13/09/2012

नेताजी की खुशफहमी और उत्तर प्रदेश

आजम खां साहब जरा मंत्रियों को संभालिए: मुलायम

कोलकाता/कुमार भवेश चंद्र
Story Update : Thursday, September 13, 2012    1:17 AM
mulayam singh said azam khan to handle ministers
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश सरकार के कुछ मंत्रियों के कामकाज के तरीके पर फिर से नाखुशी जाहिर की है। उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश के छह महीने की सरकार की तारीफ की और कहा कि यूपी में सपा सरकार के फैसलों से पार्टी को लोकसभा चुनाव में निश्चित तौर पर फायदा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि अखिलेश सरकार में कुछ मंत्रियों का रवैया ठीक नहीं है, उन्हें सुधरना पड़ेगा। इसके बाद मुलायम मंच पर बैठे नगर विकास व संसदीय कार्य मंत्री आजम खां से मुखातिब हुए और बोले, आजम साहब आप इसे देखिए। बाद में, जब आजम खां के बोलने का मौका आया, तो उन्होंने नेताजी की चिंता को वाजिब करार देते हुए दूसरे मंत्रियों पर इस अनुशासनहीनता का ठीकरा फोड़ा और सुधार की उम्मीद जताई।

समाजवादी पार्टी की बुधवार को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुलायम सिंह यादव जब मंत्रियों के कामकाज पर टिप्पणी करके आजम से मुखातिब हुए, तो एकबारगी सबकी नजरें उधर ही मुड़ गईं। अखिलेश सरकार के छह महीने के कार्यकाल में यह चौथा मौका है, जब सपा सुप्रीमो मंत्रियों के काम से नाखुश दिखे।

दो बार लखनऊ में बंद कमरे में उन्होंने मंत्रियों को अनुशासन में रहने की नसीहत दी, तो दूसरी बार पत्रकारों से बातचीत में सार्वजनिक तौर पर मंत्रियों को सुधर जाने की हिदायत दी। बुधवार को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी बंद हॉल में उन्होंने मंत्रियों के पेंच कसे। अनुशासन कायम रखने की जिम्मेदारी के बाद जब आजम बोलने लगे, तो उन्होंने कहा, 'नेताजी ने जो कहा, वह बेहद गंभीर है। हम निश्चित तौर पर इसमें सुधार करेंगे।'

आजम को जिम्मेदारी के मायने
मंत्रियों को संभालने की जिम्मेदारी आजम खां को सौंपे जाने को लेकर पार्टी नेताओं में कई तरह की चर्चाएं रहीं। आजम भी उन मंत्रियों में शामिल है, जो गाहे-बगाहे सरकार के लिए मुश्किल खड़ी करते रहे हैं। एक नेता की टिप्पणी थी, मुलायम सियासत के माहिर खिलाड़ी हैं। उन्होंने आजम को जिम्मेदारी देकर सियासी चाल चली है।

राहुल और पीएम पर बोला हमला
समाजवादी पार्टी ने पहले कांग्रेस, फिर केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए सरकार, प्रधानमंत्री और फिर सीधे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पर हमला बोल दिया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पेश राजनीतिक-आर्थिक प्रस्ताव में साफ कहा गया कि गंभीर से गंभीर मसलों पर भी राहुल के विचार सुनने को नहीं मिले तो ये कैसे माना जाए कि देश उनके हाथ में सुरक्षित है। प्रस्ताव में मनमोहन सिंह को आर्थिक मोर्चे पर नाकाम बताया और कहा गया है कि जब भी पीएम कुछ कहते हैं महंगाई और बढ़ जाती है।

