13/01/2010

पहली बार मान अपमान समझ में आया अमर सिंह को ; काश इस पर टिके रह पाते ?
जिस प्रकार से कई दिनों से यह घटना क्रम चल रहा ऐसा लगाने लगा था अब थमने वाला है, पर यह सद्बुद्धि अमर सिंह को कैसे आ गयी , जो भी है कनक तिवारी का एक लेख 'रविवार . कॉम ' पर है जिसका उल्लेख  करना यहाँ प्रासंगिक लग रहा है यथा-
 " शाबास विनोद मेहता!-
अंगरेजी साप्ताहिक 'आउट लुक' के प्रधान संपादक और देश के ख्यातनाम पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी पत्रिका के ताजा संस्करण में एक ऐतिहासिक चेतावनी मीडियाकर्मियों के लिए चुनौती की भाषा में चखचख बाजार में उछाल दी है. विनोद मेहता की साफगोई, तीखी प्रखर भाषा और समाज के ज्वलंत मुद्दों पर बेहद पारखी, संतुलित और समकालीन दृष्टि कभी भी अस्वाभाविक विवाद का विषय नहीं बनी. अखबारनवीसों की अनावश्यक रूप से उग आई बड़ी लेकिन अनुशासनहीन उच्छृंखल और धनउगाऊ भीड़ में जो पत्रकार अप्रतिहत खड़े हैं, उनमें विनोद मेहता का नाम महत्वपूर्ण ढंग से उल्लेखनीय है.

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का काम वैसे तो रचनाधर्मिता की नस्ल का ही है. अखबारों और खबरिया चैनलों का मकसद केवल सूचनाएं देना, रिपोर्टें बनाना या अपनी राय थोपना नहीं है. प्रत्येक मीडिया-स्त्रोत की अपनी एक सोच, शब्दावली और अभिव्यक्ति की शैली सहित समाज के प्रति प्रतिबद्धता होती है. मुक्तिबोध के शब्दों में इसमें कई बार अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होते हैं. इंडियन एक्सप्रेस समूह ने आपातकाल के दौरान अपने मालिक रामनाथ गोयनका के नेतृत्व में साहसी पत्रकारिता का नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया था.

आजादी की लड़ाई के दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' महाराणा प्रताप की तरह यौद्धिक के बदले बौद्धिक मुकाबला कर रहा था. पत्रकारिता के इलाके में भी अंतत: गांधी ही श्लाका पुरुष बनते दिखाई देते हैं. मध्यप्रदेश के पत्रकारों राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी ने खुद को निष्पक्ष, साहसी और प्रयोगमूलक पत्रकारिता का आंदोलन बना लिया था. पी साईनाथ भी ऐसे ही साहसिक प्रयोग करते रहते हैं. यह सूची लंबी हो सकती है और कई बेहद महत्वपूर्ण पत्रकार इस सूची में उल्लिखित नहीं होने पर भी शामिल समझे जा सकते हैं.

समाचार पत्र 'हिन्दू' स्वतंत्रता के आंदोलन के समय से आज तक साहसिक पत्रकारिता का नमूना है. उसके संपादक एन.राम ने तो सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी स्थितियों में अपनी बात पारदर्शिता और साफगोई के साथ रखी है. 'इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' एक शोध पत्रिका के रूप में यदि ख्यातनाम है तो कालम वीर एज़ी नूरानी समझदार पाठकों और समाज के लिए एक कीर्तिस्तंभ बने हुए हैं.

हाल के वर्षों में मीडिया कर्म में बेहद गिरावट आई है. संवाददाता के स्तर पर कम, मालिकों के स्तर पर बहुत ज्यादा. पहले तो विज्ञापन लेना और अनुकूल समाचार छापना गणित के समीकरण की तरह था. यह तो अब बीते जमाने की बात है. अब तो संवाददाता और संपादक की विज्ञापनकबाड़ू या इच्छाधारी भूमिका ही नहीं रही. अब तो महाप्रबंधक सीधे चुनाव के उम्मीदवारों और उद्योगपतियों और नौकरशाहों वगैरह से थोक में डील करते हैं. बने बनाए समाचार संवाददाताओं के मत्थे कलंक की तरह मढ़ दिये जाते हैं.

