2 जून 2010


आवाज उठानी  होगी
"न्यायिक सुधारों के लिए" जाति  जनगड़ना आधार बनेगी उसे रोकने वालों को पहचानो ?
और इन्हें दुबारा संसद में ही न आने दो !

डॉ.लाल रत्नाकर

सदियों से लोगों को लूट कर सरकारी पदों पर बैठे और अन्याय को काबिलियत का आधार बनाकर देश को गर्त में ले जाकर किसको इन्हें ठीक करना है, जनता को इन्हें ठीक करना चहिये जिससे देश की सारी दौलत और सत्ता को इन्होने ने अपने कब्जे में किये है उससे देश के दबे कुचलों को नहीं  बल्कि हर तरह से कराहते हुए देश और देश के लोगों  को निजात दिलाना होगा तभी खुशाली और देश फिर से दौलत से परिपूर्ण होगा .

मेरे  बार बार लिखने का औचित्य यह नहीं है की मुझे राजनेताओं की तरह कुर्सी हथियानी है बल्कि आज़ादी के बाद देश की गुलामी से बदतर हालत आज़ाद भारत में दलितों पिछड़ों और गरीब मजदूर की है पर इनके कान पर जू नहीं रेंगती है इनके कुकर्मों का लेखा जोखा यही है की देश बेचों गरीब की गरीबी के नाम पर योजनायें बनाकर करोणों रुपये अपने अपनों में बाँट दो यही हालत ९५% पदों  पर बैठे लोग कर रहे है जिन्हें देश की नहीं उनके अपनों की चिंता है गरीबों की नहीं गरीब के नाम पर लूट की छूट  है  जिससे ये देश की दौलत इज्जत ज्ञान विज्ञानं इमान सब कुछ वह उनका लूट रहे है, एकलब्य तो उदहारण है नजाने कितनों को ये एकलब्य जैसा अभागा  बना रहे और बनाये रखने की निरंतर योजनायें बना रहे है, 'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' की युक्ति इन्हें निरंतर दोष करने की छूट देती है' तुलसी ने किस आशय से कहा होगा उसकी इन्हें चिंता नहीं है इन्हें इन्हें तो किसी न किसी तरह यह अधिकार ही मिल गया है की किसी तरह इस देश पर काबिज रहो, सारे महत्त्व के रास्ते अपने पास रखो, यही इनका  अधिकार है जिससे यह कहीं से भी उस पर किसी की भी नज़र पड़ते ही 'मधुमखियों की तरह बिलबिलाने' लगते है.
दूसरी तरफ भी कुछ कम बुरे हाल नहीं है उनका सोच का हिस्सा बिलकुल कुंठित कर दिया गया है जिनमे सोचने की पता नहीं शक्ति बची है या नहीं पर सोच का सकारात्मक नज़रिया तो है पर जिस तरह उनके खिलाफ दुष्प्रचार का सहारा लिया जा रहा है समाज में उनको मूर्ख,मूढ़,लम्पट और क्रूर और कुरूप बनाकर रख दिया है वह निश्चित रूप से अपने अस्तित्व और सोच को लेकर कितने गंभीर है इसका इंतजाम करना ही एकमात्र विकल्प है यहाँ स्पष्ट कर दूँ की सोच और समाज का भार जिस 'यादव' ने नेतृत्व देकर हमेशा संघर्षों में आगे रहकर (कतिपय राजनेताओ से विरत) बड़े -बड़े बदलाव को अंजाम दिये पर आज पूरे पिछड़े समाज ने उनसे हट कर ही नहीं बल्कि उनके विरोध में खड़ा हो गया है जहाँ देखिये इन्ही यादवों को ही दुष्प्रचारित करके पूरे पिछड़े समाज को गति देने वाले नेतृत्व को बदनाम करके सुधार के सारे रास्तों को बंद किया गया है अतः आज यादवों का दायित्व बनता है की जहाँ वह सारे बड़े आन्दोलन करने में अपनी ताकत लगा रहे है वही अपने पिछड़े साथियों को भी साथ लेकर चलने चलाने की नीति और नियति का ध्यान रखें.
पिछड़ों के तमाम जातीय संगठनों को एकजुट करके उन्हें इस आन्दोलन में खड़ा करना होगा यह जाहिर है की वह अपनी छोटी हित कामना के लिए अपने ही दुश्मनों के साथ खड़े है पर आज के दौर के यादव उसमे कौन से कम है राजनितिक प्रतिस्पर्धा के चलते उन्होंने किस किस प्रकार के विनाशक तत्वों को और सोच की समस्या और मूढ़ता को प्रश्रय देने में कसर छोड़ी है अतः उनसे भी यही अनुरोध है की नेत्रित्व को उसके जीवनकाल में स्मरण नहीं किया जाता है भले ही वह सत्ता की कुर्सी से दूर हो भले ही उसका स्मारक आज न बने पर आने वाले वक्त में जब जनता को समझ आएगी तो उसके विशाल स्मारक खड़े होंगे.
यही कारण है की जातीय संघर्षों के अगुवा राजित प्रसाद यादव हों या राम स्वरुप वर्मा राम सेवक यादव हो या अनेकों लोगों के दादा परदादा जिनसे ज्यादा उन्हें यह विस्मर्निय है पर उनके योगदान न जाने क्यों कम करके आंके जाने लगते है जब उन्ही के संघर्षों से लोग सत्ता की सीढियाँ चढ़ते है  उनका जितना बड़ा योगदान जाति को और पिछड़ों को जोड़ने का था उसे समझना होगा. तमाम बुद्धिजीवी यह मानते है की यदि पिछड़े और दलित एक हो जाएँ तो देश की शकल बदल जाएगी दुनिया की हर बड़ी ताकत जो अपराध और भ्रष्ट तरीके अपनाकर देश पर काबिज है उसकी दिशा बदल जाएगी. यदि समय रहते इसकी शुरुआत ना हुयी तो हमारी आने वाली फौज बहुत कमजोर हो जाएगी, सत्ता के गलियारे में बैठे हुए लोग यह अच्छी तरह से जानते है की यदि इनको वहां से हटना हुआ तो उनकी कितनी दुरदशा होगी उनकी चिंता ही हर तरह से कैसे सही आंकड़ों न आने पाए, उसी से भयभीत है ये.
यही कारण सत्य से विचलित किये हुए है उन्हें जिस  जातीय जन गणना के हजारों तर्कों से जाति की गणना में  उन्हें परहेज़ दिखाई दे रहा है वह उनके लिए ही नही उस पूरे समाज के लिए कष्टकारी है जिन्होंने सैकड़ों सालों से देश की दौलत हड़प कर प्रतिभावान बने है इसी पर 'असगर अली इंजीनियर' रविवार .कम में लिखते है- 
सच का सामना




