02/05/2010


आज कांशीराम होते तो मायावती को शाबासी देते

लेखक: आशुतोष  |  March 22, 2010  |  देश-दुनियाब्लॉग   |   2 Comments
मायावती के गले में पड़ी माला देखी तो कांशीराम की याद ताजा हो गयी। कांशीराम के साथ बीते दिन भी याद आये और और वो बातें जो उनके साथ न जाने कितनी बार मैंने की थीं। मैं अक्सर उनसे पूछता था कि उन्हें कैसी सरकार पसंद है वो हर बार यही कहते कि उन्हें मजबूर सरकार अच्छी लगती है। क्यों? उनका जवाब होता जितनी मजबूर होगी वो उतना ही उनके एजेंडे पर काम करेगी। उनका एजेंडा क्या था, यह बताने की जरूरत नहीं है।

कांशीराम एक बात और खूब कहते थे। जहां सब स्थिर सरकार की बातें करते, वो कहते उन्हें स्थिर नहीं अस्थिर सरकार चाहिये। उनकी सोच थी कि जितनी ज्यादा अस्थिरता होगी, उतने ज्यादा चुनाव होंगे और उतना ही ज्यादा दलितों को मोबिलाइज करने का मौका मिलेगा। तब कांशीराम की ये बातें लोगों को अटपटी लगती थीं।
ज्यादातर लोगों को लगता था कि अस्थिरता और मजबूर सरकार उन्हें ज्यादा सौदेबाजी का मौका देती है। लोग तब उनको ज्यादा सीरियसली नहीं लेते थे, लेकिन उनकी राजनीति ने उत्तर प्रदेश में वो हालात पैदा कर दिये कि उनके बगैर सरकार बनाना नामुमकिन हो गया। पहले मुलायम सिंह यादव ने उनकी मदद से सरकार बनायी और उस वक्त के लोगों को याद होगा कि मुलायम कितने मजबूर हुआ करते थे और उन्हें कांशीराम की कितनी सुननी पड़ती थी।
कल्याण सिंह की सरकार भी जब बीएसपी की मदद से बनी तो कल्याण सिंह के पास कांशीराम को सहने के अलावा कोई चारा नहीं था। मुलायम और कल्याण सिहं दोनों ने ही अपनी खुंदक बीएसपी को तोड़ कर निकाली, लेकिन हर बार पार्टी टूटने के बाद कांशीराम का वोट बढ़ता गया और मुलायम और बीजेपी के वोटों में गिरावट आयी।
दरअसल कांशीराम को परंपरागत राजनीतिक मानदंडों के आधार पर देखने के कारण लोग उनके बारे में अजीब धारणा बना लेते थे। लोग कहा करते थे कि कांशीराम अस्थिरता के बहाने ब्लैकमेल किया करते हैं। यह सही भी था, लेकिन ये ब्लैकमेलिंग अलग तरह की थी। इसमें अपना सामाजिक एजेंडा लागू करना और हर हाल में पार्टी का वोटबैंक बढ़ाना अहम था और जितनी बार सरकारें उनकी हुंकार पर हिलतीं थीं उतना ही उनका वोट मजबूत हो जाता था।
ब्राह्मणवादी सोच की वजह से लोग राजनीति की यह नयी परंपरा समझ नहीं पाते थे। कांशीराम की सोच के केंद्र में था दलित और दलित चेतना का उभार। यह वो तबका था जो हजारों साल से दबा-कुचला था जिसने कभी भी सत्ता सुख देखा नहीं था और हमेशा ही उच्च जातियों के हाथों प्रताड़ना सही थी। उसके लिये उच्च जाति के सामने बोलना अपराध था और सामने खड़ा होना पाप।
कांशीराम इस तबके को यह राजनीतिक तौर पर दिखाते थे कि तुम्हें अब उच्च जातियों की गुलामी से बाहर निकलना होगा और तुम सब अगर संगठित हो गये तो सत्ता सुख भोग सकते हो, उच्च जातियों को दलितों के सामने मजबूर होना पड़ सकता है।
वो सही मायनों में दलित सशक्तीकरण का खेल खेल रहे होते थे और ये खेल अपने भाइयों को दिखा कर उन्हें ये यकीन भी दिला रहे होते थे कि उच्च जातियों के सामने दबने के दिन गये और अगर वो चाहें तो इन जातियों को झुका भी सकते हैं और उच्च जातियां उनके सामने हाथ बांधे खड़ी भी हो सकती हैं, इसलिए उन दिनों बीएसपी हमेशा दूसरी पार्टियों को मनुवादी कहा करती थी और कांग्रेस बीजेपी सांपनाथ और नागनाथ के नाम से पुकारे जाते थे।
यह वैचारिक लड़ाई थी। कांशीराम की नजर में बीजेपी और कांग्रेस समान थे। दोनों ही उच्च जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां हैं। इसलिये सांप्रदायिकता के आरोप के बाद भी बीएसपी को कभी भी बीजेपी को सरकार बनाने में मदद देने या लेने में एतराज नहीं हुआ। और न ही इस वजह से कभी भी बीएसपी का वोट बैंक कमजोर हुआ।
