28 मई 2018

EVM बनाने वाली कंपनी ने ‘चुनाव आयोग’ के अलावा किसी और को भी बेंची लाखों मशीनें

BOLTA UP बोलता स्पेशल
RTI से खुलासा : EVM बनाने वाली कंपनी ने ‘चुनाव आयोग’ के अलावा किसी और को भी बेंची लाखों मशीनें !
 (BOLTA UP (2 months ago))

ईवीएम को लेकर अब एक नया खुलासा हुआ है। अभी तक ईवीएम के हैक होने को लेकर विवाद हो रहा था लेकिन अब पता चला है कि जितनी ईवीएम मशीनें बन रही हैं उतनी चुनाव आयोग को नहीं मिल रही हैं। कंपनी ने मशीनें कम बनाई हैं लेकिन आयोग के पास ज़्यादा मशीनें हैं। तो सवाल है कि बाकी की मशीने कहाँ से आ रही हैं? क्या ईवीएम बनाने वाली कम्पनियाँ ही किसी और को मशीनें बेंच रही हैं और वहां से ये चुनाव आयोग के पास पहुँच रही हैं?

मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन एस रॉय ने चुनाव आयोग और ईवीएम बनाने वाली कंपनियों से आरटीआई के ज़रिए ये पूछा कि अबतक कितनी ईवीएम बनी हैं और कितनी चुनाव आयोग को मिली हैं। ईवीएम चुनाव आयोग के द्वारा कोई और तो प्रयोग नहीं करता है तो जितनी मशीने बनी थी उतनी ही चुनाव आयोग को मिलनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।

बता दें, कि ईवीएम को दो सरकारी कम्पनियाँ बनाती हैं। इलेक्ट्रोनिक कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल)। ईवीएम मशीन तीन भागों में होती है। बेलेटिंग यूनिट (बीयू) कंट्रोल यूनिट (सीयू) और हाल ही में आए वोटर वेरीफेबल पेपर ऑडिट ट्रायल (विविपीऐटी)।

चुनाव आयोग ने बताया कि उसने 1989 से 15 मई 2017 तक बीईएल से 1,005,662 (दस लाख पांच हज़ार 662) बीयू और 928,049 (नौ लाख 28 हज़ार 49) सीयू प्राप्त किये। ईसीआईएल से चुनाव आयोग को 1,014,644 बीयू और 934,031 सीयू प्राप्त हुए।

वहीं ईवीएम बनाने वाली कंपनियों की बात करे तो बीईएल 9 जून 2017 को बताया कि उसने 2010 से 2017 तक चुनाव आयोग को 190,000 बीयू और 125,000 सीयू की आपूर्ति की। दूसरी कंपनी ईसीआईएल ने बताया कि उसने इसी दौरान चुनाव आयोग को 222,925 बियू और 211,875 सीयू की आपूर्ति की। इसके अलावा 497,348 बियू और 307,030 सीयू इसी दौरान अलग से चुनाव आयोग को दिये गए।

मतलब चुनाव आयोग ने 2,020,326 (20 लाख 20 हज़ार 326) बीयू और 1,862,080 (18 लाख 62 हज़ार 80)  सीयू प्राप्त किये। वहीं ईवीएम बनाने वाली कंपनियों बीईएल, ईसीआईएल ने 910,273 ( नौ लाख 10 हज़ार 273) बीयू और  643,905 (छह लाख 43 हज़ार 908) सीयू की आपूर्ती की।

चुनाव आयोग और कंपनियों के आंकड़ों के बीच में लाखों ईवीएम मशीनों का अंतर आ रहा है। सवाल है ये मशीने कहा है?

साथ ही ईवीएम मशीनों के भुगतान में भी गड़बड़ी है। 2006-07 से 2016-17 तक चुनाव आयोग ने ईवीएम खरीदने के लिए Rs 5,360,175,485 (536 करोड़ 1 लाख 75 हज़ार 485 रुपये) खर्च किये। वहीं ईवीएम बनाने वाली कंपनी बीईएल ने 6,525,644,000 (652 करोड़ 56 लाख 44000 रुपये) की ईवीएम मशीनें बेंची। अब सवाल ये है कि 116 करोड़ रुपये ज़्यादा ईवीएम कंपनी ने किस्से लिए?

क्या ईवीएम कम्पनियाँ किसी और को भी ईवीएम बेंच रही हैं? साथ ही क्या चुनाव आयोग कही और से भी मशीनें खरीद रहा है? क्या ये खरीदार राजनीतिक पार्टियाँ तो नहीं हैं? अगर ऐसा है तो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बहुत बड़े खतरे में है।

आरटीआई कार्यकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट में ईवीएम को लेकर पुनर्विचार याचिका दायर की है। याचिका में मांग की गई है कि राजनीतिक पार्टियों से इस मामले में जवाब तलब किया जाए और जब तक जांच के परिणाम नहीं आते वोटिंग के लिए ईवीएम का प्रयोग न किया जाए।।

1 मार्च 2018

क्या वास्तव में स्त्रियों के सम्मान के विपरीत यह उत्सव इशारा नहीं करता।

-डॉ.लाल रत्नाकर 
एक तरफ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा चल रहा है, जिस पर सरकार रात दिन विज्ञापनों पर करोड़ों करोड़ रुपए खर्च कर रही है लेकिन वही सरकार जो भावनात्मक रूप से वायुयान को पुष्पक विमान से जोड़ कर के देखती है और गणेश जी को उस जमाने की प्लास्टिक सर्जरी बताती है तो क्या इस समय भी स्त्रियों को असत्य को ढकने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है क्या वास्तव में होलिका का जला दिया जाना तर्कसंगत रहा होगा या यह कितना सच है यह सब सवाल विचारणीय नहीं हैं ? और एक तरह का पाखंड और अपना आधिपत्य बनाए रखने का सरोकार ही प्रतीत होता है।

