25/08/2016

महामना वी पी मंड़ल साहब को नमन !

डॉ ओम शंकर 
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कार्डियोलोजिस्ट (बी एच यू  वाराणसी )

मित्रों 
आप सभी मित्रों को पिछले सदी के शोषितों के सबसे बड़े महानायक, मंडल साहब के जन्म दिन पर ढेरों शुभकामनायें तथा साधुवाद !

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मित्रो आज 25 तारिख है यानिकि 25 अगस्त,जी हाँ वही दिन जिसदिन आज से ठीक 98 वर्ष पूर्व एक महानायक का उत्तरप्रदेश के काशी शहर में परादुर्भाव हुआ था,जिन्होने मंडल आयोग के अध्यक्ष के तौर पर शोषितों को वो हथियार दिए जिनके बल पर आज इस देश और राज्यों की सत्ताऐं बनती और बिगड़ती हैं और जिनको आज हम शोषितों के सबसे बड़े महानायक के तौर पर भी जानते हैं।जी आपने सही समझा, स्वर्गीय श्री बी पी मंडल साहब,जिनके इस दुनियां में कदम रखते हीं उनके सर से पहले पिताजी का साया छिन गया और फिर कुछ दिनों बाद हीं उनकी माताजी भी उनको बचपन में हीं अकेला छोड़कर इस दुनियां को अलविदा कह गयीं।बिन माँ-बाप के साये में जीना कितना कठिन होता है ये तो बस कल्पनाओं में हीं महसूस किया जा सकता है।ऐसा लगता है मानो ऊपर वाले ने इस हीरे को पैदा करते ही जीवन की आग रूपी भट्ठी में तपाकर तराशने की शुरूआत कर दी थी।प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव के राजकीय विद्यालय में ग्रहण करने के के बाद जब मंडल साहब अपने आगे की पढाई के लिए बिहार प्रान्त में ब्राह्मणों के गढ़ कहे जाने वाले दरभंगा में दाखिला लिया तो वहां उनको पहली बार अनुभूति हुई कि वो जिस जाति और वर्ग में  पैदा लिए हैं उनको ब्राह्मणवादी भारतीय समाजिक व्यवस्था में नीच जाति का माना जाता है।आज मेरे लेख को पढ़ने के बाद आपलोगों की सोच शायद बदल जायेगी कि ब्राह्मण सिर्फ दलितों को हीं अछूत नहीं मानते थे।अम्बेडकर साहब की हीं भांति मंडल साहब को भी क्लासरूम में अलग बिठाया जाता था तथा उनको भी खाना खाने के लिए अलग पंक्ति में बिठाया जाता था।यही सब वो बात थी जो नन्हे मंडल साहब के कोड़े मानस पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ गयी,जो आगे चलकर मंडल साहब को एक ईमानदार,कर्तव्यनिष्ट,न्यायपरायण,और निर्भीक शोषित योद्धा के रूप में उनकी पहचान बनाने में मदगार साबित हुई।
बताते चलें कि जो ब्राह्मणवादी लोग उनको अछूत मानकर क्लास और खाने के समय अपने से अलग बिठाते थे उनमे से किसी की भी माली औकात उनके सामने कुछ भी नहीं थी, क्योंकि मंडल साहब खुद एक जमींदार स्वतंत्रता सेनानी परिवार में पैदा लिए थे।जब वो पटना कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद बी ए इंग्लिश ऑनर्स करने प्रेसिडेंसी कॉलेज कोलकाता पहुंचे तो वहां उनको भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने अपने ओर आकर्षित कर लिया और वो आगे की पढाई छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।भारतीय स्वाधीनता के फलस्वरूप 1952 में हुए पहले हीं विधान सभा चुनाव के बाद मंडल साहब बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली में सबसे काम उम्र के सदस्य के तौर पर चुने गए थे।
मंडल साहब के द्वारा शोषितों के हक़,सम्मान,समानता और बंधुता की लड़ाई का सबसे पहला उदाहरण साठ के दशक का मिलता है जब उन्होने अपने हलवाहे को न सिर्फ लड़कर पहले MLA का  टिकट दिलवाया बल्कि जी जान लगाकर उनको चुनाव जितवाकर बिहार असेंबली में अपने समकक्ष बैठने का अवसर प्रदान किया।
दूसरी घटना पामा कांड के नाम से मसहूर है जब मंडल साहब ने अपने क्षेत्र के पामा गांव में दलितों और अल्पसंख्यको पर हो रहे अत्याचार से इतने विचलित हुए कि, अपने पार्टी और मुख्यमंत्री के विधान सभा में न बोलने के निर्देश को अस्वीकारते हुए, न सिर्फ विधानसभा में इस मुद्दे को उन्होने जोरदार दांग से उठाया बल्कि अपने भाषण के दौरान हीं सदन में अपने पार्टी से इस्तीफा देकर विधान सभा में अपनी सीट बदलकर विपक्ष में जाकर बैठ गए।
भारतीय इतिहास की शायद ये अकेली और अनूठी घटना है जो मंडल साहब के शोषितों के लिए त्याग और समर्पण को सबसे सर्वोपरि बनाता है।
एक और रोचक घटना तब घटी जब इंदिरा गांधी के चिकमंगलूर से चुनाव जीतने के बाद उनकी सदस्यता को असंवैधानिक तरीके से रद्द किया जा रहा था,तो मंडल साहब ने इनका पुरजोर तरीके से विरोध किया जबकि वो उनके विपक्षी पार्टी की सदस्या थीं,अर्थात अन्याय चाहे किसी के साथ हो वो उनके विरोधी थे। 

