16/07/2013

मुलायम स्थिर नहीं रहते - ये कांग्रेस को रोकना चाहते हैं या मोदी को .

मुलायम ने फिर जताई पीएम बनने की इच्छा

एजेंसी | अंतिम अपडेट 16 जुलाई 2013 1:00 AM IST पर
mulayam desire to be pm
आगामी लोकसभा चुनावों में तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की भविष्यवाणी करने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अप्रत्यक्ष रूप से फिर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाहिर की है। हालांकि उन्होंने कहा कि वह पीएम बनने की रेस में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने इस तरह के प्रस्ताव को स्वीकार करने से भी इंकार नहीं किया। मुलायम ने तृणमूल कांग्रेस, टीडीपी और जदयू के साथ सपा के जुड़ने से तीसरे मोर्चे के गठन की अपेक्षा की।उन्होंने कहा कि वह पहले भी इन पार्टियों के साथ काम कर चुके हैं। सपा प्रमुख ने एक टीवी इंटरव्यू के दौरान कहा, ‘अगले चुनावों में न तो कांग्रेस को और न ही भाजपा को बहुमत मिलेगा। तीसरे मोर्चे में जुड़ने वाले दलों में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी होगी।’हालांकि नेताजी ने साफ किया कि अगर तीसरे मोर्चे की सरकार बनती है तो वह प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी पेश नहीं करेंगे, लेकिन साथ ही उन्होंने संकेत दिए कि पहले भी ऐसा हुआ है, जब कोई एक ऐसा नेता प्रधानमंत्री बना है, जिसकी कोई चर्चा ही नहीं थी। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए मुलायम ने कहा कि सिर्फ मीडिया ही उनके नाम की हवा बना रहा है। जब उनसे पूछा गया कि क्या अगला चुनाव मोदी बनाम राहुल होगा, तो उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश चुनावों को भी राहुल बनाम अखिलेश का नाम दिया गया था।मुलायम ने कहा, ‘मोदी को यह बताना चाहिए कि आखिर उन्होंने क्या हासिल किया है। मोदी मॉडल क्या है? गुजरात के विकास के पीछे रिलायंस का हाथ है।’ कांग्रेस पर भी कड़ा प्रहार करते हुए सपा प्रमुख ने कहा कि वह हमेशा उनके लिए परेशानी खड़ी करती है। उन्होंने यह भी कहा कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार के प्रधानमंत्री पद की इच्छा जताने में कुछ भी गलत नहीं है। हम यहां राजनीति करने आए हैं। हम संत या संन्यासी नहीं हैं। मुलायम ने भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी की तारीफ करते हुए कहा कि क्या वह देश के नेता नहीं हैं। मोदी के यूपी से चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने यह एक काल्पनिक सवाल है। (अमर उजाला से साभार)....................
प्रासंगिक विश्लेषण ;

