01/09/2009

''महाभारत'' के दंश |

''महाभारत'' के दंश |
डॉ.लाल रत्नाकर
समय और सरोकार अपने आप में जुड़े हुए है,जब हम अपने किसी करीबी के लिए सोचते है तो कौन कौन से तत्त्व काम करते है जिससे मेरी सोच प्रभावित होती है, महाभारत के समय इसका जबरदस्त प्रदर्शन हुआ जितने बलशाली योद्धा नैतिक पुरुष जिन्हें महापुरुष के रूप में हम आज तक मानते है, तब वह भी मजबूर थे जो आज हो रहा है वह पहले भी रहा होगा यथा- महाभारत की विशालता और दार्शनिक गूढता न सिर्फ़ भारतीय मूल्यों का संकलन है बल्कि हिन्दू धर्म और वैदिक परंपरा का भी सार है। महाभारत की विशालता का अंदाजा उसके प्रथम पर्व में उल्लेखित एक श्लोक से लगाया जा सकता है : "जो यहाँ (महाभारत में) है वह आपको संसार में कहीं न कहीं अवश्य मिल जायेगा, जो यहाँ नहीं है वो संसार में आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा"
महाभारत सिर्फ राजा-रानी, राजकुमार-राजकुमारी, मुनियों और साधुओं की कहानी से बढकर कहीं ज्यादा व्यापक और विशाल है, इसके लेखक व्यास का कहना है कि महाभारत धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की कथा है। कहानी की निष्पत्ति मोक्ष पर जाकर होती है जो हिन्दुओं द्वारा मानव जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।परन्तु आज भी हम सचेत नहीं हो पा रहे है और नित नए महाभारत की रचना में संलग्न है |
पॄष्ठभूमि और इतिहास-
कहा जाता है कि यह महाकाव्य, भगवान वेद व्यास, जो स्वयं इस महाकाव्य में एक प्रमुख पात्र हैं, द्वारा बोलकर, भगवान गणेश द्वारा लिखवाया गया ऐसा महाभारत के प्रथम अध्याय में उल्लेखित है. कहा जाता है कि जब व्यास ने भगवान गणेश के सामने यह प्रस्ताव रखा था तो गणेश तुरन्त तैयार हो गये थे, लेकिन शर्त यही थी कि व्यास कथा कहते समय एक पल भी विश्राम के लिये नहीं रुकेंगे. व्यास ने भी इस शर्त को स्वीकार कर लिया लेकिन उन्होंने भी भगवान गणेश के साथ एक शर्त रख दी कि वे लिखने से पहले उनके कहे वाक्यों को पूरी तरह समझने के बाद ही लिखेंगे. इस तरह लिखवाते समय व्यास को कुछ सोचने का मौका मिल गया. यह कथा जनमानस में प्रचलित एक कथा से भी मेल खाती है जिसमें बताया गया है कि गणेश जी का एक दाँत कैसे टूटा (गणेश जी की पारंपरिक छवि), कहा जाता है कि महाभारत लिखने के चक्कर में जल्दबाजी में ताकि लिखने में बाधा न आये एक बार कलम उनके हाथ से छूट गयी और वे अपना एक दाँत तुड़वा बैठे।
ऐसा माना जाता है कि इस महाकाव्य की शुरुआत एक छोटे सी रचना जय से हुई थी. हालाकि इसकी कोई निश्चित तिथी मालूम नहीं है लेकिन इसे आमतौर पर वैदिक युग में लगभग १४०० इसवी ईसा पूर्व के समय का माना जाता है। विद्वानों ने इसकी तिथी निरधारित करने के लिये इसमें वर्णित सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहणों के बारे में अध्ययन किया है और इसे ३१ वीं सदी इसा पूर्व का मानते हैं, लेकिन मतभेद अभी भी जारी है।
इस काव्य में बौद्ध धर्म का वर्णन नहीं, पर जैन धर्म का वर्णन है, अतः यह काव्य गौतम बुद्ध के काल से पहले अवश्य पूरा हो गया था। [१]
