समीक्षा


सामाजिक सरोकारों को संजोती एक जुझारू महिला (लेखिका) हैं। 
काव्याह यादव 
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मेरी एक बात समझ में नहीं आती हिंदू धर्म में कहा जाता है कि भारत में जो जातिया है वह सभी के कर्मो के आधार पे बनाई गयी है। अर्थात जिसका जैसा काम था उसकी वैसी ही जाति से उसे बुलाया गया।
मतलब साफ है-
जिसने तेल का काम शुरू किया उसे तेली कहा गया।

जिसने लोहे का काम शुरू किया उसे लोहार कहा गया।
जिसने लकड़ी का काम शुरू किया उसे बढ़ई कहा गया।
जिसने दूध का काम शुरू किया उसे अहिर ( यादव )कहा गया।
जिसने नाप तौल का काम शुरू किया उसे बनिया कहा गया।
जिसने लड़ाई दंगे करना शुरू किया उसे ठाकुर कहा गया।
जिसने मिठाई का काम शुरू किया उसे हलवाई कहा गया।
जिसने मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शुरू किया उसे कुम्महार कहा गया।

ठीक इसी प्रकार सभी जातियाँ बना दी गयी। ये सभी जातियाँ हिंदू धर्म के अन्तरगत बनाई गयी क्योकि उस समय हिंदू धर्म था।
लेकिन आज जातियाँ क्यों नहीं बनाई जाती है । क्या आज के समय में कोई काम नहीं करता है क्या ? जबकि सच्चाई यह है की आज के समय में काम ज्यादा है ।
पर आज क्या है?
आज कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर ,कोई अध्यापक, कोई आर्टिस्ट, गायक, कोई लेखक, नर्तक , कोई सेना में , कोई पुलिस, कोई दरोगा, कोई चपरासी, कोई मेनेजर, कोई वैज्ञानिक , कोई बिजनेस पर्सन और भी इसी तरह बहुत से काम है .
पर आज कोई जाति क्यों नहीं बनाता ??? मेरा तो उन धर्म गुरुओ से अनुरोध है बना दो जातियाँ लोगो के काम के अनुसार।
सारा मामला ही ख़त्म हो जाए चमार , धोबी , पासी, धानुक, अहिर , गड़रिया, तेली, तमोली, कुर्मी का ।
ब्राम्हण वाद का जातियाँ बनाने का मकसद सिर्फ एक ही था वह था अपना काम निकालना ।
अपने सारे काम लोगो से करवाया और उन्हें जाति में बाँट दिया।