जो लोग होलिका को भारत की आधी आबादी के रूप में देखते हैं उन्हें लगता है कि यह भारतीय समाज में आधी आबादी के प्रति हिंसात्मक कुरीति है जिसे आधी आवादी के प्रति अन्याय है। एक तरफ सत्य और राष्ट्रवाद का हौवा (बोलबाला) फैलाया जा रहा है दूसरी तरफ असत्य और आधी ावादी के उत्पीड़न का उत्सव मनाया जा रहा है।
आइए हम विचार करें और ऐसे उत्सव का पुनर्मूल्यांकन कर भारतीय परंपरा और संस्कृति को साम्राज्यवाद से मुक्त कर पाखंड और पाखंडवाद के खिलाफ खड़े हों और उसका भंडाफोड़ करें।
"पर क्या आपने कभी विचार किया हमारे देश में सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का बोलबाला है ऐसे हालात में हम लोग क्या मनाते हैं और क्यों मनाते हैं इस पर कभी विचार नहीं करते ?
क्या वास्तव में स्त्रियों के सम्मान के विपरीत यह उत्सव इशारा नहीं करता।"


भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।[11] प्रतीक रूप से यह भी माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।[12]
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढीराधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है।[13] कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।[14]

परंपराएँ

होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।[15]
होलिका दहन
होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए[16] जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।[16] लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं।
सार्वजनिक होली मिलन
विदेश (जर्मनी) में होली मनाते हुए युवा
होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजीभांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्रायः सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने की वज़ह से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता।

साहित्य में होली

प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली[क] तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। भारविमाघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदासरहीमरसखानपद्माकर[ख]जायसीमीराबाईकबीर और रीतिकालीन बिहारीकेशवघनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं।[28] इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है।[29] सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाअमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं।[8] आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँतेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सवयश चोपड़ा की सिलसिलावी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं।[30]

संगीत में होली[संपादित करें]

वसंत रागिनी- कोटा शैली में रागमाला शृंखला का एक लघुचित्र
भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हालाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंतबहारहिंडोलऔर काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैतीदादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है, जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहाँ ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री।[31] इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता है। भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और 'नवरंग' के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।

आधुनिकता का रंग

होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं।[32] लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं।[33] रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं।[34] होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। बाज़ार में इसकी उपयोगिता का अंदाज़ इस साल होली के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान केन्ज़ोआमूर द्वारा जारी किए गए नए इत्र होली है से लगाया जा सकता है।
इस तरह से इस पर्व को जनमानस में इतने भीतर तक भर दिया है की वः आसानी से निकलता ही नहीं है। 

8 फ़र॰ 2018

जब किसी समुदाय के पास उपयुक्त नेतृत्व ना हो ?

डॉ.लाल रत्नाकर 
http://www.dainikdunia.com/akhilesh-yadav-fight-with-social-justice-discuss-5-brahmin-journalist-taj-vivanta/

'अखिलेश यादव लड़ेंगे सामाजिक न्याय की लड़ाई, इन 5 ब्राह्मण पत्रकारों से बंद कमरे में की मंत्रणा !'

"निश्चित तौर पर विडंबना की कोई सीमा नहीं बचती है जब किसी समुदाय के पास उपयुक्त नेतृत्व ना हो ?"
और यह हालत जब राजनैतिक दलों की हो तब ?

जहाँ तक सवाल माननीय मुलायम सिंह यादव जी का है तो यह कहना पड़ेगा कि उन्होंने संघर्ष करके अपनी राजनैतिक हैसियत बनायी थी और उन्हें भले ही राजनीति के ठगों ने समय समय पर ठगा हो लेकिन उनके संघर्षों का अपना एक इतिहास तो रहेगा ही। हालाँकि इतिहास की अपनी कुछ न कुछ मजबूरियां तो होती ही है..  जिन मजबूरियों को इतिहास जनता के सामने नहीं ला पाता लेकिन इतिहास तो मूलतः वही होता है बाकी तो व्यक्ति का विवरण होता है। उसी तरह की बहुत सारी मजबूरियां माननीय मुलायम सिंह के राजनीतिक जीवन की भी है। 

अगर हम इतिहास के आईने में झाके तो माननीय मुलायम सिंह हो या बहुजन का कोई भी नेता हो जिसके पीछे चौ.चरण सिंह जैसा संघर्षशील और आर्थिक और राजनैतिक समझ रखने की क्षमता का व्यक्ति जिसे किसान से लेकर के देश के उद्योग धंधों की पक्की समझ रही हो और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के परत दर परत की जानकारी थी या कांशी राम जैसा साहसिक व्यक्ति रहा हो उसके बाद का हस्र क्या हुआ ? चौ. चरण सिंह जी जब राष्ट्रीय राजनीति से अवसान कर गए तब उनके पीछे उनके सुयोग्य इंजीनियर पुत्र भारतीय राजनीति में एक भी क़दम अपने पिता के राजनितिक चिन्हों पर नहीं चल पाए । जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों ने चौधरी चरणसिंह की विरासत के रूप में चौधरी अजीत सिंह को अपनाया भी यही नहीं उत्तर प्रदेश के अन्य भागों में भी चौधरी अजीत सिंह चौधरी चरण सिंह की विरासत के रूप में स्वीकार तो किए गए लेकिन चौधरी अजीत सिंह की राजनैतिक सोच चौधरी चरण सिंह की सोच समझ के मुक़ाबले बिलकुल ही उपयुक्त नहीं बानी कारन जो भी हो ?