समाचार पत्रों को पढ़ने और दूरर्दशन के चैनलों को देखने से चटखारे ले लेकर चाट खाने का मजा आता है जबकि उसे समाज का सुपाच्य और विटामिन युक्त भोजन होना चाहिए

जिन पार्टियों और उम्मीदवारों को लेकर जीतने की गारंटीशुदा भविष्यवाणियां की जाती हैं, वे औंधे मुंह या चारों खाने चित होते हैं. संबंधित मीडिया अपनी मिथ्या रिपोर्टिंग के लिए खेद तक प्रकट नहीं करता बल्कि अगले ही दिन से विजयी पार्टियों और उम्मीदवारों का खैरख्वाह बन जाता है. अखबार या टेलिविजन चैनल चलाने की आड़ में खदानों वगैरह की लीज और कारखानों वगैरह के अनुबंध बांट जोहते हैं. मुख्य काम तिजारत करना होता है और ब्याज के रूप में मीडिया का उद्योग हो जाता है. ऐसे उद्योग दिनदूनी रात चौगनी गति से आगे बढ़ते हैं. कोई भी सरकारी विभाग उन पर हाथ नहीं डाल सकता क्योंकि काजल की कोठरी में सब कुछ काला ही काला होता है. सीबीआई, इनकम टैक्स, सेन्ट्रल एक्साइज़, प्रवर्तन निदेशालय और पुलिस वगैरह के दांत और विष यदि निकल जाएं तो उनकी नकली फुफकार से भला क्या बिगाड़ हो सकता है. 


ऐसे आत्मघाती समय में विनोद मेहता का छोटा सा आत्मप्रवंचक लेख रोशनी की किरण की तरह है. वे मय सबूत कहते हैं कि भूपिंदर सिंह हुड्डा, संदीप दीक्षित, लालजी टंडन, सुधाकर रेड्डी, योगी आदित्यनाथ, कोदंडा रामाराव और अखिलेश दास जैसे राजनेताओं ने उनसे साफ कहा है कि बिना लेन देन के उनसे संबंधित खबरें तक मीडिया में प्रकाशित नहीं होती थीं. कोई खंडन करेगा? 


विनोद मेहता ने केवल दूसरों के कहने पर आरोप नहीं लगाये. उनका आत्म संबोधित उद्बोधन एक विश्वसनीय हलफनामा है. इसलिए वह सम्मान के योग्य वस्तु है. आज के संकुल समय में जब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश, देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री और समाज के लगभग सभी वर्गों के शीर्ष व्यक्ति भ्रष्टाचार के पुख्ता आरोपों से घिरे हों और फिर भी झूठ बोल रहे हों, तब एक शीर्ष पत्रकार का अपनी बिरादरी में खड़े होकर समाज के सामने अपनी ओढ़ी हुई नैतिकता को निर्वस्त्र करना एक संत-प्रकृति का कार्य है. 


दूरर्दशन की बहसों में भी विनोद मेहता को इसी साफगोई और गंभीरता से सुना जाता है जबकि उनके साथ बहुत से नामधारी वाचाल पत्रकार सहकर्मी बैठे होते हैं. चंदन मित्रा को सुनकर कभी भी विश्वास करने को जी नहीं चाहता और विनोद मेहता पर अविश्वास करने का कारण प्रतीत नहीं होता. मीडिया प्रताड़ित व्यक्ति समाज की निगाहों से गिर जाता है. दूसरों के खिलाफ लिखना और खुद के लिए मौन रहना मीडिया की तलवार और ढाल है. आदि मीडिया पुरुषों का चरित्र एक खुली किताब की तरह रहा है. उन्हें शराब पीते, रंगरेलियां मनाते, घूस ग्रहण करते, पांच सितारा जीवन जीते कभी देखा सुना नहीं गया. 


