20/02/2010

मुलायम-अमर अलग क्‍यों हुए


मुलायम सिंह और अमर सिंह के अलगाव की कहानी में कई तत्व हैं. अविश्वास है, ग़लतफहमी है, जलन है, आकांक्षा है, महत्वाकांक्षा है, षड्‌यंत्र हैं, दु:ख है, दर्द है और बेबसी है. मुलायम सिंह और अमर सिंह के अलावा इस कहानी के मुख्य पात्र हैं मोहन सिंह, आज़म खान और राम गोपाल यादव. बाद में तो जैसे पूरी समाजवादी पार्टी ही इस कहानी के प्रमुख किरदार में बदल गई. अमर सिंह चौदह साल तक मुलायम सिंह के हमसफर रहे, पर इन चौदह सालों में पिछले पांच साल ऐसे रहे जिसमें दिखे तो वह हमसफर, पर देखता उन्हें हर कोई शक़ की नज़र से था. किसी को नहीं पता कि पहला पत्थर किसने चलाया, पर आज दोनों तऱफ से पत्थरों की बारिश हो रही है. दोस्ती के आत्मीय संबंध जब टूटते हैं, तो वे कितने वीभत्स होते हैं, इसे हम जीता-जागता देख रहे हैं.

मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे तो अमर सिंह उनके मुख्य कर्ताधर्ता. उद्योग विकास परिषद बना, उन्होंने देश के बड़े पैसे वालों को मुलायम सिंह से जोड़ा और आशा जगाई कि उत्तर प्रदेश में बड़ा निवेश होगा. किसानों के सवाल पर मुलायम सिंह का वी पी सिंह से मतभेद हो गया. वी पी सिंह ने मुलायम सिंह के ख़िला़फ सघन अभियान छेड़ दिया तथा किसान और उसकी ज़मीन को मुख्य मुद्दा बनाया. चुनाव आया और मायावती जीत गईं. मायावती मुख्यमंत्री बनीं.
उत्तर प्रदेश विधानसभा की हार और लोकसभा चुनाव के बीच अमर सिंह की क़िस्मत का समाजवादी पन्ना बंद करने का निर्णय हो चुका था. मुलायम सिंह के परिवार के रुख ने पार्टी के सभी नेताओं को इशारा दे दिया कि अब अमर सिंह से डरने की ज़रूरत नहीं है. अमर सिंह केवल पैसा लाने की मशीन हैं, वोट नहीं दिलवा सकते.
विधानसभा की हार के बाद समाजवादी पार्टी की समीक्षा बैठक हुई. पार्टी के नेता इस हार के पीछे अमर सिंह को मान रहे थे तथा आम कार्यकर्ता मान रहा था कि अगर मुलायम सिंह ने वी पी सिंह की मांगें मान ली होतीं तो किसानों और आम लोगों के बीच उनका विरोध न होता और वह मुख्यमंत्री बने रहते. उन्हें लग रहा था कि अमर सिंह की सलाह पर मुलायम सिंह ने सख्त और किसान विरोधी रुख़ अपनाया था.
इस बैठक में पहली बार मोहन सिंह ने समीक्षा भाषण देते हुए कहा कि पार्टी को नचनियों की पार्टी बना दिया गया है, जिसकी वजह से हार हुई है. माहौल ग़मगीन और गुस्से से भरा था, जिसे शब्द मोहन सिंह ने दिए. अमर सिंह के ऊपर यह शायद पहली बार कठोर शब्दों की बौछार थी, जिससे वह तिलमिला गए थे. अमर सिंह को लगा कि उनका जानबूझ कर अपमान किया जा रहा है.
मोहन सिंह के भाषण के पीछे मुलायम सिंह का कोई हाथ नहीं था. पिछले सात सालों में समाजवादी पार्टी के सभी नेताओं को लग रहा था कि मुलायम सिंह उनकी बात नहीं सुनते. पहले राजबब्बर, फिर बेनी प्रसाद वर्मा और बाद में आज़म ख़ान, सभी को लगा कि उनकी राय की कोई क़ीमत मुलायम सिंह के सामने नहीं है. आम कार्यकर्ता कहें या पार्टी के नेता, सभी को लगता था कि मुलायम सिंह फैसले लेते हैं, पर उनकी राय से नहीं. यहां तक कि फैसला लेने से पहले राय-मशविरा भी नहीं करते. विधानसभा में हार का अकेला ज़िम्मेवार समाजवादी पार्टी के भीतर अमर सिंह को माना जाने लगा.
