जो हमें करना था यह उन्होंने कर दिखाया !
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समाजवादी पार्टी का विभाजन तो उसी दिन हो गया था जिस दिन अखिलेश यादव ने नेताजी से सब कुछ ले लिया था और नेताजी ने उस दिन समाजवादी पार्टी को समाप्त कर दिया था जिस दिन उन्होंने अपने पुत्र को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था !
यद्यपि मैं भी इस बात का पक्षधर था कि अब अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री का पद दे देना चाहिए और जब यह हुआ हमें भी इस बात की प्रसन्नता हुई कि मेरी भी बात मानी गई है। तब तक मैं अखिलेश यादव के बारे में उतना नहीं जानता था जितना कि उनसे अपेक्षा करता था, समय-समय पर जो बातें आती रहीं उनसे लगता था कि युवा हैं सीख रहे हैं और नेता जी का संरक्षण है बहुत कुछ सीख जाएंगे।
लेकिन जब यह लगने लगा की यह सीख नहीं रहे हैं और लोग इनका दुरुपयोग कर रहे हैं, इसलिए कि या तो यह कुछ जानते नहीं या यह बहुत कुछ जानबूझकर करने दे रहे हैं अक्सर आता था कि वह अकेले मुख्यमंत्री नहीं हैं बल्कि प्रदेश में साढे़ तीन मुख्यमंत्री हैं। आधा मुख्यमंत्री कौन है इस बारे में जो जानकारी हुई उसमें ही इन्हें रखा जाता था।
ख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते य
अब सवाल यह है कि सैफई परिवार का युवराज अपने घर से ही मात खाना शुरु कर दिया है उसके सबसे शक्तिशाली चाचा ने अपनी एक पार्टी बना ली है और ऐसा कहा जा रहा है कि माननीय नेता जी उसी की तरफ हैं, सैफई घर संभालेगा या प्रदेश देश की तो छोड़िए उसके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया।
आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व मुह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था।
इनकेआचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठा
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि क्याकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला । प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्तसाथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं। राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल हैके लायक तो इन्होंने बनने का प्रयास ही नहीं किया।
आजकल बहुत सारे लोग हो सकता है पूर्व मुख्यमंत्री जी को क्या राय दे रहे हो की आरक्षण की वजह से आपका नुकसान हुआ है और पिछड़ी जातियों के लोग आपसे अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया है कि साउथ में तो 70 परसेंट आरक्षण है यहां क्यों नहीं हो सकता गजब के नेता हैं कैसे मुख्यमंत्री रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते यह दिल से यह पूछा जाए क्या यह बात आपको नहीं पता थी तब जब आप मुख्यमंत्री थे और धड़ाधड़ आरक्षण के खिलाफ फरमान जारी कर रहे थे।
जिन लोगों को लगता है कि यह भविष्य के सामाजिक न्याय मांगने वालों के नेता बनने की कुवत रखते हैं, उनसे मैं जानना चाहूंगा कि क्या विरोध में रहकर कि यह बात कही जा सकती है और जवाब सत्ता में होते हैं तो आपको यह याद ही नहीं रहता कि आपकी से लड़ाई को और किसके इशारे पर खत्म कर रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि आरक्षण के नाम पर इनकी सत्ता चली गई और सत्ताधारियों ने इन्हें आरक्षण से गुमराह किया और उनको उमराह किए हुए लोगों के साथ इन्होंने वह काम किए जो उनके मन के अंदर निरंतर मंडल कमीशन के आने के साथ ही चलना शुरू हो गया था।
इनकेआचरण को तो इतिहास भी माफ नहीं करेगा क्योंकि सामाजिक न्याय की जिस इतिहास की सीढ़ी पर चढ़ कर यह आए थे उन्होंने उसी को उठाकर सामाजिक न्याय के विरोधियों को दे दिया किसने कहा था इनको कि आप सवर्णों की राजनीति करिए, क्या वास्तव में देश में स्वर्ण राजनीतिज्ञों की कमी हो गई थी जो उन्होंने यह दाईत्व संभाला ।
प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद के सिवा कोई राजनीतिक समझ या विचारधारा को लेकर के आगे नहीं बढ़ रहा है बल्कि वह नकली लोकतंत्र का नाटक कर रहा है।
यह बात तो जायज है कि जिन लोगों के जिम्मे सामाजिक न्याय के आंदोलन का दायित्व आया या मिला वह सब असामाजिक न्याय के आंदोलन के विरोधी निकले, जिनमें सामाजिक न्याय की समझ है उनका जनाधार नहीं है या वे जनता से दूर हैं। यह भी उनके साथ खड़े हैं जो उन्हें निरंतर धोखा देते रहते हैं और यही कारण है कि देश की 85% की आबादी वाली जमाते उनसे रीरिया रहा हैं जो मात्र 15 % से परास्त हो गई हैं । यह लोभी लालची और सीबीआई से डरे हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते और संघर्ष करने वाले को कमजोर करने का काम करते हैं।
राजनीति करने के अपने तरीके बन गए नए तरीकों के अनुसार नई पार्टियां बना ली जा रही है अभी नई पार्टियों का योगदान बनाने वाले के लिए है जय जनता के लिए है यह विचारणीय सवाल है

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