यह सब यद्यपि चौ.चरण सिंह के अवसान के उपरांत हुआ ! लोगों का तो यहाँ तक मानना है कि चौधरी चरण सिंह कभी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा उनके बाद राजनीति में आए ! चौधरी साहब किसान नेता थे और उन्होंने पूरे हिंदी बेल्ट में बहुत सारे नेताओं को निकाल करके राजनीतिक क्षितिज पर लाये जिनमें प्रमुख रूप से आगे किये जिनमें कई लोग कालांतर में भारत की राजनीति की अच्छी समझ रखने वाले माने गए जिसमें श्री शरद यादव का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है ! चौधरी साहब के अवसान के बाद उनकी विचारधारा को शरद यादव ने आगे बढ़ाया। जिसकी वजह से उत्तर प्रदेश और बिहार में दो ऐसे नेता निकले जिनकी शुरुआत अपनी तरह से अपनी राजनीति शुरू की थी लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी तब कोई पकड़ नहीं थी और न ही अब है !

भारतीय राजनीति को जो लोग जानते हैं वो लोग यह बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि उत्तर भारत के जिन प्रांतों में पिछड़ी जाति के नेता उभरे उसके पीछे जिस इंजीनियर का हाँथ था वह था राजनीतिक इंजीनियर श्री शरद यादव का उत्तर प्रदेश में जब जनता दल सत्ता में आया था तब मुख्यमंत्री के लिए अजीत सिंह और मुलायम सिंह आमने सामने थे और अजीत सिंह के पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री मा. वी पी सिंह जी का हाथ था लेकिन मा. मुलायम सिंह यादव जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे कितने लोग इस बात को जानते होंगे यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन मुलायम सिंह जी इस बात को ज़रूर जानते हैं कि वो मुख्यमंत्री न बन पाते यदि उनकी पीछे उस समय के राष्ट्रीय युवा नेता श्री शरद यादव का हाथ न होता।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करने का भी दारोमदार और योगदान श्री शरद यादव को ही जाता है क्योंकि बिहार की राजनीति के बारे में मेरा अनुभव कम है इसलिए इतना ही कह पाना उपयुक्त है जो तत्कालीन सच्चाई है आगे जो कुछ होता है और जिस तरह से नीतीश कुमार जी अलग होते हैं यहाँ तक कि नीतीश जी का पूरा राजनैतिक जीवन ही श्री शरद यादव के राजनैतिक दिशा निर्देश का परिणाम है ।

मैं यहाँ उत्तर प्रदेश की राजनीति के बारे में बात कर रहा हूँ इसलिए राष्ट्रीय राजनीति का उल्लेख दूसरे लेख में करूँगा यहाँ पर हम फिर वापस आते हैं चौधरी चरण सिंह के उपरांत माननीय अजीत सिंह जी के राजनैतिक जीवन पर अगर देखा जाए तो इसी तरह की राजनीति हमारे पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव सिंह जी के साथ हो रही है इन दोनों घटनाओं में अंतर केवल इतना है कि एक पिता के अवसान के उपरांत राजनितिक विरासत पाया दूसरा पिता के जीवन काल में ही पिता की राजनितिक विरासत के रूप में उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रायोजित किया गया। क्योंकि माननीय मुलायम सिंह यादव जी अपने जीवनकाल में राजनैतिक विरासत सौंपने की जिस मंशा से अपने पुत्र श्री अखिलेश यादव जी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश को सौंपे थे उन्होने बहुमत के पाँच सालों में पारिवारिक छबि को जिस तरह से धूल धूसरित किया उससे कोई भी अनभिज्ञ नहीं है।  

राजनीति में चापलूसों और चमचों की भरमार होती है लेकिन वो राजनीति के लिए मील के पत्थर नहीं माने जाते है।  हमेशा राजनीति को प्रभावित करने वाले लोग नेपथ्य में होते हैं लेकिन दुर्भाग्य से उत्तर प्रदेश की उस सरकार की राजनीति में सरकार को प्रभावित करने वाले लोग मुख्यमंत्री से आगे आ गये थे !

राजनीतिक समझ के लोग इस बात को बहुत ही अच्छी तरह से समझते हैं कि मौजूदा राजनीतिक दल किस तरह की राजनीति कर रहा है अगर इसका राजनीतिक मूल्यांकन किया जाए तो उस 5 साल की बहुमत वाली सरकार में राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद उसका कोई काम राष्ट्रीय राजनीती के लिए मानदंड नहीं बना। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में श्री अखिलेश यादव ने कोई राष्ट्रीय सपना नहीं देखा था हालाँकि प्रदेश के विकास के लिए उन्होंने जितनी भी योजनाएं चलाईं उसकी समाजवादी राजनिति से कोई बहुत लेना देना नहीं था। 
उनके सलाहकार मंडली में जो लोग भी थे वो राजनीतिक रूप से शत प्रतिशत ग़ैर राजनैतिक लोग थे। जिन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री के आगे पीछे इस तरह का औरा बनाया कि युवा मुख्यमंत्री सीखने की बजाए अति उत्साह में ऐसे ऐसे कार्य कर डाले जो ना तो समाजवादी राजनीती के लिए उपयुक्त थे और न ही उनकी राजनैतिक समझ  की ही बात थी। हालाँकि उनके प्रशंसकों द्वारा उनके  इन कार्यों का बहुत प्रचार प्रसार किया गया। लेकिन वह काम वोट के हिसाब से और प्रदेश के विकास के हिसाब से कारगर साबित नहीं हुआ। यही कारण था कि उस समय के चुनाव में किनारे रहने वाली भाजपा बहुत बड़े बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में विराजमान हो गई।  जो लोग माननीय नेताजी को अच्छी तरह से जानते हैं वे जानते हैं कि नेताजी भले ही बीजेपी के  आंतरिक रूप  से सम्मान देते हों लेकिन हमेशा देश में भाजपा को रोकने की वकालत करते आए हैं। अफ़सोस होता है यह कहते हुए कि उनके युवा पुत्र के इर्द गिर्द भाजपा के लोग रात - दिन घेरे रहे और अंत में भाजपा पूरी  ताक़त के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह बना ली ? 