शल्य जो महाभारत में कौरवों की तरफ से लड़ा था उसे रामायण में वर्णित लव और कुश के बाद की ५० वीं पीढ़ी का माना जाता है. इसी आधार पर कुछ विद्वान महाभारत का समय रामायण से १००० वर्ष बाद का मानते हैं. तिथियाँ चाहे जो भी हों इन्हीं काव्यों के आधार पर वैदिक धर्म का आधार टिका है जो बाद में हिन्दू धर्म का आधुनिक आधार बना है।
आर्यभट के अनुसार महाभारत युद्ध ३१३७ ईपू में हुआ। कलियुग का आरम्भ कृष्ण के इस युद्ध के ३५ वर्ष पश्चात निधन पर हुआ।
ज्यादातर अन्य भारतीय साहित्यों की तरह यह महाकाव्य भी पहले वाचिक परंपरा द्वारा हम तक पीढी दर पीढी पहुँची है. बाद में छपाई की कला के विकसित होने से पहले ही इसके बहुत से अन्य भौगोलिक संस्करण भी हो गये हैं जिनमें बहुत सी ऐसी घटनायें हैं जो मूल कथा में नहीं दिखती या फिर किसी अन्य रूप में दिखती है।
महाभारत: अनुपम काव्य-
कुरुक्षेत्र युद्ध ग्रन्थचित्र
इस महाकाव्य की मुख्य कथा हस्तिनापुर की गद्दी के लिये दो वंश के वंशजों कौरव और पाण्डव के बीच का आपसी संघर्ष था. हस्तिनापुर और उसके आस-पास का इलाका आज के गंगा से उत्तर यमुना के आस-पास दोआब का ईलाका माना जाता है. जहाँ आजकल की दिल्ली भी स्थित है. इन भाइयों के बीच की लड़ाई आज केहरियाणा स्थित कुरुक्षेत्र के आस-पास हुई मानी गयी है जिसमें पांडव विजयी हुये थे। महाभारत की समाप्ति भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु और यदु-वंश की समाप्ति तथा पांडवों के स्वर्ग गमन के साथ होती है। पांडव की यह यात्रा मोक्ष प्राप्ति को दर्शाता है जो हिन्दुओं के जीवन का सबसे प्रमुख लक्ष्य माना जाता है। इस घटना को कलि-युगके आरंभ का भी संकेत माना गया है क्योंकि इससे महाभारत के अठारह दिन की लड़ाई में सत्य की सत्ता भंग हुयी थी। इस कलि-युग को हिन्दुओं के अनुसार सबसे अधम युग माना गया है जिसमें हर तरह के मूल्यों का क्षरण होता है और अंत में कल्कि नामक विष्णु के अवतार इन सबसे हमारी रक्षा करेंगें। हिन्दू इतिहास के सबसे प्रमुख स्तंभों का इस लड़ाई में अनैतिकता (कौरवों) का साथ देना इसकेए वजह माना जाता है।
कथा-
महाभारत की कथा में एक साथ बहुत सी कथाएँ गुंफित हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख कथायें निम्नलिखित हैं:-
सबसे प्रमुख कहानी कर्ण की कहानी है। कर्ण एक महान योद्धा थे किन्तु अपने गुरु से अपनी पहचान छुपाने के कारण उनकी शक्ति गौण हो गयी थी।
भीष्म की कहानी जिसने अपना राजपाट अपने पिता की वजह से त्याग दिया था, क्योंकि उसके पिता ने एक मछुआरे की कन्या से विवाह किया था। भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी और उन्हें अपने पिता शान्तनु से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ था।
भीम की कहानी, जो पाँच पाँडवों मे से एक थे और अपने बल और स्वामिभक्ति के कारण जाने जाते थे।
युधिष्ठिर की कहानी: युधिष्ठिर जो पांचों पांडवों मे सबसे बड़े थे उन्हें धर्मराज के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने कभी जीवन में झूठ का सहारा नहीं लिया। और महाभारत के मध्य कैसे केवल एक झूठ के कारण कैसा परिणाम भुगतना पड़ा था।
