21/08/2010

दलित नेतृत्व की खामियां !
डॉ.लाल रत्नाकर
देश में दलित नेतृत्व दो तरह से काम कर रहा है ,एक डर कर दूसरा डरा कर . डर कर सी.बी.आई./ सुप्रीम कोर्ट /अपराधी  इनसे यह भयभीत है अतः बार बार यह जानने पर भी की इनकी जायज बातें यह नहीं सुनेंगें, हिम्मत नहीं की खुलकर आन्दोलन खड़ा करें और देश के समस्त दलित नेतृत्व को एक करें . डरा कर , उन्ही को जिनकी वजह से ये सत्ता में आये है,  की तुम्हारा यह काम नहीं करूँगा वह काम नहीं करूँगा और द्विजों से हाथ मिला लूँगा.
लगभग सभी राजनितिक दलों के शीर्ष नेताओं के यही हाल है . कमोवेश इस देश के दलित नेता जब भी अवसर मिला ये द्विज ही बनने का प्रयास करते है और इन्हें लगता है की यह बन भी गए है. यह सब कब तक चलता रहेगा  मुश्किल सवाल तो यही है, पर इसका विकल्प क्या है ? कहाँ से आएगा वह नेतृत्व जिसे देश प्रेम के साथ देश चलाने की समझ भी होगी.
दलितों  का एक एक कदम जिसपर पूरे मुल्क के मुट्ठी भर द्विजों की दृष्टि रहती है. पर दलितों की दृष्टि दलितों पर ही नहीं रहती है, वोट को दुबारा कैश न करना हो तो उनके नेता उनसे मिलना भी पसंद नहीं करते. इन्हें जो पसंद आते है उनका नाम लिखा जाना ही अपमान जनक है . जब वह इन्हें गालियाँ देते है तब दलित जनता इन पर तरस खा रही होती है और इन्हें शर्म भी नहीं आती . कब तक यह दौर चलेगा.
मूलतः सभी बदलाव तभी संभव होंगे जब दलित नेतृत्व बदलेगा .
जबतक ये नहीं बदलेंगे तबतक समाज का असली स्वरुप ही नहीं बदल पायेगा, कोरे नारे से सामाजिक बदलाव न कभी हुआ है और न ही आगे होने की आशा है . 
बदलाव की नियति और वैज्ञानिक नीति से ही बदलाव होगा . जिसके लिए सबसे पहले ऐसे राजनेताओं को आगे लाना होगा जिन्हें यह नीतियाँ समझ  आती हों पहले तो उसे प्रमाणिक तौर जाहिर करनी होंगी फिर गारंटी सहित उनकी व्यवस्था भी.
राष्ट्रव्यापी बदलाव के लिए देश भर में दलित चेतना को एकजुट करना होगा. 
और तभी से शुरू होगी असली लड़ाई जिससे 'असली भारत' का असली स्वरुप सामने आएगा फिर पता चलेगा की सदियों से इस देश के खूं को चूस कर कहा रक्खा गया है . नहीं तो खूं चूसने वाले खूं भी चूसेंगे और खु पी पी कर गालियाँ ही बकते ही रहेंगे.
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