11 अक्तू॰ 2010

बी.बी.सी.हिंदी से साभार -
मन-मेल के लिए झूठ का मैल निकालें 
हिंदू-मुसलमान
"आपका दोस्त इस घड़ी में भी फच्चर लगाने से बाज नहीं आया." शिकायत मेरे बारे में थी और मुझे ही सुनाई जा रही थी. संदर्भ 30 सितंबर की शाम का था.
टीवी में सभी न्यूज़ चैनलों पर लखनऊ उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत हो रहा था, बीती को भुलाकर अब आगे बढ़ने का आह्वान हो रहा था.
लेकिन मुझ जैसे कुछ लोग "मैं न मानूं" का राग अलाप कर टीवी स्टूडियो का माहौल बिगाड़ने पर तुले थे. मेरे दोस्त का आस्थावान रिश्तेदार उन्हें फोन कर पूछ रहा था कि मेरे जैसे लोग रंग में भंग क्यों करते हैं.
मैं पलटवार कर सकता था. याद दिला सकता था कि रथयात्रा के दौरान यही आडवाणी जी कहते थे कि आस्था का मामला किसी भी कोर्ट कचहरी से ऊपर है. पूछ सकता था कि न्यायालय के निर्णय के प्रति इतनी श्रद्धा कब से पैदा हुई?
कहाँ गई थी यह श्रद्धा 6 दिसंबर, 1992 को, जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं? फिर मैंने सोचा कि दूसरे जो भी करें, कम से कम मेरे जैसे लोगों को तो कोर्ट कचहरी का सम्मान करना चाहिए.

कई सवाल

मैं कई क़ानूनी तर्क गिना सकता था. पिछले दस दिनों में पूर्व-जज राजिंदर सच्चर और अहमदी और राजीव धवन, प्रशांत भूषण और नूरानी साहब जैसे क़ानूनविदों ने तमाम सवाल पूछे हैं, जिनका कोई जवाब उच्च न्यायालय के फ़ैसले में नहीं है.
मिल्कियत का फ़ैसला करने के बजाय संपत्ति के बंटवारे की बात कहाँ से आई? अगर वक्फ़ बोर्ड का दावा ग़लत है तो उन्हें एक-तिहाई हिस्सा भी क्यों दिया गया? उच्च न्यायालय इतिहास के उस सवाल में गया ही क्यों जिसका जवाब देने से सर्वोच्च न्यायालय ने तौबा कर ली थी?
आस्था का एहसास यकायक मिल्कियत का दावा कैसे बन जाता है? क्या अबसे यह छलांग लगाने की इजाज़त सबको मिलेगी? या कोर्ट कचहरी यह सुविधा उन्हीं को देगी जिनके पीछे लाखों की भीड़ हो जिनके हाथों में त्रिशूल हो और जिनके माथे पर तिलक हो?
अयोध्या विवाद ने इस देश का मन तोड़ा है. लाखों-करोड़ों हिन्दुओं और मुसलमानों के मन में जहर घोला है, बैर के बीज बोए हैं. ऐसे गहरे जख्म ऊपरी पोचा-पट्टी से भर नहीं जायेंगे.
इस बीच पिताजी का फोन आता है. मैं उन्हें यह सब क़ानूनी तर्क तफ़सील से समझाता हूँ.
जीवन भर 'न हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा' के सेकुलर विचार में आस्था रखने वाले पिताजी आख़िर में कहते हैं: "बेटा, हो सकता है, क़ानूनी हिसाब से ये फ़ैसला सही न हो. लेकिन किसी को तो इस झगड़े को ख़त्म करना था. कोर्ट ने कम-से-कम एक रास्ता तो दिखाया है. अब बस हिंदू-मुसलमान इसे मान लें और झगड़े को ख़त्म करें. अब ध्यान इसपर दें कि आगे से ऐसा फसाद इस देश में फिर से कभी न हो."

