02/07/2009

हमारे अगुआ और उनकी नियति ?





हमारे अगुआ और उनकी नियति
- डॉ.लाल रत्नाकर

देश में यादवों की संख्या का अनुपात कई जातियों से अधिक है पर उसकी उपस्थिति उस अनुपात में नहीं है, इसकी जिम्मेदारी दूसरों की नहीं यादवों की ज्यादा है ! उसे ज्यादा दुश्मनी यादव से करने में सुकून मिलता है वह किसी भी प्रदेश का हो किसी पद पर हो अपढ़ हो या पढ़ा लिखा हो, धनवान हो या निर्धन हो, एसा क्यों होता है ?
इसके लिए बहुत सारे उद्धरण दिए जाते है फला का श्राप है - फला का श्राप है , यदि एसा है भी तो यह श्राप कब उतरेगा उसकी कोई अवधि नज़र नहीं आ रही है, बड़े -बड़े आंदोलनों की जिम्मेदारी इन पर आई और उसे निभाया भी इन्होने पर आज वह सारा कौशल कहीं डूबता नज़र आ रहा है.एसा क्यों हो रहा है ?
अगर यह गलत नहीं है की यादवों का नेतृत्व कहीं न कहीं गलत हाथों में चला गया है ऐसे लोंगों के हाथों में जो आत्माभिमान या परिवार में एसे उलझे हैं की अपना ही नहीं बल्कि सारे समाज का नाश करते हुए इन्हें जरा भी संकोच नहीं होता, दूसरी ओर इन्होने सारे आन्दोलन को अपनी पैतृक सम्पदा समझ कर हड़प कर जाने और दलालों के हाथ उसकी कीमत देशी और विदेशी सत्ता की खरीददार ताकतों के हाथ बेचते रहे हैं . २४ घंटो में इनके करीब रहने वाले जितनी देर इनके साथ रहते हैं इन्हें बेवकूफी के ज्ञान देते हैं या गुमराह करके असली मुद्दों से दूर रखने के काम करते हैं , बाकी समय इनके नाश की योजनायें बनाते हैं! दरअसल हमारे नेता ऐसे लोगों को सत्ता और संपत्ति बटोरने में लगाये हुए हैं और यादवो को संघर्ष में, जो लोग २४ घंटो इनके शुभेक्च्हू थे और विद्वान् थे उन्हें ये अपने करीब नहीं आने देते !
एक और काम इन्होने किया है जिन ताकतों के बल पर सामाजिक न्याय का आन्दोलन खडा हुआ था उन्हें इन्होने बराबर की हिस्सेदारी नहीं दी,एसा करने के पीछे इनकी नियति निःसंदेह स्वार्थ की थी, इनके टुकड़े के संघर्ष ने सारे संघर्ष को हडप लिया, गैर बराबरी के खिलाफ लड़ने वालों को अपनों की गैर बराबरी ने परास्त कर दिया. औरों से तो वह लड़ रहे थे अपनो ने हरा दिया.बात यहीं ख़तम नहीं होती वर्ग को संकुचित करके जातीय गुंडे और फिर क्षेत्र तथा परिवार और धूर्तों तक समेट कर रख दिया.फिर भी इन्हें जातिवादी दल नहीं नेता कहा गया बात यहीं नहीं रुकी इनके चाहने वाले इतने निराश हुए की सारे सदन की कुल संख्या तो इनके घर वालों के लिए ही कम पड़ जायेंगी फिर इनके बाहुबलीयों का क्या होगा ?
इस कदर निराशा है की किसी भी सदन में एक आदमी नहीं जो सामाजिक न्याय के आन्दोलन पर एक शब्द ईमानदारी के कहे.उधार के पतंग उडाने वाले समाजवाद के नाम पर पूरी जिंदगी देश के सबसे बड़े सदन में काट गए और तो और कई बार मंत्री भी रह लिए.