सबसे पहले हम जातिगत जनगणना के औचित्य या अनौचित्य पर विचार करें. यह सही है कि धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में जाति के लिए कोई स्थान नहीं है और भारत में जाति प्रथा का उन्मूलन आवश्यक है. हमारे संविधान-निर्माताओं ने जाति को संविधान में कोई स्थान न देकर बिल्कुल ठीक किया. परंतु यथार्थ क्या है? जमीनी हकीकत क्या है? यथार्थ यह है कि हमारा समाज अनेक वर्गों और श्रेणियों में विभाजित है. हमारा देश कई संस्कृतियों व धर्मों वाला देश है. इस यथार्थ से हमारा प्रतिदिन वास्ता पड़ता है. इस सामाजिक विभाजन और ऊँच-नीच में जरा भी कमी नहीं आई है. उल्टे, इसमें बढ़ोत्तरी ही हुई है.

अंतर्जातीय विवाहों का अंत हत्याओं में होता है और प्रेमी जोड़े अक्सर अपने माता-पिता और परिजनों के हाथों मारे जाते हैं. आज भी दलित, गांव के कुएं से पानी नहीं ले सकते. सरपंच बनने के लिए चुनाव लड़ने का “दुस्साहस“ करने वाले नीची जाति के सदस्य को अपनी जान गंवानी पड़ती है. ऊँची जातियों के सदस्यों के लिए उनकी जाति पहचान ही नहीं बल्कि शान का चिन्ह है. जैसे-जैसे नीची जातियों के सदस्यों की माली हालत और खराब हो रही है, जैसे-जैसे देश में आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे ऊँची जातियों का अहंकार और बढ़ रहा है.

हमारे देश में चुनाव भी जातिगत आधार पर लड़े जाते हैं. चुनावों में जाति और साम्प्रदायिकता के कार्ड जम कर खेले जाते हैं. यहां तक कि टिकिट भी जाति के आधार पर बांटे जाते हैं. कुछ समय पहले तक जो लोग अपनी उपजाति का नाम तक नहीं जानते थे, वे भी अब अपनी उपजाति के आधार पर अपने समुदाय के लिए टिकिट मांगने लगे हैं. राजस्थान के गुज्जरों का उदाहरण हम सबके सामने है. सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर गुज्जरों ने हिंसक आंदोलन चलाया, जिसमें चालीस से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई. राजस्थान में मीणाओं और गुज्जरों के बीच हिंसक झड़पें हुईं क्योंकि मीणा जाति के लोगों को अपने अनुसूचित जनजाति के दर्जे के कारण अधिक सरकारी नौकरियां मिल रही थीं.