पहले समाजवादी पार्टी में बहसें होती थीं, शिविर होते थे, यहां तक कि पार्टी के ख़र्चे के लिए ज़िलों से चंदे होते थे. उस समय चुनावों में बड़ी राशि उम्मीदवारों को नहीं मिल पाती थी. अमर सिंह के आने के बाद समाजवादी पार्टी के लिए कई रास्ते खुले. पहला रास्ता खुला कि राष्ट्रीय स्तर के दूसरे सहयोगियों के साथ बात करने वाला एक विश्वस्त सहयोगी मुलायम सिंह को मिल गया. दूसरे दलों से बातचीत, तालमेल, रणनीति और सहयोग का ज़िम्मा पहले मुलायम सिंह स्वयं संभालते थे. उन्हें एक ऐसे साथी की सख्त ज़रूरत थी, जो उनके राजनैतिक हितों की देखभाल कर सके. अमर सिंह ने इस रिक्त स्थान की पूर्ति कर दी. उन्होंने कुशलता से मुलायम सिंह को राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित कर दिया.
इतना ही नहीं, उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ देश के बड़े पूंजीपतियों को जोड़ा तो दूसरी तऱफ फिल्म से भी लोगों को लाए. समाजवादी पार्टी के पास साधनों की कमी समाप्त हो गई और जिस पार्टी में पहले मुलायम सिंह अकेले भीड़ खींचने वाले नेता थे, बाद में यह काम राजबब्बर ने किया. अब इसमें जयाप्रदा, जया बच्चन और संजय दत्त भी शामिल हो गए. समाजवादी पार्टी से जुड़े पुराने समाजवादियों को लगा कि मुलायम सिंह तो उनसे दूर हो ही गए, पार्टी भी समाजवाद से दूर चली गई. लेकिन वह दौर जीत का था, इसलिए बोल कोई नहीं रहा था. अमर सिंह के पास ख़बरें आ रही थीं कि समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच उनकी आलोचना हो रही है और यह उन्हें बुरा लगता था. उनका मानना था कि जब साधन का सवाल हो तो उनसे अपेक्षा की जाए, जब भीड़ खींचने के लिए ज़रूरत हो तो जयाप्रदा या जया बच्चन को बुलाया जाए और बाद में कमरों में उन्हें कोसा भी जाए.
मुलायम सिंह के परिवार के सभी प्रमुख पुरुष पार्टी के प्रमुख पदों पर हैं और विधानसभा या लोकसभा में भी हैं. इन सबकी शुरू में अमर सिंह से का़फी नज़दीकी रही. लेकिन राजनीति बड़ी हरजाई है. एक छोटे वर्ग ने मुलायम सिंह के परिवार के लोगों से कहना शुरू किया कि अमर सिंह ने मुलायम सिंह का बहाना लेकर बहुत पैसा इकट्ठा किया है. इतना ही नहीं, परिवार से यह भी कहा कि मुलायम सिंह के रक्षा मंत्री रहते हुए सुखोई सहित जितने बड़े सौदे हुए, उनमें अमर सिंह ने जो पार्टी के नाम पर लिया, वह उनके पास आना चाहिए.
पैसा एक ऐसी चीज़ है, जो बड़ों-बड़ों के बीच ऩफरत पैदा कर देता है. यही लोग अमर सिंह के पास जाकर कहते कि मुलायम सिंह का पूरा परिवार आप पर पैसा जमा करने की बात कह रहा है. अमर सिंह बोलने में मुंहफट और असावधान क़िस्म के इंसान हैं. उनकी प्रतिक्रिया तीखी होती थी, जिसे और तीखी बनाकर परिवार के लोगों के बीच ये लोग पहुंचाते थे. नतीज़े में अमर सिंह और राम गोपाल यादव जो कभी साथ-साथ घूमते थे, धीरे-धीरे उनमें फोन पर भी बातचीत बंद हो गई.
