15/09/2010

जकडे हुए देश में सामाजिक गैरबराबरी |
डॉ. लाल रत्नाकर 
भारत देश जिन जटिलताओं में जकड़ा हुआ है उसे तोड़ना आसान नहीं है, यही कारण है कि समय समय पर यहाँ अलगाववाद कि मांग उठती रहती है. वह देश का सीमावर्ती इलाका हो या आंतरिक, सामाजिक बदलाव को दरकिनार कर भारत सरकार में बैठे उच्च वर्णों के लोग बेईमानी और भ्रष्टाचार से पदासिन इस देश को केवल और केवल अपनी जागीर समझते है |
यही कारण है घी दूध कि नदिओं वाला देश पानी में भी जहर पी रहा है शर्म नहीं आती ? इनको कि इस देश को घी दूध कि नदियो को छोडिये शुद्ध पानी को भी इन्होने पीने लायक नहीं छोड़ा!
आदरणीय शरद जी ये उसी परंपरा के लोग है, जो एक विदेशी महिला जिसका भारतीय जातीय संकीर्णताओं से कोई लेना देना नहीं था उसे भी अपनी जाती के लाभ के लिए भ्रमित कर दिये है, और अपनी उसी जातीय व्यवस्था का अंग बना लिए 'जिसकी जनगणना का विरोध कर रहे है' एक वैदिक ने कितनी बार जाति बदली कभी हिन्दुस्तानी बने कभी कुछ पर रहे वास्तव में वही............'ब्रा'  ?
शरद जी बड़ा सोचिये देश कि परंपरा बदलने के लिए, आप जहाँ हैं वहां से भी कुछ नहीं होना है वे भी बैदिक कि परमपरा के ही है 'अतः उनको जोड़िये जो आप से टूट गए है नहीं तो आप लिखते रहेंगे और ये खबरें - ऐसे ही आती रहेँगी -
(दैनिक जागरण से साभार)

जातीय जनगणना एक साल खिसकाने पर शरद खफा



Sep 14, 08:39 पम


नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। वर्तमान जनगणना से अलग अगले साल जाति जनगणना करवाने के कैबिनेट के फैसले पर फिर विरोध शुरू हो गया है। जाति जनगणना को लेकर संसद में काफी उग्र रहे जद-यू अध्यक्ष शरद यादव ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा के नेता प्रणब मुखर्जी ने संसद का भरोसा तोड़ दिया।
उन्होंने कहा कि सरकार का फैसला न सिर्फ पैसे की बर्बादी है बल्कि यह पूरी जनगणना का उद्देश्य ही विफल कर देगा। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को पत्र भेजकर उन्होंने पुनर्विचार करने और वर्तमान जनगणना में ही इसे लागू करने की मांग की है।

जाति जनगणना को लेकर विपक्षी दलों ने पिछले दो संसदीय सत्रों में लगातार सरकार पर दबाव बनाया था। पिछले दिनों कैबिनेट ने इसे हरी झंडी तो दे दी लेकिन जून से सितंबर 2011 के बीच जाति जनगणना कराने का फैसला किया। शरद ने मंगलवार को इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, सरकार अपना वादा नहीं निभा पाई। पहले भी सरकार ने भरोसा दिलाया था कि वर्तमान जनगणना के साथ ही इसे लागू किया जाएगा लेकिन उसे टाल दिया गया। जाति जनगणना के पीछे मंशा केवल पिछड़ों की संख्या जानना नहीं है बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि वे कितने पिछड़े हैं। यह तभी हो सकता है जब जाति जनगणना वर्तमान जनगणना के साथ ही हो। जाति जनगणना अलग से करवाने पर इसका उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। शरद ने कहा कि यह पैसे की भी बर्बादी है। वित्त मंत्री व जाति जनगणना पर बने मंत्री समूह के अध्यक्ष प्रणब को पत्र लिखकर उन्होंने अपनी आपत्ति जता दी है।     

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