हमारे समाज में जातिगत ऊँच-नीच और विभाजन लंबे समय तक बना रहने वाला है. हम शुतुरमुर्गों की तरह, अपने सिर ऐसे गैर-यथार्थवादी आदर्शों की रेत में छुपा सकते हैं, जिन आदर्शों की हम दिन-रात अवहेलना करते हैं, परंतु इससे कोई फायदा नहीं होगा. हमारी संस्कृति ही जाति की संस्कृति है और इसे हमारी सामूहिक सोच, सामाजिक प्रतिष्ठा के हमारे मानदंड और सबसे बढ़कर, हमारी राजनीति और मजबूत बना रही है. हमारे संविधान द्वारा जाति व्यवस्था को खारिज कर दिए जाने के बावजूद, पिछले साठ सालों में हमारी सरकारों ने एक भी ऐसा ठोस कदम नहीं उठाया जिससे जाति प्रथा खत्म होना तो दूर, जरा सी कमजोर भी हुई हो. मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्णय, यद्यपि तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों में उचित और अपरिहार्य था, तथापि इससे हमारे समाज पर जाति प्रथा की पकड़ और मजबूत हुई है. 

और  यही कारण है की कई एसी जुझारू जातियों को जिनको फौरी तरीके से मंडल को भेंट कर दिया जिससे वह समय पर उनके काम आयें. इसी तरह का एक लेख (असगर अली ने अपने दूसरे आलेख में लिखे है) जो कहता है उनके अपने सोचे हुए को -
मारे देश में महिला शिक्षा का बहुत तेजी से प्रसार हो रहा है और पिछड़े वर्ग तो छोडिए, दलित महिलाएं भी अपनी माँओं से कहीं अधिक शिक्षित हैं.
कटु सत्य यह है कि पिछड़े वर्गो के पुरूष नहीं चाहते कि उनकी महिलाएं संसद और राज्य विधानमंडलों में पहुँचें. वे सत्ता में अपनी हिस्सेदारी नहीं खोना चाहते. अगर महिलाएं सांसद और विधायक बनेंगी तो वे अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होगीं, ऊँचे स्वर में बात करेगीं और पारिवारिक व सामाजिक मसलों में उनकी राय का महत्व बढ़ जावेगा. यह संभावना पुरूषों के अहं को चोट पहुँचा रही है.
अगर पिछडे़ वर्गो के आलमबरदार अपनी महिलाओं को आरक्षण दिलवाने के इतने ही इच्छुक हैं तो वे अपनी पार्टी के टिकिट बाँटते समय यह क्यों सुनिश्चित नहीं करते कि कम से कम एक-तिहाई उम्मीदवार महिलाएं हों? वे कोटे के अंदर कोटा क्यों चाहते हैं? वे ऐसा इसलिए चाहते हैं ताकि संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व कम न हो. फिर, कौन यह गारंटी दे सकता है कि कोटे के अंदर कोटे का लाभ भी केवल पिछडे वर्गो की “क्रीमी लेयर“ नहीं उठाएगी? अब तक का यह अनुभव रहा है कि आरक्षण का लाभ, दलितों और पिछड़े वर्गो के अपेक्षाकृत अधिक पढ़े-लिखे और समृद्ध वर्ग ने ही उठाया है. पिछड़े वर्गो और दलितों की बहुत बड़ी आबादी आज भी अशिक्षा ओर गरीबी के अँधेरे में जीने को मजबूर है.

पिछड़े वर्गो के सिपहसालार, दरअसल, इस तथ्य का लाभ उठा रहे हैं कि संसद में उनके सदस्यों की अच्छी खासी संख्या. उनके सहयोग के बिना वित्त विधेयक पास कराना संभव नहीं है. यही कारण है कि सरकार को मजबूर होकर अपनी रणनीति बदलनी पड़ी और लोकसभा में विधेयक को पेश नहीं किया गया. संभवतः, वित्त विधेयक को इन दलों के सहयोग से पास करवाने के बाद, मई महीने में, सरकार महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में लाए.

मई में भी, पिछड़े वर्गो के नेता लोकसभा में इस बिल की राह में अड़ंगे लगा सकते हैं. मुलायम सिंह यादव पहले ही महिलाओं के लिए 33 की बजाय 20 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के “समझौता फार्मूले“ की बात कह चुके हैं. और शायद बिल को लोकसभा में पास कराने की खातिर, सरकार यह समझौता कर भी ले. यदि ऐसा हुआ तो यह निश्चित रूप से महिलाओं के साथ अन्याय होगा परंतु वोट की राजनीति में न्याय-अन्याय का शायद कोई महत्व नहीं है.

