटे को ही चुनेंगे. कुछ विशेषज्ञ तो यह भी कहते हैं कि बाप-बेटे का झगड़ा केवल एक ड्रामा है. समाजवादी पार्टी में जारी उठा-पटक पर नज़र रखने वालों को यक़ीन है कि अंदरूनी विवाद जल्द ख़त्म होने वाला नहीं है. लेकिन पार्टी के पास समय नहीं है. राज्य में विधानसभा चुनाव होने में अब कुछ ही हफ्ते बाक़ी हैं. अगले कुछ दिनों में इस जंग का अंत पार्टी के लिए बेहद ज़रूरी होगा.

(संतोष यादव की फेसबुक से )
"राजनीति जनमानस का खेल होता है । हर राजनीतिज्ञ अपने पक्ष में जनमानस को बनाये रखने के लिए खेल खेलता है । इसमे झूठ सच सब चलता है । समझदार नेता इंतजार कर लेता है लेकिन जनमानस में अपनी ऐसी कोई गलत छवि नहीं बनने देता जो दाग बन जाये ।

अखिलेश के लिए ,,,, 
शिवपाल---------------रामगोपाल 
अमर सिंह------------ रामनरेश 
मुख़्तार बंधू-------------राजा भैया 
अतीक अहमद------- पवन पांडेय 
आशु मालिक--------- अभिषेक मिश्र
अखिलेश जी इन लोगो में क्यों अंतर करते और कैसे करते है मुझे तो नहीं समझ में आता ।
नेता जी अध्यक्ष का पद लेकर खुद अध्यक्ष बन जाना किसको भूलेगा । 
अरे आप किसी और को भी बना सकते थे ।
आप सही हो या गलत इसके साथ आप का तरीका सही है या गलत महत्व रखता है ।
अगर अखिलेश जी नेता जी के बेटे न होते तो क्या नेता जी का एक भी राजनीतिक दाँव सह पाते ।
कम से कम नेता जी का लिहाज़ करते आप, वो सिर्फ आप के बाप ही नहीं, जिस पार्टी पर आप कब्ज़ा करना चाहते हो उसके निर्माता भी है ।
पक्का ऐ सब आप ने मोदी जी से सीखा होगा ।
कमज़ोर लोग दाँव ज्यादा चलते है ।

22/11/2016

विनम्र श्रद्धांजलि !


