31/12/2010

कांग्रेसियों को बाज़ आना चहिये ! 
महात्मा गाँधी का 'इस्तेमाल' करते हुए -
(डॉ.लाल रत्नाकर)
वर्षों से महात्मा गाँधी के नाम पर देश का कबाड़ा कर देने वाले इन कांग्रेसियों को 'गाँधी' लगाकर लूट मचा रखी है 'नेहरू लगाकर देखो न यदि सोनिया ने इस देश के राष्ट्रपिता की बराबरी की हैसियत बना ली है तो देश वासियों को शर्म से डूबकर मर जाना चहिये? सैकड़ों वर्षों से इस देश के गरीबों मज़लूमों की लडाई लड़ने के नामपर उनके खूं पीने वाले ये कांग्रेसी जब जैसा चाहे वैसा करने को तैयार रहते है, इन्हें शर्म भी नहीं आती की देश की दुर्दशा की कोई खबर इन्हें नहीं है!
और अब इन्हें सोनिया गाँधी जैसी नज़र आने लगीं हैं ! क्या हो गया इन बेचारों की आँखों को -
(बी बी सी हिंदी डोट कॉम से ) 
सोनिया की तुलना महात्मा गाँधी से

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह
सोनिया गांधी ने अपने स्थान पर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फ़ैसला किया था
कांग्रेस ने अपने 125 वर्षों का इतिहास लिखते हुए वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी की तुलना महात्मा गांधी से की है.
हाल ही में कांग्रेस से सवा साल पूरा होने पर जारी किताब 'कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ़ द इंडियन नेशन' में कहा गया है कि प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न करने का त्याग महात्मा गांधी के त्याग की तरह से याद किया जाता है.
इस किताब में कांग्रेस ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या को महात्मा गांधी की तरह ही देश के लिए बलिदान बताया गया है.
कांग्रेस का कहना है कि इस किताब को कई इतिहासकारों ने मिलकर तैयार किया है और इसे पार्टी की सहमति से प्रकाशित किया गया है.

इसके मुख्य संपादक प्रणब मुखर्जी हैं और संयोजक आनंद शर्मा हैं. ये दोनों ही नेता यूपीए सरकार के वरिष्ठ मंत्री हैं.

त्याग की तुलना

दो खंडों में प्रकाशित इस किताब के पहले खंड के पृष्ठ 156 पर 'सोनिया गांधी का यादगार त्याग' शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित सामग्री में प्रधानमंत्री पद स्वीकार न करने के सोनिया गांधी के फ़ैसले का ज़िक्र किया गया है.
लोगों को सोनिया गांधी के इस सत्ता त्याग को देखकर महात्मा की याद आई
किताब का अंश
इसमें 18 मई, 2004 को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी के संबोधन का ज़िक्र किया गया है जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री बनना कभी उनका लक्ष्य नहीं रहा, उन्हें सत्ता ने कभी आकर्षित नहीं किया और कोई पद पाना कभी उनका लक्ष्य नहीं रहा.
उल्लेखनीय है कि 15 मई को सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना गया था और अगले दिन यानी 16 मई को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए ने भी उन्हें नेता चुना और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी.
लेकिन इसके दो दिन बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफ़ा देते हुए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की थी.
प्रधानमंत्री पद त्यागने के सोनिया गांधी के फ़ैसले की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हुई थी.
कांग्रेस ने अपनी किताब में कहा है, "उनके इस त्याग की व्यापक सराहना हुई और इसकी वजह से उनका क़द पार्टी में और लोगों के बीच बढ़ गया."
महात्मा गांधी और अपनी माँ की तरह ही राजीव ने भी देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया
किताब का अंश
हाल ही में लगातार चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गईं सोनिया गांधी के बारे में कांग्रेस का कहना है कि व्यक्तिगत सत्ता के त्याग और सामाजिक आदर्शों को हासिल करने का ऐसा उदाहरण आज़ादी के बाद से देखने को नहीं मिलता.
किताब में कहा गया है, "लोगों को सोनिया गांधी के इस सत्ता त्याग को देखकर महात्मा की याद आई."
इसी किताब के पृष्ठ 135 में राजीव गांधी की हत्या का ज़िक्र करते हुए कहा गया है, "महात्मा गांधी और अपनी माँ की तरह ही राजीव ने भी देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया."
हालांकि इसी में आगे कहा गया है कि श्रीलंका में जातीय संघर्ष को सुलझाने के उनके प्रयासों की वजह से ही तमिल छापामारों के संगठन एलटीटीई ने उनसे रंज़िश पाल ली थी.

हालांकि इसी में कांग्रेस ने यह भी संदेह व्यक्त किया है कि राजीव गांधी की हत्या में एलटीटीई का ही हाथ था. 
यद्यपि भारतीय राजनेताओं की यही दशा हो गयी है जिससे उन्हें देश और देश का गौरव कहीं याद ही नहीं आ रहा है.सोनिया जी फ़िरोज़ और इंदिरा जी की 'बहू' मात्र हैं इनका सम्बन्ध कांग्रेस से इसलिए हो सकता है की नेहरू जी ने अपनी बेटी को अपने बाद इस देश को सौपने का इंतजाम किये थे 'स्वयं नेहरू जी' इस देश को हथियाने में कितना बड़ा रोल किये उसका लेखा जोखा रखने वाले 'लगभग' छीज गए हैं , नए समाजवादियों को तो यह भी पता नहीं है की समाजवाद क्या है, जिस देश का संविधान इस 'प्रकार के वंशवाद' की इज़ाज़त न देता हो और उसी के छावं में वंशवाद फलफूल रहा हो, जो अपनी बनाई हुयी व्यवस्था को गालियाँ देते हों और उसी को बढ़ाने में रातदिन मशगूल रहते हों .
क्रमशः ...... 

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