3 अग॰ 2010

पिछले दिनों संसद की मानसून सत्र की गतिविधियों को लेकर मैंने कुछ चर्चा की थी .
डॉ.लाल रत्नाकर
                                आपको याद होगा पिछले दिनों मैंने लिखा था की 'मानसून सत्र' क्या क्या लेकर आ रहा है जिसमे सबसे चिंता का मामला जनगणना का है जिसमे जातियों की गणना किया जाना महत्वपूर्ण है पर लग तो यही रहा है जातीय जनगणना को इस बार उठाया ही न जाये . क्योंकि महगाई का सवाल उठाकर उसे खीचने में सारा समय लगा देंगे और जनसंख्या की गणना में जाती की गणना को गौड़ कर देंगे .
                              देश के तथा कथित बुद्धिजीवियों की बर्गलस से समाज आजिज़ आ गया है जिसमे पिछले दिनों 'प्रेमचंद की जयंती' पर आयोजित 'हंस' की पच्चीसवें  वर्ष में प्रवेश के साथ ही वार्षिक संगोष्ठी में 'जो दशा इनकी हुयी' उनसे सभी वाकिफ है .
व्यूरोक्रेट और साहित्यकार रहे वर्धा के कुलपति के खिलोफ़ जिस नारे का प्रदर्शन हुआ वह शोभनीय था या अशोभनीय वह तो उनके साक्षात्कार पढ़ने और उसकी टिप्पड़ियों को पढ़कर हुआ .
                              आलोक मेहता ने तो सारे आम 'सम्पादकीय गुंडागर्दी का जो भोंडा प्रदर्शन कर सरकारी पत्रकारिता और स्वामी अग्निवेश को जवाब देने मंच पर आये तो विरोध और सवालों को झेलने के डर से 'कुलपति महोदय' के पीछे पीछे ही हाल छोड़ गए .
                            पर संसद में क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाना अभी तो मुश्किल है पर जनगणना के सवाल को टालने का बड़ा षड़यंत्र कहीं न कहीं जरूर हो रहा है. देश के इन इन्त्ज़म्कारों को क्या तकलीफ है उसका अंदाज़ा यही है की उनकी सारी चालाकी खुल जाएगी उसी को बचाने के लिए सारी साजिश रची जा रही है. 

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