26/06/2013

नेताजी की चिंता बाकी के सपाईयों की चिंता नहीं है.

मुलायम ने भी शुरू किया सीक्रेट 'मिशन पीएम', डिंपल के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं हेमा मालिनी



मुलायम ने भी शुरू किया सीक्रेट 'मिशन पीएम', डिंपल के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं हेमा मालिनी
लखनऊ. बिहार में अपना साथी खो चुकी और यूपी में तीसरे नंबर पर खिसक चुकी बीजेपी ने 2014 के आम चुनावों में राज्‍य में सत्‍तारूढ़ समाजवादी पार्टी को भारी चुनौती देने का मन बना लिया हैं। पार्टी ने मुलायम सिंह यादव सहित उनके पूरे कुनबे को 'टार्गेट' पर ले लिया है। बीजेपी की नई रणनीति के अनुसार पार्टी ने मुलायम के साथ ही उनकी बहू डिम्‍पल यादव को भी चुनाव में चुनौती देने का मन बना लिया है। 
भाजपा सूत्रों के अनुसार पिछला चुनाव निर्विरोध जीतने वाली डिम्‍पल के सामने इस बार बीजेपी हेमा मालिनी को उतार सकती है। वहीं फि‍रोजाबाद में पार्टी की फायरब्रांड नेता उमा भारती मुलायम के भतीजे और राम गोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव के सामने चुनौती पेश कर सकती हैं।
मुलायम सिंह यादव और धर्मेंद्र यादव के खिलाफ भी बीजेपी तगड़ा उम्‍मीदवार खड़ा करने की तैयारी में है। खबर यह भी है कि मोदी को यूपी में किसी भी सीट से चुनाव लड़ने की छूट दे दी गई है। मोदी किस सीट से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, यह उन पर ही निर्भर करेगा। 
प्रत्याशियों का रिपोर्ट कार्ड तैयार करा रहे हैं मुलायम
यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कई बार नसीहत और कानून व्यवस्था पर लताड़ चुके सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अब प्रत्येक संसदीय सीट पर लगातार नजर रखने का फैसला किया है। इसके लिए वह प्रत्याशियों के क्षेत्रों का सर्वे करवा रहे हैं। वहां नजर बनाए रखने के लिए पर्यवेक्षकों की न्युक्ति की गई है, जो कि संबंधित लोकसभा सीट की गोपनीय रिपोर्ट सीधे मुलायम सिंह को देंगे। इस बात की पुष्टि सपा सरकार के कद्दावर मंत्री राजेंद्र चौधरी ने भी की है। 
सभी पर्यवेक्षकों को अपनी पहली रिपोर्ट 25 से 30 जून के बीच दे देनी है। सभी को अपने मिशन पर लग जाने की हिदायत दी गई है। प्रभारी के रूप में तैनात हुए मुलायम के ये सिपाही लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मंत्री और विधायकों द्वारा किये गए कार्यों का लेखा-जोखा भी तैयार कर रहे हैं। इस बात की भी जानकारी ली जा रही है कि सरकार की छवि किस तरह की है। इनकी पहले चरण की रिपोर्ट के आधार पर मंत्रिमंडल में भी फेर बदल किया जा सकता है। 
उधर, सपा महासचिव किरणमय नंदा ने कहा कि यदि हमारी पार्टी 40 सीटें भी लाती है तो मुलायम सिंह का पीएम बनना तय है। कुछ दिन पहले मुलायम भी खुद कह चुके हैं कि यूपी में सपा जितनी अधिक सीटें जितेगी, उसकी केंद्र में उतनी ही मजबूत स्थिति रहेगी।
(दैनिक भाष्कर से साभार)
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(प्रसांगिक विश्लेषण)
नेताजी की चिंता बाकी के सपाईयों की चिंता नहीं है.
सपा में कोई ऐसा नहीं है जिसे नेता जी को प्रधानमंत्री बनाने में रूचि हो-
राजनीती में व्यूरोक्रेट हावी होता है यह सुना तो जाता था पर अब तो राजनेताओं की औकात भी वही तय करते हैं  ऐसी ही एक अफसर हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की सचिव श्रीमती अनिता सिंह इनके बारे में जैसा सुनाइ  पड़ता है वाकई यदि सही है तो प्रदेश की राजनीति भगवान् भरोसे ही है, कहते हैं की यदि प्रदेश की सपा सरकार की किसी को चिंता है कि उत्तर प्रदेश की छवि कैसी हो तो वह है श्रीमती अनीता सिंह (सचिव-मुख्यमंत्री) को जो पुरे प्रदेश को अपने अनुकूल चला रही हैं.
मुझे याद है नेताजी मुख्यमंत्री थे और बसपा के साथ उनका गठबंधन था घटना १९९३ की है संयोग ही है की इनके मुख्य सचिव श्री पी.एल. पुनिया हुआ करते थे और मूलतः वह भी हरयाना के थे उस समय पुनिया ने जो कुछ किया उसका खामियाजा नेताजी भुगत चुके हैं. पर अब भी वह नहीं चेत रहे हैं आये दिन अपने युवा पुत्र पर आरोप मढ़ते रहते हैं की यह नहीं कर पा रही है सरकार वह नहीं कर पा रही है सरकार.पर क्या एकबार भी उन्होंने सोचा की इस सब के पीछे वास्तव में कौन दोषी है.
