4 फ़र॰ 2010


भारत के भाग्य विधाता .
डॉ.लाल रत्नाकर 
महज यह सब एक संयोग नहीं है यह कहीं न कहीं बहसिपन  की सीमा का उलंघन भी है, समय के साथ बदलाव की गति कोई मायावती के लाने से नहीं आया है,और न ही सतीश मिश्रा येसा कोई गुल खिला दिये है, पर मायावती ने जिस बदलाव को अपने इर्द गिर्द लाकर खड़ा कर लिया और भूल गई की देश अभी बूढ़ा नहीं हुआ है, जो काम इतनी कम उम्र में उन्होंने चाहे बुत लगाकर किये हो या धन की उगाही करके किये हो, यह कोई नया काम नहीं है यही हल्का फुल्का काम पिछले दिनों शिवपाल यादव भी कर रहे थे तब और अब में इतना फरक है की वह यादव होकर उगाही कर रहे थे, कुछ लोगों के पेट फूल रहे थे, और अब उन फुले हुए पेटों में कुछ मॉल जा रहा है तो उन्हें इतनी तकलीफ नहीं हो रही है. हलके फुलके तरीके से कभी कभार जुगाली करते हुए-'सोसिअल इंजीनियरिंग' का मुल्लम्मा लगा कर सब कुछ डकार जाते है, यहि असली शत्रु है 'सोसिअल इंजीनियरिंग' के पर चलिए जो कुछ हो रहा है उसके लिए कहीं न कहीं तो सत्ता की प्यास ही तो है ?
यह कोई मायावती की नहीं इनसे पूर्ववर्ती शासन काल में लगभग इसी तरह के काम अमर सिंह ने किये जो मुलायम के लम्बे ईमानदार राजनैतिक कैरियर  होने के बावजूद जितने कम समय में उसमें दुर्गुण व् दोष पूर्ण बना दिया लोग कहते रहे और वह बर्बाद करते रहे .
समय आ गया है जब हमें नए शिरे से इस पर विचार करना होगा और इस बदलते दौर की नब्ज पकड़नी होगी, दगाबाजी और बिरोधियों की बढ़ोत्तरी ही हुयी है 'सोसिअल इंजीनियरिंग' के असली इंजिनियर कही किनारे है आश्चर्य तब हुआ जब राम विलास जैसा समझदार नेता भी आक्रकमता में यह कह जाय 'जब जनता जागेगी तब बदलाव होगा' आश्चर्य हुआ था उस दिन यह सुनकर जिस रामबिलास को जनता रिकार्ड मतों से जिताई हो एक नहीं अनेक बार और अपने कर्मों से हार गए तो 'जनता सो गई' उसी जनता ने मायावती को उत्तर प्रदेश में विजयश्री दी है,और वह जनता का नहीं अपना बुत बना रही है जहाँ जनता नज़र नहीं आ रही है दुनिया में बुतों को निहारा जाय तो माया जी आप सी समिरिद्धि हासिल की हस्तियों के ही बुत बने है और वहां भी जनता नदारद है, काश कोई शाशक आता जो जनता के बुत बनाता, जनता समझ गई है इन बुतों में उसके हिस्से की ही दौलत आप लगा रही हो, यही तो उन्होंने भी किया था पर उन्हें तो 'शर्म 'भी थी पर यहाँ तो सब कुछ धुल गया है.
इस देश में 'गाँधी जी की समझदार संताने' है जिनके पास देश की दिशा है जहाँ से आम आदमी का विकास हो सकता है की सोच है, येसा मेरा विश्वास है पर किसे तलाश है उनकी ? आज जिस तथा कथित 'गाँधी और नवजवान गाँधी' की ट्रेनिंग चल रही है देश सौपने की नेहरू के भारत का मालिकाना हक नहीं तो क्या है ?
बिचारे ................................छूट भैये किसकी नक़ल करें .


