05/03/2012

भाई शिवपाल के बयान कहीं खेल बिगाड़ न दें !


                      नेता जी से निवेदन है की वह शिवपाल भाई से निवेदन करें की वह जनता की आशाओं का मजाक न बनाएं और प्रदेश का गरिमामयी वजूद गढ़ें । जैसा की सर्वविदित भी है कि सपा की दुश्मनी लगभग सबसे है और सबसे ज्यादा तो मिडिया में बैठे सपा विरोधियों से है, वैसे यह अपना मोर्चा तो संभाल चुके हैं, पर सावधान रहना है समाजवादी पार्टी के प्रवक्ताओं को. यद्यपि जिस तरह के नपे तुले बयान ने अखिलेश यादव की छवि एक समझदार नवयुवक नेता के रूप में निखर कर आयी है, उनको यह छवि बनाये रखना चाहिए और भाई शिवपाल से आग्रह करना चाहिए की वह मौन कायम रखें. और अपने दुश्मनों से बचे रहें. साथ ही सरकार गठन से भाई शिवपाल को दूर रखें . हो सकता है की यह बात उनको अच्छा न लगे पर मेरे मौन रहने से यह बात कोई कहने वाला भी नहीं है.
                          मुझे याद है नेता जी का जब अमर सिंह ने राजनैतिक 'अपहरण' कर लिया था तो किसी ने भी यह हिम्मत ही नहीं की थी तब 'आवाज' के माध्यम से लगातार मैं यह कह रहा था यह 'दलाल' बड़ा धोखा देने जा रहा है जो आगे जा के साबित भी हुआ है.
                         मुझे लगता है की नेता जी की देखरेख में यदि अखिलेश को प्रदेश को आगे ले जाने का मौका दिया जाता है तो प्रदेश में ही नहीं अखिलेश की राजनैतिक सौम्यता  देश को नेत्रित्व के लिए उपयोगी होगी . क्योंकि अब तो विरासत का दौर आमंत्रित कर रहा है, क्योंकि वहां भी मा.नेता जी की अभी भी राजनैतिक हैसियत है जिससे देश में वह नयी लहर पैदा कर सकते हैं.
                         बहुत कम लोग जानते हैं की देवीलाल के जन्मदिन का ७५वा  जन्मदिन मनाया जा रहा था उसका संयोजकत्व मा. नेता जी के पास था. आज़  तक उस तरह का आयोजन तो देखा नहीं, फिर सारे बदलाव कई सरकारें उनका मंत्रित्वकाल केन्द्रीय सरकार का. पर उसको जितना प्रचारित किया जाना था उसकी बजाय उसे दबाया ही गया है. जो दुखद है.
                           नेता जी की कुछ सीमाएं हैं जहां कई लोग उन्हें खंडित करते हैं जिनमें उनके करीबी लोग ज्यादा हो जाते हैं, नेता जी ने  कई बार स्वीकार किया है की बाहर का विरोधी कुछ नहीं कर सकता, जितना नुकसान भीतर बैठा आदमी करता है, यह बात आगरा अधिवेशन  में कोर ग्रुप की बैठक में कपिलदेव सिंह और के.सी.त्यागी के लिए उन्होंने कहा था, यदि उस दिन बीच में जनेश्वर मिश्र न आते तो उसी दिन उन दोनों पर जीतनी 'गाज़' गिरती या गिर चुकी थी, यहाँ तक की नेताजी ने उनको पार्टी छोड़कर चले जाने को भी कहे थे. और वो जिस तरह झुके अपनी कुटिलताओं को समेटे चिपके रहे थे उन्हें रुके रहने का पूरा प्रयास जनेश्वर जी ने किया था . आज भी नेता जी के पास जो राजनैतिक खज़ाना है उसको देश के लिए इस्तेमाल के लिए 'सुयोग्य' प्रतिनिधि की आवश्यकता है. उस प्रतिनिधित्व में यदि भाई शिवपाल अपने को शरीक करते हैं, तो घर का भविष्य को भी अन्धकार में ले जाना शुरू हो जायेगा, जैसा की पीछे हो भी गया था . इसीलिए उनको घर पर ही छोड़ देना चाहिए की गाँव के लोगों की राजनीती कर सकते हों तो करें.
                                अब नेता जी के पास सुयोग्य प्रतिनिधि के रूप में अखिलेश यादव हैं जो उनकी परंपरा के कुशल संवाहक साबित हो रहे हैं. अतः उनको ही यह दायित्व देना चाहिए. यहाँ यह उल्लेखनीय है की जहाँ 'राहुल' जैसे अपढ़ आदमी को देश के 'प्रधानमंत्री के रूप में परोसा जा रहा हो पूरी कांग्रेस मौन हो वहीँ 'भाई शिवपाल की नियति' अखिलेश को राजनीती में आगे लाकर नेता जी के यश को फैलाने में 'बाधक या रोड़ा नहीं बनने देना चाहिए .
                               एक आग्रह माननीय आज़म साहब से किये जाने हेतु 'आज़म साहब आप तेज़ तर्रार और अनुभवी नेता हैं पर दुखद है की भारतीय राजनीति में परिवारवाद पनप चुका है अतः लोकतान्त्रिक चयन का चलन नेत्रित्व के लिए का लगभग अंत हो चला है, यह जानते हुए यह तो स्वीकारना ही पडेगा की भाई शिवपाल से युवा अखिलेश यादव आपके संरक्षत्व में आपके लिए भी और समाजवादी पार्टी के लिए उपयुक्त रहेंगे यदि समाजवादी पार्टी को सत्ता में बनाए रखना है.' और देश तक ले जाना है. अतः आपका इस चुनाव में अहम् रोल होते हुए भी वह यश जनता में नहीं ले जाया जा पा रहा है.
                               फिर भी यह पार्टी आपकी है आप इसमें आगे रहें या पीछे जो भी नेत्रित्व करेगा उसे आपको निहारना तो पडेगा ही. फिर नेता जी का बेटा हो तो और भी अच्छा है .

