3 अग॰ 2009

आज सभी किसी न किसी रूप में अपने आधिपत्य बनाने में ...


डॉ.लाल रत्नाकर
सामाजिक सरोकारों का समय आ गया है परन्तु अ़ब उधर किसी की नज़र नहीं है, आज सभी किसी न किसी रूप में अपने आधिपत्य बनाने में जुटे है नियमो की अनदेखी न जाने कितनों की किस्मत रच रही है, जिसमे न जाने कितने अनाथ हो रहे है न जाने कितने एशो आराम कर रहे है और लूटपाट कर रहे है यह छोटे से बड़े स्तर तक सभी का खेल है !
बेईमानी के अनेकों उदाहरण भरे पड़े है जिससे इन्सान खूब फलफूल रहा है, पर परेशान वह है जो आज यह सब नहीं कर पा रहा है! दूसरी ओर इस देश का सौभाग्य कहिये या दुर्भाग्य यहाँ जातियों का संघर्ष कम नहीं हो रहा है, जो कम हो रहा है वह चरित्र है, जिन्हें सड़क पर झाडू लगाना है या सर्वोच्च न्यायालय से फैसला करना है दोनों की प्रणाली की भिन्नता से परे आम आदमी की हिम्मत किस कदर दयनीय हुयी है, दोनों के मुकाबले की हिम्मत लगभग ख़तम होती जा रही है!
एक दौर था जब आम आदमी सडकों पर उतरता था उस आक्रोश के साथ जहाँ ईमानदारी नैतिकता और चरित्र था पर आज हम जिस समाज में जिन्दा है वहां यह सारी बातें बेमानी हो गयी है, धोखा,निन्दा,दंभ इस कदर सर उठा रहा है की उसे दिखाई ही नहीं देता की इन्शान और जानवर में फर्क क्या है, इस कदर बहसी हो गया है की छोटी छोटी बातें भी उसे बड़ी से बड़ी दिखाई देने लगी है, जब पूरी दुनिया एक येसे दौर से गुजर रही है जहाँ आर्थिक उत्थान और तनाव दोनों समान रूप से चल रहा है नए तरह का परिवर्तित किये जाने के दौर के समाज, संस्कृति और अर्थनीति के इंतजाम कारों द्वारा जो कुछ भी रचा जा रहा है उससे आप बेखबर रहे या न रहे वह निरंतर उस बदलाव के एक प्रोसेस को जारी रखे हुए है,
सामाजिक बदलाव का वह प्रोसेस क्या है -
१- आफ्टर मंडल का सामाजिक स्वरुप और उसके निहितार्थ .
२- मंडल के बाद का नेतृत्व और उसकी भूमिका तथा राजनैतिक समझ और चिंतन की विवेचना .
३- उक्त नेतृत्व का अपहरण .
४- अपहृत नेतृत्व का उपयोग और पूरे आन्दोलन के उपयुक्त / विपरीत कार्य .
५- सामाजिक बदलाव के व्यापक रुपरेखा की अज्ञानता एवं निति से अनभिज्ञता.
६- सामाजिक, आर्थिक,सांस्कृतिक तथा राजनैतिक समझ के लोंगों से दूरी.
७- अन्य कारण.
यहाँ यह कहना आवश्यक इसलिए है की मंडल के उपरांत के परिदृश्य का आकलन और उस पर नीति नियति और कार्यवाही का कार्यरूप उसका सामाजिक सरोकार उससे उपयुक्त लोंगों का हित साधन तथा उसके परिणाम.जिसका आकलन समय के साथ किया जाना आवश्यक था जिसकी प्रक्रिया स्व-चंद्रजीत यादव के द्वारा समय समय पर हो रही थी, पर देश के दर्ज़नों राजनेताओ के सामाजिक कार्यों के मूल्यांकन की परिणति से शायद हम खुश न हों पर जो खुश है वह ज्यादा नहीं है.वह शायद यही हाल रहे तो थोड़े दिन ही खुश रहें.
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