17 अक्तू॰ 2017

प्रसंगवश

(आप से अनुरोध है कि इसे आप पढ़ें पढ़ाएं और अपने मित्रों को भेजें और अपने फेसबुक पेज पर शेयर करें)

-डॉ. लाल रत्नाकर

मित्रों!

सामाजिक सरोकारों का संदर्भ आपके जीवन से जुड़ा होता है और सदियों से हम जिस पाखंड के शिकार हैं उसमें केवल और केवल कुछ खास वर्ग के लोगों का ही उत्थान हुआ है।

और वह उसी संतुष्टि के लिए नाना प्रकार के उत्सव का आयोजन करते हैं जिनमें उनका कौशल उनका पाखंड और उनकी कुटिलता छुपी हुई साजिश के तहत एक उत्सव के रूप में दिखाई देती है जिनके संतुष्टि के लिए ही पूरे समाज को उस पाखंड को स्वीकार करके ऐसे उत्सव के रूप में मनाया जाना प्रचारित है।
जिससे बहुजन की अस्मिता प्रभावित ही नहीं होती है अपमानित और लज्जित भी होती रहती है । ऐसे अपमान की पुनरावृत्ति होती है जिसे हम किसी अपराधबोध के साथ स्वीकार करते जाते हैं और उसका प्रतिवाद करने का साहस नहीं कट्ठा कर पाते।
और ऐसे समय में जब देश पर सामाजिक सरोकारों पर नए तरह के पाखंड का और इस तरह के त्योहारों का हमला है । जिसमें हमें सदियों से चले आ रहे पाखंड और ब्राह्मणवाद का ना तो एहसास होता है और ना ही महान होता है हम कई बार उन्हीं की श्रेणी में खड़े होते नजर आते हैं लेकिन हम कभी उनके साथ खड़े होते नजर नहीं आते जिनके विपरीत इस तरह के आयोजन बहुत योजनाबद्ध तरीके से किए जाते हैं।
आइए ऐसे समय में हमें एकजुट होकर के और अपने लोगों के प्रबुद्ध साथियों के साथ खड़े होते हुए अब तो हमें उस खतरनाक षड्यंत्र से सावधान हो करके एक नए विमर्श की शुरुआत करनी ही चाहिए ।
जैसा कि आप जानते हैं कि हमारे जितने भी उत्सव हैं उसके पीछे बहुजन के महत्वपूर्ण नायकों का किसी न किसी रूप में अपमान किया जाता है। और ऐसे अपमान का हम अपने उत्सव के रूप में मनाने के लिए वाध्य होते हैं क्योंकि हमें इस क्षेत्र में या इस विषय में सोचने के लिए कोई बिंदु ही नहीं दिखाई देता।
हमारे तमाम बहुजन नायकों ने इसी तरह के खतरों से हमें जगाया था और हमें जागरुक भी किया था। लेकिन मौजूदा समय के ऊन राजनेताओं की पाखंडी प्रवृत्ति ने हमें उन तमाम आंदोलनों से अलग करके पुन: पाखंड की ओर ढकेल दिया है ।
अगर हम समय रहते इस षड्यंत्र से न चेते तो हम अपनी आजादी की असली लड़ाई कभी भी नहीं लड़ सकते।
आइए हम नए तरह के विचार तैयार करें और अपने सम्मान के त्योहार मनाएं जिनमें: हमारा सम्मान हो हमारे नायकों का सम्मान हो: यथा
मित्रों !
आँख मूदकर हम जिसे उत्सव मानते हैं वह जश्न है 
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बहुजन नायकों की हत्या का जश्न ?
यही है सांस्कृतिक साम्राज्यवाद !
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राष्ट्रवाद 
हिन्दू राष्ट्रवाद 
यानि
ब्राह्मणबाद
अर्थात
मनुवाद
का पोशक
एकात्म
मानववाद
के रूप में
संविधान पर
हमला !
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संविधान बचाओ 
देश बचाओ !
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बहुजन समाज के लिए अनुकरणीय और अविस्मरणीय आलेख हमने ऊपर लगाया है जिसे किसी हमारे विद्वान साथी ने हमें किसी ने दीपावली का इतिहास लिख कर के भेजा है मेरे WhatsApp पर मुझे लगता है कि यह आप को भी पढ़ना चाहिए और "सांस्कृतिक साम्राज्यवाद" की जड़ में मट्ठा डालने का काम करना चाहिए अन्यथा यह समाज बचेगा नहीं और पूंजीपति सरकार में तो आ ही गया है आगे सरोकार में भी बना रहेगा.
मेरा ख्याल है किसका व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार हो और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को समूल नष्ट किया जाए तभी जाकर के सांस्कृतिक समाजवाद की अवधारणा का जन्म होगा अन्यथा हम पत्थर पीटते रहेंगे और ऐसे नेता पैदा करते रहेंगे जो घोर पाखंडी और ब्राह्मणवादी होंगे।