अखिलेश की अगुवाई में चुनाव
कुछ मंत्रियों से नाराजगी को छोड़ दें, तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मुलायम सिंह अखिलेश सरकार के कामकाज से गदगद नजर आए। इसका असर कार्यकारिणी के राजनीतिक प्रस्ताव में भी दिखा, जिसमें पार्टी ने मुख्यमंत्री अखिलेश की अगुआई में यूपी में लोकसभा का चुनाव अपने बल पर लड़ने का ऐलान किया। सपा ने उम्मीद जाहिर की है कि अखिलेश सरकार के अच्छे प्रदर्शन का लाभ अगले लोकसभा चुनावों में मिलना तय है।

उन्होंने यह भी कहा कि पहले यूपी के चुनाव मुलायम सिंह की अगुआई में लड़े जाते रहे हैं लेकिन इस बार अखिलेश की रहनुमाई में यूपी की सियासी जंग लड़ी जाएगी। कहा गया कि पिछले विधानसभा चुनावों में प्रदेश के 80 में से 50 लोकसभा क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा है और अब अखिलेश सरकार की कामयाबी से हम इससे अच्छे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं।
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नेताजी की खुशफहमी और उत्तर प्रदेश

राजनैतिक तौर पर उत्तर प्रदेश भले ही आज एक बदलाव के दौर से गुज़र रहा है लेकिन यह कहना बहुत वाजिब नहीं होगा की अखिलेश की सरकार ने ऐसा कुछ खास कर दिया है जिससे प्रदेश की अवाम बहुत  खुश हो उत्तर प्रदेश में जो स्थितियां हैं प्रदेशवासी उससे आज  भी त्रस्त हैं, इन्हें तो अपने मंत्रियों को ही संभालना भरी पड रहा है जैसा की  नेताजी स्वयं अनेक बार स्वीकार कर चुके हैं। अब देखना है की आने वाले चुनाव में प्रदेश की जनता किस करवट बैठती है, बसपा का जनाधार इस सारे ढाँचे में एक तरह से बहुत ही बड़ी पेंच के रूप में प्रदेश में अपना स्वरुप बना लिया है, राहुल के लिए कांग्रेस किसी हद तक जा सकती है . यदि नेता जी यह सोचते हैं की देश की संसद में उनके युवा पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री उसी तरह कामयाब हो जायेंगे तो यह सोचना यहाँ अभी जल्दबाजी होगी।
दूसरी ओर सभी युवा पुत्रों को प्रदेश की अवाम देख चुकी है "यहाँ अनीस त्रिवेदी की यह बात जायज लगती है  की यह संबिधान बदलना चाहिए जिसमें राजनेता बादशाह हो जाता हो" यह बंदा भले ही प्रायोजित किया जा रहा हो और नएद्विजत्व की स्थापना की एक घटिया सोच के एक युवा चेहरे के रूप में जिसे मिडिया लेकर आ रहा हो, क्योंकि अब इस तरह की घटिया सोच में कोई दम नहीं है। मैं जानता हूँ की आने वाले दिनों में आंबेडकर और कांशी राम की मूर्तियों के साथ सदियों की सडी मूर्ति पूजा की हिमायती ताकतें एक जूट होंगी और उनके फावड़ा चलाने वाले या हथौड़ा उठाने वाले दलित भी उन्ही के साथ। पर अब हमें उससे कोई फिक्र नहीं है क्योंकि हमने जो जनरेशन तैयार की है वह उसे मात देने में माहिर ही नहीं मुहतोड़ हिसाब देने में भी कामयाब होगी पर जो दुखद है वह यह है हमारे बुजुर्ग नेताओं की नियति। निश्चित रूप से वो अपने समय के तेज़ तर्रार नेता थे पर आवश्यक नहीं की उनकी सोहदा औलादें भी वैसी हों।
समाजवादी समारोहों में लोहिया नहीं जब पूंजीवादी और राजतंत्रीय नीतियाँ नज़र आती हैं और उसी तरह के सोच के लोग. उसे कोलकाता में आयोजित किया जाय या गुजरात में इससे कोई फर्क नहीं होता. पर जब हम  वहां होते हैं तब अचरज होता है कि क्या यही समाजवाद है .
डॉ.लाल रत्नाकर   

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