सांप्रदायिकता की लड़ाई तो उनके लिये महत्वपूर्ण है जो राजनीति और समाज की मुख्यधारा में हैं, जो हाशिये पर पड़े हैं, उनके लिये सबसे बड़ी विचारधारा तो सम्मानजनक जीवन है। वो तो पहले जातिवाद के राक्षसी चंगुल से निकल कर इंसान बनना चाहते हैं।
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के बाद पहली बार किसी शख्स ने उत्तर भारत में दलित तबके में यह उम्मीद जगाई थी कि उनके जातिवादी बंधन टूट भी सकते हैं। उनकी सरकार बन भी सकती है और उच्च जातियां उनके वजूद को स्वीकार करने को मजबूर भी हो सकती हैं। इस आग ने पहले डीएस-4 को जन्म दिया और बाद में उत्तर प्रदेश में बीएसपी को मजबूत किया।
अंबेडकर दार्शनिक थे, कांशीराम खाटी राजनीतिज्ञ। अंबेडकर ने सोयी दलित चेतना को जगाने का काम किया लेकिन वो कभी भी कांग्रेस सिस्टम को तोड़ नहीं पाये और इसलिये जब उन्होंने राजनीतिक दल बनाया तो नाकामयाब हो गये, लेकिन कांशीराम ने अंबेडकर की बनायी जमीन को उर्वर किया, जागी दलित चेतना को यह भरोसा दिया कि वो अपना दल बना कर उच्च जातियों को टक्कर दे सकते हैं।
इसके लिये जरूरी था कि कांशीराम उच्च जातियों से टकराव मोल लें और उनके झुकने को विजिबिल सिंबल में तब्दील करें। दलित तबका इस असंभव को संभव होते देखे और ये तब तक संभव नहीं होता जब तक कि वो मिलिटेंट आवाज में बात न करें और अपनी मजबूती और उच्च जातियों की मजबूरी का अहसास न करायें।
लोग कहते हैं कि आज कांशीराम होते तो वो मायावती के काम से असहमत होते। मैं कहता हूं कि वो होते तो मायावती को शाबासी देते। लोग भूल जाते हैं कि मायावती की आक्रामकता ने ही कांशीराम को आकर्षित किया था, उन्हें दलित चेतना में आग लगाने के लिये दब्बू किस्म के लोगों की जरूरत नहीं थी।
मायावती को कांशीराम ने प्रशिक्षित किया है और अपने जीते जी उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया था। आज लोग भले ही मायावती के मूर्तियां और म्यूजियम बनाने पर नाक-भौं सिकाड़ें, इसे पैसा कमाने का तरीका मानें लेकिन बारीकी से देखें तो पता चलेगा यह दलित उभार के प्रतीक हैं और उच्च जातियां इन पर जितना बवाल खड़ा करेंगी बीएसपी उतनी ही मजबूत होगी।
इनके बीच मायावती को सिर्फ दलितों को कांशीराम की भाषा में यह संदेश भर देना होगा कि क्या हमें हजारों साल के बाद अपने नेताओं की मूर्तियां बनाने का भी हक नहीं? क्या हमें नोटों की माला पहनने का भी अधिकार नहीं है। यह इस सवाल का जवाब है कि मायावती तमाम हो-हल्ले के बीच दोबारा सार्वजनिक मंच से नोटों की माला पहनती हैं और यकीन मानिये कांशीराम इस पर खुश होते नाराज नहीं क्योंकि वो होते तो वो भी यही करते। (हिंदुस्तान से साभार)

3 टिप्‍पणियां:

honesty project democracy ने कहा…

कहते हैं अंधे में काना राजा ,वही हाल इस वक्त BSP का है / लेकिन जनता जब जागेगी तो BSP को भी अँधा कर गद्दी से उतार फेकेगी / आपके इस सार्थक विवेचना के लिए धन्यवाद /

आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /

Shekhar Kumawat ने कहा…

sahi he

pipal ने कहा…

आपने जो भी विचार वयक्त किये हैं मैं उन से पूरी तरह से सहमत हूँ तथा यह समझता हूँ कि काफी हद तक लोगो के सवालों का जबाब भी मिल गया होगा । बहुजन समाज पार्टी के बारे में लोगो के मन में सरकार बनाने बिगाड़ने को लेकर कई सवाल रहते थे । हो सकता उनके मन में उठ रहीं शंकाओ का समाधान हो । मेरा मानना हे कि बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा सरकार बनाने बिगाड़ने को लेकर जो भी निर्णय लिए जाते हैं वो भविष्य के लिए सही होते हैं तथा हमें उनका सम्मान करना चाहिए ।

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