09/10/2010

बी बी सी हिंदी से साभार - 
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ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है?

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | शुक्रवार, 08 अक्तूबर 2010, 15:22 IST
न्यूज़ीलैंड के स्टार टीवी एंकर पॉल हैनरी ने जो कुछ किया उससे आप चकित हैं? मैं नहीं हूँ.
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ जिस तरह के शब्दों का प्रयोग उन्होंने किया वह असभ्य, अभद्र और असंवेदनशील है.
इसे सुनने-देखने के बाद मैं भी अपमानित महसूस कर रहा हूँ. नाराज़ भी हूँ. लेकिन चकित मैं बिल्कुल भी नहीं हूँ.
चकित इसलिए नहीं हूँ क्योंकि यह व्यक्ति की ग़लती भर नहीं है. यह एक मानसिकता का सवाल है. जिसके दबाव में पॉल हैनरी शीला दीक्षित की खिल्ली उड़ाते हैं. इस मानसिकता से हज़ारों भारतीय हर दिन पश्चिमी देशों और अमरीका में रुबरू होते हैं.
यह मानसिकता पूंजीवादी और सामंतवादी मानसिकता है.
इस मानसिकता से ग्रसित व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को अपने बराबरी पर नहीं देखना चाहता जो कभी उससे कमतर रहा हो. सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक, किसी भी स्तर पर. अगर कोई उसकी बराबरी पर या उससे ऊँचा खड़ा दिखे तो महसूस होने लगता है मानों जूती सर पर चढ़ गई हो.
जो भारतीय उनके ज़हन में अनपढ़, गँवार और ग़ुलाम के रुप में बसे हुए हैं वे आगे निकलते दिख रहे हैं. चाहे वह पेशेवरों के रुप में व्यक्ति हों या फिर अर्थव्यवस्था के रुप में देश.
यह बात आसानी से गले उतर भी नहीं सकती.
ठीक उसी तरह से जिस तरह से भारत में ही दलितों और पिछड़ों का सामाजिक उत्थान अभी भी बहुत से लोगों को अखरता है.
बाबू जगजीवनराम की राजनीतिक रास्ते में कितने कांटे बोए गए. मायावती का राजनीति में उदय उनके समकालीनों के गले में गड़ता रहा है.
बात सिर्फ़ दलित और पिछड़ों भर की नहीं है. यह मामला सामाजिक-आर्थिक उत्थान से भी जुड़ा है. पद और ओहदों से भी जुड़ा है. कहीं-कहीं यह भाषा के स्तर पर भी दिखता है.
ग़ालिब ने उस्ताद ज़ौक के गले में ऐसी ही किसी फाँस पर कहा होगा,
हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है

इसे नस्लभेदी कह देने से मामला आसान दिखने लगता है. लेकिन यह उतना आसान नहीं है. यह उससे कोई महीन चीज़ है.
भारत ने न्यूज़ीलैंड के उच्चायुक्त रुपर्ट हॉलबोरो को तो तलब करके नाराज़गी जता दी.
लेकिन सीएनएन आईबीएन नाम के एक टेलीविज़न चैनल पर साइरस बरुचा ने जो कुछ किया और कहा उसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
शीला दीक्षित के नाम को लेकर जिस तरह का मज़ाक उन्होंने उड़ाया वह कम अपमानजनक नहीं था.
मनोरंजन को लेकर हर देश काल में अलग-अलग प्रतिमान होते हैं. ये प्रतिमान सभ्यता और समाज के साथ भी बदलते हैं. लेकिन एक सीमा रेखा तो खींचनी ही होगी.
पॉल हैनरी के लिए भी और साइरस बरुचा के लिए भी.
( डॉ.लाल रत्नाकर )

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