31 जन॰ 2017

कुछ तो कहना पड़ेगा ?

कुछ तो कहना पड़ेगा ?
और हमें खड़ा होना पडेगा ?

डा.लाल रत्नाकर
हर बात के कहने का अपना अर्थ होता है और जो मैं कहने जा रहा हूं वह आपको शायद उतना उपयुक्त ना लगे जितना की उसकी प्रासांगिकता और वास्तविकता है।  उत्तर प्रदेश में चुनाव आसन्न हैं उसी के मध्य यह प्रदेश अपने नए शासक की राह देख रहा है ? जनता के मन में क्या है वह उनके नेताओं को नज़र नहीं आ रहा है इसलिए कि आजकल वह देखना इतना आसान नहीं है क्योंकि इन राजनेताओं के चमचे और उनके चापलूस सलाहकार अपने को जनता की उस इक्षा के मध्य अभेद्य दिवार की तरह खड़े हैं ? उनके खरीदे हुए इन्तजामकार बेहद वाहियात किस्म के लोग है जो कई तरह से बिकते हैं उनकी कीमत देकर उन्हें आज की राजनीति में केवल और केवल सत्ता की वापसी चाहिए होती है ।

जिस तरह से भाजपा, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों का आम आदमी के सुकून की बात करते-करते सत्ता में विराजमान हो गयी और कोई सत्ता से हजारों कोस दूर हो गया लेकिन जिन दलित और पिछड़े विचारों की उनकी पार्टियों को अपनी पहचान और अपनी आइडियोलॉजी ले करके बड़ा होना था वह आज उन्हीं दगे हुए कारतूसों के इशारे पर और उनके घटिया समीकरण पर विश्वास करके जिस राजनीतिक विरासत को हासिल करना चाहते हैं । मुझको लगता है कि वह बेमानी है उसका बहुजन राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, कोई सरोकार नहीं है। क्योंकि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सारे सामाजिक न्याय के संदर्भों को बहुत ही दूसरे तरीके से देख रही है यही कारण है कि राजनीतिक लोगों की जगह पारिवारिक होनहार या निकम्मे पुत्र पुत्रियां जैसे सामंती व्यवस्था में अपने राजपाठ को हासिल करते थे वैसे ही लोकतंत्र के इस दौर में अपनी जगह बनाए रखना चाहते हैं उनके सलाहकार उनके खरीदे हुए इंतजाम कार और लंपट कार्यकर्ता पूरे नेतृत्व को ही भोथरा करके रख दिए हैं । ऐसे समय में हमारी राजनीति का जो पहलू हमारे सम्मुख आता है उसकी अपनी अलग कहानी है । जो निहायत अदूरदर्शी भी है। 

अब राजनितिक पार्टियों में दो नंबर का कोई नेता नहीं होता जिसकी वजह से सब अपनी-अपनी लूट जारी रखते हैं और कोई चारित्रिक राजनैतिक उत्थान कि वहां जगह नहीं है इसलिए वह चारों तरफ भागते रहते हैं शाम तक जो संघी था सुबह समाजवादी हो गया, जो समाजवादी था वह संघी हो गया है।
अब यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई पार्टी की नीतियों के प्रति ईमानदार, वफादार और सैद्धांतिक रूप से जुड़ाव रखता है की नहीं ? बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि नेता के प्रति वह वफादार हो न हो दौलतमंद और धोखेबाज जरूर हो ? कौन है यह कैसी राजनीति है जिसमें एक को धोखा दिया दूसरे को प्रिय हो गया ? उसको धोखा दिया तीसरे को प्रिय हो गया ?  क्या राजनीति का यही चरित्र है और अगर यही चरित्र है तो फिर राजनीति में रहना, राजनीति सोचना, राजनीति करना अधर्म है और ऐसा अधर्म जो धर्म के नाम पर लोगों का शोषण करता हो अपना भरण पोषण करता हो, उससे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं ?
आइए हम ऐसी राजनीति की बात करें जिसमें यह सब ना हो और लोकतंत्र की महत्ता हो विचारधारा हो नैतिकता हो चरित्र हो और जनता की सेवा करने की भावना हो जनता खुशहाल होगी तो हम खुशहाल होंगे । आज भी देश बहुत ही समृद्ध है संसाधन युक्त है, केवल और केवल कमी है नैतिकता और चरित्र की ?
(अखिलेश और राहुल का प्लान सपा और कांग्रेस के गठबंधन के खिलाफ मा.मुलायम सिंह यादव )
आखिर यह कैसी राजनीति है जिस वंशवाद के खिलाफ जनता ने उन्हें नेता बनाया उन्होंने अपना वंश आगे बढ़ाया और उसी जनता से उम्मीद करते हैं कि उनके इन कारनामों को भूल जाए ? इतिहास दोहराया जा रहा है क्योंकि जिस बाप ने बेटे को सल्तनत दी जिसने बेटे को सिंहासन दिया और बेटे ने उसे बनवासी बना दिया ? जिस कांग्रेस को हटाने के लिए दलितों ने उसका हाथ काट कर उसको पकड़ा दिया था, पिछड़ों ने देश और प्रदेश की सत्ता की ओर कूच ही किया था कि उसी वंशवाद ने वंशवादी व्यवस्था का दामन थाम लिया लोगों को लगता है कि इनके साथ होने से जनता इन्हें सत्ता सौंप देगी ? मुसलमान इन के कुकर्मों को भूल जाएगा, दलित और पिछड़े इनको सर पर बैठा लेंगे ? और भागड़ा करेंगे ? क्या सचमुच इस तरह का भूलभुलैया का खेल होने जा रहा है, एक तरफ दो मुही सत्ता सदियों के आंदोलन से निकले हुए संविधान सम्मत सुविधाओं को अवसरों को बंद करने पर आमादा है और दूसरी तरफ दलितों और पिछड़ों का नेतृत्व उन्हीं लोगों के कंधे पर सवार होकर किस ओर इसे ले जा रहा है । इन्होंने उस जनता को जिसने मुट्ठीभर लोगों को समसान की ओर धकेल दिया था उन्हें ये वापस सत्ता में लाने पर आमादा है ।