संरचना
आदिपर्व - परिचय, राजकुमारों का जन्म और लालन-पालन।
सभापर्व - दरबार की झलक, द्यूत क्रीड़ा और पांडवों का वनवास। मय दानव द्वार इंद्रप्रस्थ में भवन का निर्माण।
अरयण्कपर्व (अरण्यपर्व) - वनों में १२ वर्ष का जीवन।
विराटपर्व - राजा विराट के राज्य में अज्ञातवास।
उद्योगपर्व- युद्ध की तैयारी।
भीष्मपर्व - महाभारत युद्ध का पहला भाग, भीष्म कौरवों के सेनापति के रूप में (इसी पर्व में भगवद्गीता आती है)।
द्रोणपर्व - युद्ध जारी, द्रोण सेनापति।
कर्णपर्व - युद्ध जारी, कर्ण सेनापति।
शल्यपर्व - युद्ध का अंतिम भाग, शल्य सेनापति।
सौप्तिकपर्व - अश्वत्थामा और बचे हुये कौरवों द्वारा पाण्डव सेना का सोये हुये में वध।
स्त्रीपर्व - गान्धारी और अन्य स्त्रियों द्वारा मृत लोगों के लिये शोक।
शांतिपर्व - युधिष्ठिर का राज्याभिषेक और भीष्म के दिशा-निर्देश।
अनुशासनपर्व - भीष्म के अंतिम उपदेश।
अश्वमेधिकापर्व - युधिष्ठिर द्वारा अश्वमेध का आयोजन।
आश्रम्वासिकापर्व - धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती का वन में आश्रम के लिये प्रस्थान।
मौसुलपर्व - यादवों की परस्पर लड़ाई।
महाप्रस्थानिकपर्व - युधिष्ठिर और उनके भाइयों की सद्‍गति का प्रथम भाग।
स्वर्गारोहणपर्व - पांडवों की स्वर्ग यात्रा।
इसके अलावा १६,३७५ श्लोकों का एक उपसंहार भी बाद में महाभारत में जोड़ा गया था जिसे हरिवंशपर्व कहा जाता है। इस अध्याय में खास कर भगवान श्री कृष्ण के बारे में वर्णन है।
महाभारत के कई भाग हैं जो आमतौर पर अपने आप में एक अलग और पूर्ण पुस्तक मानी जाती है। मुख्य रूप से इन भागों को अलग से महत्व दिया जाता है :-
भगवद गीता श्री कृष्ण द्वारा भीष्मपर्व में अर्जुन को दिया गया उपदेश।
दमयन्ती अथवा नल दमयन्ती, अरण्यकपर्व में एक प्रेमकथा
कृष्णवार्ता : भगवान श्री कृष्ण की कहानी।
राम रामायण का अरण्यकपर्व में एक संक्षिप्त रूप।
ॠष्य ॠंग एक ॠषि की प्रेमकथा।
विष्णुसहस्रनाम विष्णु के १००० नामों की महिमा शांतिपर्व में।
कुरुवंश वृक्ष
कुरु
गंगा
शांतनु
सत्यवती
पाराशर
भीष्म
व्यास
अंबिका
विचित्रवीर्य
अंबालिका
धृतराष्ट्रb
गांधारी
सूर्य
कुंती
पाँडुb
माद्री
कर्णc
युधिष्ठिरd
भीमd
अर्जुनd
नकुलd
सहदेवd
दुर्योधनe
दुःशला
दु:शासन
(98 अन्य पुत्र)
भारत के बाहर महाभारत
इंदोनेशिया और अन्य देशों में भी महाभारत के देशीय संस्करण हैं। इंदोनेशिया में यह कावी भाषा में हैं।
कृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार माने जाते हैं । कुछ हिन्दू कृष्ण को ईश्वर मानते हैं, और उन पर अपार श्रद्धा रखते हैं ।
सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों को धारण किया। इन अवतारों में उनका सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीकृष्ण का ही था।
यह अवतार उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में लिया था। वास्तविकता तो यह थी इस समय चारों ओर पापकृत्य हो रहे थे। धर्म नाम की कोई भी चीज नहीं रह गई थी। अतः धर्म को स्थापित करने के लिए श्रीकृष्ण अवतरित हुए थे।