यही कारण है कि आने वाले दिनों में जिस तरह से अजीतसिंह स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के उत्तर प्रदेश में और अब वह भाजपा पूरे अपने ताक़त के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी उपस्थिति बनाली है। जिससे यह उम्मीद नहीं दिखती की आने वाले दिनों में संघर्ष का कोई तरीका यह याद कर सकें और अपनी छवि प्रदेश की बहुजन अवाम को इनकी तरफ खींच सके जिससे  कि आने वाले दिनों में जिस तरह से अजीत सिंह स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के उत्तर प्रदेश में निरंतर अपनी पह्चान खोते गये डर है कि यही हाल कहीं उस युवा मुख्यमंत्री का भी ना हो जाय ?

1 जन॰ 2018

मुझे नववर्ष की शुभकामनाएं न दें .

मुझे नववर्ष की शुभकामनाएं न दें। यह मेरा नववर्ष नहीं है। यह अंग्रेजों का नववर्ष है।यह विदेशी नववर्ष है। यह ईसाईयों का नववर्ष है। मैं विदेशी नववर्ष को नहीं मनाता। मैं अपने नव वर्ष को मनाता हूं। केवल मेरे ही नववर्ष पर बधाइयां भेजें ।
इस नववर्ष की बधाइयां अगर आप भेजेंगे भी तो मुझे नहीं मिल पाएंगी क्योंकि मैंने सभी विदेशी विचारों, परम्पराओं,वस्तुओं,आविष्कारों का बहिष्कार कर दिया है। मैंने अपना मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया है। मैंने अपना आईपैड कूड़ेदान में डाल दिया है। मैंने अपना कंप्यूटर टुकड़े टुकड़े कर दिया है। एसी की जगह ताड़ का पंखा ले आया हूँ।
मुझे इस बात का दुख है कि मैंने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा अंग्रेजी में प्राप्त की थी क्योंकि नववर्ष की तरह अंग्रेजी भी अंग्रेजों की भाषा है,विदेशी है। पर मैं इंजीनियर बना था। नौकरी मिली थी। चीफ इंजीनियर के पद से अवकाश प्राप्त किया था। मुझे दुख होता है कि मैंने ऐसा क्यों किया। मुझे चाहिए था मैं गुरुकुल में जाकर शिक्षा प्राप्त करता। लेकिन तब मुझे नौकरी कहां मिलती? वेतन कहां से मिलता? कोठी कैसे बनाता? गाड़ी कैसे खरीदता? बच्चों को अच्छे स्कूल में कैसे पढ़ाता? 
पर कोई बात नहीं, पुरानी गलतियों पर मुझे दुख है पर आगे कभी ऐसा नहीं करुंगा। मैंने अपने घर की बिजली कटवा दी है क्योंकि बिजली भी विदेशी है।अब मैं अपने फ्लैट में असली घी के दीप जलाता हूं और पूरा वातावरण बहुत शुद्ध हो गया है। मैंने अपनी कार को बेच दिया है और एक बैलगाड़ी खरीदी है जिस पर मैं यात्रा करता हूँ।
कृपया मुझे मेरे नव वर्ष की शुभकामनाएं कागज़ पर नहीं ताड़ के पत्ते पर लिख कर किसी वाहक के हाथ भिजवाएं तभी स्वीकार की जाएंगी। कागज का आविष्कार भी हमारे देश में नहीं हुआ है। यह भी विदेशी है। इस कारण अब मैं ताड़पत्र पर ही लिखता हूं। पेन या पेंसिल का प्रयोग नहीं करता।
धन्यवाद आभार
आपका
..............
(यह एक मित्र का संदेश है जो उन्होंने मुझे भेजा है उनका नाम बताए बिना साझा कर रहा हूंअ.व.)
-----------------------------------------------
असग़र वज़ाहत साहब की फेसबुक वाल से साभार। 
आरेखण एवं चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर  (2018 की पहली पोस्ट)


29 दिस॰ 2017

भविष्य की सम्भावनाये और उत्तर प्रदेश की राजनीती ?


भाई श्री चंद्रभूषण सिंह यादव जी के आलेख को उनके फेसबुक पेज से यहां ले रहा हूँ क्योंकि उनके सवाल भावी राजनीती के लिए जरुरी हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में समाजवादी सोच की बजाय भैया भाभी फैक्टर प्रभावी हो गया है और इस प्रभाव में अल्पमतों क पार्टी बहुमत में ही नहीं प्रचंड बहुमत में उत्तर प्रदेश में आ गयी है। 
यह बात अभी अधूरी है जब तक यह पड़ताल न हो की क्या उत्तर प्रदेश के भैया भाभी के यहाँ से स्वर्ण राजनीती के षडयंत्रकारी अभी भी वहीँ विराजमान हैं ? भाई चंद्रभूषण से मेरा सवाल इन्ही तथ्यों को लेकर है क्योंकि उनका आना जाना अंदर तक है। 
-डॉ.लाल रत्नाकर 



-चंद्र भूषण सिंह यादव : समाजवादी कार्यकर्ता और समाजवादी धारा के प्रबुद्ध स्कॉलर
इनकी इस राय को कैसे झुठलाया जा सकता है -
"क्या पिछली 5 साल की सरकार ने पिछडो / वंचितों को सर्वाधिक नुकसान नही पंहुचाया है ? क्या उसी के कारण इनका (सपा और बसपा) का सत्ता से जाना सही नही है ? आप / कोई कैसे आंख मूंद सकते हैं इन ज्वलन्त सवालों से?"
-चंद्र भूषण सिंह यादव 

"क्या पिछली 5 साल की सरकार ने पिछडो / वंचितों का सर्वाधिक नुकसान नही पंहुचाया है ? क्या उसी के कारण सत्ता जाना सही नही है ? आप कैसे आंख मूंद सकते हैं इन ज्वलन्त सवालों से?"
-चंद्र भूषण सिंह यादव 

एक विमर्श-
"हिंदुत्व की राह पर चलेगी सपा"

-सवाल खबर पर नही वरन हमारी मंशा पर है....


