24/10/2012

आईये इसपर विचार करें.

डॉ.लाल रत्नाकर 
बचपन से ये सुनते सुनते कान पक गए की बुराई को हरबार की विजय दशमी के अवसर पर जला कर राख़ कर दिया जाता है, परम्परा से हम रामलीला में सारे के सारे रामायण के प्रकरण को दुहराते हैं. यही हमारी संस्कृति का हिस्सा बनकर अपराध, भ्रष्टाचार, अहंकार, जातीयता एवं स्त्री के अपमान और सबल द्वारा उसके अपहरण को गौरवान्वित करने का 'पर्व' बनकर नए सिरे से अचेतन और चेतनायुक्त मन के भीतर भरने मात्र का पर्व ही तो नहीं है. पर बुराई है की जलने का नाम ही नहीं लेती बल्कि नए सिरे से और प्रभावी होकर उठ खड़ी होती है. आईये इसपर विचार करें.

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