4 अग॰ 2010

'घुसखोर' राज्य 'रिश्वतखोरी' में लिप्त ?
डॉ.लाल रत्नाकर 
                                   क्या जमाना आ गया है बिना घूस के कुछ हो ही नहीं रहा है 'भर्तियाँ' हो कहीं की मान्यता हो किसी तरह का काम हो चपरासी हो या प्रिंसिपल बाबू हो या  साहब हो टीचर हो या प्रोफेसर हो वाइस चांसलर सबकी तैनाती और नियुक्ति बिना घूस के नहीं हो रही है, क्या होगा इस मुल्क का जिस समय शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय बनाया गया उसी समय से कमायी का श्रोत मानव को बना दिया गया था दुनिया भर में अलग तरह के इंतजामात है पर हिंदुस्तान में अलग तरह के काम चल रहे है यहाँ मंत्री से संतरी तक सब घुसखोर हो गए है, आखिर करें भी तो क्या ये 'बेचारे अपनी नेता को घूस देकर ही तो आये है' पहले राजनीति में वो आते थे जिनमे चरित्र और देश और प्रदेश की सेवा का लिहाज़ होता था पर आज वो आ रहे है जिन्हें न तो समाज का न देश प्रदेश का केवल लूट का ही खेल करना कराना आता है .
                                 जरा सोचिये ? अब तो लगने लगा है की सोचने के लिए भी घूस की आवश्यकता आ गयी है, बिना घूस के कोई सोचने को भी तैयार नहीं है . फिर भी जरा सोच कर देखिये ये घूस का दौर कैसे कम होगा, जब इतनी बुराईयाँ भरी हो, उसमे एक नयी और बड़ी बुराई यह आई है की शिक्षण संस्थानों की दशा बिगड़ रही है, जहाँ क्षेत्रवाद, जातिवाद , घूसखोरी आदि आदि . इतना ही नहीं 'राजीव गाँधी ने नयी शिक्षा नीति में रोजगार परक शिक्षा की परिकल्पना की थी जो कमोबेश विभिन्न प्रदेशों में किसी न किसी रूप में शुरू भी हुआ है पर रोजगारों की हालत वैसी की वैसी ही रही .
                                      हनुमान जी होते तो वह भी 'रिश्वत' की मांग करते क्या ? पर आज के हनुमानों को क्या हो गया, वह तो सुना है की नोट गिनने की मशीने लगा रक्खे है, यह नोटें कहाँ से आ रही है शायद हनुमान जी की कृपा से ही यह भंडार भर रहा है या और कोई कारण भी हो सकता है, क्योंकि यह रात दिन पूजा करते है और २४ घंटे 'घूस' लेते है. यह सब देश का बच्चा बच्चा सुन रहा है क्योंकि मिडिया चिल्ल्ला चिल्ला कर कह रहा है. किसका किसका नाम ले रहे है याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है, कोई दो चार हो तो नाम भी लिखो, जो भी आया खूब खाया उसका पेट भरा भी नहीं तबतक दूसरा ईमानदारी के नाम पर आ गया, अब वह खाना शुरू क्या किया की  सबकी नज़रों के आगे खाना 'घूस' शुरू किया है अब खाया नहीं जा रहा है तो नोट गिनने की मशीन लगा रखा है.
   ये सब कहाँ हो रहा है पत्रकारों की नज़र से कैसे यह सब बचा हुआ है या पत्रकारों को इस पर नज़र डालने की इज़ाज़त ही नहीं है या इनकी भी हिस्सेदारी सुनिश्चित है, उत्तर प्रदेश के कई मंत्री इन सुबिधाओं का लाभ ले रहे है इनको सभी जानते है ये कहते है की 'मुख्यमंत्री जी' को देना पड़ता है, येसी है उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री जो धन्नाल्ले से हजार हज़ार के नोटों की माला पहनती है-
कमाल की मुख्यमंत्री है और कमाल के इनके मंत्री जो मालाएं इन्हें पहनाई जा रही है दलितों की रजा मंदी से मांगी गयी दौलत है या उन्ही नोटों से 'घूस' की दौलत से बनी माला. 

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