5 मार्च 2017

गांधी और बाबा साहब के सपनों का भारत

देश के प्रधानमंत्री का बनारस में रोड शो ? 
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ऐसा क्यों कर रहे हैं प्रधानमंत्री जी क्या अब उनके "मन की बात" का असर ख़त्म हो गया है, देश का प्रधानमंत्री बनारस जैसे शहर में रोड शो कर रहा हो तो उससे यही लगता है कि प्रधानमंत्री जी को अपने पर भरोसा नहीं रहा, अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं रहा, मुझे याद है कि प्रदेशों के चुनाव में प्रधानमंत्री आते भी नहीं थे और बहुत आए तो उस राजधानी में आकर के कोई सभा कर दी और वह मैसेज प्रदेश के कोने-कोने में पहुंच गया ।

लेकिन मा. मोदी जी क्या सन्देश पहुंचाना चाहते हैं यह तो उनके मन की बात से भी साफ नहीं होता और न ही उनकी जनसभाओं से ही। पर जिस तरह के तंज वह प्रदेशवासियों पर कस रहे हैं, चाहे उनका हमला प्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश के आम व्यक्तियों पर हो या उनके प्रचारकीय कसीदे जिसे वे समय समय पर कस रहे हैं यह प्रधानमंत्री का धर्म नहीं है। क्योंकि देश का प्रधानमंत्री मात्र किसी दल विशेष का प्रधानमंत्री नहीं है ? उसकी जिस दल से जीत हुई है वह काम प्रधानमंत्री बनते ही खत्म हो गया है और प्रधानमंत्री जी देश के सभी नागरिकों के प्रधानमंत्री हो गए हैं, लेकिन उन्हें लगता है केवल वह कुछ लोगों के प्रधानमंत्री हैं ? जिसमें खास करके उनके मतदाता वर्ग हैं । 

आजकल प्रधानमंत्री जी जिस तरह से एक खास जाति विशेष की तरफ इशारा करते हैं और माननीय प्रधानमंत्री जी का इशारा उस जाति विशेष की इज्जत के लिए प्रश्न चिन्ह बन जाता है ? क्या उस जाति का यह हक बनता है कि वह इन्हें प्रधानमंत्री ना माने ? जब प्रधानमंत्री जी भेदभावपूर्ण नजरिया किसी जाति विशेष के प्रति या धर्म विशेष के प्रति या वर्ग विशेष के प्रति रखकर के काम करते हैं और अपने भाषणों में उसका उल्लेख करते हुए कोई मौन सन्देश देते हैं तो ऐसे प्रधानमंत्री जी हिन्दू धर्म के मंदिरों में किस बात की प्रार्थना कर रहे हैं इस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है ? यह बनारस का सांस्कृतिक माहौल दूषित तो नहीं करना चाहते हैं ?

प्रधानमंत्री जी बनारस का सांस्कृतिक दर्शन कर देश की अवाम को सुख चैन की याचना कर रहे हैं या उन मंदिरों से अपनी और अपनी पार्टी की इज्जत के लिए भीख मांग रहे हैं ? क्योंकि यह वक़्त तो जनता से याचना करने का है क्योंकि इस समय उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव का समय है ? शायद चुनाव आयोग के नियमों की भी अनदेखी प्रधानमंत्री जी द्वारा की जा रही है क्योंकि चुनाव आयोग के स्पष्ट आदेश हैं की राजनैतिक कार्यक्रमों में किसी खास धर्म , जाती और धार्मिक दिखावा आचार संहिता का उल्लंघन मना जाएगा ? उनका यह स्वरूप किसी धार्मिक नेता का चरित्र उजागर करता है ? इनकी देखादेखी उ. प्र. के मुख्यमंत्री जी भी बनारस में जाकर के जिस तरह से मंदिरों में माथा टेक रहे हैं उससे उनकी भी नियति का पता चलता है ? 

यहां पर यह कहना महत्वपूर्ण है कि मायावती ने ऐसा नहीं किया है क्योंकि उन्हें आचार संहिता का शायद ध्यान है और उन्हें यह भी पता है की मंदिरों में उनके जाने से कोई नया वितंडा भी खड़ा किया जा सकता है (यथा मंदिरों की पवित्रता आदि) जो अपने आप में गैर धार्मिक हो जाना नहीं होता । चुनाव के समय राजनेता का मुख्य धर्म होता है कि वह अपने कैंडिडेट के लिए जनता के दरबार में माथा टेके और जनसभाएं करके उसका प्रचार करें और जब उसे धर्म और दर्शन हेतु बनारस आना हो तो मंदिरों में जाकर माथा टेके लेकिन मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को क्या हो गया है ? इससे जनता को तो वह कोई संदेश दे नहीं रहे हैं ? क्या अपने अपने कैंडिडेट की जीत के लिए जनता के विश्वास की वजाय मंदिरों में माथा टेक रहे हैं ? 