आखिर क्या कारण है कि जो भारत के मूल वासी है आज उनके पास कुछ नहीं है । बल्कि जो आदमी बाहर का है यानी कि हमारे देश में आकर बस गया उसके पास सब कुछ है।
ये बाहर से आये हुए आदमी कोई और नहीं सिर्फ 15 % ही है ।
और आज हम सब पे( 85%)अपना हुक्म चला रहे है।
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टिप्पणियाँ ;
डॉ मनराज यादव 
"जो सवर्णअबविजनेस के तौर परजूते की दूकान खोल लिये है,लींड्री चला रहे हैं,पीन की दूकान चला रहे हैं,ेयरी खोलिये हैं मुर्गी पालन कर रहे हैं सुअरपालन कर रहे हैं,कपड़े की दूकानखोस़ल लिये हैं,चपरासी की नौकरी कर रहे हैं,सफाईकर्मी हो गये हैंशैलून खोल लिये हैं,आदि,- इत्यादि,ऐसा करने पर ब्राह्मण,क्षत्रिय या वैश्य ही नहीं रह जायेंगे और अध्यापन करने वाले अहीर चमार आदि ब्राह्मण हो जायेंगे! इसलिये आज कर्मा नुसार जातियाँ नहीं बनाई जा रही हैं! डॉक्टर,इंजीनियरआदि बनकर भीलोग जिस जाति मेंहुये थे ,उसी जाति के माने जाते हैं! यहाँ मनुवादियों के आगे गीता में क.ष्ण कोउद्धृत करने वालेवर्ण के.संबंध में क्या कह सकते हैं! समाज में मनुस्मृति चलती है,गीता नहीं़ कामचोरों ने जाति बनाई है और उस् ईश्वरकी बनाईहुयी प्रचारित करके आज भी अपना उल्लू सीधा कर रही हैं! आजादी के ७० साल बाद भी सामाजिक संरचना में कोईमौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है! इसको उखाड़ ने के लियेमनुवादियों केशास्त्रोंका बहिॉष्कार करना एक प्रमुखउपाय है! शास्त्रो,पुराणों,रामायण,महाभारत में इस व्यवस्था का महिमामंडन किया गया,जिसका सुनना- पढ़ना वर्जित करना पड़ेगा!" 
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मुआँ जो दड़ो' ;
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मुआँ जो दड़ो' का #राजघराना_भैंस_के_गोत्र_वाला_था जिसकी राजमुद्रा थी भैंस के सींग वाला वह सील जिसे अंग्रेजों ने 'पशुपति सील' की गलत संज्ञा दी | वह #महिषासुर सील है, #पशुपति_सील नहीं |
मोहनजोदड़ो की "सभ्यता" ???
मुआँ_जो_दड़ो के पुरातात्विक उत्खनन की रिपोर्ट मेरे पास है | पुरातात्विक रिपोर्ट तो कहती है कि मुआँ जो दड़ो में 69 संरचनात्मक स्तरों का पता चला था जिनमें से #केवल30 स्तरों की खुदाई हो सकी क्योंकि नीचे के 39 स्तर भूगर्भ जल में डूबे हुए हैं ! किन्तु आज भी पाठ्यपुस्तकों में जानबूझकर झूठ पढ़ाया जाता है कि 'मुआँ जो दड़ो' की 'सभ्यता' अति विकसित अवस्था में किसी अज्ञात स्थान से आकर वहाँ अचानक स्थापित हो गयी |
इतना बड़ा झूठ — ताकि भारतीय को पढ़ाया जा सके कि भारत की भूमि में कोई सभ्यता पैदा ही नहीं हो सकती ! म्लेच्छों का वश चलता तो समूचे 'मुआँ जो दड़ो' को ही उठाकर इंग्लैंड या ग्रीस ले जाते |
-👉 दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि जिन 30 स्तरों की खुदाई हो सकी है उनमें भी कुल प्राचीन टीलों में से केवल 13% स्थलों की ही खुदाई की जा सकी | यह तथ्य भी रिपोर्ट में दबा रह गया, पुस्तकों में पढ़ाया नहीं जाता | पुस्तकों में तथ्य नहीं पढाये जातें, धूर्तों के विचार पढाये जाते हैं जिन्हें वे तथ्य के तौर पर प्रस्तुत करके लोगों को बेवकूफ बनाते हैं |
👉फ़िनलैंड और रूस के कई पुरातत्ववेत्ताओं के शोधकार्य मे लिखा था कि 'मुआँ जो दड़ो' का #राजघराना_भैंस_के_गोत्र_वाला_था जिसकी राजमुद्रा थी भैंस के सींग वाला वह सील जिसे अंग्रेजों ने 'पशुपति सील' की गलत संज्ञा दी | वह #महिषासुर सील है, #पशुपति_सील नहीं |
उन्हीं पुरातत्ववेत्ताओं ने यह भी लिखा था कि उस #भैंस_गोत्र_वाले_राजघराने_का_राजमहल_जहाँ_है_उसपर_ईसापूर्व_चार_पाँच_शती_पूर्व_बौद्ध_स्तूप बना दिया गया, अतः खुदाई असम्भव है |
Note👉 ÷ इतने प्राचीन बौद्ध स्तूप को तोड़ने पर संसार भर के बौद्ध हंगामा मचा देंगे | ऐसे पुरातत्ववेत्ताओं के कार्यों और विचारों का यूरोप और भारत के वेद-विरोधी तथाकथित बुद्धिजीवी उल्लेख तक नहीं करते |
#हड़प्पाई_मुद्राओं पर जो #लिपि मिली है उसमें कुछ अन्ध-राष्ट्रवादियों ने वेदमन्त्र होने की कल्पना की है | हड़प्पाई स्थलों में वैदिक यज्ञकुण्ड नहीं मिले हैं | कालीबंगा में सोलह कुण्ड मिले जिनमें "गोजातीय" पशु की हड्डियाँ आदि मिले . रिपोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे अवशेष बैल के थे या नर-भैंस के |
सिन्ध के एक हड़प्पाई स्थल का आजतक नाम है #असुरकोट 'असुर' कोई पृथक नस्ल नहीं था | for example -कंस और श्रीकृष्ण एक ही वंश के थे, किन्तु कंस असुर था |
आधुनिक #सीरिया देश का नाम लैटिन #असीरिया से बना है जिसका वास्तविक उच्चारण असुर था.
मध्यपूर्व और मिस्र की प्राचीन लिपियों को भी आधुनिक_पश्चिम के विद्वानों ने इसी तरह विकृत करके पढ़ा और पढ़ाया है ताकि वैदिक संस्कृति से विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के सम्बन्ध को छुपाया जाय |
मिस्र की प्राचीनतम पिरामिडों की दीवारों पर वैदिक यज्ञ के हवि से देवों की क्षुधा-तृप्ति का भित्ति-चित्र मिलता है तो उसे कोकेन पीने वाले पुरोहितों का चित्र बतलाया जाता है !
कालीबंगा के हड़प्पाई यज्ञकुण्ड को रोमिला थापर ने तन्दूर की भट्ठी कहा, यद्यपि यज्ञकुण्ड की ज्यामिति कैसी होती है यह शुल्वसूत्र के प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में स्पष्ट उल्लिखित है |
👉यह दूसरी बात है कि #हड़प्पाई_यज्ञकुण्ड_वैदिक_नहीं_बल्कि_आसुरी_तन्त्र_के_कुण्ड_हैं | रोमिला थापर को इस बात की जानकारी होती कि वे वैदिक नहीं बल्कि आसुरी हैं तो आज हमारे पाठ्यपुस्तकों में "जय महिषासुर" के अध्याय पढ़ाये जाते और वैदिक आर्यों को विदेशी घोषित करके पूरे भारत को आर्यावर्त के बदले असुरावर्त बनाने का प्रयास किया जाता |
इन वामपन्थी मूर्खों को वाममार्गी 'मुआँ जो दड़ो' के महिषासुरी सम्बन्ध की जानकारी नहीं है तब तो महिषासुर_जयन्ती मनाते हैं ! जानकारी हो जाय तो क्या करेंगे ?
Kavyah Yadav

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