उत्तरप्रदेश विधानसभा व विधानपरिषद में चले सत्तापक्ष व विपक्ष के तकरार में हिन्दू धर्म से मुतल्लिक सवालों पर असली-नकली हिन्दू समर्थक बनने की होड़ को देखते हुए किसी अखबार ने यह समीक्षा लिख डाली कि "हिंदुत्व की राह पर चलेगी सपा, भाजपा को साबित करेगी हिन्दू विरोधी",मैंने इस समीक्षात्मक खबर पर जो पोस्ट डाला है उस पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।


मेरे लिखने का जो आशय है वह केवल अखबार में छपी खबर नही बल्कि विगत 5-6 वर्षो में सपा की बनी छबि व कार्य प्रणाली है।यदि किसी साथी को मेरे द्वारा लिखे गए व उठाये गए सवालों में कोई त्रुटि नजर आ रही हो तो वे बताएं।



मैंने जो बातें और शंकाये जताई हैं क्या वे गलत हैं?क्या पिछली 5 साल की सरकार ने पिछडो/वंचितों का सर्वाधिक नुकसान नही पंहुचाया है?क्या उसी के कारण सत्ता जाना सही नही है?आप कैसे आंख मूंद सकते हैं इन ज्वलन्त सवालों से?


रही बात "आबादी के अनुपात में आरक्षण" के मुद्दे पर अखिलेश जी द्वारा बोलने की तो मुझे कबड्डी का खेल याद आता है।कबड्डी के खेल में जो रनर होता है वह केवल डेड लाइन छूता नही है बल्कि कइयों को मारकर आता है जबकि जो कमजोर खिलाड़ी होता है वह जैसे-तैसे डेड लाइन छूकर खुद मरने य पकड़े जाने के डर से भाग आता है।अखिलेश जी बेशक 2-3 बार आबादी के अनुपात में आरक्षण की बात किये हैं पर ठीक वैसे ही जैसे कबड्डी का कमजोर खिलाड़ी डेड लाइन छूकर भाग आता है।क्या इस आबादी के अनुपात में आरक्षण के सवाल को प्रदेश सम्मेलन या राष्ट्रीय सम्मेलन के राजनैतिक/आर्थिक प्रस्ताव में स्थान दिया गया?क्या इस मुद्दे को किसी सार्वजनिक कार्यक्रम या सभा आदि में मजबूती से रखा गया?क्या प्रमोशन में आरक्षण के विरोध की तरह संसद,सड़क,सम्मेलन,रैली आदि में प्रमुखता से इस पर बोला गया?क्या कभी इस मुद्दे पर कोई प्रेस कांफ्रेंस किया गया?क्या कभी इस पर कोई प्रेस नोट जारी हुआ?

क्या समाजवादी पार्टी ने जातिवार जनगणना के सवाल पर कोई आंदोलन किया?आज हमारी दुर्गति उच्च व सर्बोच्च न्यायालय में हमारे न्यायाधीश न होने को लेकर है।यदि दलित चीफ जस्टिश न होते तो ताज कॉरिडोर में मायावती जी जेल नही होती क्या?यदि पिछड़े चीफ जस्टिश एमएच कानिया न होते तो मण्डल लागू होता क्या?क्या इस सवाल पर कोई आंदोलन हुवा,रणनीति बनी?

मण्डल कमीशन को पूर्णतया लागू करवाने की जिम्मेदारी किसकी है?क्या मण्डल को पूर्णतया लागू करने का अभियान चला या अब भी सोचा जा रहा है?आखिर कौन सी हमारी बात उठाने वाला कोई नही रह जायेगा?
विधान सभा,व विधान परिषद में पिछडो,दलितों,अल्पसंख्यको के मुद्दों पर कितनी बहस सपा ने चलाई है?क्या स्ट्रेटजी सपा ने बनाई थी,यही कि हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा को घेरना है?आखिर सपा आबादी के अनुपात में आरक्षण के सवाल पर ही सदन में भाजपा को क्यो नही घेरी?

भाजपा ने धम्म यात्रा निकाला।इंग्लैंड के बाबा साहब का आवास खरीद स्मारक बना दिया,यूपी में हर कार्यालय में अम्बेडकर साहब का चित्र लगाने का फरमान जारी कर दिया और सपा अपने कार्यालय में अम्बेडकर साहब की एक अदद मूर्ति भी नही लगा सकी।अम्बेदकर जयंती व निर्वाण दिवस पर सपा द्वारा कोई भव्य कार्यक्रम हुआ हो तो बताएं?किन मुद्दों की बात कर रहे हैं आप?

बार-बार यही रट क्यो लगी हुई है कि मैं भी गोभक्त हूँ,मैं भी हनुमान भक्त हूँ?राजनीति वंचितों को हक दिलवाने के लिए होता है या गोभक्ति,हनुमान भक्ति दिखाने के लिए?भक्ति अपने घर मे करते रहिए या भाजपाइयों को करने दीजिए,आप तो पिछडो,दलितों,अल्पसंख्यको,वंचितों,सामाजिक न्याय,धर्मनिरपेक्षता पर सोचिए।क्यो खामख्वाह उन्ही के एजेंडे में बंधे जा रहे हैं?

