15 जुल॰ 2010



बुन्देल खंड की त्रासदी 

Jul 14, 11:32 pm
बारिश की पहली फुहार पड़ते ही आबो-हवा के साथ इंसानी चेहरों की रंगत भी बदल गई। नहीं बदला तो केवल बुंदेलखंड और उसके बाशिदोंके चेहरे की मुरझाइया। वहां धूल भरी आधिया हैं, पानी के लिए जगह-जगह मरे पड़े, सड़ते जानवरों की लाशें हैं, कुछ कुंवारों के गांव भी हैं, क्योंकि लोग उन गांवों में अपनी बेटियों की शादी नहीं करते-इसलिए कि वहां पानी नहीं है। रात में पानी की चोरी करते किसान हैं, पानी के लिए लाठिया चटकाते फौजदारी करते भाई-बंधु हैं और मीलों तपती धरती से नंगे पैर पानी भरकर लाती हुई औरतें हैं। ये बुंदेलखंड की भयावह तस्वीर है, जहां आज की तारीख में केवल 50 से 95 सेमी वर्षा होती है। बुंदेलखंड में सूखे और अकाल का इतिहास बहुत पुराना है।
यहां तक कि 744 हिजरी में इब्नबतूता बुदेलखंड आया तो उसे यहां अकाल के दीदार हुए और उसने अपनी पुस्तक 'रेहला' में इसका जिक्र भी किया। यह भयावह सूखा उन घने जंगलों को धीरे-धीरे लील गया जिसमें बाबर द्वारा शिकार खेलने का जिक्र मिलता है। चंदेलों का राजकीय चिह्न शार्दूल जो कि भारतीय शेरों की एक प्रजाति था, आज केवल पत्थर के स्मारकों में सुरक्षित है।
बुंदेलखंड का इतिहास चंदेलों, बुंदेलों, मराठों और अंग्रेजों के आगोश में अंगड़ाइया लेता है। शुरुआती दिनों में चंदेलों ने कुओं की तरफ खूब ध्यान दिया। कुएं ही पेयजल और खेती के मुख्य साधन थे। टीकमगढ़ में आज भी देश के सबसे ज्यादा कुएं पाये जाते हैं, लेकिन जलस्तर नीचा होने, विषम-कठोर धरातल, बिखरी हुई बस्तियों के कारण तालाबों ने जल्द ही कुओं का स्थान लेना शुरु किया और तालाबों का एक खूबसूरत नेटवर्क पूरे बुंदेलखंड में बनना प्रारंभ हुआ। चंदेल राजाओं ने इसे एक धार्मिक और सामाजिक ताना-बाना भी दिया। चंदेल राजाओं ने अपने नाम से यहां तक कि पुत्र-पुत्रियों, पूर्वजों और पौराणिक पात्रों के नाम से भी तालाब बनवाए। पूरे बुंदेलखंड में 700 तालाब इसी अवधि में अस्तित्व में आए। चंदेलों ने कुछ तालाबों के भीतर मंदिर बनवाकर उन्हें ऐतिहासिक स्वरूप भी दिया। इस दौर में ऐसे भी उदाहरण मिले हैं जिसमें सजायाफ्ता दुश्मन राजा को तालाब निर्माण के रूप में जुर्माना भरने का कहा गया। ये तालाब जीविकोपार्जन का साधन भी बने। चंदेल शासकों ने जलीय कृषि करने वाली स्थानीय जातियों को इस बात की छूट दी कि वे तालाबों में मछली पालन करें, सिंघाड़ा, मुरार और कमलगट्टा की खेती करें, इस शर्त पर की तालाबों का रख-रखाव भी करते रहें। इन समवेत कारणों से तालाब बुंदेलखंड की सामाजिक-धार्मिक परंपरा में पूरी तरह कदमताल करते नजर आए। बुंदेला राजाओं ने उतने महत्वपूर्ण नए तालाब तो नहीं बनाए, लेकिन इन तालाबों का स्वरूप जरूर बरकरार रखा। चरखारी और अजयगढ़ में कुछ सुंदर तालाब भी बने।
बुंदेलखंड में उत्तराधिकार जब मराठों से अंग्रेजों को हस्तातरित हुआ तो अंग्रेजों ने बुंदेलखंड की सैन्य महत्ता को देखते हुए यहां खुद को स्थापित करने का निर्णय लिया और जलीय संकट के निवारण के लिए बाध निर्माण की योजना बनाई। बाध निर्माण की प्रक्रिया आज भी तब से अनवरत जारी है। दुर्भाग्य से बुंदेलखंड की परंपरागत जल संचयन प्रणाली अब ध्वस्त है। कुएं, बावड़िया और तालाब सब भूमाफियाओं के कब्जे में हैं। 1930 में शुरू हुई नलकूप प्रणाली ने बुंदेलखंड की परंपरागत जल संचयन व्यवस्था का विध्वंस कर डाला है। इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि देश में 1930 में जहां तीन हजार नलकूप थे, वहीं इनकी संख्या अब पाच लाख है।
जल संचयन अब केवल सरकारी मकहमे की जिम्मेदारी है। जैसे-जैसे जलस्तर नीचे जा रहा है, हैंडपंप पानी देना बंद कर देते हैं। प्रशासन इसे री-बोर कराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। गर्मिया शुरू होते ही गावों में पानी को लेकर जब हाहाकार मचता है तब पानी की चोरी और जल संसाधनों पर कब्जे की घटनाएं कानून एवं व्यवस्था की एक बड़ी समस्या बन जाती है। यह भी एक अजीब विरोधाभास है कि जहां बुंदेलखंड की खेती पानी के अभाव में दम तोड़ रही है वहीं देश की 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ में जलमग्न है। कहर मचाते इस जल संसाधन का समान वितरण कैसे किया जाए, इस पर देश के योजनाकारों का ध्यान नहीं जा रहा है। बुंदेलखंड में किन साजिशों के तहत जंगल नष्ट किए जा रहे हैं, तालाबों पर खेती की जा रही है, इसके निवारण के लिए बुंदेलखंड की अवाम को अपने बीच से ही भगीरथ पैदा करना होगा।
[कौशलेंद्र प्रताप: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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