यह तो कुछ नहीं है ऐसे लुटेरों की कथा लिखी जाये तो निश्चित ही वह अब तक के सबसे लम्बे उपन्यास से भी लम्बा होगा. अगर आप अपने दिमाग पर जोर डालें तो ये नेता उन तमाम कूडों को जो जीवन भर किसी सदन का मुहं तक देखने के लायक नहीं थे उन्हें सांसद विधायक ही नहीं मंत्री तक बनाया.
राजनीति में सब कुछ जायज है यह बात तो समझ में आती है पर अपना घर फूंक कर यह सब करना यह बात समझ में नहीं आती .
और कई महत्व की बातें जो यादव समाज को आज तक बड़ा नहीं होने दे रही है और हर बहादुर यादव अभिमन्यु जैसा लड़ रहा है - शिक्षा का घोर अपमान , धन और सत्ता का अभिमान , चरित्र निर्माण की बजाय अपना ही नहीं औरों का चरित्रहनन . कृष्ण के बन्शज होने का गुमान और उनके चरित्र का सतांश भी अनुकरण नहीं .
सुंदर और पराक्रमी कौम का कौन सा पहलू कमजोर है जिससे शक्तिशाली और बहुसंख्य ईमानदार जाति जिसे कृष्ण के ज़माने से चोर /भले ही माखनचोर कहा हो लेकिन हमेशा अपमानित करने की नियति रही है . उत्तर प्रदेश, हरियाणा ,राजस्थान के कुछ हिस्सों की हालत शायद भिन्न हो सकती है , पर बिहार,मध्य प्रदेश, पूर्बी उत्तर प्रदेश और देश के वे सारे प्रदेश जहाँ यादव अच्छी हालत में है भी और नहीं भी है , पर हालत यह है कि सहयोग के नाम पर एक दूसरे के कितना करीब है यही चर्चा का विषय होना चाहिए ? वह मामला सामजिक हो या राजनीतिक हो अथवा किसी भी प्रकार का हो हर हिस्से में इस प्रकार के काम होने चाहिए ?
हमारे भीतर अंहकार के वृक्ष ने इस कदर जड़ें जमा ली है कि हम अपने आपको उठाने के बजायऔरों के उत्थान में लग गए है सामाजिक सरोकारों के जितने हथकंडे है उसमे फसते जा रहे है,सामाजिक सरोकारों के अनेकों उदहारण है जिसमे सबसे आगे वह लोग थे जिन्हें समाज में जरा सा सर उठाने का मौका मिला औरयह मौका मिलते ही उनके बच्चे उनसे बिलकुल अलग होकर अजातीय बर - बधू ढूढ़ लिए, उन्होंने सबसे पहले अपनी जाति छोड़ी फिर अपने आप समाज छुट जायेगा क्योंकि अब तो कहने मात्र को पुरुष प्रधान समाज रह गया है. सर्वाधिक तो स्त्री समज ने चाहे अनचाहे सामाजिक सरोकारों पर अपना हक़ जमा लिया है . जैसे लम्बे समय तक पुरुषों ने नारियों पर अपना हक बनाये रक्खा था आज अधिकांश जगहों पर यही स्थिति है.
विद्वानों का मानना है कि सामाजिक दशा दिशा दूसरों के तय करने से नहीं होती उसे हर समाज अपने हित में करता है यही कारन है कि सामाजिक न्याय कि लम्बी लड़ाई के बाद जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ यह वर्ग टुकडों में बट गया, कारन स्पष्ट है संघर्ष से निकले अमृत को घुमाकर एसा पिलाया कि वह जहर बन गया. लम्बे समय तक चले इस आन्दोलन ने जहाँ साँस लेना बंद किया वही गिद्धों कि तरह मांस खाने वह आ गए या ला दिए गए जो जीवन भर इस आन्दोलन का विरोध करते रहे. अब क्या था फिर बचे खुचे अमृत को वह डकार रहे है और पालतू कुत्तो कि तरह उन्हें रिश रिशा कर पिलाया भी जा रहा है, और यह प्रचारित किया जाता है कि आरक्षण का सारा लाभ यादवों ने ले लिया जिसे मिला भी कुछ नहीं और आरोपी भी हो गए.
