31 जन॰ 2010


'गाय की पूंछ पकड़ कर कसाई की तरह घुस आया'/ है. था...  .?
आज बात दलित की नहीं हो रही है आज सत्ता की बात है मायावती का विजन दलित उत्थान का नहीं है मायावती सभी दलितों से महान बनने की प्रक्रिया मे लगी है, जिन दलित नेताओ की प्रतिमाएं मायावती स्थापित करा रही है वह उन्हें ही भयावह बना दिए है की उनकी रक्षा के लिए उन्हें फौज बनानी पड़ रही है, मायावती जी शायद भूल रही है की इंदिरा गाँधी के घर मे उन्ही के रक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी, इसका कारन भी जातीय और धार्मिक उन्माद ही था |
सुमन यादव को दलित स्मिता इन पत्थरो के बुतों मे नज़र आ रही है जिसे "भ.बुद्ध ने, स्वामी दयानंद ने , अनेक दलित नेताओ ने बहुत मुश्किल से खत्म कराया था , जिसे बहन जी ब्रह्मण चतुराई के बसिभूत होकर बुत बनाने मे सारी दौलत समय बर्बाद कर रही है यह सच है की बुद्धिजम दुनिया के अनेक देशों ने स्वीकार किया और आज उनकी जगह हर क्षेत्र मे नज़र आती है पर भारत मे ?

उत्तर प्रदेश मे सामाजिक चेतना बढ़ने वाले बुतों की रक्षा उन बुतों के दुश्मन कैसे करेंगे उनकी,इस  फौज द्वारा किससे रक्षा कराइ जानी है, जो दरअसल बुत तोड़ते और तोरवाते है वह तो आजकल मायावती के साथ ही है, शायद मायावती जी दलितों को ही उस फौज मे रखना चाह रही हों पर आज जो उनके साथ है उन्हें हर जगह बराबर का हक चाहिए तो वह तो रहेंगे ही, जब दलित को अकल आएगी की अब इन बुतों को तोड़ना चाहिए तो यही द्विज फिर इनके काम आयेंगे और मायावती जी के बुत प्रेम के कारन फिर ब्रह्मणवाद  इसका आविर्भाव करेगा तब दलित इनकी चल समझेगा और उनकी नेता द्वारा सारा समय अपने बुतों मे बरबाद करने मे जाया होगा , सामाजिक सरोकार बढ़ाने की बजाय ब्रह्मण सामाजिक सरोकार घटाता है "क्योंकि एन कें प्रकारेण" ऊपर रहना चाहता है .
क्योंकि लबे समय से ब्रह्मिन उत्तर प्रदेश की राजनीती से बाहर था उसे 'सत्ता चाहिए थी' सो समझ से काम लिया 'गाय की पूंछ पकड़ कर कसाई की तरह घुस आया' है . आज हर दलित उसकी चालाकी समझ रहा है पर उसकी मुखिया को क्यों समझ नहीं आ रहा है , 


जैसे मुलायम को नहीं समझ आ रहा था 'अमर' ये किसी दलित और पिछड़े के हितैषी नहीं हो सकते |

डॉ.लाल रत्नाकर


1 टिप्पणी:

निर्मला कपिला ने कहा…

ापकी हर बात से सहमत हूँ मगर दलितों को क्यों इन बुतों मे अपनी रोटी नज़र आती है ये समझ नहीं आता क्या वो इतने सालों मे भी दस्ताके बन्धन से आज़ाद नहीं हुये? या केवल भ्राहम्न्त्व से ही आजादी चाहिये थी। धन्यवाद

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