श्री रामनरेश यादव का जन्म एक जुलाई 1928 ई. एवं निधन 22 नवम्बर 2016 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, जिले के गांव आंधीपुर (अम्बारी) में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। आपका बचपन खेत-खलिहानों से होकर गुजरा। आपकी माता श्रीमती भागवन्ती देवी जी धार्मिक गृहिणी थीं और पिता श्री गया प्रसाद जी महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और डा. राममनोहर लोहिया के अनुयायी थे। आपके पिताजी प्राइमरी पाठशाला में अध्यापक थे तथा सादगी और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति थे। श्री यादव को देशभक्ति, ईमानदारी और सादगी की शिक्षा पिताश्री से विरासत में मिली है। आपका भारतीय राजनीति में विशिष्ट स्थान है। आप कर्मयोगी और जनप्रिय नेता हैं। स्वदेशी एवं स्वावलंबन आपके जीवन का आदर्श है। आपके बहुमुखी कृतित्व एवं व्यक्तित्व के कारण आप बाबूजी'' के नाम से जाने जाते हैं। श्री रामनरेश यादव का विवाह सन् 1949 में श्री राजाराम यादव निवासी ग्राम-करमिसिरपुर (मालीपुर) जिला-अम्बेडकर नगर (उ.प्र.)की सुपुत्री सुश्री अनारी देवी जी ऊर्फ शांति देवी जी के साथ हुआ। आपके तीन पुत्र और पांच पुत्रियां हैं। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के विद्यालय में हुई और आपने हाईस्कूल की शिक्षा आजमगढ़ के मशहूर वेस्ली हाई स्कूल से प्राप्त की। इन्टरमीडिएट, डी.ए.वी. कालेज, वाराणसी से और बी.ए., एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्राप्त की। उस समय प्रसिद्ध समाजवादी चिन्तक एवं विचारक आचार्य नरेन्द्र देव काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति थे। विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं जनक पंडित मदनमोहन मालवीय जी के गीता पर उपदेश तथा भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं तत्कालीन प्रोफेसर डॉ. राधाकृष्णन के भारतीय दर्शन पर व्याख्यान की गहरी छाप आप पर विद्यार्थी जीवन में पड़ी। श्री यादव ने स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वाराणसी में चिन्तामणि एंग्लो बंगाली इन्टरमीडिएट कालेज में प्रवक्ता के पद पर तीन वर्षों तक सफल शिक्षक के रूप में कार्य किया। आप पट्टी नरेन्द्रपुर इंटर कालेज जौनपुर में भी कुछ समय तक प्रवक्ता रहे। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद सन् 1953 में आपने आजमगढ़ में वकालत प्रारम्भ की और अपनी कर्मठता तथा ईमानदारी के बल पर अपने पेशे तथा आम जनता में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया। श्री यादव ने छात्र जीवन से समाजवादी आन्दोलन में शामिल होकर अपने राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन की शुरूआत की। आजमगढ़ जिले के गांधी कहे जाने वाले बाबू विश्राम राय जी का आपको भरपूर सानिध्य मिला। श्री यादव ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डाक्टर रामनोहर लोहिया के विचारों को अपना आदर्श माना है। आपने समाजवादी विचारधारा के अन्तर्गत विशेष रूप से जाति तोड़ो, विशेष अवसर के सिद्धान्त, बढ़े नहर रेट, किसानों की लगान माफी, समान शिक्षा, आमदनी एवं खर्चा की सीमा बांधने, वास्तविक रूप से जमीन जोतने वालों को उनका अधिकार दिलाने, अंग्रेजी हटाओ आदि आन्दोलनों को लेकर अनेकों बार गिरफ्तारियां दीं। आपातकाल के दौरान आप मीसा और डी.आई. आर के अधीन जून 1975 से फरवरी 1977 तक आजमगढ़ जेल और केन्द्रीय कारागार नैनी इलाहाबाद में निरूद्ध रहे। आप अपने राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में विभिन्न दलों एवं संगठनों तथा संस्थाओं से संबद्ध रहे। राज्यसभा सदस्य तथा संसदीय दल के उपनेता भी रहे। आप अखिल भारतीय राजीव ग्राम्य विकास मंच, अखिल भारतीय खादी ग्रामोद्योग कमीशन कर्मचारी यूनियन और कोयला मजदूर संगठन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ग्रामीणों और मजदूर तबके के कल्याण के लिये लम्बे समय तक संघर्षरत रहे। बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में एक्सिक्यूटिव कॉसिंल के सदस्य भी थे। अखिल भारतीय अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी.) रेलवे कर्मचारी महासंघ के आप राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, और आप जनता इंटर कालेज अम्बारी आजमगढ़ (उ.प्र.) के प्रबंधक हैं तथा अनेकों शिक्षण संस्थाओं के संरक्षक भी हैं तथा गांधी गुरूकुल इन्टर कालेज भंवरनाथ, आजमगढ़ के प्रबंध समिति के अध्यक्ष भी हैं। श्री रामनरेश यादव 23 जून 1977 को उत्तरप्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए। मुख्यमंत्रित्व काल में आपने सबसे अधिक ध्यान आर्थिक, शैक्षणिक तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के उत्थान के कार्यों पर दिया तथा गांवों के विकास के लिये समर्पित रहे। आपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों के अनुरूप उत्तरप्रदेश में अन्त्योदय योजना का शुभारम्भ किया। श्री यादव सन् 1988 में संसद के उच्च सदन राज्यसभा के सदस्य बने एवं 12 अप्रैल 1989 को राज्यसभा के अन्दर डिप्टी लीडरशिप,पार्टी के महामंत्री एवं अन्य पदों से त्यागपत्र देकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। आपने मानव संसाधन विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति के पहले अध्यक्ष के रूप में आपने स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति के चहुंमुखी विकास को दिशा देने संबंधी रिपोर्ट सदन में पेश की। केन्द्रीय जन संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत गठित हिन्दी भाषा समिति के सदस्य के रूप में आपने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वित्त मंत्रालय की महत्वपूर्ण नारकोटिक्स समिति के सदस्य के रूप में सीमावर्ती राज्यों में नशीले पदार्थों की खेती की रोकथाम की पहल की। प्रतिभूति घोटाले की जांच के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति के सदस्य के रूप में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पब्लिक एकाउंट कमेटी (पी.ए.सी.), संसदीय सलाहकार समिति (गृह विभाग), रेलवे परामर्शदात्री समिति और दूरभाष सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में आप कार्यरत रहे। आप कुछ समय तक कृषि की स्थाई संसदीय समिति के सदस्य तथा इंडियन काँसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च की जनरल बाडी तथा गवर्निंग बाडी के सदस्य भी रहे। आपका लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने में काफी योगदान था। श्री रामनरेश यादव ने सन् 1977 में आजमगढ़ (उ.प्र.) से छठी लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया। आप 23 जून 1977 से 15 फरवरी 1979 तक उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। आपने 1977 से 1979 तक निधौली कलां (एटा) का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया तथा 1985 से 1988 तक शिकोहाबाद (फिरोजाबाद) से विधायक रहे। श्री यादव 1988 से 1994 तक (लगभग तीन माह छोड़कर) उत्तरप्रदेश से राज्यसभा सदस्य रहे और 1996 से 2007 तक फूलपुर(आजमगढ़) का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया। आपने दिनांक 8 सितम्बर 2011 को अपरान्ह 01.15 बजे मध्यप्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ ग्रहण की। श्री रामनरेश यादव मध्यप्रदेश के राज्यपाल रह चुके हैं ।

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