डॉ.लाल रत्नाकर
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साथियो ……
दरिद्र दीपावली में ही आया जब हमने अपना सब कुछ खर्च करके लूटा दिया।अतः बुद्धिमानी इसमे है कि हम अपना इतिहास जाने और उसको माने।इस दिवाली ऐसा करे तो जानें.......देश के सारे संसाधनो पर सांप की तरह कुंडली मारे बैठे शोषक वर्ग ( ब्राह्मण/ वैश्य) द्वारा आए दिन प्रतिनिधित्व, नौकरी, देश केमूलभूत संसाधनों व अन्य सुविधाओं को खत्म करने के आंदोलन खड़े किए जा रहे है। ताज्जूब है कि हम लोग इन्ही के रीति रिवाजों, त्योहारों,देवी देवताओं व व्यापार को मजबूत कर इस विष बेल को खाद पानी दिए जा रहे है। यदि इनकी जड़ों पर चोट करनी है तो इस दिवाली के धनतेरस को आप बाजार से कुछ भी नही खरीदें क्योकि वे सब हमारे घरों में पहले से हीहै। पूजापाठ नही करें और न ही मंदिर में चढावा दें। सिक्के,गहनें, मिठाइयां ,पटाखों आदि खरीद कर मेहनत का धन व समय बर्बाद न करें । यह सब नकली व मिलावटी चीजें बेच कर अपनी तिजोरियां भर रहे है। खरीद के लिए बिछाए गए पुष्य नक्षत्र व शुभ घड़ी के जाल में न फंसें । याद रखे भारत के बाजार में दलित पिछड़ा समाज सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है हम मजदूरी या नौकरी से जितना कमाते है उसका बड़ा भाग बाजार में खर्च करते है ।कुरीतियों व कर्मकांडों में पसीने के पैसे को पानी की तरहबहा देते है इसलिए हमे आरक्षण विरोधियों के मंदिर व बाजार व्यवस्था पर चोट करना जरुरी है क्योकि शोषितों को पीछे धकेलने की साजिशें इन्हीं के दिमाग व धन से तैयार होती है।हममें अपार क्षमता है यदि दलित/ पिछड़े /आदिवासी ने करवट ली तो सामाजिक आर्थिक परिवर्तन मे देर नहीं लगेगी लेकिन इसके लिए आपको संकल्प लेना होगा।समय,धन,ज्ञानव श्रम का दान देना होगा । तथागत बुद्ध, फुले, शाहू जी महाराज व डॉ आंबेडकर के बताए मार्ग पर चलने से ही हमारा कल्याण है .....!

