24 जन॰ 2010


..इसीलिए थे वह जन-जन के जनेश्वर

Jan 23, 11:44 pm
इलाहाबाद । फफक कर फूट रहे आंसुओं का सिलसिला थम नहीं रहा था। बुझती चिता के साथ-साथ एक युग का भी अंत हो रहा था। शनिवार को दारागंज श्मशान घाट पर अस्त हो चुके राजनीति के इस सूरज श्रद्धांजलि देने वालों में जहां दिग्गजों का तांता था, वहीं कोने-कतरे खड़े गरीब और असहाय भी फूट-फूट कर रो रहे थे। उनको अपनी छाया देने वाला अपने आखिरी सफर पर था। सिर्फ जनेश्वर ही ऐसे थे जो गंगा के किनारे समाजवाद फैलाने की सोच सकते थे। उन्हें जन-जन की भावनाओं का भान था और यही बात उन्हें जनेश्वर बनाती थी।
नि:स्वार्थ भाव से राजनीतिक सीढि़यां चढ़ने वाले जनेश्वर मिश्र गंगा के महत्व को भली-भांति जानते थे। माघ मेला में समाजवाद चिंतन शिविर में सबके साथ बैठकर खिचड़ी खाना शायद ही उनके चाहने वाले कभी भूल पाएं। उनके करीबी बताते हैं कि होली उन्हें बहुत प्रिय थी। उनकी कोशिश रहती थी कि होली पर वह अपने साथियों के साथ रहे। इसके लिए वह कभी इलाहाबाद तो कभी बलिया स्थित गांव चले जाते थे। उनके करीबियों में से एक पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी बताते हैं कि इनके बाद अब उन हजारों की कौन सुनेगा, जिनके वह सबकुछ थे। कहना नहीं चाहिए लेकिन हजारों लोगों की गुहार अनसुनी रह जायेगी। मदद की आस में आया हुआ शायद ही कोई उनके दर से खाली जाता होगा। गरीबों का इलाज कराना, उन्हें कपड़े देना, अन्नदान जैसे कई समाजसेवी कार्य कर उन्होंने कितनों को तारा। नरेंद्र सिंह बताते हैं कि डा. लोहिया की तरह उन्हें भी एकांत जगह पर चिंतन करना पसंद था। इसलिए उनके अधिकतर विशेष चिंतन शिविर शांत जगह पर लगते थे। करीबियों ने बताया कि वह धार्मिक थे पर कट्टर नहीं। उनका मानना था कि गरीबों की सेवा करों, भगवान की सेवा हो जायेगी। बस यह समझिए कि जनेश्वर राजनीति के एक ऐसे आइना थे, जिसमें हर वर्ग का आदमी अपना चेहरा देखना चाहता था।

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