27/10/2011

दीपावली की मंगल कामनाएं-

मध्‍य प्रदेशः राम नरेश की नई पारी


राजनीति में न दोस्ती स्थायी होती है और न दुश्मनी. यह मुहावरा नहीं, बल्कि सच्चाई है. अगर ऐसा न होता तो कांग्रेस में राम नरेश यादव को वह सम्मान नहीं मिलता, जो उन्हें मिला. 1977 में आपातकाल के खिला़फ संघर्ष करने वाले राम नरेश के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि उन्हें उसी कांगे्रस ने सिर-आंखों पर बैठाया, जिसके खिला़फ संघर्ष करके उन्होंने अपनी राजनीतिक जीवन यात्रा का श्रीगणेश किया था. पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ कांगे्रसी नेता राम नरेश यादव को मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाकर सम्मानित करना उनके शुभचिंतकों को ही नहीं, बल्कि उन लोगों को भी अच्छा लगा, जो राम नरेश की सादगी के कायल थे और उनकी विचारधारा से प्रभावित. केंद्र सरकार ने इस बुजुर्ग नेता को मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य का राज्यपाल बनाया तो जेहन में कई सवाल एक साथ उठ खड़े हुए.
राम नरेश यादव का समाजवादी आंदोलन और भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट स्थान रहा है. उन्होंने दलितों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों के दु:ख-दर्द को बहुत करीब और गहराई से समझा. इसे महज़ इत्त़ेफाक़ ही कहा जाएगा कि कभी राम नरेश यादव के मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री और भाजपा शासनकाल में मुख्यमंत्री रहे राम प्रकाश गुप्ता को भी मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाया जा चुका है.
राम नरेश आज भले ही कांगे्रस में हों, लेकिन उनकी विचारधारा हमेशा समाजवादी रही है. समाजवादी चिंतक आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया, पंडित मदन मोहन मालवीय एवं सर्वपल्ली राधाकृष्णन के भारतीय दर्शन और सामाजिक जीवन से प्रभावित राम नरेश सोशलिस्ट नेता राज नारायण के साथी रहे. आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी के टिकट से जीत के बाद चर्चा में आए राम नरेश ने राजनीति का ककहरा संसद में ही सीखा.
यह वह दौर था, जब इंदिरा गांधी की तानाशाही से जनता और जनप्रतिनिधि दोनों ही त्रस्त हो गए थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए देश में आपातकाल लगाकर सारे अधिकार खुद ले लिए थे. आपातकाल के विरुद्ध जिसने भी मुंह खोलने की कोशिश की, उसे जेल में डाल दिया गया. तब राज नारायण एवं चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं के साथ राम नरेश ने भी लोकनायक जय प्रकाश नारायण की अगुवाई में आपातकाल के खिला़फ बिगुल बजाया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रवैये ने सभी गैर कांगे्रसी नेताओं को एक झंडे के नीचे खड़ा कर दिया तो जनता ने भी कांगे्रस की केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने में देरी नहीं की. 1977 में पहली बार गैर कांगे्रसी सरकार बनी तो जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई को पहला गैर कांगे्रसी प्रधानमंत्री होने का सौभाग्य मिला. जनता पार्टी की सरकार ने कई राज्यों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा भी भंग कर दी. उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी थे. उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी जीतकर आई. जीत के साथ ही मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार भी सामने आ गए, लेकिन तरजीह राम नरेश यादव को मिली और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया.