अब तो पैकेज डील होता है. कुछ मुख्यमंत्री देश में नंबर एक बता दिए जाते हैं. कुछ सच्चे व्यक्तियों की चरित्र हत्या या चरित्र दुर्घटना कर दी जाती है. अमेरिका और यूरोप जैसे शोषक देशों की संस्कृति को अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिलता रहता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्टंट फिल्मों की किस्म के समाचार दिखाता रहता है और समाचार पत्रों में एक साथ त्रासदी, हास्य-प्रहसन और धारावाहिक सड़ी गली खबरों का पाठ होता रहता है. देश के किसानों, पीड़ित महिलाओं, शोषित बच्चों, बहादुर सैनिकों, चरित्रवान वरिष्ठ नागरिकों, वास्तविक स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रचार तथा निंदा से दूर रहकर काम करने वाले समाज सेवकों को समाचारों के योग्य नहीं समझा जाता. 


समाचार पत्रों को पढ़ने और दूरर्दशन के चैनलों को देखने से चटखारे ले लेकर चाट खाने का मजा आता है जबकि उसे समाज का सुपाच्य और विटामिन युक्त भोजन होना चाहिए. सत्रहवीं शताब्दी के इंग्लैंड से लेकर बीसवीं सदी के मध्य वाले भारत में साहित्य और पत्रकारिता की धूमिल दूरियां खत्म हो गई थीं. अज्ञेय, निर्मल वर्मा, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, नरेश मेहता, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, विष्णु खरे, हरिवंश, मंगलेश डबराल जैसे बीसियों लेखकों की रोजी रोटी पत्रकारिता से भी आई है. उन्होंने नैतिकता के नमक का महत्व समझा है. विनोद मेहता भी ऐसे ही पांक्तेय हैं. 


चेलापति राव, फ्रैंक मोरेस, खुशवंत सिंह, कुलदीप नैय्यर, एनज़े नानपोरिया, गिरिलाल जैन, बीज़ी वर्गीस, शामलाल वगैरह का जमाना यदि लद भी गया हो तो भी ये सब पत्रकारिता इसलिए समाज इसलिए समय के आसमान पर सितारों की तरह टंके रहेंगे. विनोद मेहता का झकझोरना इस गौरवमयी परिपाटी का अगला ताजा, समयानुकूल और समय-सापेक्ष ऐलान है. उम्मीद तो यही करनी चाहिए कि मीडिया परिवार उन बहरों की तरह आचरण नहीं करेगा जिनके कानों पर सुनने की मशीन लगी होती है और वे दूसरों को बहरा समझ कर जोर-जोर से बोलते हैं, लेकिन लोग उनके बहरेपन तथा वाचालता के तिलिस्म पर मुस्कराने लगते हैं. "


"क्या अमर सिंह इन्ही सारे गुणों को पिरोना चाहते है यद्यपि लोग यह कहते नहीं थकते कि अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी को ही समाप्त कर दिया भावनात्मक और वैचारिक दोनों तरह से , जिन रंगकर्मियों को लेकर वह यहाँ आये थे उनकी फौज आखिर  फेल हो  गयी, जिन्हें जाना होता है चले जाते है | जो लोग मुलायम के साथ दुःख सुख में खड़े रहते थे, उन्हें एक एक करके अलग कर दिया - अब भाइयों में भी फूट डालना इनका किस तरह का चरित्र है समझ नहीं आता |"


माननीय मुलायम सिंह यादव के चाहने वालों कि कमी आज भी नहीं है, पर उनके मन पर जो आवरण इन पूंजीवादियों डाल दिया है उसकी वजह से सारे लोग अलग थलग पड़ गए है .

डॉ.लाल रत्नाकर





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