पुलिस कि भरती होगी तो यादव नहीं होगा तो कौन होगा डील - डौल, लम्बाई चौडाई तो उनकी होती ही है इस पर इतना हल्ला मचाता है कि जैसे किसी दूसरे मुल्क के लोंगो को लाकर भर दिया . और तो और घूस लेकर भर दिया, माना कि लिया होगा पर परवर्ती सरकार ने तो कमाल ही कर दिखाया न जाने उसकी अकल थी या वही अमृत चुराने वाले चोरों की सबको हटवा दिया. भला हो न्यायालय का जिसने उनकी रक्षा की.
यही नहीं जो इनके ज़माने में बेचारे पुलिस वाले आये तो सारी नाप जोख तक पर सींकिया पहलवान जूडी बोखार की शीशी के समान पुलिस. मोटी रकम वाले प्रिंसिपल कालेजों में , जगह जगह भारतियों में पैसों का खुल्लम खुल्ला लेंन देंन , पोस्टिंग में एकमात्र एक जाति को चुन चुन कर तवज्जो दी गयी पर इन सबकी अखबारों में कोई चर्चा नहीं हुयी शायद यह सब ठीक ही हो रहा था, करोडों में टिकट, जो ज्यादा लाये वह ले जाये , चोर हो हत्यारा हो डाकू हो , जो भी हो यह गौतम बुद्धा के अनुयायियों और अम्बेडकर के बुत बनाने वालों के हाल है, कांशी राम को बंधक बनाकर मृत्युपर्यंत रखने की कहानी किसी से छुपी तो नहीं है .
यह सब हो रहा रहा है सामाजिक न्याय के चिंतकों और दलितों की अगुआई करने वालों के राज्य में ! दलितों के राज्य में दलितों की हत्या - जौनपुर की घटना एक नहीं अनेक कहानी इन सचेतकों की सच्चाईयों की कहती है.
इन सबको भी क्या आज कल के ऋषियों मुनियों ने श्राप दे दिया है या ये मध्य कालीन अहंकारी शासकों को भी मात करने पर तुले है. क्या इन्हें पता नहीं है जिसके खिलाफ लड़ रही जनता के ये प्रतिनिधि मात्र है राजा नहीं, पर लगता है ये बेहोश है या मदहोश है जेल जाने को. इन्हें वो जेल ले जायेंगे जो इनके साथ लगे है.यह तय है.
जिन्होंने जीवन भर मूर्ति पूजा का बिरोध किया हो उनके बुत बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे है या गाली देने का काम कर रहे है?
दूसरी ओर समाजवादी नए समाजवाद की रचना में लगे है जिसे वह पूजीवाद की झोली में घूस कर ढूंढ़ रहे है, और सहयोग कर रहे है चाँद और सितारों की छांव में बैठे हुए अमृत चुराने वालों के रिश्तेदार. दलाल मंडियों में हुआ करते है नेता जी, नेतृत्व दलालों से जब भी चला है वह उर्ध्वगामी नहीं रहा हमेशा अवनति की ओर गया है . उन विद्वानों व् बिचारे मजलूमों ने जिन्हों ने जाति मोह में आपकी वजह से आपके प्रत्याशी व अपने समाज के गुंडे और अपराधी अहंकारी और मुर्ख को यह जानते हुए वोट किया होगा की यह हमारा प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता फिर भी हमारी जाति का तो है !
यह सब कटु हो सकता है पर है सत्य , अपने अपने तरीके से इसकी काट करेंगे लोग लेकिन उनका हृदय भी यह सच स्वीकारेगा एसा मेरा विश्वास है, सदियों से दगा देने वाले सहसा हितैषी बनकर ही वह काम करते है , फिर फिर हम हर युग में ठगे जाते है .
