21/08/2009

चल उड़ जा रे पंछी के अब ये देश हुआ बेगाना


चल उड़ जा रे पंछी के अब ये देश हुआ बेगाना,
अमर सिंह के बगैर समाजवाद और वो भी समाजवादी पार्टी का समाजवाद नमूना -
कांग्रेस शर्मिदा पार्टी : अमरAug 21, 02:28 am
आगरा। सपा के विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन में कांग्रेस पर सबसे तीखा हमला बोला पार्टी महासचिव अमर सिंह ने। उन्होंने कांग्रेस को सबसे बड़ा दुश्मन, धोखेबाज, मतलबी, अहसान फरामोश, घमंडी आदि विशेषणों से नवाजते हुए कहा कि उसका तात्कालिक बैर भले ही बसपा से है लेकिन, आगे लड़ाई सपा और कांग्रेस के बीच होगी। उन्होंने कांग्रेस को 'शर्मिंदा पार्टी' करार देते हुए कहा कि चाहे बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का मामला हो या स्वर्ण मंदिर का मुद्दा, कांग्रेस ने हमेशा ही माफी ही मांगने का काम किया है, जबकि सपा को कभी किसी मामले में शर्मिदा होने की नौबत नहीं आयी।
सिंगापुर में इलाज करा रहे अमर सिंह के 'रिकार्डेड' भाषण का वीडियो गुरुवार को अधिवेशन में विशाल स्क्रीन पर दिखाया गया। अमर ने कहा कि इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि अधिवेशन के बाद सपा राष्ट्रपति के पास जाकर केंद्र सरकार से समर्थन वापसी का पत्र सौंप देगी। मेरा कहना है कि जब रेलमंत्री रहते हुए ममता बनर्जी सरकार का विरोध कर सकती हैं, शरद पवार सरकार को धमका सकते हैं, तो फिर समर्थन देते हुए सपा ऐसा क्यों नहीं कर सकती। उन्होंने कहा हम सोच रहे थे कि बसपा के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस का साथ मिलेगा लेकिन, उसने हमें बसपा के साथ एक ही पलड़े में खड़ा कर दिया। हमने महत्वपूर्ण मामलों में समन्वय समिति बनाने की मांग रखी लेकिन, कांग्रेस ने इसमें बसपा को भी साथ लेने की शर्त रख दी। यह शर्त एक तरह से हमारी मांग को ठुकराना था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का कहीं न कहीं बसपा के प्रति प्रेम अनुराग बना हुआ है। कांग्रेस की फितरत है कि वह किसी का भी निर्ममता और क्रूरता से इस्तेमाल कर उसे फेंक देती है। कांग्रेस को चालाक दुश्मन करार देते हुए अमर ने कहा कि कार्यकर्ताओं को हीनभावना से ग्रसित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमने धोखा दिया नहीं बल्कि खाया है। उन्होंने कहा कि बसपा तो अपनी मूर्तियों के बोझ तले खुद ही दबकर समाप्त हो जायेगी, सपा को कांग्रेस से लड़ाई की रणनीति तय करनी होगी।
एक और खबर -
समर्थन के साथ कांग्रेस पर हमला जारी रहेगा
Aug 21, 02:28 am
आगरा। समाजवादी पार्टी की नजर में अब उसकी मुख्य विरोधी भाजपा नहीं, कांग्रेस है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र की संप्रग सरकार से सपा ने समर्थन वापस लेने के बारे में भले ही अपने पत्ते न खोले हों लेकिन, इतना तो साफ है कि वह उस पर हमला करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगी।
पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन से निकल रहे स्वर बता रहे हैं कि सपा ने अपनी तोप का मुंह अब सीधे कांग्रेस की ओर कर दिया है। कभी भाजपा को दुश्मन नंबर एक बताने वाली सपा की नजर में अब यह जगह कांग्रेस ने ले ली है। भाजपा को तो वह मृतप्राय मान रही है। हां, उसे कष्ट इस बात का है कि वह अपने नये दुश्मन कांग्रेस को समर्थन भी दे रही है। अधिवेशन में कई नेताओं ने चाहे सीधे तौर पर या फिर घुमा फिरा कर नेतृत्व से यह सवाल करने में गुरेज नहीं किया कि कांग्रेस के साथ 'दोस्त और दुश्मन' का खेल एक साथ कैसे खेला जा सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेता त्रिलोक सिंह त्यागी ने तो साफ कहा कि गाजियाबाद तक तो हम कांग्रेस को कोसेंगे लेकिन, दिल्ली की सीमा मे घुसते ही हम उसे समर्थन की बात करेंगे, इससे तो कार्यकर्ताओं में दुविधा ही बढ़ेगी। यह बात मुलायम के नये राजनीतिक सखा और अतिथि के रूप में मंच पर विराजमान कल्याण सिंह को भी प्रभावित किये बिना नहीं रही। यही वजह थी कि उन्होंने प्रस्ताव किया कि समर्थन वापसी का अधिकार पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह को सौंप दिया जाये। वह जब चाहें कांग्रेस से समर्थन वापस ले सकते हैं। पूर्व सांसद रशीद मसूद ने तो एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा कि कांग्रेस को समर्थन है ही कहां? उसे तो नीतियों पर आधारित समर्थन दिया गया था। वह नीतियों से डिगी नहीं कि समझो समर्थन खत्म। उन्होंने यह सवाल जरूर उछाला कि पहले यह तय करना होगा कि कांग्रेस और मुलायम में सेकुलर कौन है? देश में आजादी के बाद से 53 हजार फसाद हुए, जिसमें ज्यादातर बडे़ फसाद कांग्रेस के जमाने में हुए। बाबरी मस्जिद का ताला न खुला होता तो नफरत का अंबार न लगता। उन्होंने पूछा, देश में फिरकापरस्ती का सबसे बड़ा दोषी कौन, कार्यकर्ताओं के बीच से आवाज आयी-कांग्रेस। मंच भी शायद यही सुनने को बेताब था। इससे पहले प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी साफ किया कि सपा का जिन दो दलों से मुकाबला है, वे दोनों ही सरकार में हैं। ऐसे में सपा को इनसे निपटने के लिए बहुत सावधानी से रणनीति तय करनी होगी।
वास्तव में सपा नेताओं को यह महसूस हो रहा है कि कांग्रेस उसका इस्तेमाल सिर्फ अपने मतलब के लिए कर रही है और मतलब निकलते ही वह उसे पहचानेगी नहीं। ऐसे में उसने भी उसके साथ वैसा ही रवैया अख्तियार करने का मन बना लिया है। सपा द्वारा उठाये गये इस कदम में राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह का योगदान कम नहीं आंका जा सकता, क्योकि उनके यहां सुनाये गये रिकार्डेड भाषण का लबोलुआब यही था कि कांग्रेस अहसानफरामोश है। उससे अब किसी तरह की उम्मीद करना बेकार है। वह मुंह पर मीठी बनी रहती है और पीठ पर खंजर भोंकती है। ऐसे में कांग्रेस से उसी के तौर तरीके से निपटना पडे़गा।
दैनिक जागरण से साभार -
ये खबरे यह बताती है की यहाँ पर अब वह चर्चा ही नहीं होनी है जिससे समाज का भला हो .इन समाजवादी पार्टी के लोंगों को यह क्यों समझ में नहीं आता की कांग्रेस सपा की उत्थान करने की नियति नहीं है उसे तो सपा को खत्म कराके उ प्र एस अपना राज्य ल्थापित करना है|

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