इसमें किसी तरह का विवाद नहीं है कि राम नरेश आपातकाल की उपज थे. जिस पार्टी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू किया और राम नरेश ने जिसके खिला़फ संघर्ष किया, आज उसी पार्टी की सरकार ने उन्हें राज्यपाल की कुर्सी पर बैठाया तो उनका कद अपने आप का़फी ऊंचा हो गया. 1977 में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाने में किसान नेता चौधरी चरण सिंह और राज नारायन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. यादव 23 जून, 1977 से 27 फरवरी, 1979 तक मुख्यमंत्री रहे. उस समय बाबू बनारसी दास विधानसभा के अध्यक्ष थे. सरल स्वभाव के राम नरेश यादव को प्रदेश का पहला ग़ैर कांगे्रसी मुख्यमंत्री होने का भी सम्मान मिला. वैसे इससे पहले चौधरी चरण सिंह भी कांगे्रस के कुछ अन्य विधायकों के साथ पार्टी से बग़ावत करके जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट और निर्दलीय विधायकों का एक मोर्चा संयुक्त विधायक दल के नाम से बनाकर सत्ता पर क़ाबिज़ हो चुके थे, लेकिन उन्हें ग़ैर कांगे्रसी मुख्यमंत्री किसी ने नहीं माना. 1977 में राम नरेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन वह राजनीति के दांव-पेंच कभी नहीं सीख पाए. यही वजह थी कि वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दो वर्ष भी पूरे नहीं कर पाए और उनकी जगह बाबू बनारसी दास को मुख्यमंत्री बना दिया गया. राम नरेश के सीधेपन की इससे बेहतर मिसाल कोई नहीं होगी कि जब बनारसी दास मुख्यमंत्री बने तो राम नरेश उसी सरकार में उप मुख्यमंत्री बनने को तैयार हो गए. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के निवासी राम नरेश का जन्म एक जुलाई, 1928 को ग्राम आंधीपुर में एक ग़रीब परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम गया प्रसाद यादव था. पेशे से वकील राम नरेश यादव के चार पुत्र और पांच पुत्रियां हैं. राम नरेश ने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे. उन्होने मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ से जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में विजय प्राप्त कर पहली बार संसदीय जीवन में प्रवेश किया और दिसंबर 1977 तक लोकसभा के सदस्य रहे. इसके बाद वह 1977 के विधानसभा चुनाव के बाद संपन्न हुए उपचुनाव में जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार निधौली कलां (एटा) से, दूसरी बार बतौर निर्दलीय 1985 में शिकोहाबाद से, तीसरी बार आजमगढ़ के फूलपुर निर्वाचन क्षेत्र से 1996 में और चौथी बार कांग्रेस के टिकट पर 2002 में विजयी हुए. वह अप्रैल 1988 से अप्रैल 1989 तक लोकदल और जून 1989 से अप्रैल 1994 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से राज्यसभा के भी सदस्य रहे. राम नरेश यादव ने दस गुना लगान, जमीन बांटो-भूमि हड़पो, गन्ना गोदाम घेरो, दाम बांधों और अंग्रेजी हटाओ जैसे अनेक आंदोलनों में भाग लिया. वह लगभग दस बार जेल गए. आपातकाल के दौरान लगभग 19 माह तक जेल में रहे. मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कराने संबंधी आंदोलन और पटना में विधानसभा घेरो आंदोलन (1986) में गिरफ्तारी दी. राम नरेश मूल्य आधारित राजनीति करने वाले नेता माने जाते हैं. उन्होंने अकूत दौलत छोड़कर नैतिक मूल्यों को अपनी पूंजी बनाया. यही कारण है कि अपने राजनीतिक जीवन में वह कई बार उपेक्षा के शिकार भी हुए.
राम नरेश यादव का समाजवादी आंदोलन और भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट स्थान रहा है. उन्होंने दलितों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों के दु:ख-दर्द को बहुत करीब और गहराई से समझा. इसे महज़ इत्ते़फाक़ ही कहा जाएगा कि कभी राम नरेश यादव के मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री और भाजपा शासनकाल में मुख्यमंत्री रहे राम प्रकाश गुप्ता को भी मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाया जा चुका है. देर से ही सही, राम नरेश यादव को मध्य प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य का राज्यपाल बनाया जाना का़फी सुखद है. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुशील हरकोली ने जब बीते 8 अगस्त को राजभवन में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई तो आजमगढ़ में खुशी की लहर दौड़ गई.

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