आज का यह युग बराबरी और बसुधैवकुटुम्बकम का है हम और हमारे कई लोग दुनिया के कई देशों में शीर्ष पदों पर बैठे है, पर एक हमारे अगुआ है की उन्हें स्वदेशी और बिदेशी का एश अभिमान चढा की बदलते परिवेश की राजनीतिक चातुर्य को न समझ पाने की भूल, पाखंड का पोषण और उनके अनचाहे हनुमान बनाकर सत्ता से सदा दूर करने की साजिश का अभिशाप ओढ़ लिया. यदि वहां भी ठहरे रहते तो कल्याण होता न होता पर 'कल्याण' की शरण में तो न जाना पड़ता, चलिए यदि अब कल्याण करना है तो भी सामाजिक शक्तियों की ईमानदार गोल बनानी चाहिए जो कहीं नज़र नहीं आ रही है. एक जमाना था जब जनता नेता के भाषण सुनकर दीवानी हो जाती थी पर अब इनकी चोरी वोरी भी जनता को पता चल जाती है. जिसका ये विरोध करते रहे है उन्ही के यहाँ ये मिन्नतें करते नहीं थकते. यह सब जनता देख रही होती है, नेता जी नयी नीति माना की उद्योगपतियों के पास है तो जनता आपके साथ क्यों रहेगी उनको वोट क्यों न करे, यही कारन है की समाजवाद का ढिंढोरा पिटते हुए नहीं उसे पोसते हुए समाजवाद पनपेगा. जनता का वर्ग नहीं बदल सकता, आपने अपने दामन में झाँका की आय से अधिक संपत्ति आपके ही पास है या न जाने कितनों ने दौलत जुताई है पर जाँच एजेंसियां आपको ही क्यों घेर रही है, क्योंकि वह जानती है की आप बेईमान नहीं हो सकते थे किसी ने आपको सिखा दिया सो गलती हुयी उसे जाँच करके ठीक कर दिया जाये जिससे समाज और समाजवाद सीख ले सके की इमानदार को बेईमान मत बनाओ नहीं तो अर्थ व्यवस्था का सत्यानाश हो जायेगा .
याद है आपको एक दौर था भारतीय राजनीति का जब लगाने लगा था की स्वामी दयानंद , स्वामी विवेकानंद, राहुल संकृत्यायन तथा दलित और पिछडे चिंतकों के तपस्या का परिणाम आने लगा है पिछडों और दलितों के नेतृत्व का दौर आ गया है, पर हम कही न कही गलती जरूर कर रहे है जिससे शक्तिशाली होते हुए भी शिखंडियों के हाथ आहत होते जा रहे है. अधिकारों की इस दौड़ में हम बार-बार छोड़ दिए जाते है, यह किसकी बाजीगरी है अब बंदर की तरह अपनी डोर बाजीगर के हाथ में देने का दौर नहीं रहा,बन्दर कभी हमारे पूर्वज हुआ करते थे यह ठीक है की हनुमान जी हमें सबसे ज्यादा रास आते है सो उन्हें महाबीर जयंती या बुढ़वा मंगल पर सोहारी भी तो यादव ही चढाता है, अखाडे में लंगोट बांध कर उन जैसे उठा उठा कर लोंगो को फेकता भी तो है . यद् करिए हनुमान ने लंका इस लिए नहीं जलाई थी की वह आतंकी थे , जब उन पर अत्याचार हुआ तो उन्होंने सारी लंका को आग लगा दी थी वह अत्याचार और अन्याय के विरोध की मशाल थी. अब वक्त आ गया है मशाल जलाने का लेकिन उस राम के लिए नहीं जो दो भाईयों में एक का अपने स्वार्थ के लिए साथ लेने के लिए मार दिया हो और यह कह कर प्रचारित किया हो की वह दुराचारी था. राम राज्य में दुराचार ?.
समय आ गया है उन तमाम बिखर गए सामाजिक न्याय के शत्रु-मित्र सभी को एकजुट करने का, जो इस आन्दोलन मे आगे आये उनका सम्मान हो जो न आये वह अपनी अधोगति को प्राप्त होंगे यह तय है .


कोई टिप्पणी नहीं:

समर्थक