  
(जागरण से साभार खबर के आधार पर)
व्यंग;
दे ही दो युवराज को ताज!


अगल-बगल बैठे बगलें झांक रहे सारे चचा, ताउओं को बाअदब सलाम ठोकते हुए विदूषक ने जनता बनकर

सीधे नेताजी से अर्ज किया, हुजूर! यह बेटा अब हमें दे ही दो। जैसे राजा दशरथ ने ऋषियों की रक्षा के लिए 

अपने बेटे दे दिए थे। गुरु ज्ञान और धर्म पालन, दोनों साथ-साथ हो जाएगा। इन खटारा सड़कों और कीचड़ 

सनी पगडंडियों में साइकिल चलाने का हुनर इसी में है। इतने बड़े सूबे के लोगों ने यह बात बटन दबाकर 

कही है। अब धमाके से युवराज का राज्याभिषेक कर दिया जाए। 



दरबार में सन्नाटा है। विदूषक फिर शुरू हुआ, हुजूर! अमर चचा की वक्री वाणी पर न जाइए, उन्हें भला


भतीजे पर कैसे लाड़ आएगा! सम्मोहनी इत्र बांटकर मित्र बनाने वालों के नुसखों पर अमल कर अच्छा


तजुर्बा हो चुका है। दिल पर हाथ रखकर कहिए, वे पहलवानी के दिन, वे साइकिल यात्राएं, बड़े नेताओं की वे


तिरछी मुसकानें... संघर्ष के वे कई वर्ष, वे तजुर्बे...। बेटे ने सारा इतिहास सामने रख दिया कि नहीं! एक


झटके में सारी खोई पूंजी सूद समेत कदमों में रख दी। जो आज्ञा पिताश्री का यह रामायणकालीन


शिष्टाचार...। बताइए, आज के राजघरानों में ऐसे संस्कार बचे ही कहां हैं? 


चचा-ताऊ इस अवांछित के प्रवेश से खिन्न नाखून कुतर रहे हैं। विदूषक ने फिर खुद ही खामोशी तोड़ी-

मालिक! अपना यह प्रदेश थोड़ा उपचार और थोड़ी ताजा हवा मांग रहा है। साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति में

फंसी व्यवस्था थोड़ा-सा इजी होना चाहती है। बेटे ने बढ़िया गणित बनाया है। तीन-तिकड़म की भी कोई

जरूरत नहीं। हर सवाल का जवाब इनके पास है, बिना लाग लपेट, बिना अटके ...। समझ है, शालीनता है,