श्रीकृष्ण में इतने अमित गुण थे कि वे स्वयं उसे नहीं जानते थे, फिर अन्य की तो बात ही क्या है? ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव-प्रभृत्ति देवता जिनके चरणकमलों का ध्यान करते थे, ऐसे श्रीकृष्ण का गुणानुवाद अत्यंत पवित्र है। श्रीकृष्ण से ही प्रकृति उत्पन्न हुई। सम्पूर्ण प्राकृतिक पदार्थ, प्रकृति के कार्य स्वयं श्रीकृष्ण ही थे। श्रीकृष्ण ने इस पृथ्वी से अधर्म को जड़मूल से उखाड़कर फेंक दिया और उसके स्थान पर धर्म को स्थापित किया। समस्त देवताओं में श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे।
उन्होंने जो भी कार्य किया उसे अपना महत्वपूर्ण कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि उनके अवतीर्ण होने का मात्र एक उद्देश्य था कि इस पृथ्वी को पापियों से मुक्त किया जाए। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने जो भी उचित समझा वही किया। उन्होंने कर्मव्यवस्था को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को ज्ञान देते हुए उन्होंने गीता की रचना की जो आज के कलिकाल में हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
राधास हित कृष्ण, १८वीं सदी की राजसथानी पेंतिंग में
संपूर्ण पृथ्वी दुष्टों एवं पतितों के भार से पीड़ित थी। उस भार को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने एक प्रमुख अवतार ग्रहण किया जो कृष्णावतार के नाम से संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध हुआ। उस समय धर्म, यज्ञ, दया पर राक्षसों एवं दानवों द्वारा आघात पहुँचाया जा रहा था।
पृथ्वी पापियों के बोझ से पूर्णतः दब चुकी थी। समस्त देवताओं द्वारा बारम्बार भगवान विष्णु की प्रार्थना की जा रही थी। विष्णु ही ऐसे देवता थे, जो समय-समय पर विभिन्न अवतारों को ग्रहण कर पृथ्वी के भार को दूर करने में सक्षम थे क्योंकि प्रत्येक युग में भगवान विष्णु ने ही महत्वपूर्ण अवतार ग्रहण कर दुष्ट राक्षसों का संहार किया। वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण अवतरित हुए।
श्रीकृष्ण से सृष्टि का आरंभ
भगवान ने देखा कि संपूर्ण विश्व शून्यमय है। कहीं कोई जीव-जन्तु नहीं है। जल का भी कहीं पता नहीं है। संपूर्ण आकाश वायु से रहित और अंधकार से आवृत्त हो घोर प्रतीत हो रहा है। वृक्ष, पर्वत और समुद्र आदि शून्य होने के कारण विकृताकार जान पड़ता है। मूर्ति, धातु, शस्य तथा तृण का सर्वथा अभाव हो गया है। इस प्रकार जगत्‌ को शून्य अवस्था में देख अपने हृदय में सभी बातों की आलोचना करके दूसरे किसी सहायक से रहित एकमात्र स्वेच्छामय प्रभु ने स्वेच्छा से ही इस सृष्टि की रचना प्रारंभ की।
