20 दिस॰ 2015

परिवार की जाती और जाति की राजनीति !

क्या हो गया है हमारे इन राजनेताओं को !
जिसे ही देखिये वही परिवार मोह में पागल!

भाई नेता जी के परिवार की नक़ल कर रहे हो क्या ?
या इतने लायक हो गए हो की अब सारा साम्राज्य चलाने की कुवत ही आप में है, बाकी सब आपकी प्रजा, चमचे, कार्यकर्ता हो गए हैं. अब तो राजनेताओं को शर्म भी आनी बंद हो गयी है बल्कि इन्हें देख हमें शर्म आती है। इनके पिछलग्गू कार्यकर्ताओं की तो मति ही मारी गयी ।
जिन्हें इनका कोढ़ तो दीखता नहीं ?

अरे भाई राजनीती में आये जनता ने मुहब्बत दिखाई आपको प्रधान, प्रमुख और विधायक बनाया आप के आका की पार्टी सत्ता में आयी और आपकी किस्मत काम आयी आपका अपढ़ होना, गुंडा होना काम आया आप मंत्री बन गए.... ?

पर इतना सब हुआ तो आप अपना परिवार पढा-लिखाकर अफसर बनाते लेकिन आप यहाँ भी गच्चा खा गए क्योंकि आप तो पढ़े लिखों को मुर्ख समझते हो? अफसरों से उगाही करते हो, चौकीदार हो, लेखपाल हो, वह इंजिनियर हो, कलक्टर हो, एसपी हो, कोतवाल हो, दारोगा हो, इतना ही नहीं तबादले की फीस लेते हो, बहाली की फिस लेते हो, भरतीयों में अपनी फीस लेते हो, हो न आप अजब के आदमी, इस युग में भी सामंत। कैसे आएंगे ईमानदार अफसर, कौन करेगा ईमानदारी से काम ! 

धन्य हो प्रभु ! मंत्री होकर पैसा वसूलना कोई आपके लिए शर्म की बात नहीं है बल्कि सम्मान की बात है। शर्म तो हमें आती है की आप जैसे मंत्री को हम जानते हैं ?

धन्य हो मंत्री जी, आप राजनेता हो और नेता भी आप बनाते हो ?
कौन कहता है आपकी  कोई जाती भी है ? आपकी कोई जाती नहीं है ? कोई आप पर जाती का होने का भ्रम करता हो तो "उल्लू है" ? आप किसके हो यह किसी को नहीं पता केवल आपको पता है !  आप अपने परिवार यथा "पुत्र, पत्नी या बहु के हो" ? इसके लिए आपको किसी का गला काटना पड़े तो आप काटोगे ? लखनऊ से काटोगे दिल्ली से काटोगे, कार्यकर्ताओं को धमका के काटोगे,  नेताजी को गरिया के काटोगे जातियों में भेद-भाव करके  काटोगे आप कैसे जातिवादी हो ? भला ऐसे कोई अपनी जाती का भला कर सकटा है ?
जो अपने परिवार को ही जाती समझता उसके लिए जन जन में भेद करता हैं क्या ?

नहीं नहीं ये जातिवादी नहीं हैं ? ये तो केवल समाजवादी हैं समाजवाद में जातिवाद नहीं होता है, परिवारवाद की ही नयी अवधारणा समाजवाद है ? जिस समाजवाद का कोई सिद्धांत नहीं है, कोई हो चोर, उच्चका, छिनरा, दलाल, पूंजीवादी, पाखंडी, सब इस नए समाजवाद के अंग  है, पैसा लूटो, लुटाओ यही तो नया समाजवाद है? नहीं तो कैसे समाजवादी ?

वाह गज़ब का समाजवाद है ? इस समय जिला पंचायत के चुनाव हो रहे हैं टिकट दिए जा चुके हैं, उपरवाले नए समाजवादी भागदौड़ कर रहे हैं, क्योंकि उनके परिवारीजनों को टिकट नहीं मिला है !  जिसको मिला है बता रहे हैं उसके पास चुनाव जितने लायक पैसा नहीं है ? क्योंकि  जिसे वे लडाना चाह रहे हैं  उनके पास पैसा है ! यह पैसा कहाँ से आया है ?  मंत्री जी की काली कमाई का होगा ? तभी तो बिना पैसा वाला चुनाव कैसे जीतेगा क्योंकि मंत्री जी जानते हैं की किसी को भी एकबार चुनाव जितने दिया तो इनका परिवार बेरोजगार हो जाएगा ?
इस मंत्री जी को नहीं पता की परिवार के चक्कर में बड़े बड़े परिवार टक्कर खा गए हैं ? 