हौसला है। 

नेता जी थोड़ा-सा मुसकराए। विदूषक फिर बोला, आप तो अब अश्वमेध यज्ञ का सामान जुटाएं और इस सूबे

को युवराज को सौंप दे। सोनिया जी को बेटे को पीएम बनाने की जल्दी है। चचा फारूक का ही उदाहरण

लीजिए। इन्हें कृष्ण का उपदेश सुनाइए। चचा, ताऊ, भाई, भतीजे, राजा-प्रजा आदि-आदि के बारे में जो भी

कहा, बताइए और चाहे तो आप भी त्रिगुणरहित हो जाइए। विविधताओं से भरा इतना बड़ा प्रदेश बहुत कुछ

सिखाने को तैयार बैठा है। बच्चों के मन से चचाओं का डर निकालिए। 

एक दूसरे को ताक रहे चचाओं की भृकुटी तनी देख ऐलान होता है, तख्लिया! विदूषक धीरे से बाहर निकलते

हुए बड़बड़ाता है-जेहि विधि राखे राम, सियासत से हम जैसे विदूषकों का भला क्या काम!

दिनेश जुयाल

(साभार;अमर उजाला - डॉ.लाल रत्नाकर)
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शिवपाल को विश्वास, जरूरी नहीं किसी का साथ
Mar 04, 07:51 am
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश मतदान के बाद अब यूपी की सियासत धीरे-धीरे उबाल पर आ रही है। यूं भी चुनाव के ठीक बाद आए एग्जिट पोल ने समाजवादी पार्टी की बल्ले-बल्ले कर दी है और वह अब अपनी सरकार बनाने के सपने संजोने लगी है। वहीं सपा नेता को पूर्ण बहुमत की उम्मीद है।
लेकिन बहुमत न आने की सूरत में सपा के पास कांग्रेस से गठजोड़ का विकल्प ही बचता है। लेकिन हाल ही में कांग्रेस गठबंधन की सरकार में आए रालोद के अध्यक्ष अजित सिंह सपा के साथ किसी तरह के गठबंधन से इंकार कर रहे हैं। वहीं सपा नेता शिवपाल यादव अपनी पार्टी के पूर्ण बहुमत में आने का दावा भी कर रहे हैं।
सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी समाजवादी पार्टी की मुश्किलें कम नहीं होंगी। क्योंकि जहां अखिलेष यादव को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की बातें चल रही हैं वहीं अखिलेष एक बार फिर मुलायम को इस गद्दी पर काबिज होते देखना चाहते हैं। वहीं दूसरे वरिष्ठ नेता इस बारे पार्टी हाईकमान के निर्णय की बात स्वीकारने की बात कर रहे हैं।
सपा को बहुमत न मिलने की सूरत में कांग्रेस प्रदेश में सरकार बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसके अलावा एग्जिट पोल्स ने सभी पांच राज्यों में बदलाव के संकेत दिए हैं। उत्तार प्रदेश में सपा को भारी बढ़त के साथ बसपा के हाथ से सत्ता खिसकने के पूर्वानुमान लगाए गए हैं। उत्ताराखंड और पंजाब भी परिवर्तन की राह पर जाते दिख रहे हैं। हालांकि पिछले कई चुनावों में पूर्वानुमानों पर खरे नहीं उतरने वाले एक्जिट पोल को लेकर विभिन्न राजनीतिक दल मुतमईन नहीं हैं।
इस बार ये कितने खरे उतरेंगे, यह तो छह मार्च को परिणाम आने पर ही पता चलेगा, लेकिन तब तक के लिए बहस और अटकलें तो शुरू हो ही गई हैं। पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के सामने हमारे देश की चुनावी सर्वे व एक्जिट पोल करने वाली एजेंसियां ज्यादातर सटीक पूर्वानुमान लगाने में विफल रही हैं।
यही वजह है कि अब न तो राजनीतिक दल और न ही आम जनता इनके आंकड़ों पर ज्यादा भरोसा करती हैं। यह अलग बात है कि अधिकृत परिणाम आने तक यह चर्चा का विषय जरूर रहते हैं। देश में चुनाव में इस तरह के पूर्वानुमानों का दौर 1996 के आम चुनावों से शुरू हुआ था। बाद में इनका प्रचलन बढ़ा और कथित तौर पर आंकड़ों को इकट्ठा करने व आकलन के वैज्ञानिक तरीकों का दावा किया गया।