सर्वप्रथम उन परम पुरुष श्रीकृष्ण के दक्षिण पार्श्व से जगत के कारण रूप तीन मूर्तिमान गुण प्रकट हुए। उन गुणों से महत्तत्त्व अहंकार पांच तन्मात्राएं रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द ये पांच विषय क्रमशः प्रकट हुए। इसके उपरान्त ही श्रीकृष्ण से साक्षात भगवान नारायण का प्रादुर्भाव हुआ। जिनकी अंगकान्ति श्याम थी, वे नित्य तरुण पीताम्बरधारी और विभिन्न वनमालाओं से विभूषित थे। उनकी चार भुजाएं थीं, उन भुजाओं में क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्म विराजमान थे। उनके मुखारबिन्द पर मंद-मंद मुस्कान की छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणों से विभूषित थे। शांर्गधनुष धारण किए हुए थे।
कौस्तुभ मणि उनके वक्षस्थल की शोभा बढ़ा रही थी। श्रीवत्सभूषित वक्ष में साक्षात लक्ष्मी का निवास था। वे श्रीनिधि अपूर्व शोभा को प्रस्तुत कर रहे थे। शरत्‌काल की पूर्णिमा के चंद्रमा की प्रभा से सेवित मुखचन्द्र के कारण वे मनोहर जान पड़ते थे। कामदेव की कान्ति से युक्त रूप-लावण्य उनके सौंदर्य को और भी बढ़ा रहा था। नारायण श्रीकृष्ण के समक्ष खड़े होकर दोनों हाथों को जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।
कृष्ण ने ही अर्जुन को भगवद्गीता का सन्देश सुनाया था ।
उनकी कथा कृष्णावतार में मिलती है।
यदुकुल के राजा।
अचिन्त्य भेदाभेद दर्शन के अनुसार परब्रह्म का दूसरा नाम।
कृष्ण लीलाओं में छिपा संदेश
श्रीकृष्ण लीलाओं का जो विस्तृत वर्णन भागवत ग्रंथ मे किया गया है, उसका उद्देश्य क्या केवल कृष्ण भक्तों की श्रद्धा बढ़ाना है या मनुष्य मात्र के लिए इसका कुछ संदेश है? तार्किक मन को विचित्र-सी लगने वाली इन घटनाओं के वर्णन का उद्देश्य क्या ऐसे मन को अतिमानवीय पराशक्ति की रहस्यमयता से विमूढ़वत बना देना है अथवा उसे उसके तार्किक स्तर पर ही कुछ गहरा संदेश देना है, इस पर हमें विचार करना चाहिए।
श्री कृष्ण एक ऐतिहासिक पुरुष हुए हैं, इसका स्पष्ट प्रमाण हमें छान्दोग्य उपनिषद के एक उल्लेख में मिलता है। वहां (3.17.6) कहा गया है कि देवकी पुत्र श्रीकृष्ण को महर्षि आंगिरस ने निष्काम कर्म रूप यज्ञ उपासना की शिक्षा दी थी, जिसे ग्रहण कर श्रीकृष्ण 'तृप्त' अर्थात पूर्ण पुरुष हो गए थे। श्रीकृष्ण का जीवन, जैसा कि महाभारत में वर्णित है, इसी शिक्षा से अनुप्राणित था और गीता में उसी शिक्षा का प्रतिपादन उनके ही माध्यम से किया गया है।
किंतु इनके जन्म और बाल-जीवन का जो वर्णन हमें प्राप्त है वह मूलतः श्रीमद् भागवत का है और वह ऐतिहासिक कम, आध्यात्मिक अधिक है और यह बात ग्रंथ के आध्यात्मिक स्वरूप के अनुसार ही है। ग्रंथ में चमत्कारी भौतिक वर्णनों के पर्दे के पीछे गहन आध्यात्मिक संकेत संजोए गए हैं।
वस्तुतः भागवत में सृष्टि की संपूर्ण विकास प्रक्रिया का और उस प्रक्रिया को गति देने वाली परमात्म शक्ति का दर्शन कराया गया है। ग्रंथ के पूर्वार्ध (स्कंध 1 से 9) में सृष्टि के क्रमिक विकास (जड़-जीव-मानव निर्माण) का और उत्तरार्ध (दशम स्कंध) में श्रीकृष्ण की लीलाओं के द्वारा व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का वर्णन प्रतीक शैली में किया गया है। भागवत में वर्णित श्रीकृष्ण लीला के कुछ मुख्य प्रसंगों का आध्यात्मिक संदेश पहचानने का यहाँ प्रयास किया गया है।
[संपादित करें]श्रीकृष्ण जन्म
त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता!