मुझे समाजवादी पुरखो ने बताया है कि इमरजेंसी के खिलाफ हुए जन विद्रोह के समय जब जयप्रकाश नारायण जी देवरिया गए थे तो कुछ लोगो ने उनसे "देवरहवा बाबा"से मिलने की बात कही थी।जयप्रकाश नारायण जी ने उस कथित साधू से मिलने से इनकार कर दिया था।यह समाजवादी चरित्र है जबकि इंदिरा जी उस देवरहवा बाबा के वहां माथा पटक आयी थीं।केवल जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र बना देने से समाजवाद नही आ जायेगा,वैसा चरित्र बनाना पड़ेगा।जहां ऊंचा देखा वहीं माथा पटक दिया,यह समाजवादी चरित्र थोड़े न है।
मुद्दों पर संघर्ष हो।कबड्डी के खेल की तरह मजबूर खिलाड़ी बन डेड लाइन छूने पर शाबाशी देने की बजाय मजबूत प्लेयर बन कई को डेड करने में वंचित समाज की भलाई और सपा का हित है।

गलतियों को छुपाये नही बल्कि गलती पर चोट करें।आत्म समीक्षा हो।जहां कमजोरी हो उसमे सुधार हो।हमे मुख्यमंत्री थोड़े न बनना है।मुख्यमंत्री तो अखिलेश जी को ही बनना है।हम तो उन्ही के लिए चिंतित हैं पर एक जिम्मेदार साथी की तरह न कि चाटुकार स्व हितसाधक की तरह। लोहिया जी ने कहा था कि "सुधरो या टूटो।"

----------------------------------------------------------

गजब हैं आप भी श्री अखिलेश यादव जी !

भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला आप सपाई हिंदुत्व से करेंगे ?

भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला आप सपाई हिंदुत्व से करेंगे ?


क्या अखिलेश जी !आप भी हद कर देते हैं।अब आप भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला 2019 में सपाई हिंदुत्व से करेंगे?आपकी कार्यप्रणाली और आपके नेता प्रतिपक्ष श्री रामगोविंद चौधरी जी के व्यक्तव्यों को देखकर एजेंसी को यह समीक्षात्मक खबर छापनी पड़ी है कि सपा हिंदुत्व की राह चलेगी।मैंने आपसे मुतल्लिक यह बयान जनेश्वर मिश्र पार्क घूमते समय पढा।मै आपसे सम्बंधित इस बयान "हिंदुत्व की राह पर चलेगी सपा, भाजपा को साबित करेगी हिन्दू विरोधी" पढ़कर बड़ी देर तक हंसा फिर आंखे डबडबा गयीं कि आखिर क्या हश्र होने वाला है पिछड़ो/दलितों/अल्पसंख्यको की राजनीति का?क्या अब कोई दूसरा अम्बेडकर,कांशीराम,लोहिया,पेरियार, ललई सिंह यादव,फुले,छत्रपति शाहू जी,वीपी सिंह,रामस्वरूप वर्मा,जगदेव कुशवाहा आदि नही जन्मेगा?



क्या अब बहुजन की राजनीति करने वाले लोग आप जैसे ही होंगे?क्या अब आरक्षण,सामाजिक न्याय,भागीदारी का सवाल इतिहास बन जायेगा?क्या अब सत्ता के लिए सभी के सभी हिन्दू-हिन्दू ही रटेंगे?क्या अब विचारधारा के लिए कोई जोखिम उठाने की जहमत नही मोल लेगा?क्या कोई अब अम्बेडकर की तरह "आरक्षण" {अनुच्छेद 340,341,342,15(4),16(4)} के प्राविधान जैसा कुछ करने वाला न होगा?क्या अब सवर्ण लोहिया की तरह कोई यह न बोलेगा कि "सोशलिस्टों ने बांधी गांठ,पिछड़े पावें सौ में साठ"?क्या अब कोई कांशीराम की तरह यह नही कहेगा कि "जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी"?क्या अब कोई वीपी सिंह की तरह "मण्डल" जैसा कोई कानून लागू करने की हिम्मत नही करेगा?


अखिलेश जी! आप विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर इंजीनियर व्यक्ति हैं पर आप बिल्ली के रास्ता काटने से डर जांय, सत्ता जाने के डर से नोएडा न जांय,खुद को सबसे बड़ा हनुमान भक्त बताये,हिंदुत्व की डगर अपनाएं,गोभक्त बन जांय तो मुझे लगता है कि अब समाजवाद,लोहियावाद का यह सबसे बुरा दिन होगा।
अखिलेश जी!आप हिंदुत्व की राह चलेंगे पर जब आप मुख्यमंत्री आवास खाली करेंगे तो वह आप जैसे हिन्दू के रहने से अपवित्र होने के कारण गंगाजल व गोमूत्र से उसे धुला जाएगा।क्या आपको अभी भी हिंदुत्व में कुछ शेष बचा दिख रहा है क्या?