(यहाँ यह बता देना वाजिब है की मायावती को सत्ता में लाने का सारा श्रेय उस दौर के पुनिया का रहा है, यह बात मायावती के अलावा नेताजी अच्छी तरह जानते हैं. जबकि नेताजी ने इस बात को तत्कालीन यूपी निवास में कहा था की यह अपना विश्वासपात्र है और फिर यह स्वीकारा था की उसने बहुत गड़बड़ किया)
वास्तव में नेताजी बहुत ही सरल हैं और सहज भरोसा कर लेते है ऐसे तिकडम्बाज़ों का जबकि नेताजी अच्छी तरह से जानते हैं की २०१४ के परिणाम क्या होंगे! बहुत कुछ उनके मनमाफिक ही होगा पर इन सबके पीछे जो साजिश कर रहा है उससे परिणाम प्रभावित होंगे क्योंकि जिनको उन्होंने सत्ता का सारा जिम्मा सौपा हुआ है, श्रीमती अनीता सिंह के विषय में जो बातें सत्ता के गलियारे से निकल कर आ रही हैं उनमें उनकी इक्षा के बगैर कोई पत्ता भी नहीं फडफडा सकता उत्तर प्रदेश में. और यही कारण है कि प्रदेश की अवाम इतने कम समय में ही यह कहने लगी है की इससे अच्छी तो पिछली सरकार ही थी कम से कम प्रदेश की क़ानून व्यवस्था तो ठीक था .जानने वाले ये बात जानते होंगें अन्यथा नेताजी के मर्जी के अनेक भ्रष्ट मंत्री युवा मुख्यमंत्री के मंत्रीमंडल की इतनी छिछालेदर न करवाते. 
अब सवाल यह है की उत्तर प्रदेश के लोग वोट करेंगे और राय देंगे कोलकता के किरणमय नंदा, क्या समाजवादी पार्टी के पास जमीनी हकीकत समझने वाला कोई प्रवक्ता ही नही रह गया है, सारा प्लान भगवान् भरोसे है सचमुच यदि भाजपा वास्तव में इस कुनबे को रोकना चाहे तो मुश्किलें खड़ी कर सकती है, माना की हेमा कोई राजनीतिग्य नहीं है पर डिम्पल को सिंपल कर सकती है क्योंकि वह भी राजनीतिग्य नहीं है, रही बात नेता जी की तो नेता जी तो अब प्रधानमंत्री की दौड में वास्तव में हैं ही नहीं यह लगभग सभी लोग जानते है, अन्यथा किसी सरकार के बचाने में अपना वक्त बर्बाद न करते और सारा काम प्रधानमंत्री बनने के लिए करते देश का और कौन सा सूबा है जहाँ इनके समर्थक हों.सरकार के स्टार पर यदि देखें तो इस सरकार के जिन मंत्रियों को समझदार कहा जा सकता है उनमें आज़म खान साहब का नाम लिया जा सकता है जो वास्तव में उत्त प्रदेश की राजनीती को समझते हैं बाकी तो उलटे लूट में लगे हैं वो प्रदेश को क्या सपोर्ट करेंगे . तो हो क्या ! यद्यपि यह चिंता मुख्यमंत्री की बजाय  नेता की होनी चाहिए पर आश्चर्य हो रहा है नेताजी को क्या हो गया है, जो नेता यह स्वीकारता रहा हो की यदि हम उत्तर प्रदेश के सारे मंदिर को बहुत सुंदर बनवा दूँ तब भी 'ये' हमें वोट नहीं करेंगे वो ही आज उनकी वोट की उम्मीद लगाये बैठे ही नहीं है बल्कि सबको वैसे ही छोड़ चुके हैं जैसे अमर सिंह के चक्कर में किसी को भी पहचानते ही नहीं थे. और इतना अनर्थ करने में लगे हुए हैं जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती. द्विज महा सम्मलेन (ये एक भी वोट नहीं देंगे नेता जी देख लेना गाली अलग से देंगे) पूरी पिछड़ी कौम को.  
हालाँकि अभी कांग्रेस के गच्चे इन्हें मिलने हैं क्योंकि यदि वो गच्चे न दे तो उसके पास और कुछ है ही नहीं. भाजपा के मोदी फैक्टर में नेता जी का मुश्लिम वोट उधर जाएगा जो भाजपा को परास्त कर रहा होगा, जिसमें बसपा की संभावनाएं ज्यादा लगती हैं क्योंकि बसपा के स्वाभाविक वोटों का अनुपात २२% उनके हिस्से में सॉलिड है "भ्रष्टाचार की सरिता में सभी ओत प्रोत हैं" अतः यह कहना की इनसे किसी को दुराव है तो वह अब नज़र नहीं आता 'जाती का अतिवाद' भी इन्हें मदद करेगा.