श्रीकृष्ण आत्म तत्व के मूर्तिमान रूप हैं। मनुष्य में इस चेतन तत्व का पूर्ण विकास ही आत्म तत्व की जागृति है। जीवन प्रकृति से उद्भुत और विकसित होता है अतः त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में श्रीकृष्ण की भी तीन माताएँ हैं। 1- रजोगुणी प्रकृतिरूप देवकी जन्मदात्री माँ हैं, जो सांसारिक माया गृह में कैद हैं। 2- सतगुणी प्रकृति रूपा माँ यशोदा हैं, जिनके वात्सल्य प्रेम रस को पीकर श्रीकृष्ण बड़े होते हैं। 3- इनके विपरीत एक घोर तमस रूपा प्रकृति भी शिशुभक्षक सर्पिणी के समान पूतना माँ है, जिसे आत्म तत्व का प्रस्फुटित अंकुरण नहीं सुहाता और वह वात्सल्य का अमृत पिलाने के स्थान पर विषपान कराती है। यहाँ यह संदेश प्रेषित किया गया है कि प्रकृति का तमस-तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने में असमर्थ है।
गोकुल-वृंदावन की लीलाएँ
शिशु और बाल वय में ही श्रीकृष्ण द्वारा अनेक राक्षसों के वध की लीलाओं तथा सहज-सरल-हृदय मित्रों और ग्रामवासियों में आनंद और प्रेम बांटने वाली क्रीड़ाओं का विस्तृत वर्णन भागवत में हुआ है। शिशु चरित्र गोकुल में और बाल चरित्र वृंदावन में संपन्न होने का जो उल्लेख है, वह आध्यात्मिक अर्थ की ओर संकेत करता है।
गो-शब्द का अर्थ इंद्रियाँ भी हैं, अतः गोकुल से आशय है हमारी पंचेद्रियों का संसार और वृंदावन का अर्थ है तुलसीवन अर्थात मन का उच्च क्षेत्र (तुरीयावस्था वाले 'तुर' से 'तुरस' और 'तुलसी' शब्द की व्युत्पत्ति व्याकरणसम्मत है)। गोकुल में पूतना वध, शकट भंजन और तृणावर्त वध का तथा वृंदावन में बकासुर, अधासुर और धेनुकासुर आदि अनेक राक्षसों के हनन का वर्णन है।
व्यक्ति और समाज को अपने अंदर व्याप्त आसुरी वृत्तियों के रूप में इनकी पहचान करना होगा तभी आध्यात्मिक-नैतिक शक्ति से इनका हनन संभव होगा और तब ही इस बालरूप श्रीकृष्ण का उद्भव महाभारत के सूत्रधार, धर्मस्थापक, श्रीकृष्ण के रूप में होना संभव होगा।
वृंदावन की कथाओं में कालिया नाग, गोवर्धन, रासलीला और महारास वाली कथाएं अधिक प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण ने यमुना को कालिया नाग से मुक्त-शुद्ध किया था। यमुना, गंगा, सरस्वती नदियों को क्रमशः कर्म, भक्ति और ज्ञान की प्रतीक माना गया है। ज्ञान अथवा भक्ति के अभाव मेंकर्म का परिणाम होता है, कर्ता में कर्तापन के अहंकार-विष का संचय। यह अहंकार ही कर्म-नद यमुना का कालिया नाग है। सर्वात्म रूप श्रीकृष्ण भाव का उदय इस अहंकार-विष से कर्म और कर्ता की रक्षा करता है (गीता- 18.55.58)।