लेकिन, इसके साथ ही इनके गलत साबित होने का आंकड़ा भी बढ़ा। एक-दो बार को छोड़ दिया जाए तो अक्सर ये पूर्वानुमान मतदाताओं के असली मन को पढ़ने में नाकामयाब रहे। 2004 व 2009 के लोकसभा चुनाव हों या 2007 के उत्तार प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव, एक्जिट पोल कसौटी पर खरे नहीं उतरे।
इस बार भी कुछ समाचार चैनलों ने एक्जिट पोल किए हैं। अगर उनके आंकड़ों को माना जाए तो उत्तार प्रदेश में लगभग सभी पूर्वानुमानों में सपा को बहुमत के करीब सबसे बड़ी पार्टी बताया गया है। बसपा को दूसरे स्थान पर, लेकिन सपा से काफी पीछे रखा गया है। भाजपा पहले से बेहतर तीसरे और कांग्रेस चौथे नंबर पर है। कांग्रेस को रालोद गठबंधन का ज्यादा फायदा मिलता नहीं दिख रहा।
पंजाब में सभी पूर्वानुमानों में कड़े मुकाबले में कांग्रेस को अकाली-भाजपा गठबंधन से आगे दिखाया गया है। यही स्थिति उत्ताराखंड की है। वहां भी कांग्रेस, भाजपा पर भारी पड़ रही है। मणिपुर में भी कांग्रेस विपक्षी दलों के गठबंधन से आगे है।
उत्तार प्रदेश में अगर कोई दल पूर्ण बहुमत के पास नहीं पहुंचता है तो काग्रेस और भाजपा कहा खड़ी होंगी? 2014 के लोकसभा चुनावों की रणनीति अभी से बुन रही काग्रेस को अब समाजवादी पार्टी के साथ किसी भी तरह के समझौते में नुकसान दिख रहा है। पार्टी की सोच है कि अगर वह 80 से 100 सीटें तक लाने में कामयाब रही तो वह बसपा के साथ ही सरकार बनाने को वरीयता देगी।
वहीं, भाजपा के लिए सपा के साथ जाने का सवाल ही नहीं। साथ ही वह बसपा से भी हाथ मिलाने को तैयार नहीं है। सपा-बसपा से धोखा खाए बैठे दोनों राष्ट्रीय दलों के इस रुख से उत्तार प्रदेश में सरकार के स्वरूप या उसके भविष्य को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है।
काग्रेस की सारी योजना या सोच सीटों की संख्या पर टिकी हैं। उसकी कोशिश उत्तार प्रदेश की सत्ता में भागीदारी की तो है, लेकिन यह भी वह सीटों की संख्या के बाद ही तय कर सकेगी। कांग्रेस के रणनीतिकारों की सोच है कि वह या तो बसपा को समर्थन दे या उससे ही समर्थन लेकर सरकार बनाए।
सूत्रों का कहना है कि काग्रेस महासचिव राहुल गाधी और उनके करीबी मान रहे हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी की तरफ दोस्ती का कदम उत्तार प्रदेश में काग्रेस के दोबारा पैरों पर खड़े होने की कोशिशों में बाधक होगा। काग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि समाजवादी पार्टी के साथ सरकार बनाने का सवाल ही नहीं उठता। यदि सीटें कम आई तो काग्रेस विपक्ष में बैठेगी।
काग्रेस के मैनेजर मान रहे हैं कि मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के बीच इस चुनाव में काग्रेस ने जो पैठ बनाने की कोशिश की है, वह एक तरह से मुलायम का वोटबैंक ही छीनने के मंतव्य से थी। ऐसे में फिर उनका साथ, मतदाताओं और कार्यकर्ताओं को भ्रमित करेगा। वैसे भी 1990 में जबसे काग्रेस ने मुलायम को समर्थन दिया तबसे उसने उत्तार प्रदेश में सत्ता का मुंह नहीं देखा।
वहीं, अब बसपा के साथ जाने से उसे ऐसा सियासी नुकसान नहीं दिख रहा। बसपा के साथ जाने के इच्छुक वर्ग का मानना है कि दलित वोट पहले भी काग्रेस केसाथ था। यदि सत्ता में बसपा के साथ भागीदारी होती है तो हो सकता है कि पुराना वोट फिर उसके साथ आ सके।