अमर सिंह ने अपनी नाराज़गी मुलायम सिंह से नहीं छुपाई तथा उन्हें कहा कि उनके ख़िला़फ क्या रामगोपाल यादव ने कहा है और क्या अखिलेश यादव ने कहा है. मुलायम सिंह यादव ने कई बार रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव से माफी मंगवाई. जबकि दोनों ने कहा कि उन्होंने अमर सिंह के ख़िला़फ वे बातें नहीं कहीं, जिन्हें अमर सिंह कहा बताते हैं. इसके बावज़ूद मुलायम सिंह ने न केवल इन दोनों पर, बल्कि पार्टी के दूसरे नेताओं पर भी दबाव डाल कर अमर सिंह से खेद प्रकट करने या माफी मांगने के लिए कहा.
आग लगाने वाले लोगों ने मुलायम सिंह के परिवार को सफलतापूर्वक समझा दिया कि नोएडा की ज़मीन अमर सिंह ने बिल्डरों और पैसे वालों को दिलवा दी है. नोएडा दिल्ली से जुड़ा उत्तर प्रदेश का औद्योगिक क्षेत्र है, जहां ज़मीन मिलना सोना मिलने जैसा है. नोएडा एक प्रमुख कारण है, जिसने मुलायम सिंह के परिवार को अमर सिंह से न केवल दूर कर दिया, बल्कि उनका विरोधी बना दिया. मुलायम सिंह ने बीस दिन पहले अपने कई साथियों से कहा भी कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब अमर सिंह ने पूरा का पूरा नोएडा बेच दिया.
उत्तर प्रदेश विधानसभा की हार और लोकसभा चुनाव के बीच अमर सिंह की क़िस्मत का समाजवादी पन्ना बंद करने का निर्णय हो चुका था. मुलायम सिंह के परिवार के रुख ने पार्टी के सभी नेताओं को इशारा दे दिया कि अब अमर सिंह से डरने की ज़रूरत नहीं है. अमर सिंह केवल पैसा लाने की मशीन हैं, वोट नहीं दिलवा सकते. उन पर पार्टी के नेता छींटाकशी करने लगे कि कहीं सिनेमा के लोगों से वोट मिलता है? समाजवादी पार्टी बिना संघर्ष के जीत नहीं सकती और अमर सिंह ने संघर्ष को सालाना आयोजन में बदल दिया है.
लेकिन मुलायम सिंह ने अमर सिंह का हमेशा बचाव किया और उन्हें सांत्वना दी कि वह उनके साथ हैं और पार्टी में सब ठीक हो जाएगा. अमर सिंह विश्वास और अविश्वास के बीच झूलते रहे. उन्हें वे लोग, जो मुलायम सिंह के परिवार के पास से बैठ कर आते थे, समझाने में सफल हो गए कि मुलायम सिंह परिवार का दबाव नहीं झेल पाएंगे.
आज़म ख़ान और मोहन सिंह ने अमर सिंह को लेकर सवाल उठाने शुरू किए. अमर सिंह के क्रियाकलापों, उनके संबंधों को लेकर अ़फवाहें जैसे बहने लगीं. जयाप्रदा बुरी तरह निशाने पर आ गईं. भारतीय राजनीति में अगर कोई महिला आगे बढ़ती है तो बड़ी संख्या में लोग मानने लगते हैं कि उसका रास्ता किसी बेडरूम से निकल कर आसान हुआ है. भारतीय राजनीतिक मानसिकता का यह दुखद, घिनौना और विद्रूप सच है, जो महिलाओं को राजनीति में आने से हमेशा रोकता है. महिला और उसकी चारित्रिक बदनामी साथ-साथ चलती है. जयाप्रदा को लेकर उड़ाई अ़फवाहों को अमर सिंह सहन नहीं कर पाए. जयाप्रदा का नाम पार्टी नेताओं ने अपने साथ वैसे ही चटखारे लेकर जोड़ना शुरू कर दिया, जैसे फिल्म में नायक या निर्देशक करते हैं. अ़फवाहों में कोई नहीं छूटा. न मुलायम सिंह, न रामगोपाल यादव, न अखिलेश यादव और न ही अमर सिंह.
लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई. इस बैठक में अमर सिंह आए और उन्होंने लगभग एक घंटे से ज़्यादा लंबा भाषण दिया. इस भाषण में उन्होंने सख्त से सख्त भाषा का इस्तेमाल किया और पार्टी के लोगों से कहा कि सभी उनसे पैसा लेते हैं, मुसीबत में हर तरह की मदद मांगते हैं और उन्हें गाली भी देते हैं. अमर सिंह ने कहा कि उन्होंने चुनावों के लिए हमेशा ढाई सौ करोड़ इकट्ठा किया, पार्टी के लोग दस प्रतिशत भी इकट्ठा कर दिखा दें. उन्होंने गुस्से से कहा कि जयाप्रदा को रंडी कहते हैं और चुनाव में प्रचार के लिए बुलाने के लिए हाथ-पैर जोड़ते हैं. उन्होंने सा़फ किया कि वह वही करते हैं, जो मुलायम सिंह कहते हैं. अमर सिंह ने हर वाक्य में समाजवादी शब्द को ताने की तरह इस्तेमाल किया तथा कहा कि पार्टी के लिए सब कुछ करने वाले लोग समाजवादी नहीं और जो कुछ न कर स़िर्फ बात करते हैं, वे समाजवादी हैं. 
इस कार्यकारिणी में अमर सिंह के गुस्से, उनकी भाषा ने संकेत दे दिया कि दूरी बहुत बढ़ चुकी है. अमर सिंह ने यह भी कहा कि पैसा लेना हो तो अनिल अंबानी ठीक और पब्लिक में भाषण देना हो तो अनिल अंबानी को गालियां. अमर सिंह ने अपनी इस तक़ली़फ को छुपाया नहीं कि लोग उन्हें अनिल अंबानी का राजनैतिक व्यापारिक प्रतिनिधि बताते हैं. उन्होंने मुलायम सिंह पर भी आरोपों की छोटी बौछार की तथा अंत में अपने इस्ती़फे का ऐलान कर दिया. इससे पहले उन्होंने कहा कि वह अगर सारी बातें बता देंगे तो बहुत से लोग बेनक़ाब हो जाएंगे.
मुलायम सिंह ने अमर सिंह के भाषण के बाद सधी भाषा में कहा कि आपने अपनी सारी बातें पार्टी के सामने रख दीं. वे बातें भी, जो नहीं रखनी चाहिए थीं. अब पार्टी इस पर अपना रुख़ बताए. मुलायम सिंह के नज़दीकी चार-पांच लोगों ने कहा कि अमर सिंह के इस्ती़फे का सवाल ही नहीं है, क्योंकि कार्यकारिणी में सभी को अपनी बातें रखने का हक़ है. पार्टी के नेताओं को संकेत चला गया कि मुलायम सिंह नहीं चाहते कि अमर सिंह के ख़िला़फ और कुछ हो. सभी ख़ामोश हो गए. मुलायम सिंह ने कहा कि पार्टी में लोकतंत्र है और पार्टी की बात माननी चाहिए. इस्ती़फे का कोई सवाल ही नहीं है.
दरअसल यही कार्यकारिणी की बैठक थी, जिसने अमर सिंह को अहसास दिला दिया कि उनमें और पार्टी में दूरी बढ़ गई है. मुलायम सिंह को अहसास दिलाया कि अमर सिंह सार्वजनिक रूप से कुछ भी कह सकते हैं तथा पार्टी के नेताओं को अहसास कराया कि वे चाहें तो मुलायम सिंह को अमर सिंह से अलग कर सकते हैं. अमर सिंह किडनी का इलाज कराने सिंगापुर गए. समाजवादी पार्टी में रणनीति पर बात शुरू हो गई कि कैसे मायावती को सत्ता से हटाने के लिए संघर्ष किया जाए. इस बीच अमर सिंह को देखने मुलायम सिंह के परिवार से, मुलायम सिंह समेत लगभग पंद्रह लोग सिंगापुर गए. लेकिन अमर सिंह जिस एक सदस्य को सिंगापुर में देखना चाहते थे, वह सिंगापुर नहीं गया.