मंडल साहब के ज़माने में बिहार ब्राह्मणवाद का सबसे बड़ा किला हुआ करता था,जिस किले को मंडल साहब ने धवस्त करते हुए बिहार के दूसरे शोषित मुख्यमंत्री बन बैठे।उनके मुख्यमंत्री बनने की घटना भी ब्राह्मणवादी विरोध का एक सबसे बड़ा उदाहरण है।हुआ यूं कि मंडल साहब को बिहार के पहले शोषित मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेनी थी, परंतु तब के ब्राह्मण राज्यपाल ने उनको सपथ दिलाने से इंकार कर दिया और जाकर रांची में बैठ गए। इस समस्या का हल निकलने के लिए मंडल साहब ने सतीश बाबू को एक दिन के लिए पहले बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई और फिर उनके इस्तीफे के बाद मंडल साहब बिहार के मुख्यमंत्री बन पाये।

उनके मुख्यमंत्री रहने के दौरान बरौनी तेल रिफाइनरी से गंगा में तेल का रिसाव होने के कारण आग लग गयी, जिसके बारे में विधान सभा में बोलते हुए एक घोर ब्राह्मणवादी नेता बिनोदनंद झ ने कहा कि "जब शुद्र मुख्यमंत्री होगा तो गंगा में आग नहीं लगेगी तो और क्या होगा"?

इससे ज्यादा हीन मानसिकता से पीड़ित मानसिक रोगियों के निकृष्ठ सोच का भला दूसरा उदाहरण क्या हो सकता है?
चित्र ; डॉ लाल  रत्नाकर 

उनके छोटे से मुख्यमंत्री काल के दौरान लिए गए फैसले इतने स्वस्थ, निर्भीक और ईमानदार थे कि उनकी सरकार गिरने के बाद राष्ट्रपति शाषण लगने के बाद गवर्नर के एडवाइजर बनाये गए श्री एम एस राव ने उनके समय के फाइल पढ़ने के बाद मंडल सरकार में मंत्री रहे एस एन झा के सामने उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा करने से अपने आपको नहीं रोक पाये।

मंडल साहब के सरकार के गिरने की मुख्य वजह भी भ्रष्ट कांग्रेसियों के भ्रष्टाचार की जाँच के लिए बनी अय्यर कमिटी को निरस्त नहीं करना अर्थात उनकी ईमानदारी,कर्त्तव्य परायणता और उनके शोषक वर्ग का होना हीं था।

🌹ऐसे मंडल साहब को आज उनके जन्मदिन पर मेरा बारमबार नमन।🙏🙏

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