कृष्ण को पेंट करने का मेरा कोई धार्मिक आशय नहीं है वह एक ऐसे चरित्र हैं जिनमें अवश्य अनेक खूबियां डाली गई हैं और जो सबसे बड़ी खूबी है वह यह है कि वह स्त्रियों को बहुत प्रिय है और इतनी स्त्रियों के साथ उन्हें दिखाकर के जहां उनको रसिया कहा जाता है और रसिया के लिए जिस तरह की मान्यता कालांतर में स्थापित की गई है वह बहुत अच्छी भले ना हो।

लेकिन वही एक ऐसे व्यक्ति हैं जो लांछित किए जाने के बाद भी लांछित नहीं है बल्कि सर्वग्राही हैं।
कृष्ण चरवाहे हैं जैसे महिषासुर बहुजन नायक हैं उन्हें अपमानित करने के लिए भैंसे के रूप में रूपायित किया गया है लेकिन उनके भी इतिहास का कोई बहुत प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है।

निश्चित तौर पर कृष्ण की अवधारणा भले ही काल्पनिक नहीं होगी । लेकिन जिस तरह से उनके चरित्र को रूपायित किया गया है वह निश्चित तौर पर कई जगह ब्राह्मण विरोधी दिखते हैं। 

कृष्ण को बहुजन नायक कहने में ज्यादा हिट हो सकता है बजाए भगवान बनाने के।

और कालांतर में धर्म के इंतजामकारों ने बहुतायत को अपने बस में रखने के लिए उनके नाम का इतना विस्तार किया होगा और देवता बना दिया होगा जैसे वर्तमान समय के राजनीतिज्ञों को पकड़ कर के वह घेर लेते हैं और अपने ही लोगों से दूर कर देते हैं।

हम कौन होते हैं उन्हें प्रमाणिकता देने वाले उनको बहुजन नायकों में ही माना जाना चाहिए क्योंकि जिंहें भगवान बना करके उनके नाम पर कोई खा रहा हूं इस बात का मैं पक्षधर नहीं हूं क्योंकि यह जानकारी यदि कृष्ण या किसी देवी देवता को हो तो वह ऐसा कदापि नही होने देंगे, क्या वास्तव में जिनको भगवान बना करके लूटा जा रहा है उस भगवान को इस बात की जानकारी है।

जी निश्चित तौर पर यह हुआ है। लोहिया जी से इस मसले पर चंदा पुरी ने बहुत सारे सवाल किए हैं जिनके वाजिब उत्तर लोहिया जी के पास नहीं थे।

मेरा यह चित्र "राम-कृष्ण-शिव" जिसे मैं लोहिया के पढ़ने के बाद बनाया था और उन की अवधारणा थी कि यह हमारे देश के सांस्कृतिक स्वरूप है जिसे हमने भगवान बना रखा है । और आप देख पा रहे होंगे कि इनके कैरेक्टरिस्टिक को मैंने रंगों के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की है जिसमें मेरी तत्कालीन कला समझ मैं प्रेरित किया था कि मैं उन्हें चुन चित्रित करूं।

कालांतर में समाजवाद के स्वरूप को देख कर लिया भैया का समाजवाद तिरोहित हो गया और नए समाजवाद की अवधारणा से निहायत नफरत और मैंने फिर अपने चित्रों की दिशा गांव की ओर मोड़ दी थी दोबारा समाजवाद की तरफ मुड़ के भी नहीं देखा? जिस के क्या कारण हैं उसका उल्लेख यहां आवश्यक नहीं है!
जिस तरह से इनकी भगवान होने की अवधारणा चल रही है उससे काफी तरह से सामाजिक स्वरूपों में घालमेल मिला जो बिल्कुल इस तरह के चित्रों से विमुख कर दिया।
मेरा यह चित्र उन दिनों के मेरे कला कार्य का एक प्रचलित शैली का चित्र है जिसे भारत सरकार के पर्यटन विभाग में किसी महत्वपूर्ण स्थान पर लगा रखा है जिसे हम अब कई बार विशिष्ट अतिथियों के आगमन पर अखबारों में छपी उनकी तस्वीर के पृष्ठ भाग में देख पाते हैं।
यह कितनी विडंबना की बात है कि जिससे मैंने रचा है उसकी सूचना भी मुझे ठीक से नहीं है अब वह कहां है।
मेरे चित्रों की पहली सरकारी खरीद जिसे भारतीय पर्यटन निगम ने लिया।

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