अखिलेश जी!आप हिंदुत्व की राह चलेंगे।जानते हैं हिंदुत्व मतलब क्या होता है?हिंदुत्व का मतलब प्रभु वर्ग के लिए सुरक्षा,सम्मान,सम्पत्ति,शिक्षा,ब्यापार,सत्ता आदि की गारन्टी।

अखिलेश जी!आपने अपनी पिछली 5 साल की सरकार में हिंदुत्व पर चलने में कोई कोर-कसर छोड़ा था क्या?आपने हिंदुत्व के लिए सम्पूर्ण पिछड़ों को समाजवादी पेंशन,लैपटॉप,कन्या विद्याधन,जनेश्वर मिश्र व लोहिया गांव व आवास में आरक्षण से विरत कर सामान्य कटेगरी में डाल दिया था।आपने हिंदुत्व को खुश रखने के लिए पिछडो के पीसीएस में त्रिस्तरीय आरक्षण को खत्म कर दिया था।आपने हिंदुत्व की हिफाजत के लिए पदोन्नति में आरक्षण की ऐसी की तैसी कर डाली थी।आपने सरकारी खर्चे से तीर्थयात्राएं करवायीं थीं।पिछडो की बैक लाग नियुक्ति नही की गई।सिद्धार्थ विश्वविद्यालय-सिद्धार्थनगर में सारी नियुक्तियां ब्राह्मण की कर दी गईं।आरक्षित पदों में 1.5 या इससे आगे 1.99 तक को 2 की बजाय एक ही पद मानने का सर्कुलर आपकी सरकार ने ला दिया था। अयोध्या,मथुरा,बनारस,कुम्भ आदि में सरकारी धन हिंदुत्व हित मे पानी की तरह बहाया था लेकिन अखिलेश जी! आपको अभिजात्य वर्गो ने कितना वोट दिया?आपने पिछडो और दलितों का जितना नुकसान अपने सरकार में किया उससे लाभान्वित कितना अगड़ा आपको वोट दिया?क्या इतना सब करने के बावजूद आप अहीर से कुछ और बन सके?

अखिलेश जी!आपने अभिजात्य समाज को 5 साल सर पर बिठाए रखा,अभी भी आपके अगल-बगल मौजूद ये अभिजात्य लोग आपको हिंदुत्व की राह चल करके सत्ता दिलाने का स्वप्न दिखा रहे हैं।अखिलेश जी! आप मृग मरीचिका से वाकिफ होंगे क्योंकि लायन सफारी बनाने वाले लायन के डियर डीयर की कहानी जरूर सुने होंगे।अखिलेश जी!रेगिस्तान में तपती गर्मी में जैसे हिरन गर्मी की ऊष्मा से उपजे रेखाओं को पानी समझ दौड़ता रहता है पर वह पानी नही पाता वैसे ही आपके लिए हिंदुत्व मृग मरीचिका साबित होगा और आप 2019 एवं 2022 में हिंदुत्व रूपी मृग मरीचिका में झुलस के रह जाएंगे पर सत्ता रूपी पानी नही मिलेगी।

अखिलेश जी! मैंने सुना है कि लोग गलतियों से सीखते हैं पर आप पता नही क्यो गलतियों से सीखने की बजाय उसे ही दुहराते जा रहे हैं।अखिलेश जी!आपने 5 साल की अपनी सरकार में पिछड़ा शब्द का नाम तक नही लिया,दलित को अपने दरवाजे से खदेड़ दिया,अल्पसंख्यको के मसायल को हल करने से बचते रहे लेकिन क्या आप यह सब करने के बावजूद 2012 में सरकार बनाने के बाद शहरों में अधिकाधिक अभिजात्य वर्गो की उपस्थिति वाले नगर निकाय चुनावों में कुछ कर पाए,2014 लोकसभा चुनाव में अभिजात्य वर्गो का दुलारा बन पाए,2017 विधानसभा चुनाव में सवर्ण परस्ती की हद करने के बावजूद सवर्ण वोट पाए या अभी 2017 में सम्पन्न नगर निकाय चुनाव में इन अभिजात्य वर्ग के वोटों को अपने पाले में अपनी सवर्ण परस्ती,नोटबन्दी,जीएसटी आदि के बावजूद अपनी तरफ ला पाए?

अखिलेश जी! अभी गुजरात चुनाव सम्पन्न हुआ है। राहुल गांधी जी गुजरात मे हिंदुत्व का काट हिंदुत्व से करने चले थे।राहुल जी के मंदिर-मन्दिर परिक्रमा तथा नोटबन्दी,जीएसटी,व्यवसायिक मंदी आदि के बावजूद भाजपा का हिंदुत्व जीत गया क्योंकि हिंदुत्व का पेटेंट अहीर,चमार या पारसी/ईसाई आदि से जन्मे स्वयम्भू जनेऊधारी राहुल गांधी जी के पास नही है,वह नागपुर के सावरकर/गोलवरकर व भागवत को प्राप्त है।अखिलेश जी!आप भी गुजरात चुनाव मे हिंदुत्व की ही राह चले,आदिवासी/पिछड़े/दलित/अल्पसंख्यक बस्ती में जाने की बजाय द्वारिकाधीश की घण्टी बजाया,परिणाम क्या आया नोटा से भी कम वोट पाए आपके पांचो उम्मीदवार।

अखिलेश जी!आप भाजपा को हिंदुत्व विरोधी साबित करेंगे? क्या है आपके पास?कोई वैचारिक पाठशाला है आपके पास?कोई कैडराइज फोर्स है आपके पास सिवाय दिशाहीन जवानी कुर्बान गैंग के?बालू की भीत पर बिना विचार,कैडर के चले हैं भाजपा को हिंदुत्व विरोधी सिद्ध करने आप?