राम गोपाल यादव मुलायम सिंह के भाई हैं. रामगोपाल यादव को समाजवादी पार्टी में शालीन, समझदार व्यक्ति माना जाता है तथा कहा जाता है कि जानकारी में भी उनका कोई जवाब नहीं है. पिछले चार सालों में दिल्ली के संबंधों में मुलायम सिंह उनकी राय पर निर्भर होने लगे थे. रामगोपाल यादव अकेले व्यक्ति हैं, जो मुलायम सिंह से बिना संकोच, बिना डर के बातें कर सकते हैं. रामगोपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव को विधानसभा चुनावों के बाद पार्टी के लोगों की राय बतानी शुरू की. मुलायम सिंह को पार्टी में फैले असंतोष के साथ विभिन्न प्रकार के संदेह भी बताए. रामगोपाल यादव ने शंका ज़ाहिर की कि कुछ और नेता पार्टी छोड़ कर जा सकते हैं. अमर सिंह ने सिंगापुर से लौटने के बाद भी अपनी बेबाक और तल्ख टिप्पणियां बंद नहीं कीं. डिंपल यादव की हार को उन्होंने मुलायम सिंह के परिवार का अति आत्मविश्वास कहा, जो हार का कारण बना.
रामगोपाल यादव ने बिना मुलायम सिंह यादव को सूचित किए सार्वजनिक रूप से कह दिया कि कोई भी व्यक्ति पार्टी से ऊपर नहीं है. अमर सिंह ने इसे अपने ऊपर हमला माना और समझ लिया कि आख़िरी गिनती प्रारंभ हो गई है. सार्वजनिक बयानबाजी शुरू हो गई. अमर सिंह ने इस बार सार्वजनिक रूप से इस्ती़फे का ऐलान कर दिया.
मुलायम सिंह इस घटनाक्रम से परेशान थे. वह नहीं चाहते थे कि अमर सिंह और उनकी पार्टी अलग हो. उन्होंने कोशिशें कीं, सार्वजनिक रूप से अमर सिंह के ख़िला़फ कोई टिप्पणी नहीं की. इतना ही नहीं, उन्होंने फिर रामगोपाल यादव के ऊपर दबाव डाला कि वह अमर सिंह से खेद प्रगट करें. रामगोपाल यादव ने किया भी. लेकिन अमर सिंह ने इसे सार्वजनिक कर दिया, कहा कि रामगोपाल यादव ने मुझसे माफी मांगी है.
इस फोन कॉल का सार्वजनिक होना समाजवादी पार्टी में भूकंप का कारण बना. रामगोपाल यादव, अखिलेश यादव, शिवपाल यादव ने मिलकर सा़फ कर दिया कि वे अब अमर सिंह के साथ रहने की जगह राजनीति से अलग होना पसंद करेंगे. पार्टी के सभी नेता रामगोपाल यादव के साथ खड़े हो गए. फोन पर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुलायम सिंह से कहना शुरू कर दिया कि वे अमर सिंह का इस्ती़फा मंजूर कर लें. उधर अमर सिंह के समर्थन में संजय दत्त, जयाप्रदा, जया बच्चन और मनोज तिवारी खुलकर आ गए. रामगोपाल यादव को लगा कि अगर जल्दी कार्रवाई नहीं हुई तो कुछ विधायक भी अमर सिंह के साथ जा सकते हैं, क्योंकि अमर सिंह के पास पैसा है.
राजनीति में पिछले सालों में दो जोड़ियां का़फी चर्चित रही थीं. एक मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह की तथा दूसरी नीतीश कुमार और राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की. दोनों ही जोड़ियां टूट गईं. अमर सिंह बिहार से नई राजनैतिक पारी की शुरुआत करने वाले हैं, जिसमें ललन सिंह उनके राजनैतिक सहयोगी बनने जा रहे हैं.