गोवर्धन धारण कथा की आर्थिक, नीति-परक और राजनीतिक व्याख्याएं की गई हैं। इस कथा का आध्यात्मिक संकेत यह दिखता है कि गो अर्थात इंद्रियों का वर्धन (पालन-पोषण) कर्ता, अर्थात इंद्रियों में क्रियाशील प्राण-शक्ति के स्रोत परमेश्वर पर हमारी दृष्टि होना चाहिए। इसी प्रकार गोपियों के साथ रासलीला के वर्णन में मन की वृत्तियां ही गोपिकाओं के रूप में मूर्तिमान हुई हैं और प्रत्येक वृत्ति के आत्म-रस से सराबोर होने को रासलीला या रसनृत्य के रूप में चित्रित किया गया है। इससे भी उच्च अवस्था का- प्रेम और विरह के बाह्य द्वैत का एक आंतरिक आनंद में समाहित हो जाने की अवस्था का वर्णन 'महारास' में हुआ है।
मथुरा आगमन और कंस वध
श्रीकृष्ण को किशोर वय होते न होते कंस उन्हें मरवा डालने का एक बार फिर षड्यंत्र रचकर मथुरा बुलवाता है, किंतु श्रीकृष्ण उसको उसके महाबली साथियों सहित मार डालते हैं। कंस शब्द का अर्थ और उसकी कथा भी संकेत करती है कि कंस देहासक्ति का मूर्तिमान रूप है, जो संभावित मृत्यु से बचने के लिए कितने ही कुत्सित कर्म करता है। मथुरा का शब्दार्थ है- 'विक्षुब्ध किया हुआ।' अतः मथुरा है देहासक्ति से विक्षुब्ध मन। श्रीकृष्ण का कंस वध करने के उपरांत द्वारिका में राज्य स्थापना करने का अर्थ है कि आत्मभाव में प्रवेश के पूर्व देहासक्ति की समाप्ति आवश्यक है।
समुद्र में द्वारिका निर्माण और राज्य स्थापना
कंस वध के बाद श्रीकृष्ण समुद्र के भीतर (अंतः समुद्रे-भा. 10/50/50) द्वारिका का निर्माण करवाते हैं और वहां राज्य स्थापित करते हैं। इतिहास के महापुरुष श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका नगर का समुद्र किनारे या द्वीप पर निर्माण करवाना और कालांतर में उसका समुद्र में डूब जाना (जिसके कुछ अवशेष अभी हाल में ही खोजे गए हैं) उस काल की वास्तविक घटना होगी, किंतु भागवत ने 'समुद्र के अंदर' द्वारिका निर्माण का वर्णन करके स्पष्टतः यहां उसका आध्यात्मिक रूपांतरण प्रस्तुत किया है।
द्वारिका शब्द में द्वार का अर्थ है- साधन, उपाय या प्रवेश मार्ग। समुद्र व्यक्तित्व के गहरे तल- आत्म क्षेत्र को इंगित करता है। अतः आत्म क्षेत्र का प्रवेश द्वार है द्वारिका। इस क्षेत्र में चेतना का प्रवेश होने पर जीवन जीने का जैसा स्वरूप होगा, उसका निरूपण द्वारिका पर श्रीकृष्ण राज्य के रूप में किया गया है। इस क्षेत्र का परिचय हमें महाभारत में श्रीकृष्ण के लोकहितार्थ और धर्मस्थापनार्थ किए गए कार्यों द्वारा तथा गीता के अंतर्गत उनकी वाणी द्वारा कराया गया है। सारांश यह कि व्यक्ति भी संकल्प करे तो उसकी चेतना भी कृष्ण सम विकसित हो सकती है।
जिस महान कुल के गौरव हमारे लिए आधार हो आज की राजनितिक विरासत से हमारा सफाया क्या सन्देश देता है समझने की जरुरत है |

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