अखिलेश जी!आप जान रहे होंगे कि भाजपा के पास कट्टर 10 करोड़ हिन्दू सदस्य हैं।केंद्र के साथ 19 राज्यो में उनकी सरकार है।प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,सभी राज्यपाल,लोकसभा / राज्यसभा सभापति उनके कैडराइज हिन्दू स्वयंसेवक हैं। भाजपा के पास 1631 विधायक,283 सांसद हिंदुत्व वाले हैं।भारतीय जनता पार्टी की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व की यूनिवर्सिटी है जिसके पास भारतीय मजदूर संघ,राष्ट्रीय सेविका समिति,सेवा भारती,दुर्गा वाहिनी,बजरंग दल,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,विश्व हिंदू परिषद,स्वदेशी जागरण मंच,सरस्वती शिशु मंदिर, विद्या भारती,बनवासी कल्याण आश्रम,मुस्लिम राष्ट्रीय मंच,अनुसूचित जाति मोर्चा,लघु उद्योग भारती,भारतीय विचार केंद्र,विश्व सम्बाद केंद्र,गायत्री पीठ,सन्त अखाड़ा परिषद,सिख संगठन,विवेकानन्द केंद्र,महिला मोर्चा आदि सैकड़ो अनुसांगिक संगठन हैं अफलेटेड महाविद्यालयों की तरह हैं।

अखिलेश जी!भाजपा के पास 28500 सरस्वती विद्या मंदिर,2 लाख 80 हजार आचार्य,49 लाख छात्र,600 प्रकाशन समूह,1लाख पूर्व सैनिक,6 लाख 90 हजार कारसेवा करने वाले जंगजू बजरंगी व विहिप के सदस्य हैं।भाजपा के पास 4000 अविवाहित पूर्णकालिक/ईमानदार/मिशनरी हिंदुत्व को समर्पित स्वयंसेवक हैं जिन्होंने अपना सारा जीवन भाजपा/संघ को दान दे रखा है।भाजपा की मातृ संस्था रोजाना सुबह हथियार सहित निश्चित ड्रेस में पूर्ण अनुशासन के साथ 56 हजार 859 शाखाये लगाती है जहां 55 लाख 20 हजार स्वयंसेवक रोजाना भाजपा/संघ के लिए मरने-जीने की कसमें खाते हैं।

अखिलेश जी!देश भर के लाखों मंदिरों के समस्त साधु,सन्त,महात्मा,शंकराचार्य,जगतगुरु भाजपा के साथ हैं।सारी प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,सभी उद्योगपति भाजपा के साथ हैं।देश का सम्पूर्ण सवर्ण,प्रभु वर्ग,अभिजात्य तबका भाजपा के साथ है फिर आप किस गफलत के शिकार हैं?कौन आप जैसे "अहीर" के हिंदुत्व की बात सुनेगा। किसके जरिये भाजपा के इस जाल से आप मुकाबला करेंगे?

अखिलेश जी ! मुझे समझ नही आता है कि आप राहुल गांधी जी की गुजरात वाली गलती क्यो दुहराने पर आमादा हैं।अखिलेश जी! आपको मेरी बात कितनी अच्छी लगेगी यह तो मैं नही जानता हूँ लेकिन मुझे आप के वैचारिक दरिद्रता पर रोना आता है।जिसके सवर्ण पुरखो ने हिंदुत्व के मुकाबले सोशल जस्टिश,भागीदारी,आरक्षण जैसे अकाट्य,अमोघ हथियार दे रखे हो वह हिंदुत्व का काट हिंदुत्व में ढूंढ रहा हो तो रोना ही आएगा।

अखिलेश जी! देश बड़े भयावह दौर में है।संविधान बदलने की कोशिशें जारी हो गयी हैं।आरक्षण के खात्मे व दलितों/पिछडो की उन्नति को रोकने का प्रयत्न जोरदार तरीके से चल पड़ा है।ईवीएम के जरिये मतदान को बेमतलब बनाया जा रहा है।लोकतंत्र का गला घोंटने का दौर चल पड़ा है।आप यदि सचमुच चिंतित हैं देश के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक ढांचे की बचाने के प्रति तो अखिलेश जी!बहुजन बुद्धिजीवियों को आमंत्रित करिए,चाटुकारों को किनारे करिए।

अखिलेश जी! 2019 मे भाजपा को शिकस्त देना जरूरी है जो सामाजिक न्याय के एजेंडे से ही पूरा होगा।जातिवार जनगढ़ना, आबादी के अनुपात में आरक्षण,प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण,उच्च न्यायपालिका में आरक्षण,पदोन्नति में आरक्षण आदि सवाल जब बलवती तरीके से उठेंगे तो सवर्ण हकमार हिन्दुओ को छोड़ करके 85 प्रतिशत पिछड़ा/दलित हिन्दू तथा अल्पसंख्यक खुद ब खुद हिंदुत्व की ऐसी की तैसी कर डालेगा।
अखिलेश जी!अपनी इन बयानबाजियों से सेक्युलर व सोशल जस्टिश समर्थक ताकतों को निराश न करिए बल्कि बहुजन बुद्धिजीवियों को बुलाइये,परामर्श कीजिये और कम्युनल/अनजस्टिश लोगो से बचिए वरना वे खुद तो नही डूबेंगे पर आपको और समस्त बहुजन नेतृत्व व उनके वर्गीय हितों को नेस्तनाबूद कर डालेंगे।

अखिलेश जी!मै आपका कोई प्रतिद्वंदी नही हूँ।मैं आपको गद्दी पर बैठे हुए देखना चाहता हूं।आप जैसा सहृदय व्यक्ति मुख्यमंत्री क्या प्रधानमंत्री बने ऐसी मेरी चाहत है लेकिन अखिलेश जी!विचारधारा के प्रति कठोरता होनी चाहिए,सहृदयता का फार्मूला विचारधारा के साथ नही चल सकता।मुझे जब लगता है वैचारिक विचलन या फिसलन हो रही है तो मैं आगामी दुर्घटना का आभास समझते हुए लिख डालता हूँ जो शायद नश्तर की तरह चुभता लगता व दिखता है पर किसी घाव के इलाज हेतु नश्तर चलाना मजबूरी होती है।वैचारिक दृढ़ता के साथ 2019 मे कम्युनल ताकतों से मुकाबला हो इसी उम्मीद के साथ-
जय भीम! जय मण्डल !!
जय भारत!!!

समर्थक