मंत्री जी जनता जाग गयी है और अब बिकना नहीं चाहती है,  क्योंकि आपके लिए भी नेताजी जनता से ही गिड़गिड़ाते हैं तब आप जीतते हो कितनीबार पैसे से जीते हो ? परिवार का मोह छोडो कार्यकर्ताओं को आने दो तभी समाजवाद आएगा ? अपने चमचों की फ़ौज़ को रोको ! समाज में समाजवादी ज़िंदा हैं वे अच्छा बुरा जानते हैं, नेताजी के परिवार ने ही अपने समाजवादी कार्यकर्ता को टिकट दिया है ? उन्हें आपके परिवार को आगे बढ़ाकर अपने परिवार को मिटटी में थोड़े ही मिलाना है ?  टिकट मिला नहीं आपके खिलाफ आपके दुर्गुणों के खिलाफ पार्टी ने ईमानदार कार्यकर्ता को टिकट दी है, आप हार-जीत का चक्कर छोडो ?  पार्टी ने उस जिला अध्यक्ष को टिकट दिया जिसने अपने कार्यकाल में सात सात विधायक दिए है जिसमें आप भी हो और मंत्री भी हो !

चुनाव में पैसा चलाओगे तो पैसा ही तुम्हे खा जाएगा जैसे तुम्हारे पैसे के घमंड ने टिकट खा लिया है !

यह बसपा नहीं है जहां पैसा फेंको तमाशा देखो होता है !

जब जब पैसे वाले समाजवादी बनने का नाटक किये तब तब जनता ने उन्हें  धकिया दिया !
अभी तो सरकार है आप हांर जीत की चिंता छोड़ गंगा सागर चले जाओ तब तक इधर चुनाव हो जायेगे ?

शायद आपको पता न हो की ये जनता है ?  अब जनता भी सब जानती है कि आप का दर्द कहाँ है.

-डॉ. लाल रत्नाकर

यह विचार हैं ललित यादव के ;
(जौनपुर जनपद का यह दुर्भाग्य रहा है कि कुछ राजनेता अपने आप को माननीय नेताजी और यशश्वी मुख्यमंत्री माननीय अखिलेश यादव से भी अपने को ऊपर समझते हैं। जब किसी कर्मठ,ईमानदार एवं योग्य कार्यकर्त्ता को टिकट मिलता है तो अपनी सारी ऊर्जा टिकट कटवाने में लगा देते हैं। काश!यही उर्जा माननीय नेता जी के आदेश के पालन में लगाते तो अच्छा रहता। किन्तु वे ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि?उन्हें सत्ता का जो नशा चढ़ा है। अपने अयोग्य पुत्रों एवं बहुवों को एडजस्ट करना है।यह समस्या आज इसलिए है क्योंकि ये महोदय पढ़े-लिखे लोगों को मुर्ख समझते हैं।इसकी वजह इनका दंभ है।विगत लोक सभा चुनाव में इस दंभ का परिचय सार्वजानिक मंच से एक ऐसे गाँव की जनसभा में यह कहकर दिया था की गाँव वालों सुन लो!मैं चुनाव जीतू या हारू कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि?मैं तो मंत्री हूँ और रहूँगा। जौनपुर जनपद में मैंने जब चाहा ,चाहे जिसकी पूँछ को ऊपर कर दिया,जब चाहा नीचे कर दिया।यह भाषण एक ऐसे गाँव में दे रहे थे जहाँ समाजवादी पार्टी सर्वाधिक वोट हर चुनाव में पाती है।ए नेता महोदय राजनीतिक भ्रूण -हत्या के आदी हो चुके हैं। अच्छा सबक सिखाया है उत्तर प्रदेश के यशश्वी मुख्यमंत्री माननीय अखिलेश जी ने इनको।----------

अखिलेश यादव जिंदाबाद 
जय समाजवाद ।)

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