            अब सवाल यह है कि जब देश में एक तरह की आशा बढ़ी हो, बूढी और निकम्मी कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना हो, मोदी को देश की अवाम के मस्तिष्क ने उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में आम अवाम देखना शुरू कर दिया हो, और यह हवा लगभग चल पड़ी हो, आखिर ऐसे वक्त में अपने मा. नेता जी को प्रधानमंत्री बनने की जो सुधि आई है, वह किसी के गले तो उतर ही नहीं रहा है और न ही कहीं चर्चा ही है भैया इस मामले में तो बहिन मायावती ज्यादा चतुर लगती हैं और समय का आकलन कर चुप हैं. जिस कांग्रेस के खिलाफ 'मोदी' डंका पीट पीट कर ये एलान कर रहा हो कि महाभ्रष्ट कांग्रेस को हटाया जाय इसके लिए जो भी करना पड़े करो ! अब ऐसे में कांन्ग्रेस को सत्ता में बनाये रखने और तीसरे मोर्चे की बात करना अखबारी और पत्रकारिता के साथ वर्चुअल दुनिया का मामला तो हो सकता है पर हकीकत नहीं.             अब यदि बात हकीक़त की की जाय तो इनकी या उस किसी पिछड़े या दलित नेता की इक्छा को यदि पर लगाने हैं तो देश के कोने तक ये सन्देश देना होगा और केवल मायावती ही नहीं राष्ट्रिय नेताओं को साथ ला सकते हैं यदि ये इस काम में बहन मायावती को मना लें और उनका सहयोग मिल जाय और इमानदारी से समझौता हो की ये मिलकर राष्ट्र को अच्छे लोगों से चलवाना चाहते हैं, तो कुछ अच्छे लोग अन्य जातियों से भी इनका समर्थन कर सकते हैं, पर अब कोई जादू जैसा कार्य हो जाए तो अलग बात है पर, उत्तर प्रदेश के बाहर का यादव भी यह जानता है की ये क्या करेंगे देश के लिए, देश बड़ा है, विविधता वाली समस्याएं है, अपने प्रदेश को ही जब ये उन्नत मार्ग पर ले जाने में कामयाब नहीं है, तो इनसे पुरे देश के लिए उम्मीद करना बेमानी ही है.
              'इस मामले में कम से कम मायावती तो कामयाब हैं सम्पूर्ण देश में दलितों को उनका सन्देश गया है, की वो क्या कर सकती हैं दलित उत्थान के लिए, भले ही उनके ब्राह्मिन मोह ने उन्हें उनके लोगों के मध्य कुछ हद तक निरासात्मक स्थिति में पहुंचाया हो पर जिन स्थितियों में ऐसी दशा उन्होंने उत्पन्न की हो पर अभी भी उनके लोग उतने निराश नहीं हैं'. माननीय नेता जी अगर सबसे ज्यादा निराश किसी को करते हैं तो अपने लोगों को, जो कुछ करना चाहता है उसे खुले हाथ करने भी नहीं देते हैं ऐसा कहा जाता है, दूसरी जो खराबी है सैफई के अलावा इनके कार्यकाल में पुरे प्रदेश में विकास कहीं नज़र नहीं आता.
            पता नहीं ये प्रधानमंत्री बनकर लोगों के भले का कोई कार्यक्रम नहीं दे पायेंगे तो कौन अब इनको ये बताये की यह सब नाटक करने से जनता का समर्थन नहीं मिलने जा रहा है, अब इन्हें ठीक से यह पता नहीं की 'अल्ली बल्ली' से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी नहीं बनती, लोहिया की सूक्तियां रटकर 'समाजवाद' नहीं चलता समाजवादी सोच उधार की नहीं होती. समझ और दृढ संकल्प से चिंतन की जरूरत होती है, समझदार लोग देश के विकास के अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम तैयार करते हैं दबे कुचले लोगों के लिए ठोस कार्य क्रम देते है तब जनमानस आपको समर्थान के लिए संघर्ष करके आगे आता है. 'माली से बागवानी का ही काम लिया जाता है उसे मंत्री बना देना आत्म संतोष तो भले ही दे सकता हो पर वह प्लानिंग नहीं कर सकता'.
             पर अभी तो नहीं पर पिछड़े और दलित समुदाय के उस नौजवान को यह दायित्व देना होगा जो इन सबको समेट सके. दर असल इनके परिवार से या किसी भी नेता के परिवार से सुयोग्य व्यक्ति नहीं होगा तो इस दायित्व का निर्वहन नहीं हो पायेगा, इनके मुख्यमंत्री पुत्र तो दावेदारी तो कर सकते हैं उक्त पद के लिए पर अभी उनका असर तो प्रदेश में चहुमुखी विकास की धारा बहाने के यश से से लबरेज़ होने के बाद.
              हर नागरिक देश के लिए सोचे ऐसी सोच वाला नेत्रित्व पैदा करना होगा, गुजरात के हाथ त्रासद से जले हुए हैं, पर उससे बहुतों को कोई मतलब नहीं है, हो सकता है गुजरात के अन्दर मुस्लिम सफोकेशन महशुस कर रहा हो, दुसरे प्रांत के लोग फिट न हो रहे हों, पर वहां के लोग सुकून तो मह्शूश कर रहे होंगे उनके विकास की संभावनाएं तो हैं. मुझे उस डॉ. मित्र की बात आज भी याद है जो गुजरात के किसी जिले के बड़े मेडिकल कालेज में प्रोफ. है "अंकल यह बहुत अच्छी जगह है यहं 'भ्रष्टाचार' भी इमानदारी से होता है, बात अटपटी लगी खुलासा किया तो हसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी यानी यदि आप ने घूस के लिए एक करोर दिया है दूसरा एक बीस देगा तो पहले का एक वापस इमानदारी से कर देते हैं" उसका कहना साफ़ था कई प्रदेशों में तो वापस भी नहीं करते काम न होने पर भी. 'बेईमानी' के नायाब नमूने हमारे जिन प्रदेशों की खूबसूरती बढा रहे होंगे आज भले ही हमें अच्छा न लगे मेरा यह कहना की बेईमानी के अपने लाभ तो हैं, पर इमानदारी की अपनी पहचान भी तो है.
             माननीय नेता जी प्रधानमंत्री बनेंगें तो यह एक सन्देश होगा की 'माटी' के लाल भी उस पद तक पहुँच सकते हैं यह सब तब और अच्छा होगा जब उनके इर्द गिर्द अच्छे लोग होंगें, तब इसका लाभ अवाम तक जाएगा जिससे यह सन्देश प्रबल होगा "धरतीपुत्र मुलायम सिंह" बदले नहीं हैं. उस समय जो कुछ हुआ या इस बीच उन्होंने जो जो पहचान बनायी थी वह मध्यकाल के किसी राजा से कमतर आंकी नहीं जा सकती थी यदि उसमें भी बदलाव कर अपने प्रारम्भिक स्वरुप में होंगे तो ऐसा राजा (प्रधानमंत्री) अब अलग बात है कि राजा की कोई जाती नहीं होती वह राजा होता है, उसकी मर्ज़ी होती है. वैसे लोग तो यही कहते हैं अच्छा राजा प्रजा का ध्यान रखता है और अपने राज्य का विस्तार भी. चलो जो कुछ भी करते हैं राजा लोग सहना ही पड़ता है, सदियों से सहते सहते चले आ रहे हैं , और आगे भी यही होता रहेगा.
क्रमशः............जारी........   


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