अगर सरकार को समझौता ही करना था तो उसने चौदह साल तक इंतजार क्यों किया? संशोधित स्वरूप में तो यह बिल चौदह वर्ष पहले ही पास हो सकता था.

मुझे आशा है कि सरकार दबाव में नहीं आयेगी और महिलाओं के आरक्षण में कमी नहीं करेगी. यह अन्याय होगा. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछड़े वर्ग के जो नेता अपने वर्ग की महिलाओं के सबसे बड़े हितचिंतक होने का नाटक कर रहे हैं, उन्होंने ही अपनी पत्नियों को मुख्यमंत्री बनाने में जरा भी संकोच नहीं किया. लालू प्रसाद यादव ने अपनी पत्नी राबडी देवी को बिहार जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जबकि राबडी देवी को न तो राजनीति और न ही प्रशासन का कोई अनुभव था. इसी तरह, पिछड़े वर्ग की उमा भारती को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया जबकि उनकी प्रसिद्धि मुख्यतः आंदोलनकर्ता व भावनाएं भड़काने वाली वक्ता के रूप में थी.
अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यह मांग भी कर रहे हैं कि मुस्लिम महिलाओं को भी कोटे के अंदर कोटा दिया जाना चाहिए. उनके इरादे नेक लगते यदि उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को लोकसभा या कम से कम विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाया होता. महिलाएं तो दूर, इन पार्टियों ने तो मुस्लिम पुरूषों तक को आबादी में उनके हिस्से के अनुपात में टिकिट नहीं दिये. मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा निर्धारित करने की उनकी मांग, मुसलमानों का समर्थन हासिल करने की एक चाल भर है. इसी तरह की स्वार्थ की राजनीति इस देश में अल्पसंख्यकों को न्याय दिलवाने के आड़े आती रही है. जैसा कि पहले कहा चुका है, इन नेताओं का इरादा पिछड़े वर्गो को न्याय दिलवाने का भी नहीं है. वे तो केवल पिछड़े वर्ग की “क्रीमी लेयर“ के हितरक्षक हैं.

इस से भी बड़ी विडंबना यह है मुस्लिम समुदाय अपने फायदे के लिए भी एक राय नहीं हो पा रहा है. जहाँ मुस्लिम राजनीतिज्ञ कोटे के अंदर कोटे की असंगत मांग दोहरा रहे हैं वही उलेमा अपना अलग राग अलाप रहे हैं. उलेमा का कहना है कि मुस्लिम महिलाओं के लिए, चुनावी राजनीति प्रतिबंधित क्षेत्र है. कुछ वर्ष पहले, जब महिलाओं के लिए पंचायती राज संस्थाओं में 33 प्रतिशत (व कुछ राज्यों में 50 प्रतिशत) आरक्षण किया गया था, उस वक्त एक मुस्लिम महिला ने देवबंद की नगरपालिका का चुनाव लड़ने के लिए अपना पर्चा भरा.

देवबंद के मुफ्तियों ने तुरत-फुरत एक फतवा जारी कर फरमाया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए चुनाव लड़ना और पुरूषों के बीच प्रचार करना हराम है. उस मुस्लिम महिला ने जब हिम्मत दिखाई और फतवे को मानने से साफ इंकार कर दिया, तब मुफ्ती मजबूर होकर कुछ झुके. उन्होंने कहा कि वो चुनाव तो लड़ सकती है परंतु उसे प्रचार करते समय हिजाब पहनना होगा. उस महिला ने यह आदेश भी नहीं माना. उसने चुनाव लड़ा, बिना हिजाब पहने प्रचार किया और चुनाव जीता भी. अब ऐसी खबर आई है कि लखनऊ के नद्वातुल उलेमा ने फतवा जारी किया है कि महिलाओं को घर में रहकर घरेलू कामकाज करने चाहिए और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश नहीं करना चाहिए.

अकेले असगर अली इंजीनियर के ऐसे विचार नहीं है इसी तरह के विचार वह तमाम बुद्धिजीवी रखते है जिन्हें देश से अपने हक़ की चिंता है पर उन्हें देश की चिंता नहीं है दरअसल उससे अलग 'यादव बंधुओं' की चिंता है जिसे न तो असगर साहब समझ पा रहे है न ही उनके बंधू " क्योंकि न तो यह सांप्रदायिक है और न ही इन्हें जातिवादी ही कहा जा सकता है यदि ये यादव कुल में जन्मे है तो इनका क्या दोष है" जब जब धरम की हनी होती है तो ये अवतरित होते है और धरम की रक्षा कर्स्ते है और लम्बे विश्राम के लिए चले जाते है न जाने कहाँ ? 


  

     

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