कौन नहीं जानता उनका इतिहास क्या है मुट्ठी भर लोग करोड़ों लोगों की किस्मत लिख रहे हैं और करोड़ों लोग अपने नेताओं के दोमुंहेपन पर नजर नहीं डाल पा रहे हैं । जिस वक्त उन्होंने अपने पुत्र को अनेकों राजनीतिज्ञों को जो इनके वारिस हो सकते थे जिन्हें उन्होंने तिरस्कृत कर वंशवाद के चलते उत्तर प्रदेश की राज्य सत्ता उन्हें दी उस समय ही समाजवाद का लोप हो चुका था और साम्राज्यवाद का आरंभ अब कौन सी ऐसी घड़ी है जिसमें पुनः समाजवाद जन्म लेगा और जनता की उम्मीदें पूरी होगी । आज का विचारणीय मामला है ?

यह कैसा दौर है जब दुश्मनों से हाथ मिला रहे हैं और उनके पिताजी चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं यह अविश्वसनीय हैं पर उनकी सुनने को ही उनका पुत्र भी और कोई तैयार नहीं है ? क्या सचमुच नेताजी इस गठबंधन के खिलाफ मैदान में आएंगे और आते हैं तो उन्हें हराने के साथ किसी को जिताने की बात करनी चाहिए और वह कौन दल हो सकता है ?

जिसमें समाजवादी मानसिकता और बहुजन की हिफाजत की ताकत हो नेताजी अगर ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास में वह सबसे महान पुरुष और राजनीतिज्ञ माने जाएंगे कि वक्त आने पर उन्होंने अपने पुत्र की तानाशाही के खिलाफ उस ताकत को मजबूत किया है जिसे उन्होंने संघर्ष करके आगे लाने की कोशिश की थी और निश्चित तौर पर यह संगठन जिसने आरक्षण को एक नया आयाम दिया था उस दल का नाम है बहुजन समाज पार्टी 1993 में नेताजी ने अपने समाजवादी दाल के साथ बहुत सारी ऐसी स्कीमें लागू की थी जिनकी वजह से आज उन दोनों की उस एकता की आग उन लोगों को आज भी उस एकता के ताप का एहसास है जो उन्हें इनके प्रति क्रूर रहने की सीख देती रहती है पर इन्हें क्यों समझ नहीं आता ?

जिसके चलते कांग्रेसियों की ऐसी की तैसी हो गई और इनकी लापरवाही ने भाजपा जैसे अविश्वसनीय दल को सत्ता में आने को निमंत्रित किया मैंने पहले भी कहा है नेताजी की कुछ नीतियां जिन्हें वे लागू करना चाहते हैं उनके आस पास खड़े उनके अदृश्य दुश्मन उसे लागू नहीं होने देते यही कारण है कि उनके मूर्ख अनुयायियों ने मायावती के साथ गेस्ट हाउस कांड में जो कुछ किया वह दलितों और पिछड़ों की एकता में बहुत बड़ा रोड़ा बन गया आज मौका है नेताजी को उस भूल को सुधारने का जिसको मायावती ने गांठ की तरह बांध रखा है, उसे खोलने का ?

उस गांठ को खोलिये नेता जी देश संकट में है इसलिए खोलने का प्रयास करिये क्योंकि बदतमीजी आपकी तरफ से हुयी थी ? आप यह कर सकते हैं जो आपका बड्डपन्न होगा ! अगर देश सुरक्षित रहेगा लोकतंत्र बचा रहेगा तो हम आपस में फिर लड़ लेंगे अभी तो हमें चाहिए कि हम इन दोनों से गुजारिश करें कि वे एक साथ आकर इस समय नजाकत को समझें ?

उधर कांग्रेस को इधर भाजपा को हराने की गुहार करनी चाहिए और मेरा विश्वास है कि ऐसा होने पर बहुजन समाजवादी पार्टी निश्चित रुप से देश में बहुजन की बात करेगी और आरक्षण के साथ इमानदारी से खड़ी रहेगी । जिसके लिए नेताजी की कई भूलों पर दलित आँखमूंद लेगा और एक साथ खड़ा होगा।  यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह सारा दोष आप पर जाएगा क्योंकि कांग्रेस और भाजपा दो नहीं एक ही है नेता जी ?

जिसके लिए नेता जी का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण होगा और मायावती अगर इस बात को नहीं मानेगी तो आने वाला युग उनको माफ नहीं करेगा और उनकी दलितों के प्रति ठेकेदारी केवल यह साबित करेगी की वह दौलत की भूखी है और भूखी जनता से उनका कोई लेना देना नहीं है।

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