भले ही ये नेता जी के कुनबे के लोगों को लगने लगा है की ये जो चाहेंगे वही होगा पर दिखाई कुछ और दे रहा है जो इनके कुनबे को क्यों नज़र नहीं आता, उत्तर प्रदेश भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष का प्रदेश है जिसमें राजपूतों का बड़ा वर्ग उन्हें अपना नेता मानता है ऊ.प्र.की सता में इन राजपूतों का बड़ा हिस्सा आज भी है, सपा इन्ही के समुदाय के लोगों को संपन्न बनाने में लगी हुयी है इसी के साथ साथ ब्रह्मिनों की पूजा अर्चना चल रही है सत्तासुख में उन्हें उनके अनुपात से कई गुना ज्यादा दिया गया है और दिया जा रहा है, ऐसे में जो समाज के लोग कमजोर हो रहे हैं या छूट रहे हैं उनका उत्साह ख़त्म हो रहा है. यदि यही उत्साह ख़त्म हो गया तो सत्ता क्या जीवन जाते देर नहीं लगती नेताजी जबकि आपकी खूबी रही है की आप इसी उत्साह को बढाते रहे हो, ये जिनकी आप याचना कर रहे हो यही आपके वोटरों को रोकेंगे और खरिदेंगे नेताजी और ये विचारे कब तक आपके निक्काम्मों को वोट करते रहेंगे ये बिक जायेंगे नेता जी जब इन्हें लगेगा की इनकी यही औकात है   .नीचे का प्रसंग भी इसी तरह का है, इसी तरह के आक्रोश यादवों के मध्य पैदा हो रहे हैं -
सामयिक सन्दर्भों का विश्लेषण मेरी ही नहीं किसी भी सजग समाज के मध्य निरंतर जारी रहती है, यही कारण है की वह इक्षाशक्ति के मायनों को मूल्यांकित कराती है जो परिणाम आते हैं बहुत ही सूक्ष्म होते हैं , जो राजनेताओं के मोह उत्पन्न करने पर भी पुनारंकुरित नहीं हो पाते, जो भी सिद्धांत भारत के राजनीती में चल रहे हों की उन्हें विक्सित मत होने दो 'भीख दो' जरा उनसे जो इन सब को सह रहे होते है, उसमें गायत्रे प्रजापति होते हैं, संगीता यादव होती हैं, राज नारायण बिंद होते हैं ये समाज को आकर्षित कर सकते हैं पर उसका विकास नहीं, ये काबिल लोग नहीं है, यदि आपको लगता है कि कोई इनको देख कर वोट करेगा तो ये आपकी भूल हो सकती है.
जो नीतियाँ बनाते हैं जो आपके पंचम तल पर बैठते हैं वे किसके लिए काम कर रहे हैं आपको कैसी राइ दे रहे हैं वो आपके वोटर को कितना जानते हैं, उनकी नीतियों से वोट मिलता है नेता जी, आज तमाम पिछड़ों यहाँ तक की बहुतायत में यादवों के युवा और युवतियां पिछली सरकार की भारती की नीतियों से नौकरी कर रहे हैं और खुशहाल है, वे ही वोट करते हैं और अपेक्षा भी रखते हैं पर जो सरकारें इसपर गौर नहीं करतीं इसका मतलब होता है कि उन्हें तो चमचे और चाटुकार घेर लेते हैं, जिसके लिए वो आती हैं उनके वजाय अनेक तरह के धंधे वाजों का काम करती हैं, जो भी हो राजनीती के मायने बदलने होंगे लूट की खुली छुट के मायने बदलने होंगे. वास्तव में यदि ये माद्दा नहीं है तो सबकुछ ठीक है और चुनाओं में उनके ये चमचे भावी सत्ता के लोगों का आकलन कर अपने जुगाड़ वहां ढूढ़ने में व्यस्त हो जाते हैं -
और फक्र से कहते हैं की सत्ता किसी की हो काम तो हमारा ही होगा,
कमोबेस यही हाल सपा का भी है जिसमे पिछली सरकार के तमाम लूटेरे अफसर आज भी अच्छे पदों पर काबिज हैं। कैसे यह तो वही जानें या सरकार जाने.सत्ता के गलियारे हमेशा चाटुकारों से भरे रहते हैं, स्वाभिमानी व्यक्ति इन चाटुकारों से पिछड़ ही नहीं जाता बल्कि इन चाटुकारों से जलील भी होता है, आज यही हाल हर जगह है उ.प्र.की राजधानी लखनऊ हो या उसके जिले हों सभी के ही यही हाल हैं। इन्ही सब के चलते हमारे नेता जी के ख्वाब दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने के हैं, जो हमें तो नहीं लगते की माकूल हों. पर वह तो यग्य और ब्रह्म वंदना में पूरा वक्त दे ही रहे हैं.
डॉ.लाल रत्नाकर 



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