05/02/2012

उत्तर प्रदेश के चुनाव 
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ये चुनाव नहीं 'उत्सव' लगते हैं जिसमे सबकी जुबान खुली हुयी है.
डॉ.लाल रत्नाकर 
यद् करें मायावती का मुख्यमंत्रीत्व काल की घटनाएँ क्या मजाल कांग्रेस ,भाजप या सपा सबकी हवा खस्ता थी कोई भी माया के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत नहीं कर रहा था, चाहे भ्रष्टाचार का मामला रहा हो या मूर्तियों के निर्माण का. सर्वोच्च न्यायालय से लेकर संसद ने बहुत पापड़ बेले पर हुआ वही जो मायावती ने चाहा. सरकारी नौकरशाही ने जो चाहा वही किया माया ने जिसे चाहा रखा जिसे चाहा उखाड़कर फेंक दिया.  
पोस्टिंग का सवाल हो या लूट की छूट का सब मनमानी चला यदि किसी की नहीं चली तो 'यादवों' की और इनपर सरकारी अत्याचार भी खूब हुया पर साथ कोई खड़ा नहीं हुआ. अमर सिंह हो या कांग्रेस सबने यादवों को जितना नुकसान हो सकता हो करने की कोशिशे की, गालियां दीं, फर्जी मामलों में फसाया, जितना भी हो सकता था किया, दलितों ने नहीं दलितों को हमेशा लूटने वालों नें और दलितों के राज्य के नाम पर. यह भारतीय द्विज प्रधान चरित्र समाज के एक न्यायप्रिय और संघर्षशील कौम का मर्दन कर रहा था.
'उत्तर प्रदेश' के चुनाओं ने पुनः एक सरकार गठित करने का संकल्प आरम्भ किया है जिसकी परिणिति एक सर्कार के गठन के रूप में होने जा रहा है. अब देखना यह है की आने वाली सरकार की शक्ल क्या होती है . क्योंकि मुलायम की सरकार आते ही मीडिया, माफिया तभी सभी सक्रीय हो जाते हैं बदनामी के लिए की अब 'गुंडाराज़. गुंडाराज़ का जवाब स्वर्गीय राम शरण दास  ने ''गुंडीराज'' के रूप में दिए थे जो अभी अभी हमने सहा है , पर राम शरण दास की यह भाषा कम लोगों को ही समझ आती है क्योंकि यह भाषा के रूप में भले ही हलकी लगती हो, पर है तो गहरे तक घाव करने वाली. आज विचारणीय है की पुरे समाज को इस 'गुंडी' राज के अनन्य अत्याचार से 'छुटकारा' दिलाने के लिए 'मुलायम' की ही याद क्यों आ रही है. जबकि राष्ट्रिय और अन्तराष्ट्रीय दल देश को लूटने में शुमार/ मशगूल हैं . इनसे बचाने के लिए 'मुलायम' के नहीं चरित्रवान कौम की जरूरत होती है जो गुण 'यादवों में कूट कूट के भरा हैं, जिसके साथ रहते हैं रहते हैं और मरते दम तक. गद्दारों की कौम के निक्कमेंपण ने प्रदेश को जितना नुकसान पहुंचाया है उसका जवाब कौन देगा .
(लखनऊ। अपने राजनीतिक प्रतिदंद्वी के विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कराने की चल रही होड़ में आज सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी ने फिर बाजी मार ली जब उसके घुर राजनीतिक प्रतिदंद्वी समाजवादी पार्टी (सपा) के छह विधायक बसपा में शामिल हो गए। सपा को गुरुवार को भी गहरा झटका लगा था जब मुलायम सिंह यादव के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र मैनपुरी के किशनी सीट से विधायक संध्या कठोरिया पार्टी पर परिवारवाद का बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए बसपा में शामिल हो गई थीं।
बसपा के महासचिव नसीमुददीन सिद्दीकी और प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि आजमगढ़ के सगडी से सर्वेश कुमार सिंह, बरेली के कनवर से सुलतान बेग, हमीरपुर से अशोक कुमार सिंह चंदेल, मुरादाबाद से संदीप अग्रवाल, उन्नाव के हदाहा से सुंदर लाल लोधी और एटा के सकीत से सूरज सिंह शाक्य पार्टी में शामिल हुए हैं।)
ऐसे न जाने कितने उदहारण हैं जब मुलायम सिंह को कमजोर करने की चाल चली जा रही थी.
      कौन दोस्त है कौन दुश्मन पता ही नहीं चल रहा था.

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