मुलायम सिंह यादव ने पार्टी को पुनः संघर्ष के रास्ते पर ले जाने का फैसला लिया है. वह रोज आजकल सौ से ज़्यादा लोगों से मिल रहे हैं. दूसरी ओर मुलायम सिंह ने ओम प्रकाश चौटाला के अलावा प्रकाश करात और वर्धन से भी संपर्क किया है. मुलायम सिंह एक बार फिर ग़ैर भाजपा, ग़ैर कांग्रेस गठबंधन बनाना चाहते हैं, जिसके लिए वह वामपंथी दलों के अलावा लालू यादव, रामविलास पासवान, चंद्रबाबू, जयललिता और चौटाला के लगातार संपर्क में हैं.
रामगोपाल यादव के पास अब यह ज़िम्मेदारी आई है कि वह इस गठबंधन को शक्ल दें. पार्टी में उन्होंने पुराने समाजवादियों बृजभूषण तिवारी, मोहन सिंह और सुनीलम्‌ को मुख्य ज़िम्मेदारियां दी हैं.
एक सलाह अमर सिंह को और एक सलाह मुलायम सिंह के साथियों को देना चाहते हैं. राजनीति में साथ छूटने का मतलब मानवीय रिश्तों का ख़ात्मा नहीं होता. अलग तो लोहिया और जयप्रकाश भी हुए थे. वी पी सिंह और चंद्रशेखर भी हुए थे. यहां तक कि चंद्रशेखर और मुलायम सिंह भी अलग हुए थे. वैसी ही शालीनता दिखानी चाहिए. हमारे पास दोनों पक्षों के नेताओं की भाषा और विषय दोनों ही हैं, लेकिन दोनों ही लिखने योग्य नहीं हैं. हमने स़िर्फ संकेत दिए हैं. बाज़ार में अ़फवाहें फैली हैं कि अमर सिंह के पास मुलायम सिंह से जुड़ी सीडी हैं तो मुलायम सिंह के पास अमर सिंह के भ्रष्टाचार के सबूत. अ़फवाहें ही दंगे कराती हैं, दोनों पक्षों को अ़फवाहों के जाल में नहीं फंसना चाहिए. वरना ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, जो स़िर्फ तमाशबीनों का मनोरंजन करेगी.
साभार - चौथी दुनिया ,
"संतोष भारतीय ने इस लेख में सब कुछ उजागर किया है , पर एक महत्व की बात छोड़ दी है क्यों पता नहीं यदि यह खुलाशा भी किया जाता की जिस समय 'अमर सिंह' समाजवादी पार्टी की तरफ आये थे तभी से मुलायम का या समाजवादी पार्टी का ग्राफ नीचे आने लगा था और अमर का ऊपर , यदि मुलायम सिंह का भोलापन इस गैर राजनितिक आदमी को अन्दर ना आने देते तो ना ही इतनी समाजवादियो से रार होती और न ही राज बब्बर , बेनी प्रसाद वर्मा और आज़म खान जैसे कद्दावर नेता अलग होते . रही राष्ट्रीय स्तर के दल की बात तो, चंद्रशेखर को वी पी सिंह से जोड़ने की बात तो वह कहीं से भी तुलनीय नहीं है साफ तो हो ही गया था एक साथ रहकर भी मुलायम के कद के दुश्मन थे और दूसरे दूर से भी मुलायम को अच्छे राह पर जाने/चलाने के लिए जूझते रहे जब 'अमर सिंह किसानों की बेशकीमती जमीने पूजीपतियों की झोली में डलवा रहे थे काश इनकी भी कोई जमीन होती' समाजवादी पार्टी को भी अपनी जागीर की तरह इस्तेमाल कर रहे थे, वहां से भगाए जाने का कितना मलाल है यह तो कोई उनसे ही पूछें , पार्टियाँ बनाना आसान होगा विश्वाश बनाना मुश्किल होता है इन्होने मुलायम के विश्वास के लोगों को तोडा है".
डॉ.लाल रत्नाकर 

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