दूसरे राष्ट्रीय दल भाजपा अपने पूर्व अनुभवों के मद्देनजर सरकार बनाने के लिए बसपा के साथ किसी भी तरह के समझौते के लिए अभी तक तो तैयार नहीं है। भाजपा के थिंकटैंक का मानना है कि बसपा के साथ एक बार फिर समझौते का मतलब पार्टी को पीछे धकेलने जैसा होगा। पार्टी के शीर्ष पदस्थ सूत्रों ने कहा कि यदि भाजपा के पास मुख्यमंत्री बनने लायक नंबर नहीं आते तो वह विपक्ष में बैठेगी।
सुझाव---
समाजवादी पार्टी के चिंतकों की चिंता ; यह नहीं है की ऊंट किस करवट बैठेगा, वो तो बैठेगा ही, पर बैठने के बाद उठेगा कैसे, मुझे यह कहते हुए बिलकुल हिचक नहीं है की समाजवादी पार्टी यदि सत्ता में आती है. तो उसे सत्ता प्रबंधकों की अच्छी फौज लेकर आना चाहिए, जनता ने सुशासन के लिए सपा को वोट दिया है. और जनता को मुलायम सिंह से ही आशा भी थी कि 'बहन जी के अनियंत्रित' आचारों से फैले संकट से वही उबार सकते हैं, यथा बड़ी बड़ी आशाओं के साथ मुलायम के तथाकथित स्वार्थी सपाई घात लगाए बैठे हैं. वक़्त आते ही वह अपने कुकर्मों में लग जायेंगे और पार्टी को पिछले वाले चरित्रों से जोड़ने में कामयाब हो जायेंगे.
यदि इन बातों पर ध्यान दे दिया जाय तो सरकार अपने को राष्ट्रिय स्तर पर अपनी 'इमानदार' छाप छोड़ने में कामयाब हो सकेगी क्योंकि 'बहन' जी ने जिस "लूट की छूट" को अंजाम दिया है, वही पुरे देश में चर्चा का कारण बना हुआ है. अतः कृपया -
१.पार्कों और मूर्तियों पर बिना विचारे किसी तरह का बयान न दिया जाय. 
२.प्रदेश में विद्युत् आपूर्ति के लिए तत्काल इंतजामात किये जाय .
३. प्रदेश को बिल्डरों की लूट से रोका जाय और विकास के सरकारी और किसानों के साथ निति तय की जाय (पुणे के माडल पर हो) जिससे किसान खुशहाल हो.
४. शिक्षा के निजीकरण से उपजी लूट को रोकने का प्रयास किया जाय .
५. सभी स्तर के सरकारी शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों व् स्कूलों को नियमतः आरक्षित और अनारक्षित पदों को तत्काल भरा जाय और ईमानदार और सुयोग्य शिक्षा मंत्री दिया जाय .
६.समय पर कर्मचारियों को उनके कार्यालयों में उपस्थिति और नियमितता तय की जाय.
७. भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों और अधिकारीयों को जेल भेजा जाय .
८.तबादले और भर्तियों में 'घुस' पर सख्त रोक लगाई जाए. और इसके व्यवसाय होने से रोक लगाकर  इमानदार और कर्मठ लोगों को मौका दिया जाय.
९. 'शिष्टाचार' का रूप ले चूका 'भ्रष्टाचार' समाप्त करने के लिए एक मंत्रालय बनाया जाय और लोकायुक्त को मज़बूत बनाया जाये.
१०. मंत्रिमंडल में साफ छवि और प्रबुद्ध लोगों को रखा जाए.
यदि इन पर ध्यान नहीं दिया जाता तो सरकार भले ही बन जाय पर जनता का विश्वास नहीं बनेगा  और 'समता  और समाजवादी अवधारणा तार तार हो जायेगी' लोग लोहिया को भूल जायेंगे.
अतः आपकी कोशिस होनी चाहिए की लोहिया के इस सिद्धांत का कडाई से पालन हो आय में १;१० का ही अनुपात हो. एक बात और की 'गुंडा राज' से बचने के बयान मात्र से ही काम नहीं चलेगा उस पर अमल भी आवश्यक होगा.  
(समय समय पर हम एसे सुझाव देते रहेंगे यदि आपके पास भ अच्छे सुझाव हैं तो क्रिपय लिखते रहें.)
(संपादक)

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