इससे किस भारत का निर्माण करना चाहते हैं डिजिटल इंडिया का ? या पाखंड इंडिया का ? पाखंड से तात्पर्य है कि अवैज्ञानिक अवधारणा से सांस्कृतिक साम्राज्यवाद स्थापित करना और जब तक देश इस तरह के धर्म और पाखंड से नहीं निकलेगा तो विज्ञान है और नई टेक्नोलॉजी का क्या होगा ? मुझे लगता है कि धर्म और पाखंड विज्ञान को रोकता है, भेदभाव बढ़ाता है, जातिवाद बढ़ाता है, धर्मांधता बढ़ाता है और विज्ञान व्यक्ति को विकास की ओर ले जाता है।

मैं बनारस में अपनी पढ़ाई के समय इस बात को शिद्दत से महसूस किया हूं कि जिस तरह का हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस में माननीय महामना ने बनाया था उसका असर चौगुना होता यदि वह इस कथित आध्यात्मिक पाखंडी महानगर के धार्मिक और पाखंडी वातावरण की नगरी में ना होता। मैंने उस समय यह महशुस किया और देखा था कि ज्ञान के साथ-साथ जिस तरह का धर्म का मुलम्मा बनारस के मंदिरों से व्यक्ति को बांध देता है, उससे वह जीवन भर निकल नहीं पाता ! कोल्हू के बैल की तरह वहीँ इर्द गिर्द घूमता रहता है ?

दर्शन,साहित्य, संगीत, विज्ञान, समाजशास्त्रीय विद्याओं, तकनिकी, औषधीय  एवं ललित कलाओं का केंद्र कहा जाने वाला विश्वविद्यालय जहां दुनिया भर में अपने यहां से पढ़े लिखे लोगों को प्रसारित किया है या फैलाया हुआ है वही पर वह घोर जातिवाद संकट से निकल नहीं पाया है। जिसकी स्टाफ में देश की अन्य तमाम जातियों का धर्मों का और वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया है और इसका मुख्य कारण है बनारस का पाखंडी और विश्वविद्यालय में जातिवादियों का काबिज होना । कहते हैं यह आस्था और आध्यात्म की नगरी है और आस्था और आध्यात्म मानव के विकास के लिए है पर पाखंड का स्वरूप क्या है ? जो सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने के लिए ही तो है। 

जब पूरी दुनिया घूम घूम कर के देश के प्रधानमंत्री बनारस आये हुए है तो बनारस को दुनिया के मुकाबले कहां खड़ा देख पा रहे हैं, यह तो वह खुद जाने लेकिन जो हम देख पा रहे हैं कि माननीय प्रधानमंत्री जी जिस तरह का पाखंड बनारस पहुंच करके कर रहे हैं वह किसी देश के प्रधानमंत्री के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। जितना समय उन्होंने मंदिरों को दिया है उतना समय देश की किसी समस्या के लिए लोकतंत्र के मंदिर जिसे भारत की संसद कहा जाता है  को शायद ही दिया हो?

देश का प्रधानमंत्री जितना धन, जितना समय अपने खुद के प्रचार प्रसार के लिए व्यय कर रहा है, इतना तो कारपोरेट कंपनियां नहीं करती और शायद यही कारण है कि देश के बहुत सारे विभाग अपने जरूरी काम भी नहीं कर पा रहे हैं, सातवें वेतन आयोग में जिस तरह से वर्तमान सरकार ने कटौती कर के देशवासियों को चुप करा दिया है और नोट बंदी कर के बहुत सारे अनिवार्य कार्य भी रोक दिए हैं, देश के विभिन्न कार्यक्रमों जनोपयोगी योजनाओं को बंद कर दिया गया है, जिससे देश का आर्थिक और सांस्कृतिक विकास होता था । 

आज बहुत सारे संस्थानों को ऐसे कार्यकर्ताओं से सुशोभित कर दिया गया है जिनका उद्देश्य मात्र धर्म प्रचार और पाखंड के सिवाय अवैज्ञानिक ही है चाहे वह विश्वविद्यालय के कुलपतियों का मामला हो या शिक्षा में भगवाकरण का सवाल हो देश के सारे विश्वविद्यालय इसी तरह के भगवाकरण के कारण पठन पाठन की बजाए पाखंड की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसमें पाखंडी बाल-बच्चे अवैज्ञानिक करतूतों से देश को शर्मसार कर रहे हैं । देश संविधान से चलता है और संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले लोग देश चलाने का दंभ भर रहे हैं यही कारण है कि अब वक्त आ गया है कि जनता उठे और इन दंभियों को सबक सिखाएं।

जिसके लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा क्योंकि बिहार के चुनाव में वहां की अवाम ने प्रधानमंत्री को यह बता दिया था कि गपबाजी से प्रदेश नहीं चला करता और नहीं पाखंड से किसी जाति का विनाश हो सकता है।  हां किसी खास जाति विशेष के लिए भारत में पाखंड अनिवार्य हिस्सा है। क्योंकि उसने इस पाखंड से इस देश को अपने कब्जे में कर रखा है, और आज भाजपा उसी वर्ग विशेष को पाखंड करके जिंदा रखना चाहती है। कमोबेश अन्य पार्टियां भी उनके चंगुल से मुक्त नहीं हो पा रही हैं लेकिन जहां संभावनाएं दिखती हो वहां वोट करके जनता को पाखंड पुरोहितों को सबक सिखाना चाहिए ? 

अब सवाल यह है कि उस सत्ता का नेतृत्व किसके हाथ में जा रहा है उसी से यह तय होगा कि गांधी और बाबा साहब  के सपनों का भारत बन रहा है कि नहीं।

डॉ.लाल रत्नाकर 

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