14 जन॰ 2010

आज हमने,तुम्हारे लिए एक,सपना बुना |

डॉ.लाल रत्नाकर 


आज हमने 
तुम्हारे लिए एक 
सपना बुना |


सुनोगी रात 
सपनों में तुम्हे 
जगाता रहा |






लुटेरे सब 
अपने पहचाने 
आते जाते थे |


चोर उचक्के 
सब उसके साथ 
फिर लुटेरा |


पहचाना था 
पर चुप हो गया 
शरीक जो था |


अमर गया 
बेइज्जत होकर 
किसने लुटा |


मुलायम ना 
मुलायम नहीं था 
कठोर संग |


अब देखना 
फिर चमकेगा वो 
ओ चला गया |


इनका तो था 
इतिहास ही सदा 
धोखा ही देना |


कहाँ फंसे थे 
जानता है फ़साना 
अरे अमर |


तुमको लुटा 
उसको भी उसने
तब लूटा था |


चला गया है 
क्या कहते वह 
नहीं गया है |


दाद हो गया 
बरबाद हो गया 
आना उसका |



  




3 टिप्‍पणियां:

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

ok, thanks.

Udan Tashtari ने कहा…

डॉ.लाल रत्नाकर को पढ़कर अच्छा लगा.

धन्यवाद ! रत्नाकर ने कहा…

धन्यवाद !
रत्नाकर

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