राजेश प्रियदर्शी के 'ब्लॉग' पर टिपण्णी से -

जातियों के आत्मसम्मान के पीछे अपने सम्मान की चिंता राजनेताओं को है. करीब 15 साल पहले बिहार में भी जातिगत समीकरण का नारा उठा था लेकिन उस सम्मान ने बेरोज़गारों की एक फ़ौज खड़ी कर दी और रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन करना पड़ा. और फिर पिछड़े बिहार और ना जाने कौन-कौन उपमाओं को लोग झेल रहे हैं. इसी फ़ौज का एक हिस्सा मैं भी हूँ. आख़िर ये सम्मान हमें रोटी तो नहीं देती है. मूर्तियों और उसकी सुरक्षा के लिए मायावती जी को राज्यों के दलितों की समस्याओं के समाधान के बारे में सोचना चाहिए.
अति तो हर चीज़ की बुरी होती है. आत्मसम्मान तो जनता के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान जैसी बुनयादी ज़रूरतों में निहित है. बाकी तुगलकी योजनायें कितनी कारगार होतीं हैं यह जग ज़ाहिर है. वैसे तो बहनजी ने गरीबों के लिए आशियाने भी अपने जन्मदिन पर कुछ मुट्ठीभर गरीबों को उपलब्ध करवाए हैं. लेकिन यह समझ नहीं आता कि यह सब खर्च गरीबों के आत्मसम्मान और पेट की आग पर क्यों भारी पड़ता आया है. हमारे नेता और जनता के हकों के प्रहरी परिपक्वता का परिचय क्यों नहीं देते. बेशक बहनजी ने बहुत अच्छे काम भी किए हैं और इन कार्यों को नकारा भी नहीं जा सकत. लेकिन लखनऊ के बाहर अति गरीबी की काली परछाईं घने कोहरे से कम नहीं है और तर्कवादियों पर नकारात्मक विषयों की सोच हावी रहना कोई नई बात नहीं है. वरन एक समय अपहरण ,लूट-पाट व् पकड़ जैसे शब्दों का अर्थ छोटे से छोटा सा बच्चा भी समझता था. अगर अटूट और सच्चे मन से एक स्वस्थ समाज की सरंचना की भावना हो तो एक प्रदेश की सरकार के पास जन-मानस के हृदयों में जगह पाने के लिए सदियों के लिए याद किए जाने के लिए पांच साल का अच्छा -खासा वक्त होता है. बात यहाँ सिर्फ बहनजी की ही नहीं बल्कि सब नेताओं को समझना चाहिए कि जनता में भगवान् बसता है और भगवान् का आदर हमेशा ही फलदाई होता है.
राजेश जी लेख बहुत अच्छा है और हक़ीक़त भी यही है. लेकिन जानवरों से रक्षा करने के लिए इंसानों की भर्ती करना कोई बुरी बात नहीं है, शायद इसी बहाने लोगों को रोज़गार तो मिलेगा. फिर जब सरकार बदल जाएगी तो यही सब इंसान एक बार फिर बेरोज़गारों में शामिल हो जाएंगे. दुख इस बात का है कि पूरे देश को मालूम है कि ये बेईमान नेता कभी भी ग़रीबों का भला नहीं कर सकते हैं फिर भी जनता उनके पीछे और उनके गुण गान करती है. सच है कि एक दिन इन सब मूर्तियों का हाल सद्दाम हुसैन की मूर्तियों की तरह ही होगा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.
मायावती जी एक सुझाव ये भी हो सकता है कि अपनी मूर्तियों के साथ कुछ सिपाहियों की मूर्तियाँ भी बना के बगल में लगा दे जैसा कि चीन के प्राचीन शासक करते थे. यदि दो हजार करोड़ रुपए खर्च करके गरीबो, दलितों, और किसानो के घर बना दे या इनको पाँच हजार रुपए प्रत्येक परिवारों को बिना ब्याज के ऋण दे दें तो सदियों तक आपका नाम रहेगा चाहे मूर्ति रहे न रहे. रही बात कांग्रेस और गांधियों की, तो सबको पता है कि कोई मजबूत विपक्ष कभी टिका नहीं इनके सामने इसीलिए जिसकी लाठी उसकी भैस. जैसा कि आजादी के महान नेता सिर्फ कांग्रेस के है और जो मर गए उनका नाम सरकार को याद भी नहीं आता. उदहारण के तौर पर लाल, बाल, पाल, सुखदेव, राजगुरु, नेताजी, भगत सिंह जैसे जाने कितने ही देशभक्तों के जन्म दिन कितने लोगों को पता है, मीडिया के तो क्या कहने!!! पत्रकारों को बुद्धिजीवी कहा जाता था लेकिन मास कोम्मुनिकेसन का कोर्स करके हर चौथा नौजवान बुद्धिजीवी बन जाता है और ऐसे में कोई खबर देता नहीं, खबर बनाके टाइम खा जाता है और फिर टाइम खाने के लिए नया खबर बनाने चल देते है, कल के लिए फिर 24 घंटे का न्यूज़ जो बनाना है. कहने का मतलब आज के दिन का न्यूज़ आज के लिए कल फिर न्या न्यूज़ और कुछ नहीं मिले तो बिल्ली छत से गिरकर भी नहीं मरी!!! राष्ट्रीय समाचार चंनेलो पर ऐसे न्यूज़ दिखाकर समय खाते है आज के बुद्धिजीवी पत्रकार. लेकिन दलितों, किसानो, मजदूरों की किसी को फिक्र नहीं, मै एक किसान का बेटा हूँ, हमने गेहू 975 रुपए क्विंटल मई 2009 में मुश्किल से बेचा, अक्टूबर 2009 से आटा 20 रुपए किलो है !! बीच में कौन है जो 10 रुपए प्रति किलो बढ़ा देता है. नौकरी वालों को क्या बारिश हो या तूफान महीने के अंत में वेतन तो मिलना है, महंगाई है तो क्या आधा पेट ही सही खाने को तो मिलेगा. लेकिन किसान का क्या, बीज खाद, दवाई महंगी हो जाती है और बारिश कम या ज्यादा हो गई तो भूखे ही रहना पड़ता है और जो रह नहीं पाते वो सुसाइड कर लेते है और राहुल गाँधी एक दिन कहानी बताकर छा जाते है और उस किसान की विधवा कलावती और बच्चे आज भी वैसे रहते है.
इसीलिए अगर मायावती एक पुलिस बल बनाना चाहती है तो बनाओ लेकिन उसमे केवल ग़रीब, दलित और किसानो के बेटो को नौकरी देती है तो मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा, लेकिन ऐसे होने वाला नहीं मुझे पता है!! एक विनती है यदि आप सुनहले मूर्ति केवल हाथ कारीगरों से ही बनाना फैक्ट्री में नहीं कम से कम किसी एक गरीब कलाकार का ही भला हो जाए. जय हिंद
BBC Hindi से साभार 

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