16/03/2012

मार्क टुल्ली का आलेख 
(अमर उजाला से साभार)

उत्तर प्रदेश में अखिलेश

Story Update : Saturday, March 10, 2012    11:20 PM
राहुल गांधी का कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी की विफलता से उन्हें सबक मिला है, और इस बारे में वह व्यापक चिंतन करेंगे।

उत्तर प्रदेश के नतीजे पर व्यापक चिंतन की जरूरत ही नहीं है। ये सारे तथ्य तो पहले से ही स्पष्ट थे। ये ऐसे सबक हैं, जिन्हें सीखने की गांधी परिवार को कीमत चुकानी पड़ सकती है, जबकि लगता नहीं कि यह परिवार कीमत चुकाने के लिए तैयार है। इसके लिए 10, जनपथ से बाहर निकलना होगा। दरअसल राजनीति में महल जान-बूझकर साधारण लोगों से दूर कर दिए जाते हैं। जबकि राजनेताओं को आम लोगों के साथ खड़े दिखना चाहिए।

चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने पूरे राज्य का दौरा करते हुए लोगों की समस्याओं को दूर करने का इस तरह वायदा किया, मानो वह दूसरे राजनेताओं से अलग हैं, मानो केवल उन्हीं के पास लोगों की तकलीफें दूर करने की शक्ति है। वायदे करते राहुल में मुझे उनके पिता की छवि नजर आई, जो इसी तरह लोगों को आश्वस्त करते थे, जैसे कि राज्य सरकारों की तुलना में केंद्र सरकार ज्यादा कार्यकुशल और योग्य है।

दुर्भाग्य से राजीव गांधी ने यह पाया कि भारत में अधिकार इतने विकेंद्रित हैं कि प्रधानमंत्री तक अपने वायदे पूरे करने की गारंटी नहीं दे सकते। उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने जान लिया था कि राहुल गांधी के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है। वे महसूस कर चुके थे कि गांधी परिवार से होने के बावजूद राहुल के पास राजशाही वाले असीमित अधिकार नहीं हैं।

दूसरे राजकुमारों की तरह राहुल गांधी ने भी खुद को दरबारियों से घेरे रखा। फिर साधारण राजनेता न होने के कारण उन्होंने अपने सलाहकारों के तौर पर अनुभवी राजनेताओं को चुनने के बजाय अपने आसपास उभरती युवा शख्सियतों को रखा, जिनके पास एमबीए से लेकर दूसरी अकादमिक योग्यताएं थीं, जिनका भारतीय राजनीति में कोई महत्व नहीं है।

उन्होंने दिग्विजय सिंह को उत्तर प्रदेश में अपने पास रखा, लेकिन इस पूर्व मुख्यमंत्री ने पुराने और अप्रासंगिक मुद्दे उठाकर खुद ही अपना कद छोटा कर लिया। 'सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई' जैसे जुमले उछालने के अतिरिक्त मतगणना से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर चाटुकारिता का ही परिचय दिया कि अगर चुनावी नतीजे अच्छे होते हैं, तो इसका श्रेय राहुल गांधी को जाएगा, लेकिन अगर परिणाम आशानुरूप नहीं आता, तो इसकी जिम्मेदारी मेरी होगी। राहुल गांधी को अपने सलाहकारों से अच्छी सलाह नहीं मिली, बल्कि वे समझ बैठे थे कि युवराज इस तरह की चाटुकारिता से ही खुश हो जाएंगे।

लगातार यात्रा और एक के बाद एक बैठकें करके राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश की थी। चुनाव से पहले ही दलितों के घर भोजन करके और रात गुजारकर वह अपने बहुप्रचारित अभियान की झलक दे चुके थे। इसके बावजूद उनका उन अखिलेश यादव से कोई मुकाबला नहीं था, जो युवाओं के आइकॉन बनकर उभर चुके थे। अखिलेश एक ऐसे परिवार से आते हैं, जो हमेशा अपनी सादगी पर गर्व करता आया है। मुझे मुलायम सिंह के शुरुआती भाषण का एक अंश आज भी याद है, जो वह बार-बार दोहराते हैं, 'मैंने पूरे उत्तर प्रदेश की धूल फांकी है।' अखिलेश राज्य का मुख्यमंत्री बनने के साथ अब अपने वायदों पर अमल करने की हरसंभव कोशिश करेंगे।जबकि राहुल जनपथ के अपने एकांत महल में वापस लौट जाएंगे।

राहुल ने उत्तर प्रदेश से लौटते हुए यह तक बताने की जहमत नहीं की कि वायदों की पूर्ति के लिए वह राज्य में किसे छोड़ जा रहे हैं। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया था। यह आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि कांग्रेस में निष्ठा के आगे दूसरी कोई चीज मायने नहीं रखती। यही कारण है कि असम के अपवाद को छोड़कर देश के किसी राज्य में कांग्रेस का कोई स्थापित और निर्विवाद नेता नहीं है। इसके बावजूद दिशाहीन कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय पार्टियों के दो कद्दावर नेताओं से टकराने की गलती की।

कांग्रेसी निष्ठा आम आदमी पर हमेशा भारी पड़ती है। गांधी परिवार ने रहस्य के एक ऐसे आवरण से खुद को घेर रखा है, मानो उसके पास वोट पाने की जादुई क्षमता है। इस पार्टी को, जो इस बार उत्तर प्रदेश में इसी जादू के सहारे जीतने की उम्मीद लगाए बैठी थी, जान लेना चाहिए कि 1984 में राजीव गांधी की भारी जीत के बाद से यह जादू काम नहीं करता। राजीव गांधी को भी उतने वोट दरअसल इंदिरा गांधी की हत्या से उत्पन्न सहानुभूति के कारण मिले थे।

पिछले लोकसभा चुनाव में यूपीए की जीत को उत्साही टेलीविजन एंकरों ने कांग्रेस की लहर मानते हुए इसका श्रेय सोनिया के करिश्मे को दिया था। लेकिन वह कांग्रेस के पक्ष में लहर नहीं थी। इस चुनाव में एक और मिथक को चुनौती मिली-वह यह कि राहुल की तरह प्रियंका के करिश्मे पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। अमेठी के नतीजे बताते हैं कि प्रियंका कांग्रेस को जीत नहीं दिला पाई।
मतगणना के एक दिन बाद सोनिया को दूसरे राजनेताओं की तरह पत्रकारों के बीच देखा गया। उन्होंने भी कहा कि मुझे उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों के नतीजे से सबक मिला है।

उन्होंने यह कहा कि ज्यादा नेताओं के कारण भी कांग्रेस की यह दुर्गति हुई हो, तो आश्चर्य नहीं। मेरे हिसाब से उन्होंने बिलकुल उलटी बात कही है-मुलायम और मायावती जैसे कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं के सामने खड़े होने वाले कांग्रेसी नेता बहुत थोड़े थे। गांधियों को सबसे पहले सत्ता साझा करने का सबक सीखना चाहिए। कांग्रेस को समझना होगा कि उसे न तो गांधी परिवार पर इतना निर्भर होना चाहिए और न ही चाटुकारिता का प्रदर्शन करना चाहिए।

राहुल गांधी के लिए बेहतर यही होगा कि दोबारा अपनी छवि दांव पर लगाने से पहले वह राज्य की धूल फांकें। इसी तरह 10, जनपथ को महल के बजाय एक ऐसा निवास होना चाहिए, जहां सभी राजनेताओं की आसान पहुंच संभव हो।
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