राहत की बात

उनकी बात से मुझे वो शिकायत समझ आई जिसका जिक्र शुरू में किया गया है. सच यह है कि अयोध्या विवाद पर उच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद से आम लोगों ने राहत की सांस ली है.
हिंदुओं और मुसलमानों का बहुमत आज ये चाहता है कि इस फ़ैसले की ज्यादा चीर-फाड़ न की जाए. अगर कुछ तकनीकी गड़बड़ी है भी तो उसे ढका रहने दिया जाए. बस अब इस मामले को रफा-दफा किया जाए.
दरअसल मुझे इसी मानसिकता से ऐतराज़ है. अयोध्या विवाद ने इस देश का मन तोड़ा है. लाखों-करोड़ों हिंदुओं और मुसलमानों के मन में ज़हर घोला है, बैर के बीज बोए हैं. ऐसे गहरे जख्म ऊपरी पोचा-पट्टी से भर नहीं जाएंगे.
समाज के गहरे जख्म को भरने के लिए सच के नश्तर की जरूरत है, ताकि बरसों से पडी मवाद बाहर निकल सके, ताकि दवा और मलहम अपना काम कर सके.
आज हम अपना मन भले ही बहला लें कि यह फोड़ा हमारी आँखों से ओझल हो गया है, लेकिन इलाज किए बिना यह फोड़ा नासूर बन सकता है. एक दिन ऐसी शक्ल में फूट सकता है, जो पहले से भी ज्यादा खौफ़नाक हो.
इस सिलसिले में हमें दक्षिण अफ्रीका के ट्रुथ एंड रेकोन्सिलिएशन आयोग के महान अनुभव से सीखने की जरूरत है. समाज के गहरे जख्म को भरने के लिए सच के नश्तर की ज़रूरत है, ताकि बरसों से पड़ी मवाद बाहर निकल सके, ताकि दवा और मल्हम अपना काम कर सके.
अयोध्या विवाद से टूटे दिलों को जोड़ना है तो सबसे पहले सच बोलने की हिम्मत करनी होगी.

सच क्या है

सच यह है कि जहाँ आज रामलला विराजमान हैं वहां सैंकड़ों वर्षों से एक मस्जिद थी. यह भी सच है कि बहुत लंबे अरसे से वहां के हिंदुओं की आस्था रही है कि वह राम जन्मभूमि है.
इस पुराने झगड़े का हिंदू-मुसलमानों ने अपने तरीके से हल निकाल रखा था. गुम्बद में मुसलमान नमाज़ अदा करते थे तो चबूतरे पर हिंदू आरती करते थे.
सच का सबसे कड़वा पहलू यह है कि विभाजन के बाद से कम से कम तीन बार (पहले 1949 में, फिर 1986 और अंत में 1992 में) प्रशासन की मिलीभगत का फायदा उठा कर हिंदू नेताओं ने क़दम-दर-क़दम मुसलमानों को वहां से बेदखल कर दिया.
न्याय के मंदिर में ठगा महसूस कर रहे मुसलमानों से आज उदारता की मांग करना बेमानी है. इसलिए अब सर्वोच्च न्यायालय के पास जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है.
सरकार की नाक के नीचे एक विवादित मस्जिद को धक्के से मंदिर में बदल दिया गया. इस जोर-जबरदस्ती से अल्पसंख्यक समुदाय को बचाने के बजाए कोर्ट-कचहरी ने भी इस पर मोहर लगा दी.
बहुसंख्यक समाज की धार्मिक आस्था को बचाने के लिए क़ानून, संविधान और देश में आस्था को दांव पर लगा दिया गया. इस सच को स्वीकार किए बिना अयोध्या मामले में कोई मध्यस्थता टिकाऊ नहीं हो सकती.

आंसू न पोंछने वाला फ़ैसला

अयोध्या मसले पर उच्च न्यायालय के फैसले से मेरा असली ऐतराज़ यह नहीं है कि उसका बंटवारा सही नहीं है, या कि उसके कानूनी तर्क नाकाफ़ी हैं. मेरी परेशानी यह है कि सच इस फ़ैसले से गुम हो गया है.
मेरी पीड़ा यह है कि यह फ़ैसला उन आंखों के आंसू नहीं पोंछता जो 6 दिसंबर, 1992 को भीगी थी. (इनमें इस लेखक की दो आंखें भी शामिल हैं)
न्याय के मंदिर में ठगा महसूस कर रहे मुसलमानों से आज उदारता की मांग करना बेमानी है. इसलिए अब सर्वोच्च न्यायालय के पास जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है.
उम्मीद करनी चाहिए कि न्याय के सबसे ऊंचे पायदान पर सच बोलने में किफ़ायत बरतने की मजबूरी नहीं होगी. मुसलमान को यह भरोसा होगा कि उसे इस देश में किराएदार नहीं समझा जाता.
एक बार सच को स्वीकार कर लिया जाएगा तो जमीन के बंटवारे के एक नहीं अनेक रास्ते खुल जाएंगे. अगर तब भी मुसलमानों के राजनीति के ठेकेदार नहीं मानेंगे, तो खुद मुसलमान उन्हें ठिकाने लगा देंगे.
लेख लिखते वक्त चंदन भाई का फोन आया. बोले अंग्रेजी के रेकोन्सिलिएशन का सही हिंदी अनुवाद होना चाहिए "मन-मेल". यह भी बोले कि मन-मेल के लिए पहले मन का मैल निकलना ज़रूरी है. मुझे लगा कि यह बात कहीं रामचरितमानस से जुड़ती है.

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